Archive | March 2015

हमारे रास्ते की बाधा

                    आदर्श : सत्य

               उप आदर्श : आशावाद

एक समय की बात है एक राजा ने सड़क के मार्ग में एक गोल पत्थर रखवा दिया. king1फिर छिपकर वह देखने लगा कि क्या कोई उस विशाल पत्थर को हटाएगा. राजा के कुछ सर्वाधिक अमीर व्यापारी व दरबारी आए और उस पत्थर के पास से गुज़र गए. बहुतों ने सड़क साफ़ न रखने के लिए राजा को ऊँचे स्वर में दोष दिया पर पत्थर को रास्ते से हटाने के लिए किसी ने भी प्रयास नहीं किया.

तब सब्ज़ियों का बोझ लेकर एक किसान उधर आया.king2 पत्थर के पास पहुँचकर किसान ने अपना भार नीचे रखा और पत्थर को सड़क के किनारे हटाने की कोशिश करने लगा. काफी प्रयत्न व मेहनत के बाद वह आखिर में सफल हो गया. जब किसान ने अपनी सब्ज़ियों का बोझ वापस उठाया तब उसने पत्थर के स्थान पर एक बटुआ पड़ा हुआ देखा. बटुए में अनेकों सोने के सिक्के थे king3और राजा की ओर से एक छोटी सी चिट्ठी थी. चिट्ठी में लिखा हुआ था कि यह सोना उस व्यक्ति के लिए है जो सड़क से पत्थर हटाएगा.

किसान ने वह सीखा जो हममें से बहुत लोग कभी समझ नहीं पाते हैं.

 सीख :

प्रत्येक बाधा हमें हमारी स्थिति सुधारने का अवसर प्रदान करती है.

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अनुवादक- अर्चना

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अच्छा करो और दूसरों की मदद करो

          आदर्श : उचित आचरण

     उप आदर्श : सबसे प्रेम करो और सबकी सेवा करो

गौतम बुद्ध के दिनों के दौरान एक युवक बुरी आदतों का आदी था. वह लोगों से रूखा व्यवहार करता था और अपनी असामाजिक गतिविधयों के कारण अपराधी बन रहा था. उसकी माँ ने उसे सामान्य जीवन में वापस लाने की कोशिश की पर सफल नहीं हो पाईं.buddha1 अंततः उन्होंने अपने बेटे को “गौतम बुद्ध'” के पास ले जाकर उनका आशीर्वाद माँगने का निश्चय किया. बहुत मुश्किल से वह अपने बेटे को “बुद्ध” से मिलने के लिए राजी कर पाईं. दोनों जंगल में गए जहाँ बुद्ध पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या कर रहे थे. budhha2माँ बुद्ध के चरणों में गिरकर रोने लगीं.

बुद्ध ने उनसे पूछा, “तुम क्यों रो रही हो?”

माँ ने कहा कि मेरा बेटा सारे बुरी काम कर रहा है और आजकल अपराधी बन रहा है. कृपया कुछ करिये. बुद्ध ने उनके पुत्र की ओर देखा और कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है. यह युवक एक दिन में मरने वाला है.”budhha3 ऐसा कहकर बुद्ध वहाँ से चले गए. माँ और बेटा, दोनों, यह सुनकर स्तंभित थे और उदास मन से दोनों अपने घर लौट आए. मौत के डर से दोनों रातभर सो नहीं पाए. २३ घंटे बीत गए और आखिरी घंटे में बुद्ध उनके इलाके में आए और उनके घर भी आए.

बुद्ध ने पुत्र से पूछा, “इन २३ घंटों में क्या तुम किसी धोखेबाज़ी, अपराध या चोरी में शामिल हुए?”
पुत्र ने कहा, “नहीं.”
“क्या तुमने झूठ बोला?” बेटे ने कहा, “नहीं.”
बुद्ध ने पूछा, “फिर तुमने इन २३ घंटों में क्या किया?”
पुत्र ने उत्तर दिया, “चूँकि मौत मेरे बहुत निकट पहुँच रही थी, मैं अबतक के अपने अपराधों पर पश्चात्ताप कर रहा था. budhha4मुझे समझ में आया कि मैंने कैसे अपना बेशकीमती जीवन व्यर्थ कर दिया. पर यह समझने में अब बहुत देर हो चुकी है.”

बुद्ध ने कहा, “चिंता मत करो. तुम्हारी मृत्यु अभी नहीं होगी. वह टल गई है. अपनी शेष ज़िन्दगी सार्थक ढ़ंग से बिताओ और दूसरों के प्रति उदार रहो.”

