Archive | October 2014

सुनहरा नियम- प्रेम बदलाव ला सकता है

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           आदर्श : प्रेम
      उप आदर्श : बड़ों से प्रेम और उनका आदर

बहुत समय पहले, ली-ली नाम की एक लड़की का विवाह हुआ और वह अपने पति व सास के साथ रहने चली गई. जल्द ही, ली-ली को लगने लगा कि वह और उसकी सास मिलजुल कर नहीं रह सकते.lili उन दोनों का व्यक्तित्व बहुत भिन्न था और अपनी सास की बहुत सी आदतों पर ली-ली को गुस्सा आता था. इसके अतिरिक्त सास ली-ली की निरंतर आलोचना करतीं थीं. li li1दिन पर दिन और हफ्ते पर हफ्ते बीतते गए . पर ली-ली और उसकी सास का बहस करना और झगड़ना समाप्त नहीं हुआ. इन सबसे के अलावा प्राचीन चीनी प्रथा के अनुसार, ली-ली को अपनी सास के आगे झुकना पड़ता था और उनकी हर इच्छा का पालन करना पड़ता था. घर में क्रोध व अप्रसन्नता के कारण बेचारा पति बहुत परेशान था.

अंततः ली-ली अपनी सास का बुरा मिज़ाज़ व तानाशाही और बर्दाश नहीं कर पाई और उसने इस विषय में कुछ करने का निश्चय किया.li li2 ली-ली अपने पिता के प्रिय मित्र, श्री हुआंग, को मिलने गई, जो जड़ी-बूटी बेचते थे.ली-ली ने उन्हें परिस्थिति से अवगत कराया और पूछा अगर वो उसे ज़हर दे सकते हैं तो वह इस समस्या का सदा के लिए हल कर सकती है. श्री हुआंग ने क्षणभर सोचा और फिर बोले, “ली-ली, मैं तुम्हारी समस्या सुलझाने में मदद करूँगा परन्तु तुम्हें मेरी बात पर ध्यान देना होगा और मेरी आज्ञा का पालन करना होगा.”

ली-ली ने कहा, “जी, श्री हुआंग, जैसा आप कहेंगें, मैं वैसा ही करूँगी.” श्री हुआंग पीछे के कमरे में गए और कुछ ही देर में जड़ी-बूटियों की गठ्ठी लेकर लौटे. उन्होंने ली-ली से कहा, ” अपनी सास से छुटकारा पाने के लिए तुम तुरंत असर करने वाला ज़हर इस्तेमाल नहीं कर सकती क्योंकि उससे लोगों को शक हो जाएगा. इसलिए मैंने तुम्हें विभिन्न जड़ी-बूटियाँ दीं हैं जो उनके शरीर में धीरे-धीरे विष बढ़ाएंगीं. जब तुम अपनी सास के लिए खाना बनाओ तब उनके खाने में थोड़ी सी जड़ी- बूटियाँ दाल दिया करो. और जब उनकी मृत्यु हो जाए तब अपने उपर लोगों के संदेह से बचने के लिए, तुम बहुत सतर्क रहकर अपनी सास के प्रति दोस्ताना सम्बन्ध का नाटक करना. उनसे बहस मत करना, उनकी हर इच्छा का पालन करना और उन्हें रानी की तरह रखना.”

ली-ली बहुत खुश थी. उसने श्री हुआंग को धन्यवाद दिया और अपनी सास की ह्त्या का षड्यंत्र शुरू करने जल्दी से घर लौटी. हफ्ते और महीने बीत गए. ली-ली हर दूसरे दिन अपनी सास को विशेष रूप से तैयार खाना परोसती थी. संदेह से बचने के लिए उसे श्री हुआंग की बात याद थी. अतः उसने अपने गुस्से पर नियंत्रण रखा, अपनी सास की आज्ञा का पालन किया और उनके साथ अपनी माँ के जैसा व्यवहार किया. छह महीने बीतने के बाद, सारे घर का वातावरण बदल गया. ली- ली अपने गुस्से पर नियंत्रण करने का इतना अभ्यास कर चुकी थी कि उसने पाया कि अब वह कभी भी अपने आपे से बाहर या क्रोधित नहीं होती थी. छह महीने में उसकी अपनी सास से बहस नहीं हुई थी. अब वह अधिक दयालु प्रतीत होती थी और उसे अपनी सास के साथ मिलजुल कर रहना अधिक आसान लगता था. ली-ली के प्रति उसकी सास का रवैया भी बदल गया और ली-ली को वह अपनी बेटी के सामान चाहने लगीं थीं. वह अपने दोस्तों व रिश्तेदारों में बोलतीं थीं कि ली-ली सर्वोत्तम बहू है. ली-ली और उसकी सास अब एक दूसरे को सगी माँ और बेटी के सामान मानने लगे थे. liयह सब देखकर ली-ली का पति बहुत खुश था.

