Tag Archive | balkahaaniyan

आम का पेड़

aam1

आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: आदर, देख-रेख

एक बार आम का एक बहुत बड़ा पेड़ था. एक नन्हा बालक हर रोज़ उस पेड़ के आस-पास खेला करता था. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ता था, कभी पेड़ के पक्के आम तोड़कर खाता था और कभी पेड़ की छाया में सो जाता था. उसे आम का वह पेड़ बहुत पसंद था और पेड़ को भी उसके साथ खेलना अच्छा लगता था.

aam2

समय बीतता रहा….. नन्हा बालक बड़ा हो गया और अब वह पेड़ के आस-पास नहीं खेलता था.

एक दिन उदास चेहरा लेकर वह लड़का पेड़ के पास वापस आया.

लड़के को देखकर पेड़ बोला, “आओ, मेरे साथ खेलो.”
“नहीं, अब मैं बच्चा नहीं रहा. मैंने पेड़ के आस-पास खेलना छोड़ दिया है,” लड़के ने जवाब दिया. “मुझे खिलौने चाहिए हैं और उन्हें खरीदने के लिए मुझे पैसों की आवश्यकता है.”aam3
“माफ़ करना, मेरे पास पैसे नहीं हैं…. पर तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बेचकर तुम्हें पैसे मिल जाएंगें.”
पेड़ का सुझाव सुनकर लड़का बहुत ही खुश हो गया. फिर पेड़ के सारे आम तोड़कर वह वहाँ से ख़ुशी-ख़ुशी चला गया. काफी समय तक वह लड़का वापस नहीं आया और पेड़ उदास था.

aam4

एक दिन वह लड़का पेड़ के पास पुनः लौटा. इस बार वह बड़ा होकर आदमी बन चुका था. उसे देखकर पेड़ बहुत ही खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो, ” पेड़ ने कहा.
“मेरे पास खेलने का समय नहीं है. मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है. हमें एक घर की ज़रुरत है. क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?”
“माफ़ करना, मेरे पास घर नहीं है. पर अपना घर बनाने के लिए तुम मेरी शाखाएँ काट सकते हो.”

aam5

अतः युवक ने पेड़ की सारी शाखाएँ काट लीं और ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया. उसे खुश देखकर पेड़ प्रसन्न था पर उसके बाद वह युवक वापस नहीं आया. एक बार फिर पेड़ अकेला व उदास था.

कड़ी गर्मी के एक दिन वह युवक लौटा और उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो.”
“मैं उदास हूँ और वृद्ध हो रहा हूँ. अपने विश्राम के लिए मैं नौकायान पर जाना चाहता हूँ. क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?”
“तुम मेरे तने से नाव बना लो. नाव लेकर तुम लम्बी जलयात्रा पर निकल जाओ और यात्रा का आनंद लो.”

aam6aam7

पेड़ की बात सुनकर उस व्यक्ति ने पेड़ का तना काटा और अपने लिए एक नाव तैयार कर ली. वह जलयात्रा पर चला गया और काफी समय तक वापस नहीं आया.

अंततः कई वर्षों के बाद वह व्यक्ति वापस लौटा.
“माफ़ करना, मेरे बच्चे, पर अब मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हें देने के लिए आम भी नहीं बचे हैं, पेड़ ने कहा.
व्यक्ति ने उत्तर दिया, ” अब तो मेरे पास दांत भी नहीं हैं.”
“तुम्हारे चढ़ने के लिए तना भी नहीं बचा है.”
व्यक्ति बोला, “उसके लिए मैं बूढ़ा हो चुका हूँ.”
“मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है…. केवल मेरी मुरझाई हुई जड़ें ही बाकी बची हैं, ” पेड़ ने निराश होकर कहा.
“अब मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. इतने वर्षों के बाद मैं थक चुका हूँ, ” व्यक्ति ने उत्तर दिया.
“अच्छा है! टेक लगाकर आराम करने के लिए पुराने वृक्ष की जड़ें सर्वोत्तम होती हैं.”

