Archive | November 2015

कर्तव्य परायण डॉक्टर

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : समझदारी, दूसरों का ध्यान रखना

एक अत्यावश्यक ऑपरेशन के लिए बुलाए जाने पर एक डॉक्टर झटपट अस्पताल पहुँचा. उसने जल्दी से अपने कपड़े बदले और सीधे ऑपरेशन विभाग में गया. कक्ष में उसने लड़के के पिता को व्याकुलता से उसका इंतज़ार करते हुए पाया.

डॉक्टर को देखते ही पिता चिल्लाकर बोला:
“आपने आने में इतनी देर क्यों लगा दी? क्या आपको पता नहीं है कि मेरे बेटे की ज़िन्दगी खतरे में है? आपको ज़िम्मेदारी का ज़रा भी अहसास नहीं है?”

डॉक्टर मुस्कुराया और बोला :
“क्षमा कीजिएगा. मैं अस्पताल में नहीं था. फ़ोन पर समाचार मिलते ही मैं शीघ्रताशीघ्र चला आया…..अब आप ज़रा शांत हो जाइए ताकि मैं अपना काम कर सकूँ.”

“शांत हो जाऊँ?! अगर आपका अपना बेटा इस समय इस कमरे में होता तो क्या आप शांत रहते? अगर आपके बेटे की अभी मृत्यु हो जाए तो आप क्या करेंगें?? “, पिता ने गुस्से में कहा.

डॉक्टर ने धीरे से मुस्कुराकर जवाब दिया, “हमारे ग्रंथों में कहते हैं , “हम सब मिट्टी से उत्पन्न हुए हैं और हमें मिट्टी में ही वापस लौटना है. केवल ईश्वर ही अविनाशी हैं.” हम डॉक्टर जीवन की अवधि बढ़ा नहीं सकते हैं. आप अपने बेटे के लिए भगवान से प्रार्थना करिए और हम भगवान की कृपा से अपनी पूरी कोशिश करेंगें.”

“दूसरों को सलाह देना बहुत आसान होता है” , पिता बड़बड़ाया.
ऑपरेशन में कुछ घंटे लगे doc1और ऑपरेशन ख़त्म होने पर डॉक्टर बाहर आया और मुस्कुराते हुए बोला, “भगवान का शुक्र है. आपका बेटा बच गया है.”
ऐसा कहकर पिता के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही डॉक्टर भागते हुए वहाँ से चला गया और जाते-जाते बोला, “अगर आपको कुछ पूछना है तो नर्स से पूछ लेना.”

“वह इतने घमंडी क्यों हैं? वह कुछ देर और इंतज़ार नहीं कर सकते था ताकि मैं उससे अपने बेटे की स्थिति के बारे में कुछ पूछ सकता”, डॉक्टर के जाते ही नर्स से बात करने के दौरान, पिता ने टिप्पणी की.

नर्स के चेहरे पर निरंतर आँसू बह रहे थे. वह बोली, “कल एक सड़क दुर्घटना में डॉक्टर साहब के बेटे की मृत्यु हो doc3गई थी. जब हमने इन्हें आपके पुत्र के ऑपरेशन के बारे में सूचित किया तब डॉक्टर साहब शमशान घाट पर थे. अब जब उन्होंने आपके पुत्र की जान बचा ली हैं, वह झटपट अपने मृत बेटे की शेष विधि पूरी करने गए हैं.”

 

 

सीख:
हमें स्वयं को आलोचना से दूर रखना चाहिए. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. यह जाने बिना कि दूसरा व्यक्ति किस परिस्थिति से गुज़र रहा हैं, हमें उनके प्रति निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए. ऐसा करने से हम दूसरों को गंभीर रूप से ठेस पहुँचा सकते हैं और हमें अपनी करनी पर भी पछतावा हो सकता हैं.

Source : http://www.saibalsanskaar.wordpress.com
अनुवादक- अर्चना

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चिड़िया जो सपनों का अर्थ समझ लेती थी

आदर्श :अहिंसा

उप आदर्श : सकारात्मक विचार

राजू नाम का एक जवान किसान अपनी जमीन पर कठिन परिश्रम करता था.

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एक शाम उसके गाँव में एक शाही संदेशवाहक घोषणा करने आया कि राजा के सपनों का अर्थ समझने वाले को १०० सोने के सिक्के मिलेंगें.
राजा ने सपने में एक गीदड़ को व्यंग्यात्मक ढंग से मुस्कुराते हुए अपनी गोद में कूदने की कोशिश करते हुए देखा था.

