Archive | May 2019

“मैं ना होता तो क्या होता” – एक कथा 

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  एक बार हनुमानजी प्रभु श्रीराम से बोले, “प्रभु, अशोक वाटिका में जिस समय क्रोधित रावण तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा था, उस समय मुझे ऐसा लगा था कि उसकी तलवार छीनकर उसका सर काट दूँ. परन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़कर उसे रोक लिया. यह देखकर मैं अति प्रसन्न था क्योंकि अगर मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं ना होता तो क्या होता? ”

    “बहुधा हमें ऐसा ही भ्रम हो जाता है. मुझे भी लगता कि यदि मैं नहीं होता तो सीताजी को कौन बचाता? परन्तु आज आपने न केवल उन्हें बचाया बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया. तब मुझे समझ में आया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं. इस में हमारा किसी का कोई महत्व नहीं है.”

  “कुछ समय बाद जब त्रिजटा ने लंकापति से कहा कि लंका में एक बन्दर आया हुआ है और वह लंका जलाएगा तब मैं गहरी सोच में पड़ गया. मैं सोचने लगा कि प्रभु ने तो मुझे लंका जलाने का आदेश नहीं दिया है तो फिर यह त्रिजटा ऐसा क्यों कह रही है. त्रिजटा की बात से उत्तेजित होकर रावण ने मुझे मारने के लिए अपने सैनिक भेजे. स्वयं को बचाने के लिए मैंने तनिक भी चेष्टा नहीं की. तभी विभीषण ने वहाँ आकर रावण को सलाह दी कि एक दूत को मारना अनीति है . तब मैं समझ गया कि मेरी रक्षा के लिए मेरे प्रभु ने यह उपाय किया था.” 

  “मुझे सबसे अधिक आश्चर्य तब हुआ जब रावण ने कहा कि बन्दर को मारा नहीं जाएगा. उसके बदले घी से भीगे कपड़े से उसकी पूंछ को बाँधकर उसमें आग लगाई जाएगी. रावण का कथन सुनकर मैं चकित था क्योंकि संत त्रिजटा की भविष्यवाणी सच साबित हो रही थी. वरना लंका को जलाने के लिए मैं घी, कपड़ा और आग का प्रबंध कहाँ से करता? परन्तु आपने सारी व्यवस्था रावण के द्वारा करवा दी. जब आप रावण से भी काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में क्या आश्चर्य की बात है.”

   इसलिए हमें सदा याद रखना चाहिए कि संसार में जी कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है. हम और आप केवल निमित्त मात्र हैं. अतः कभी भी यह भ्रम न पालें कि …..

     मैं ना होता तो क्या होता!

   

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  कुत्ता नहीं शेर बनो 

           

   दक्षिण भारत के एक गाँव में एक व्यापारी रहता था. उसके विवाह के बहुत वर्षों बाद उसके घर में पुत्र का जन्म हुआ. व्यापारी इतना ज़्यादा दौलतमंद था कि उसके पुत्र का लालन-पालन बहुत लाड़ प्यार और हर प्रकार की विलासता में हुआ. उसकी हर इच्छा व आवश्यकता का ध्यान रखा जाता था और उसके पास हर वह वस्तु थी जो दौलत खरीद सकती थी. व्यापारी भी अपने पुत्र से अत्यधिक प्रेम करता था. समय के साथ जब वह बालक बड़ा हुआ तब उसके इर्द-गिर्द ऐसे बहुत सारे मित्र थे जो उसके द्वारा दिए गए उपहार व दावत का आनंद लेते थे.

   विवाह योग्य होने पर उसके लिए अत्यधिक खूबसूरत व धनवान वधुओं के प्रस्ताव आये; उसके जीवन में सब कुछ बहुत ही अच्छा चल रहा था. वह अपने पिता की संपत्ति खर्च करता चला गया और एक दिन उसका दिवालिया निकल गया. उसने अपने दोस्तों से मदद माँगने की कोशिश की परन्तु उसके सभी मित्र उसे टालने लगे.     