वह व्यक्ति मुस्कुराया और वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया.

सीख:
कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता को दर्शाता है. जब हम छोटे होते हैं तब हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम बड़े हो जाते हैं तब हम उन्हें छोड़कर चले जाते हैं और वापस तभी आते हैं जब हमें मदद चाहिए होती है. माता-पिता हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान करते हैं. हमें उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और जब उन्हें हमारी सबसे अधिक ज़रुरत होती है, हमें उनकी मदद अवश्य करनी चाहिए. उन्हें केवल हमारे प्रेम की आवश्यकता होती है और हमारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं.

aam9

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

Advertisements

एक तपस्वी का संकल्प

 

god2

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: दृढ़ निश्चय, श्रद्धा

भगवान् को प्रसन्न करने के मुख्य उद्देश्य से बहुत सारे लोग तप करते हैं. एक तपस्वी ने एक बार भगवान् को प्रसन्न करने का निश्चय किया और अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या करने लगा. उसने सोचा कि अगर वह भगवान् को प्रसन्न करने में सफल हो जाएगा तो उसे आशीर्वाद में भगवान् के दर्शन मिलेंगें. अतः वह प्रतिदिन पेड़ की परिक्रमा करता था और भोजन में रोज़ाना पेड़ के पत्ते खाता था.

एक दिन नारदजी भगवान् के धाम जा रहे थे. रास्ते में तपस्वी को देखकर वह उससे मिलने आ गए. नारदजी को देखकर तपस्वी ने तुरंत उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया. नारदजी के पूछने पर तपस्वी ने भगवान् की कृपा पाने के अपने निश्चय का वर्णन किया. तपस्वी बोला, “नारदजी, मैं कई वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ और इस अम्बली वृक्ष के पत्तों का ही भोजन करता हूँ ताकि मुझे भगवान् के दर्शन हो सकें. आप जब भगवान् से मिलेंगें तो कृपया मेरी ओर से उन्हें मुझे दर्शन प्रदान करने के लिए कहना.” तपस्वी की कहानी सुनकर नारदजी ने निश्चय किया कि वह उसका सन्देश भगवान् तक अवश्य पहुँचाएंगें.

god3

नारद के आगमन पर भगवान् ने उनसे पूछा, “नारद! पृथ्वी से क्या समाचार लाए हो?”

तपस्वी से अपनी मुलाकात का स्मरण करते हुए नारदजी बोले, “भगवन! एक तपस्वी अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा है ताकि उसे आपके दर्शन हो सकें. आप उसे अपने दर्शन कब देंगें?”

god4

भगवान् बोले, “उससे कहो कि मेरे दर्शन पाने के लिए उसे उतने वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने कि अम्बली पेड़ पर पत्ते हैं! ”

प्रभु का कथन सुनकर नारदजी के घुटने ठिठुरने लगे. उनकी टांगें सुन्न हो गयीं मानो वह एक कदम भी नहीं ले पाएंगीं और उनका दिल बैठ गया. उत्सुक तपस्वी को वह यह समाचार कैसे दे पायेंगें. वह तो बेचारा बिलकुल टूट जाएगा. नारदजी ने मन ही मन सोचा, “मैं उससे क्या कहूँगा? वह हिम्मत हार जाएगा और तपस्या के लिए सारा उत्साह गँवा देगा.” इस प्रकार चिंतन करते हुए नारदजी आसमान से पृथ्वी की ओर आ रहे थे जब तपस्वी ने उन्हें देखा. अपना नाम सुनकर, नारदजी तपस्वी के पास गए. तपस्वी यह सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ कि नारदजी भगवान् से मिले थे.god

उसने नारदजी से पूछा, “मेरे लिए भगवान् का क्या सन्देश है?”
नारदजी ने उदासी से उत्तर दिया, “वह मैं नहीं बता सकता क्योंकि मेरी बात सुनकर तुम हिम्मत हार जाओगे और अपनी तपस्या त्याग दोगे.”
तपस्वी ने जवाब दिया, “भगवान् ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं हिम्मत नहीं हारूँगा. कम से कम मुझे प्रभु के दिव्य शब्द सुनने का अवसर प्राप्त होगा. कृपया मुझे ठीक-ठीक बताएं कि भगवान् ने क्या कहा है.”