एक दिन ली-ली श्री हुआंग से मिलने गई और उनसे पुनः एक मदद के लिए पूछा. उसने कहा, “प्रिय श्री हुआंग, मेरी सास को विष से न मारने में मेरी मदद कीजिये. वह बहुत ही अच्छी महिला में परिवर्तित हो गईं हैं और मैं उनसे अपनी माँ के सामान प्यार करतीं हूँ. मैं नहीं चाहती कि मेरे द्वारा दिए गए ज़हर से उनकी मृत्यु हो.” श्री हुआंग मुस्कुराये और उन्होंने सहमति में सर हिलाया. “ली-ली, चिंता की कोई बात नहीं है. मैंने तुम्हें ज़हर दिया ही नहीं था. वे जड़ी-बूटियाँ उनका स्वास्थ्य सुधारने के लिए विटामिन थीं. ज़हर केवल तुम्हारे दिमाग में और उनके प्रति तुम्हारे व्यवहार में था. पर अब उनके प्रति तुम्हारे प्यार से सारा ज़हर धुल गया है.” आदर्श : दोस्तों, क्या तुमने कभी समझा है कि दूसरे तुम्हारे साथ ठीक उसी प्रकार से व्यवहार करेंगें जैसे तुम उनके साथ व्यवहार करोगे?
चीन में कहा जाता है : जो व्यक्ति दूसरों से प्यार करता है, उसे लोग भी प्रेम करते हैं. सुनहरा नियम.

       सीख :

प्रेम एक शक्तिशाली औज़ार है जो लोगों को बदल सकता है. इसमें समय लग सकता है पर कभी भी प्रेम करना त्यागना मत. आखिरी जीत प्रेम की ही होती है. पर इसके लिए बहुत सारे धैर्य व दृढ़ता की आवश्यकता पड़ सकती है.

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translation : अर्चना

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अहम् क्या है ?

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 आदर्श: अहिंसा
 उप आदर्श : भीतरी शान्ति

टंग राजवंश के प्रधानमंत्री, राजनेता तथा सैनिक नेता के रूप में अपनी सफलता के कारण, राष्ट्रीय शूरवीर थे. परन्तु अपनी कीर्ति, ताकत और धन-दौलत के बावजूद वे अपने आप को एक विनम्र व धार्मिक बौद्धधर्मी मानते थे. वे अक्सर अपने मनपसंद ज़ेन मास्टर के पास जाते थे और उन दोनों की आपस में अच्छी दोस्ती थी. उनके प्रधानमंत्री होने का उनके रिश्ते पर बिलकुल भी प्रभाव नहीं था और उनका सम्बन्ध केवल एक उपास्य गुरु एवं आदरपूर्ण शिष्य का था.

एक दिन अपनी सामान्य भेंट के दौरान, प्रधानमंत्री ने पंडित से पूछा, “माननीय, बौद्धधर्म के अनुसार अहंभाव क्या है?” मास्टर का चेहरा लाल हो गया और बहुत ही वरिष्ठता व अपमानजनक भाव से उन्होंने कहा, “यह कैसा फालतू प्रश्न है?”

इस आकस्मिक उत्तर ने प्रधानमंत्री को इतना चौंका दिया कि वे खिन्न व क्रोधित हो गए. ज़ेन मास्टर तब मुस्कुराकर बोले, “महाशय, यह अहंभाव है.”

  सीख :

किसी चीज़ को सीखने का सर्वोत्तम तरीका, किसी और के द्वारा समझाकर नहीं अपितु स्वयं अनुभव कर के है. यह ज़ेन मास्टरों का जिज्ञासुओं को सीखाने का बहुत ही दिलचस्प व साधारण तरीका है.

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Translation :  अर्चना

एक भी नहीं – निःस्वार्थ प्रेम

 

आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : देखरेख, शर्त रहित प्रेम

नन्हा चाड एक शर्मिला व शांत नवयुवक था. एक दिन वह घर आया और अपनी माँ से बोला कि वह अपनी कक्षा में सबके लिए वैलेंटाइन बनाना चाहता है. उसकी माँ का दिल बैठ गया. उन्होंने सोचा, “काश यह ऐसा न करे!” क्योंकि उन्होंने बच्चों को विद्यालय से घर लौटते समय देखा था. उनका चाड हमेशा उन सब के पीछे होता था.वे एक दूसरे को पकड़कर हँसते थे और आपस में बातें करते थे पर बेचारे चाड को कभी भी शामिल नहीं करते थे. school kids फिर भी उन्हींने फैसला किया कि वह अपने बेटे का साथ देंगीं. अतः उन्होंने कागज़, गोंद और क्रेयॉन खरीदा. तीन हफ़्तों तक, रात भर कड़ी मेहनत करके चाड ने ३५ वैलेंटाइन बनाए.v cards
वैलेंटाइन दिन की सुबह आई और चाड अत्यधिक जोश में था. उसने सावधानीपूर्वक कार्डों की गड्डी उठाकर थैली में रखी v cards1और दरवाज़ा बंद करके चला गया. उसकी माँ ने निश्चय किया कि वे उसके लिए उसके मनपसंद बिस्कुट बनाएँगीं और जब वह विद्यालय से घर लौटेगा तो उसे गरम बिस्कुट के साथ ठंडा दूध परोसेंगीं. उन्हें मालूम था कि वह निराश होगा और बिस्कुट तथा दूध शायद उसके दर्द को कुछ शांत कर पाएंगें. उन्हें यह सोचकर बहुत कष्ट हो रहा था कि चाड को बहुत वैलेंटाइन नहीं मिलेंगें – शायद कोई भी नहीं.