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“काश मुझे इसका जवाब मालूम होता” , राजू बड़बड़ाया.
“अगर तुम मुझे आधा इनाम दोगे तो मैं तुम्हें बता सकती हूँ” ,एक नन्हीं चिड़िया ने राजू से कहा. राजू सहमत हो गया. “गीदड़ धोखे का प्रतीक होता है. राजा से सावधान रहने को कहना” ,चिड़िया ने कहा.

राजू ने राजा तक अपना स्पष्टीकरण पहुँचाया और इनाम में १०० सोने के सिक्के जीत लिए. इनाम मिलने के बाद राजू ने सोचा, “कितने दुःख की बात है कि मुझे अपना इनाम बाँटना पड़ेगा.” और चिड़िया से बचने के लिए वह एक अलग लंबा रास्ता लेकर घर गया.

उसने समझदारी से पैसे लगाए और जल्द ही अमीर बन गया. पाँच साल बाद एक शाम राजा का सेनापति सरपट दौड़ते हुए राजू के घर आया. सेनापति ने कहा, “महाराज ने एक और सपना देखा है. इस बार उन्होंने अपने सर के ऊपर एक खून से भरी खंजर मंडराते हुए देखी है.”bird3 भयभीत राजू चिड़िया की खोज में गया और जैसे ही वह बरगद के वृक्ष के पास पहुँचा, एक जानकार आवाज़ बोली, “अगर मैं तुम्हें इस स्वप्न का अर्थ समझाऊँगी तो क्या तुम मुझे अपना आधा इनाम दोगे?” राजू के वादा करने पर चिड़िया ने बताया कि खंजर हिंसा का प्रतीक होता है. अतः राजा को सतर्क रहना चाहिए. इस बार राजू को इनाम में १००० सोने के सिक्के मिले.

इस बार भी राजू चिड़िया से साथ इनाम बाँटने से बचना चाहता था पर उसे डर था कि कहीं चिड़िया राजा को उसका राज़ न बता दे. राजू ने एक पत्थर उठाया और ज़ोर से चिड़िया की ओर फेंका. समय के साथ-साथ राजू इस बारे में सब कुछ भूल गया.

कुछ वर्ष बाद राजा ने एक और सपना देखा. इस बार राजा ने अपनी गोद में एक कबूतर देखा.bird4 एक बार पुनः राजू चिड़िया के पास गया और चिड़िया ने उसे बताया कि कबूतर शांति का प्रतीक होता है. राजा ने राजू को इनाम में १०,००० सोने के सिक्के दिए.

इस बार राजू ने स्वेच्छा से सम्पूर्ण राशि चिड़िया को सौंप दी. परन्तु चिड़िया के लिए सोने के सिक्के व्यर्थ थे. राजू ने चिड़िया से आग्रह किया, “कृपया मुझे क्षमा कर दो.”

चिड़िया बोली, “पहली बार जब वातावरण में धोखा था, तब तुम भी विश्वासघाती साबित हुए. दूसरी बार वायुमंडल में हिंसा थी और तुम हिंसात्मक थे. और अब, जब ईमानदारी का माहौल है, तुमने अपने व्यवहार में भी ईमानदारी दिखाई है. बहुत कम लोगों का आचरण अपने अंतःकरण के अनुरूप होता है.”

सीख:
प्रायः हम अपने आसपास के वातावरण व लोगों से प्रभावित होते हैं. जब हम सकारात्मक लोगों की संगति में होते हैं तब हममें सकारात्मकता का विकास होता है; नकारात्मक लोगों तथा परिस्थियों का हम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. अतः हमें सदा सकारात्मकता की तलाश में रहना चाहिए.

हक़ीक़त में हमें विरूद्ध अवस्थाओं, परिस्थियों तथा लोगों का भी सामना करना पड़ता है. ऐसी परिस्थियों को संभालने के लिए हमें अपनी बुद्धि को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि हम अपनी भीतरी शक्ति का विकास कर सकें. प्रार्थनाएँ, शास्त्रों का पाठ, आध्यात्मिक साधना तथा प्रेरक साधन हमें सकारात्मक प्रवृत्ति विकसित करने का मार्ग दिखाते हैं और जो हमारे नियंत्रण से परे है उसे स्वीकार करने तथा उसका सामना करने की शक्ति देते हैं. परन्तु यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस सीख का अपने जीवन में कितना समावेश करते हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com
अनुवादक- अर्चना