नारदजी अभी भी अनिश्चित थे. वह सोचने लगे, “क्या मैं इसे बता दूँ? कहीं इस बेचारे का विश्वास न टूट जाए. मैं इसके साथ ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.”

तपस्वी ने पुनः विनती की, “कृपया मुझे भगवान् का सन्देश बताएं.”
इस पर नारदजी बोले, “भगवान् ने कहा है कि तुम्हें और कई वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी. असल में, भगवान् के दर्शन पाने के लिए तुम्हें उतने सालों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने इस अम्बली वृक्ष पर पत्ते हैं.”
तपस्वी आनंदोल्लास हो गया. वह नाचने और गाने लगा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. भगवान् ने अपने धाम से मेरे लिए सन्देश भेजा है. उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वह मुझे दर्शन देंगें.यह वर्ष तो तुरंत ही बीत जायेंगें.”
तपस्वी का प्रेम और हौसला देखकर भगवान् ने तत्क्षण तपस्वी के सामने प्रकट होकर उसे अपने दर्शन दिए. तपस्वी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा.

नारदजी अचंभित थे. उन्होंने भगवान् से पूछा, “प्रभु, आप यहाँ कैसे? आपने तो कहा था कि आप इसे कई वर्षों की तपस्या के बाद दर्शन देंगें.”

god5

भगवान् ने जवाब दिया, “इसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को देखो! यह जानने के बाद भी कि इसे अभी कई और वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी, इसने हिम्मत नहीं हारी और अपना विश्वास बनाए रखा. ऐसे व्यक्ति को मैं दर्शन अवश्य देता हूँ.”

 

सीख:
अगर तपस्वी अपना विश्वास खो देता तो क्या उसे भगवान् के दर्शन प्राप्त हो पाते? नहीं! चूँकि उसने हिम्मत नहीं हारी, भगवान् ने उसे दर्शन दिए. दृढ़ संकल्पी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने पर हमें हार न मानने का निश्चय करना चाहिए और उद्देश्य हासिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास, उचित प्रवृत्ति व विश्वास से काम करना चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

परिस्थितियों को देखने का एक ख़ूबसूरत तरीका

 

    आदर्श : आशावाद
उप आदर्श: विचार में स्पष्टता

एक पिता एक पत्रिका पढ़ रहे थे और उनकी नन्ही बेटी समय-समय पर उनका ध्यान भंग कर रही थी. बेटी को व्यस्त रखने के लिए उन्होंने एक पृष्ठ फाड़ा जिस पर विश्व का नक्शा छपा हुआ था. पिता ने उस पृष्ठ को अनेकों छोटे-छोटे टुकड़ों में फाड़ा और अपनी बेटी से उन सभी टुकड़ों को जोड़कर दुबारा से नक्शा बनाने को कहा. कागज़ की पहेली सुलझाने वह नन्ही लड़की ख़ुशी-ख़ुशी भागकर अपने कमरे में गई.

map1map2map4

पिता को पूरा विश्वास था कि पहेली सुलझाने में बच्ची को पूरा दिन लग जाएगा. वह अपनी इस परियोजना से बेहद प्रसन्न थे और निश्चिन्त होकर पुनः पत्रिका पढ़ने लगे. परन्तु शीघ्र ही नन्ही बालिका पूर्णतया संकलित नक्शा लेकर वापस आ गई. आश्चर्यचकित पिता ने उससे पूछा कि उसने नक्शा इतनी जल्दी कैसे बना लिया. उनकी बेटी ने जवाब दिया, “ओह……पिताजी! कागज़ के दूसरी तरफ एक व्यक्ति का चेहरा था…..map3चेहरा परिपूर्ण करने के लिए मैंने टुकड़ों को जोड़ दिया और इस तरह नक्शा भी सही तरह से बन गया.” ऐसा कहकर पिता को हक्का-बक्का छोड़कर वह भागकर बाहर खेलने चली गई.