उस दोपहर उन्होंने बिस्कुट और दूध मेज़ पर तैयार रखा था. बाहर बच्चों की आवाज़ सुनकर, उन्होंने खिड़की से बाहर देखा. निःसंदेह बच्चे आ रहे थे, हँसते और मस्ती करते हुए. और हमेशा की तरह चाड सबसे पीछे था. वह हमेशा की अपेक्षा अधिक तेज़ चल रहा था. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि घर आते ही वह फूट-फूटकर रोने लगेगा. उन्होंने देखा कि उसके हाथ खाली थे और उन्होंने अपने आँसुओं को दबाकर दरवाज़ा खोला.

उन्होंने कहा, “मम्मी के पास तुम्हारे लिए कुछ बिस्कुट व दूध हैं.”

पर चाड ने शायद ही उनकी बात सुनी. दमकता हुआ चेहरा लेकर, वह तेज़ी से आगे बढ़ता रहा और केवल इतना ही बोल पाया, “एक भी नहीं, एक भी नहीं.”

उसकी माँ का दिल बैठ गया.
और फिर उसने आगे कहा, “मैं भूला नहीं, एक भी नहीं.”

सीख:

हमें प्रेमपूर्ण कार्य करने चाहिए क्योंकि वही सही हैं ना कि इसलिए कि उसके बदले में हमें कुछ मिलेगा. यह प्रेम का सर्वोच्च रूप है- निःस्वार्थ प्रेम, पवित्र प्रेम जो विकसित करना आसान नहीं है. निरंतर चिंतन हमें इस पथ का पालन करने में मदद करेगा.

 

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Translation : अर्चना

भगवान की हमें कितनी ज़रुरत है?

 

आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : अत्यधिक प्रेम या ज़रुरत

एक योगी नदी के किनारे ध्यान मग्न थे जब एक युवा व्यक्ति ने उनका ध्यान भंग किया.  yogi“प्रभु, मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूँ,” व्यक्ति ने कहा. “क्यों?” , योगी ने प्रश्न किया. उस युवक ने पल भर के लिए सोचा और फिर कहा, “क्योंकि मैं भगवान को पाना चाहता हूँ .” सन्यासी ने युवक को गर्दन से पकड़ा, नदी में घसीटा और उसका सर पानी के अंदर धकेल दिया.

सन्यासी ने कुछ देर उसे पानी में पकड़ कर रखा और इस दौरान युवक खुद को छुड़ाने के लिए टाँगें चलाता रहा और संघर्ष करता रहा. अंततः योगी ने उसे नदी से बाहर खींचा. वह युवक गुस्से में बड़बड़ाते हुए बाहर निकला. वह पानी से खांस रहा था और उसकी स्वास फूली हुई थी.  yogi1आखिरकार जब वह शांत हुआ तो योगी बोले, “बताओ, जब तुम पानी के अंदर थे तो तुम्हें सबसे अधिक किस चीज़ की ज़रुरत थी? ” “हवा!” , युवक ने उत्तर दिया. “बहुत अच्छा” , सन्यासी ने कहा. “घर जाओ और मेरे पास वापस तब आना जब तुम्हें भगवान की आवश्यकता ऐसी हो जैसी अभी हवा की थी.”

 सीख :

अक्सर हमारी ज़िन्दगी में भगवान को पाने की अपेक्षा जीने की इच्छा अधिक प्रबल होती है. बाइबिल में ईसाह मसीह लोगों से कहतें हैं कि उनके साथ भगवान का अनुगमन करने के लिए उन्हें सब कुछ त्याग देना चाहिए.