               सीख:

हम सब की मृत्यु निश्चित है. वह किसी भी क्षण, किसी भी रूप और बिना किसी कारण आ सकती है. आइए अपना जीवन मानवीय आदर्शों के साथ अच्छे कामों तथा दूसरों की मदद करते हुए बिताएं. ताकि हमारी मृत्यु के बाद भी लोग हमें याद रखेंगें.

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अनुवादक – अर्चना

सेवा करने वालों को हमेशा याद रखें

 आदर्श : उचित आचरण
   उप आदर्श : आदर

उन दिनों जब फलमिश्रित आइस क्रीम की कीमत काफ़ी कम होती थी, एक दस वर्षीय लड़का एक होटल की कॉफी की दुकान में गया और एक मेज़ पर बैठ गया. एक महिला वेटर उसके लिए पानी लेकर आई.

“एक फलमिश्रित आइस क्रीम कितने की है?” उसने पूछा.ice cream
“पचास सेंट,” महिला वेटर ने जवाब दिया. नन्हें बालक ने अपनी जेब से हाथ बाहर निकाला और सिक्कों का परीक्षण किया.
“अच्छा, सामान्य आइस क्रीम कितने की है?” उसने पूछा. ice cream2

इस समय तक और लोग भी मेज़ के लिए इंतज़ार कर रहे थे और उस महिला वेटर की बेचैनी बढ़ रही थी.

“पैंतीस सेंट” , उसने बेरूखी से उत्तर दिया.
नन्हें बालक ने फिर से अपने सिक्कों की गिनती की.
“मैं सादी आइस क्रीम लूँगा” , लड़के ने बोला.

महिला वेटर आइस क्रीम लाई, बिल मेज़ पर रखा और चली गई. लड़के ने आइस क्रीम ख़त्म की, ice craem3बिल का भुगतान किया और चला गया. जब महिला वेटर वापस आई और जैसे ही उसने मेज़ साफ़ करना शुरू किया, ice craem5वह रोने लग पड़ी. वहाँ मेज़ पर खाली थाली के पास पच्चीस सेंट्स रखे हुए थे.

देखो, वह फलमिश्रित आइस क्रीम नहीं खा पाया क्योंकि उसे बक्शीश छोड़ने के लिए पर्याप्त पैसे चाहिए थे.

सीख:
सबका आदर करो और जो तुम्हारी सेवा करते हैं उन्हें याद रखो. यह उनके तथा तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकता है.

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अनुवादक : अर्चना

सुनहरी खिड़की वाला घर – जो तुम्हारे पास है उसे संजो कर रखो

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आदर्श : उचित आचरण
    उप आदर्श : संतोष, कृतज्ञता

एक पहाड़ी पर एक छोटे, अति साधारण, गरीब घर में एक नन्ही लड़की रहती थी. जैसे वह थोड़ी बड़ी हुई, वह एक छोटे-से बगीचे में खेलती थी. house2जैसे वह और बड़ी हुई, वह बगीचे के घेरे के आगे घाटी के उस पार पहाड़ी की उँचाई पर एक अत्युत्तम घर को देख सकती थी. इस घर की सुनहरी खिड़कियाँ थीं- इतनी सेनहारी व चमकीली कि वह नन्ही लड़की स्वप्न देखते थी कि उसके सामान्य घर के बजाय सुनहरी खिड़कियों वाले घर में बड़ा होना और रहना कैसा जादुई होगा.
हालाँकि वह अपने माता-पिता तथा परिवार से प्यार करती थी,पर फिर भी वह ऐसे सुनहरे घर में रहने को तरसती थी और दिन भर कल्पना करती थी कि वहाँ रहना कितना अद्भुत व रोमांचक होगा.house

जब वह थोड़ी और बड़ी हुई और उसने बगीचे के घेरे के बाहर जाने के लिए पर्याप्त योग्यता व समझ पा ली तब उसने अपनी माँ से पूछा यदि वह द्वार से बाहर, गली में साइकिल चलाने जा सकती है. माँ से अनेको बार विनती करने पर, आखिरकार माँ ने उसे जाने की इज़ाज़त दे दी पर आगाह किया कि वह घर के इर्द-गिर्द ही रहे और ज़्यादा दूर न जाए. वह एक ख़ूबसूरत दिन था और उस बालिका को ठीक पता था कि वह कहाँ जा रही है. गली में घाटी के उस पार, उसने साइकिल तब तक चलाई जब तक वह दूसरी पहाड़ी के उस पार सुनहरे घर के द्वार तक न पहुँच गई.house3

जैसे ही वह साइकिल से नीचे उतरी और साइकिल को द्वार के खम्बे के सहारे खड़ा किया, उसने उस घर तक जाने वाले पथ पर ध्यान केंद्रित किया और फिर घर पर…और उसे यह जानकार बहुत निराशा हुई कि सभी खिड़कियाँ सादी व गन्दी थीं, जो सिर्फ घर के प्रति लापरवाही दर्शा रहीं थीं.