 

 

    सीख:
इस संसार में हम जो भी अनुभव करते हैं उनका सदैव एक दूसरा पहलू भी होता है. जब भी हम किसी चुनौती या पेचीदा परिस्थिति का सामना करते हैं तो हमें उसके दूसरे पहलू पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए….इससे हमें समस्या के समाधान का आसान तरीका नज़र आएगा.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक-अर्चना

कूड़ा-कचरे की गाड़ी का सिद्धांत

car1

आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: प्रवृत्ति, रवैया

एक दिन हवाई अड्डे जाने के लिए मैं एक टैक्सी में बैठी. गाड़ी चालक सही लेन में गाड़ी चला रहा था पर तभी एक काले रंग की गाड़ी अकस्मात् ही कहीं से निकलकर हमारी गाड़ी के सामने आ गई. गाड़ी चालक ने झटपट गतिरोधक को ज़ोर से दबाया जिस कारण गाड़ी फिसलकर एकदम से रुकी और दोनों गाड़ियों की टक्कर होते-होते बची.

दूसरी गाड़ी के वाहक ने झटके से सर घुमाया और हमारे ऊपर चिल्लाने लगा. मेरे टैक्सी चालक ने मुस्कुराकर दूसरे चालक को हाथ से इशारा किया. मेरा वाहन चालक वास्तव में स्नेहशील व मित्रवत था.

car3

मैंने उससे पूछा, “उस वाहक के गुस्से से चिल्लाने के बावजूद तुमने उसे मुस्कुराकर हाथ से इशारा क्यों किया? उस व्यक्ति ने तुम्हारी गाड़ी लगभग बर्बाद कर दी थी और हमें अस्पताल पहुँचा दिया था!” इस पर मेरे टैक्सी चालक ने मुझे वह सीख दी जिसे मैंने “कूड़ा-कचरे के गाड़ी का सिद्धांत” का नाम दिया.

वाहक ने मुझे समझाया कि अधिकतर लोग कूड़ा-कचरे की गाड़ी के समान होते हैं. वह गंदगी, कुंठा, क्रोध व निराशा से परिपूर्ण हर तरफ भागते रहते हैं. जब उनका कूड़ा इकट्ठा हो जाता है तब उन्हें उसे फेंकने के लिए जगह चाहिए होती है और कभी-कभी वह उस गंदगी को आप पर उलट देते हैं. उनकी इस करतूत को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए, केवल मुस्कुराकर उनकी ओर इशारा करके, उन्हें शुभकामना देकर आगे बढ़ जाना चाहिए.

car4

सीख:
किसी भी परिस्थिति में विरूद्ध प्रतिक्रिया न दिखाकर हमें सदा परिस्थिति के अनुकूल रहना चाहिए. हमारी प्रवृत्ति बहुत मायने रखती है. नकारात्मक रूप से की गई प्रतिक्रिया से परिस्थिति कभी संवरती नहीं है. हमें अपनी प्रवृत्ति में बदलाव लाना चाहिए विशेषतर तब जब हम परिस्थिति बदल नहीं सकते या परिस्थिति घट चुकी होती है. मन की शान्ति का यही रहस्य है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

माँ के प्रति प्रेम

maa1

आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: आदर

एक नन्हा बालक अपनी माँ के साथ रहता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बालक बहुत ही रूपवान और अत्यंत बुद्धिमान था. समय के साथ-साथ वह बालक और भी अधिक आकर्षक व तीव्रबुद्धि होता गया. परन्तु उसकी माँ हमेशा उदास रहती थी.