 

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translation : अर्चना

अहिंसा की शक्ति

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 आदर्श : अहिंसा
उप आदर्श : ख़ामोशी

डा. अरुण गाँधी, महात्मा गाँधी के पोते तथा अहिंसा हेतु एम. के. गाँधी संस्थान के संस्थापक हैं. उन्होंने पोर्टो रिको विश्वविश्यालय में ९ जून को अपने व्याख्यान के दौरान, परवरिश में अहिंसा के उदहारण में निम्न कहानी बयान की थी- arun 2मैं १६ वर्ष का था और अपने माता-पिता के साथ, अपने दादा द्वारा संस्थापित संस्थान में रहता था. यह संस्थान गन्ने के खेतों के बीच दक्षिण अफ्रीका में डरबन से १८ मील की दूरी पर था. हम शहर से काफी दूर रहते थे और हमारा कोई  पड़ोसी भी नहीं था. अतः मेरी दो बहनें और मैं, दोस्तों को मिलने जाने या सिनेमा देखने के लिए शहर जाने की प्रतीक्षा करते थे. एक दिन मेरे पिता ने मुझसे उन्हें एक दिवसीय सम्मेलन के लिए कार में शहर लेकर चलने को कहा. मैं ख़ुशी से कूद पड़ा. चूँकि मैं शहर जा रहा था, मेरी माँ ने मुझे किराने की सूची दे दी. और चूँकि शहर में मेरे पास पूरा दिन था, मेरे पिता ने भी मुझे कुछ काम-काज बता दिए, जैसे कि गाड़ी की जाँच करवाना.

उस सुबह जब मैंने पिताजी को सम्मेलन के लिए उतारा तो उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें ५ बजे यहीं मिलूँगा और हम घर साथ चलेंगें.” अपना काम जल्दी से ख़त्म करके, मैं सीधा सिनेमाघर गया. मैं सिनेमा में इतना तल्लीन हो गया कि मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा. और जब मुझे याद आया तब ५:३० बज चुके थे; अतः जब तक मैं गाड़ी लेने भागकर गैराज गया और जल्दी-जल्दी उस जगह पहुँचा जहाँ मेरे पिता मेरा इंतज़ार कर रहे थे, तब तक ६ बज गए थे. उन्होंने चिंतित होकर पूछा, “तुम्हें देर क्यों हो गई?” मुझे यह बताते हुए कि मैं सिनेमाघर में था, इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि मैंने कहा, “गाड़ी तैयार नहीं थी, अतः मुझे इंतज़ार करना पड़ा,” न जानते हुए कि पिताजी पहले से ही गैराज से पता कर चुके थे.

जब उन्होंने मेरा झूठ पकड़ा तो उन्होंने कहा,”तुम्हारी परवरिश में मुझसे कहीं गलती हुई है. इस कारण तुममें मुझे सच बताने का आत्मविश्वास नहीं है. यह समझने के लिए कि मुझसे कहाँ गलती हुई है, मैं घर तक १८ मील का रास्ता चलकर जाऊँगा और इस विषय पर विचार करूँगा.” अतः अपने औपचारिक कपड़ों तथा जूतों में, कच्ची व बिना रोशनी की सड़कों पर रात के समय, वे घर के लिए चलना शुरू हो गए. मैं उन्हें छोड़ नहीं सकता था इसलिए अपने बेकार से एक झूठ के कारण उन्हें अत्यंत कष्ट में देखता रहा और ५ १/२ घंटों तक उनके पीछे-पीछे गाड़ी चलाता रहा. मैंने तभी का तभी निश्चय किया कि मैं दुबारा कभी झूठ नहीं बोलूँगा. arun1

अक्सर उस घटना के बारे में सोचकर मुझे अचरज होता है कि अगर मेरे पिता ने मुझे उस प्रकार से दण्डित किया होता जिस तरह से हम अपने बच्चों को सज़ा देते हैं, तो क्या मैं सबक सीख पाता? मुझे नहीं लगता! मैं सज़ा सहन करता और फिर वही चीज़ दोहराता रहता. पर यह एक अहिंसात्मक कार्य इतना बलशाली था कि वह आज भी ऐसे है मानो कल की ही बात हो. यह अहिंसा की शक्ति है.

सीख :

अहिंसा में बहुत शक्ति होती है. अहिंसा के मार्ग पर कायम रहकर भी जीत हासिल की जा सकती है और इसका सर्वोत्तम उदाहरण महात्मा गाँधी हैं. समाज की अधिकतम समस्याओं का हल प्रेम व शान्ति हैं. कई परिस्थितियों में कठोर उपायों की अपेक्षा खामोशी अधिक मूल्यवान सबक सिखा सकती है. कोई आदर्श बतलाने के लिए या बच्चे को सुधारने के लिए, कठोर तरीका अपनाना ज़रूरी नहीं है. इसे अहिंसानात्मक ढ़ंग से भी कर सकते हैं. कई बार ऐसा देखा गया है कि चिल्लाने और क्रोध से बहस व कटुता बढ़ती है. किसी आदर्श के स्थायी असर के लिए अहिंसा अधिक प्रभावशाली साबित हो सकती है.

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translation:  अर्चना