  धन नहीं रहने पर, दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया. उसकी पत्नी और बच्चे भी ऐसे इंसान के साथ नहीं रहना चाहते थे जिसके पास कुछ भी न हो. अपनी बुरी आदतों व अवगुणों के साथ अस्वस्थ हालत में उसे अकेला छोड़ दिया गया था. उसके शरीर ने भी ज़्यादा देर साथ नहीं दिया और बीमारी के कारण वह बिस्तर पर पड़ गया. वह मन ही मन सोचने लगा कि किस प्रकार भौतिक वस्तुओं से सम्बद्ध होकर उसने अपना जीवन नष्ट कर लिया था. उसे अहसास हुआ कि उसने स्वयं के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया था और वास्तव में आर्थिक व आध्यात्मिक जीवन में वह बिलकुल विफल था.  

   वह बहुत उदास रहने लगा परन्तु सौभाग्यवश एक घुमंतू संत उसके पास आया. हमारे जीवन में संत प्रभु के अनुग्रह से ही आते हैं.कृपालु संत ने इस व्यक्ति की दयनीय अवस्था देखी और उसे अपने आश्रम ले गए. उनके शिष्यों ने इस व्यक्ति का भली-भाँती ध्यान रखा. जब उसकी तबियत में सुधार हुआ तब उसने आश्रम में रहकर संत की सेवा करने के लिए उनकी अनुमति माँगी.

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  वह चाहता था कि गुरु उसे कुछ ज्ञान भी प्रदान करें. गुरु कृपालु थे और उन्होंने उसे समझाया, “मेरे बच्चे, “शेर बनो, कुत्ता नहीं.” उस व्यक्ति को समझ नहीं आया कि इस कथन से गुरु का क्या अभिप्राय था. तब गुरु ने समझाया, “जब तुम एक कुत्ते के सामने गेंद फेंकोगे तो वह गेंद के पीछे भागेगा. जब तुम शेर के सामने कुछ फेंकोगे तो उसका ध्यान फेंकी गई वस्तु पर नहीं बल्कि तुम्हारे ऊपर ही रहेगा. वह तुम्हारे ऊपर झपटने के इंतज़ार में रहेगा. इन सभी वर्षों में तुम एक कुत्ते की तरह अपनी संपत्ति, यौवन, पत्नी व बच्चों जैसे अल्पकालिक सुखों के पीछे भागते रहे हो. जीवन के वास्तविक व स्थाई सत्य पर ध्यान केंद्रित करने की तुमने कभी भी कोशिश नहीं की. कम से कम इस का अहसास करो, वह जो शाश्वत है उस पर ध्यान केंद्रित करके उसकी तलाश करो. तुम ज़्यादा खुश रहोगे.”

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   वह व्यक्ति गुरु का आभारी था. आश्रम में रहकर सेवा करने और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने से वह पुनः स्वस्थ, खुशहाल व संतुष्ट बन गया. जल्द ही उसे अहसास हो गया कि यह संसार नश्वर है और उसे कुछ उच्चतर की तलाश करनी है जोकि सर्वश्रेष्ठ है.

  वह एक मेहनती व निष्ठावान शिष्य था. उस व्यक्ति में बदलाव देखकर गुरु ने आश्रम के लिए उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. गुरु ने फिर उसे योगीत्व की दीक्षा दी. उस व्यक्ति ने आश्रम का कार्यभार संभाला और अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए अपने सभी शिष्यों को सत्य व विवेक का ज्ञान प्रदान किया. 

  सारांश:

  सांसारिक वस्तुएँ अल्पकालिक होती हैं. यह सत्य नहीं है. हम जो रोज़ अनुभव करते हैं वह सापेक्ष सत्य है. यही हमारे उतार-चढ़ाव और सुख-दुःख का कारण है. इसकी वजह यह है कि यह शाश्वत नहीं है. जब एक बार हमें स्थायी सत्य का अहसास होगा कि हम सब ब्रह्मन हैं; तब संसार हमें प्रभावित नहीं करेगा. हम ऐसा तभी हासिल कर सकते हैं जब हम मनन करेंगे, अपने भीतर देखेंगे और अपने वास्तविक आत्म द्वारा निर्देशित किए जाएंगे.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक- अर्चना