एक दिन बालक ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, तुम सदा उदास क्यों रहती हो?”
माँ ने उत्तर दिया, “बेटा, एक ज्योतिषी ने एक बार मुझसे कहा था कि जिनके दाँत तुम्हारे जैसे होते हैं वह जीवन में बहुत विख्यात होते हैं.”
इस पर बालक ने पूछा, “अगर मैं प्रसिद्ध हो जाऊँगा तो क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा?”
“अरे, मेरे बच्चे! ऐसी कौन सी माँ होगी जो अपने बच्चे को प्रसिद्ध देखकर खुश नहीं होगी. मैं तो यह सोचकर उदास रहती हूँ कि जब तुम प्रसिद्ध हो जाओगे तब तुम मुझे भूल जाओगे.”

माँ की बात सुनकर लड़का रोने लगा. वह कुछ देर माँ के सामने खड़ा रहा और फिर घर से बाहर भाग गया. बाहर जाकर उसने एक पत्थर उठाया और अपने दाँतों पर ज़ोर से मारकर आगे के २ दाँत तोड़ दिए. पत्थर के प्रहार से दाँत टूटने पर उसके मुँह से खून बहने लगा.

उसकी माँ भागकर बाहर आई और अपने पुत्र की हालत देखकर दंग रह गई. माँ ने पूछा, “बेटा! यह तुमने क्या किया?”
माँ का हाथ पकड़कर बालक बोला, “माँ, अगर इन दाँतों से तुम्हें कष्ट पहुँचता है और अगर यह तुम्हारी उदासी का कारण हैं तो मुझे यह दाँत नहीं चाहियें. यह मेरे किसी काम के नहीं हैं. मैं इन दाँतों से विख्यात नहीं होना चाहता. मैं आपकी सेवा करके और आपके आशीर्वाद से प्रसिद्ध होना चाहता हूँ.”

दोस्तों, यह बालक और कोई नहीं बल्कि चाणक्य था.

सीख:
माता-पिता व बड़ों का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. हमारे माता-पिता हमसे निस्स्वार्थ प्रेम करते हैं. जो भी अपने माता-पिता से प्रेम करता है, उनका सम्मान करता है और उनकी सेवा करता है उन्हें माता-पिता का आशीर्वाद प्रचुरता में मिलता है जिसकी बदौलत वह सदा खुश रहते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

नदी पार करते हुए एक गुरु और शिष्य

guru1

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बूझ, मन पर नियंत्रण

एक वयोवृद्ध गुरु और उनका युवा शिष्य हिमालय से पैदल चलकर अपने आश्रम वापस लौट रहे थे. रास्ता काफ़ी लंबा था और वह इलाक़ा पहाड़ी होने के कारण वहाँ की सड़कें बेढंगी व कठिन थीं. आश्रम के रास्ते में उन्हें गंगा नदी का एक भाग पार करना था जहाँ पानी का प्रवाह तेज़ था परन्तु प्रचंड नहीं था.

guru2

जब वह दोनों नदी के पास पहुँचे तब देखा कि वहाँ एक युवती बैठी हुई थी जिसका गाँव नदी के उस पार था. अकेले नदी पार करने में उसे डर लग रहा था और इस कारण नदी पार करने में सहायता के लिए वह गुरु के पास आई.

“अवश्य”, गुरु बोले और उसे अपनी बाहों में उठाकर सावधानीपूर्वक नदी के पार ले आए. सही समय पर मदद के लिए युवती ने गुरु को धन्यवाद दिया और अपने रास्ते चली गई. युवा शिष्य इस भाव प्रदर्शन से खुश नहीं था और उसका चेहरा विषादग्रस्त हो गया.