उदास होकर वह और आगे नहीं बढ़ी और वापस मुड़ गई. अत्यंत दुखी मन से वह अपनी साइकिल पर पुनः सवार हुई… और जैसे ही उसने ऊपर देखा उसने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने उसे चकित कर दिया…उसकी तरफ की घाटी के रास्ते के दूसरी ओर एक छोटा सा घर था और उसकी खिड़कियाँ सुनहरी चमक रहीं थीं….उसके छोटे से घर पर सूरज की रोशिनी चमकने के कारण.

तब उसे समझ में आया कि वह अपने सुनहरे घर में रह रही थी और वहाँ मिले सारे प्यार व देखभाल ने उस घर को ‘सुनहरा घर’ बनाया था. उसके द्वारा कल्पना की गई सारी चीज़ें वहीँ उसके सामने थीं.

              सीख :

हमें और अधिक की अभिलाषा करने के बदले अपने वरदानों की गिनती करना सीखना चाहिए. वह कहावत कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’- सदा सत्य नहीं प्रमाणित होती है. हमें हमारी आस-पास की चीज़ों को बहुमूल्य्ता से तथा संजो कर रखना चाहिए.

थोड़े और आध्यात्मिक अर्थ में, हमारे पास ‘प्रभु के लिए प्रेम’ की सबसे बड़ी पूँजी है और हम फिर भी संसार में अस्थायी ख़ुशी की तलाश में रहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

होली

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होली एक रंगबिरंगा मस्ती भरा पर्व है. इस त्यौहार को बसंत ऋतु में मनाया जाता है. यह एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. होली को ‘रंगों का त्यौहार’ भी कहते हैं और इसे मुख्य रूप से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है. फाल्गुन मास में मनाये जाने वाले इस पर्व को ‘फाल्गुनी’ भी कहते हैं और पारम्परिक रूप से इसे दो दिन मनाया जाता है. पहले दिन को होलिका जलायी जाती है जिसे होलिका दहन भी कहते हैं. holikaदूसरे दिन को धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवन्दन कहते हैं. लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल फेंकते हैं और ढोल बजाकर होली के गीत गाये जाते है. हर तरफ आनंद, हर्ष व मस्ती का वातावरण होता है और बच्चे तथा युवा, सभी समान भाव से इस रंगों के त्यौहार में भाग लेते हैं.ऐसा माना जाता है की होली के दिन लोग अपनी पुरानी कटुता भूलकर गले मिलते है और एक बार फिर दोस्त बन जाते हैं.    holi5

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से जाना जाता है. होली बसंत ऋतु के आगमन का संदेशवाहक भी है और इस कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहते हैं. होली के पर्व से साथ अनेक कहानियाँ जुड़ीं हुईं हैं जिनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी प्रह्लाद की है. ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को ईश्वर मानता था और उसके राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर पाबंदी थी. परन्तु हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था. प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यपु ने उसे अनेक दंड दिए परन्तु उसने फिर भी ईश्वर भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा. आखिरकार हिरण्यकश्यपु ने अपनी बहिन होलिका की मदद मांगी. होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठी परन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई।holika1

यह कथा इस बात का संकेत करती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते हैं, और अगले दिन सब लोग एक दूसरे पर गुलाल, अबीर और तरह-तरह के रंग डालते हैं। holi3यह त्योहार रंगों का त्योहार है। इस दिन लोग प्रात:काल उठकर रंगों को लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाते हैं और उनके साथ जमकर होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता है। वह एक दिन पहले से ही बाजार से अपने लिए तरह-तरह की पिचकारियां व गुब्बारे लाते हैं। बच्चे गुब्बारों व पिचकारी से अपने मित्रों के साथ होली का आनंद उठते हैं।
सभी लोग बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे से परस्पर गले मिलते हैं।कई लोग होली की टोली बनाकर निकलते हैं उन्हें हुरियारे कहते हैं।

होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े और कई प्रकार के व्यंजन पकाये जाते हैं. इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनायीं जाती हैं जिनमें गुजिया का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश के प्रायः प्रत्येक घर में बेसन के सेव और दही बड़े बनाए व खिलाये जाते हैं. कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय हैं.

ब्रज की होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाने की होली, काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है।

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