पहाड़ियों में कुछ समय और कठिन व थकाऊ सफर के बाद दोनों आश्रम पहुँचे. आश्रम लौटने के बाद भी युवक स्पष्ट रूप से व्याकुल था. युवक को बेचैन देखकर गुरु ने शिष्य से उसकी उत्तेजना का कारण पूछा.

शिष्य बोला, “गुरुदेव, किसी भी औरत को न छूने का हमने प्रण लिया है पर फिर भी आपने उसे अपनी बाहों में उठाया. हमें आप स्त्री के बारे में सोचने से भी मना करते हैं पर आपने उस स्त्री को छूआ.”

गुरु मुस्कुराये और शिष्य से बोले, “मैंने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की और उसे नदी के पार छोड़ दिया परन्तु तुम तो अभी भी उसे उठाए हुए हो.”

सीख:
गुरु से मिली शिक्षा से हमें उसमें निहित सन्देश पर ध्यान देना चाहिए. हमें शिक्षा का विश्लेषण करके उससे गलत समझ निकालकर स्वयं को उलझाना नहीं चाहिए.

अनुवादक- अर्चना

हाथी और उसकी वृद्ध अंधी माँ

ele2

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: प्रेम, अपने माता-पिता के प्रति सम्मान

बहुत समय पहले हिमालय की पहाड़ियों में कमल के तालाब के पास बुद्ध का जन्म एक हाथी के रूप में हुआ. वह सफ़ेद रंग का अत्यंत सुन्दर हाथी था जिसका चेहरा व पैर मूँगिया रंग के थे. उसकी सूँड़ चाँदी की डोर के समान चमकती थी.

वह हर जगह अपनी माँ के पीछे-पीछे जाता था. उसकी माँ सबसे ऊँचे पेड़ों से सबसे कोमल पत्ते और सबसे अधिक मीठे आम तोड़कर उसे देते हुए बोलती थी, “पहले तुम, फिर मैं.”

ele3

उसकी माँ कमल के तालाब में सुगन्धित फूलों के बीच उसे नहलाती थी. गहरी सांस लेकर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह अपने शिशु के सर और शरीर पर तब तक फुहारती थी जब तक कि वह साफ़ होकर चमकने न लगे. फिर अपनी सूँड़ में पानी भरकर शिशु भी निशाना साधकर अपनी माँ की आँखों के बीच में फुहारे के समान पानी छिड़कता था. जवाब में माँ भी अपने शिशु पर पानी की तेज़ धार छोड़ती थी. इस प्रकार दोनों अपनी-अपनी सूँड़ में पानी भरकर फुहार मारकर एक-दूसरे को गीला करते और प्रसन्नतापूर्वक समय व्यतीत करते थे. कुछ देर पानी से खेलने के बाद दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे.

ele1

अक्सर दोपहर के समय शिशु हाथी की माँ जावाहफल के पेड़ की छाँव में आराम करती और अपने बच्चे को अन्य नन्हें हाथियों के साथ उछल-कूद करते और शोरगुल मचाते हुए खेलते देखती थी. समय के साथ-साथ नन्हा हाथी बड़ा होता रहा और जल्द ही अपने समूह का सबसे विशाल व शक्तिशाली युवक हाथी बन गया. जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया वैसे-वैसे उसकी माँ वृद्ध होती गई. माँ के दाँत पीले पड़कर टूट गए और उसकी आँखों की दृष्टि भी चली गई. युवा हाथी सबसे ऊँचे पेड़ों से कोमल पत्तियाँ व सबसे मीठे आम तोड़कर अपनी प्रिय वृद्ध अंधी माँ को देकर कहता था, “पहले तुम, फिर मैं.”

वह अपनी माँ को कमल के तालाब में मनमोहक फूलों के बीच ठन्डे पानी से नहलाता था. फिर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह माँ के सर व शरीर पर तब तक छिड़कता था जब तक कि उसकी माँ बिल्कुल साफ़ न हो जाती. तत्पश्चात वह दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे. दोपहर के समय वह अपनी माँ की अगुवाई करता और उसे जावाहफल के पेड़ की छाँव में ले जाता था. फिर वह बाकी के हाथियों के साथ घूमने-फिरने निकल जाता था.

एक दिन शिकार के दौरान एक राजा की निगाह इस मनमोहक सफ़ेद हाथी पर पड़ी.
“कितना उत्कृष्ट हाथ है! इसे तो मेरे पास होना चाहिए ताकि मैं इसकी सवारी कर सकूँ !”
राजा ने हाथी को बंदी बना लिया और उसे शाही तबेले में भेज दिया. राजा ने हाथी को रेशम, रत्न तथा कमल के फूलों के हार से विभूषित किया. उसने हाथी को मीठी घास और रसीले आलूबुखारे दिए और उसकी नांद स्वच्छ पानी से भर दी.

ele4

परन्तु युवा हाथी न कुछ खाता और न ही कुछ पीता. वह निरंतर रोता रहता और इस कारण धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा. राजा बोला, “उत्कृष्ट हाथी, मैंने तुम्हें रेशम तथा रत्नों से सुसज्जित किया. मैं तुम्हें बेहतरीन खाना व शुद्ध पानी देता हूँ पर फिर भी तुम न तो खाना कहते हो और न ही पानी पीते हो. तुम्हें किस चीज़ से ख़ुशी मिलती है?” युवा हाथी बोला, “रेशम, रत्न, श्रेष्ठ खाना व स्वच्छ पानी से मुझे ख़ुशी नहीं मिलती है. मेरी वृद्ध व अंधी माँ जंगल में अकेली है और उसकी देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं है. जब तक मैं अपनी माँ को कुछ खाने को नहीं दे देता तब तक मैं खाना व पानी ग्रहण नहीं करूँगा. इससे मेरी चाहे मृत्यु ही क्यों न हो जाए.”

राजा बोला, “ऐसी अनुकम्पा तो मैंने मनुष्यों में भी नहीं देखी है. इस युवा हाथी को ज़ंजीर में रखना उचित नहीं है.”
शाही तबेले से आज़ाद होते ही युवा हाथी अपनी माँ को ढूँढ़ने पहाड़ियों के पार भागा. उसे अपनी माँ कमल के तालाब के पास मिली. वह मिट्टी में लेती हुई थी क्योंकि वह अत्यंत कमज़ोर हो चुकी थी. माँ को देखकर युवक की आँखें भर आईं. उसने अपनी सूँड़ में पानी भरा और माँ के सर व शरीर पर पानी तब तक छिड़का जब तक कि वह पूर्ण रूप से साफ़ न हो गई.
“यह बारिश हो रही है या फिर मेरा पुत्र लौट आया है?, माँ ने पूछा.
“यह तुम्हारा अपना बेटा है. राजा ने मुझे छोड़ दिया है” , युवक बोला.
युवक ने जब माँ की आँखें धोईं तब चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से उसकी माँ की दृष्टि ठीक हो गई और वह बोली, “जिस प्रकार अपने बेटे को देखकर मैं प्रसन्न हूँ उसी प्रकार राजा भी सदा खुश रहे!”

युवा हाथी ने झटपट पेड़ से कोमल पत्ते और मीठे आम तोड़े और माँ को देते हुए बोला, “पहले तुम, फिर मैं.”

सीख:

हमारे माता-पीता हमसे बिना शर्त के प्रेम करते हैं. हमें सिखाया गया है- माता, पिता, गुरु, दैवं. हमारे जीवन में माँ का स्थान सर्वोच्च होता है. हमें भी अपने माता-पिता से प्रेम करना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए विशेषकर तब जब उन्हें हमारे प्यार की सबसे अधिक ज़रुरत होती है.

ele5

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना