Archive | October 2017

भगवान में विश्वास

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        आदर्श: विश्वास
  उप आदर्श : भरोसा

एक नवविवाहित व्यक्ति अपनी ख़ूबसूरत पत्नी के साथ घर लौट रहा था. वह दोनों नाव से नदी पार कर रहे थे जब अचानक ही वह एक भयनाक तूफ़ान में फंस गए.

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वह व्यक्ति जो वास्तव में सैनिक था, भयरहित था पर उसकी पत्नी अत्यधिक डरी हुई व मायूस थी. उनकी छोटी सी किश्ती बड़ी-बड़ी प्रबल लहरों में डावांडोल हो रही थी और तूफ़ान की उग्रता से पत्नी को बहुत डर लग रहा था. उसे भय था कि किसी भी क्षण उनकी नाव उलट जाएगी और वह डूब जायेंगें. परन्तु वह व्यक्ति शांत, स्थिर व अव्याकुल था मानो कुछ भी न हुआ हो.

पत्नी ने कांपती हुई आवाज़ में अपने शांत पति से पूछा, “क्या आपको डर नहीं लग रहा है? यह हमारी ज़िन्दगी का आखिरी पल भी हो सकता है! हमारा तट पर पहुँच पाना असंभव सा लग रहा है. केवल एक चमत्कार ही हमें बचा सकता है; वरना हमारा अंत निश्चित है. क्या आपको डर नहीं लग रहा है? आप बावले हैं क्या? आप पत्थर के बने हैं क्या?

व्यक्ति हँसा और उसने कोष में से अपनी तलवार निकाली.trust3 पति को इस प्रकार तलवार निकालते हुए देखकर पत्नी और भी अधिक उलझन में आ गई और अचंभित थी कि वह क्या करने वाला है. तत्पश्चात पति अपनी तलवार पत्नी के गले के पास ले आया, इतनी करीब ले आया कि तलवार पत्नी के गले को करीब-करीब छू रही थी.

पति ने पत्नी से पूछा, “क्या तुम्हें डर लग रहा है? ”
पत्नी हँसने लगी और बोली, “मुझे क्यों डर लगेगा? भले ही आपके हाथ में तलवार है पर मैं क्यों डरूँ? मुझे पूरा विश्वास है कि आप मुझसे प्रेम करते हैं.”
पत्नी की बात सुनकर तलवार वापस रखते हुए पति बोला, “यही मेरा उत्तर है. मैं जानता हूँ कि भगवान मुझसे प्रेम करते हैं और यह तूफ़ान उन्हीं के हाथ में है.”

अतः जो भी होगा, अच्छा ही होगा क्योंकि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है और वह कभी कुछ गलत नहीं कर सकते हैं.

सीख:
हमें स्वयं में दृढ़ विश्वास विकसित करना चाहिए. यह दृढ़ विश्वास ही हमारे जीवन को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- श्रीमती सरस्वती व अर्चना

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कृष्ण ,बलराम और राक्षस

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आदर्श:उचित आचरण

उप आदर्श :आत्म विश्वास,साहस

एक पूर्णिमा की रात, कृष्ण और बलराम जंगल की ओर चल पड़े. देरी हो जाने के कारण उन्हें रात जंगल में गुजारना पड़ा. जंगल भयानक था और दोनों की सुरक्षा के लिए कृष्ण ने बलराम को सुझाव दिया की वे दोनों बारी बारी पहरा देंगे. पहला पहरा देने की बारी बलराम की थी और कृष्ण सोने के लिए तैयार हो गए.

कुछ ही समय मे कृष्ण गहरी नींद सो गए. बलराम को दूर से किसी की गुर्राने की आवाज सुनायी दी. बलराम आवाज़ की ओर बढ़ने लगे. तब  उन्होंने एक विरूप आकारवाले राक्षस को अपने ओर आते हुए देखा. वह राक्षस फिर से गुर्राया. बलराम डर से थर थर कांपने लगे.जैसे जैसे बलराम डर रहे थे, वैसे वैसे वह राक्षस दुगुना बढ़ता गया.वह राक्षस बहुत बड़ा आकार लेकर ,बलराम के बहुत खरीब आकर खडा हो गया और उसने फिर गुर्राया. बलराम उसकी आकार और दुर्गन्ध सह नहीं पाए. वे जोर से “कृष्ण,कृष्ण” चिल्लाते हुए बेहोश गिर पड़े.

बलराम की पुकार सुन कर कृष्ण जाग गए और उस आवाज़ की ओर चलने लगे. उन्हें लगा कि बलराम सो गए होंगे और पहरा देने की बारी उनकी है. इस सोच से वे आगे पीछे टहलने लगे और उन्होंने अपने समक्ष एक भयानक प्राणी खडा पाया.

राक्षस कृष्ण को देखकर गुर्राया. कृष्ण निडर होकर राक्षस से प्रश्न पूछने लगे. उन्होंने पहले उसे वहां आने की वजह पूछी. प्रश्न सुनते ही राक्षस का आकार आधा कम हो गया. कृष्ण लगातार जवाब की प्रतीक्षे में  प्रश्न पूछते गए ,और वह राक्षस सिकुड़ता गया.

अब वह राक्षस केवल दो इंच का हो गया. वह देखने में बहुत सुन्दर और प्यारा लग रहा था . कृष्ण उसे अपने जेब में रखकर बलराम की ओर चल पड़े. रात बीती और सुबह बलराम नींद से जागे.

कृष्ण को देखते ही बलराम खुशी से “कृष्ण,कृष्ण” पुकारने लगे. बलराम ने कृष्ण से कहा कि “कृष्ण, कल रात जब तुम सो रहे थे,तब एक भयानक राक्षस यहाँ आकर हम दोनों को मारने की कोशिश कर रहा था. किसी तरह हम बच गए. मुझे सिर्फ इतना याद है कि मैं बेहोश होकर गिर गया.”

कृष्ण अपने जेब से वह छोटी सी आकार वाले राक्षस को  निकालकर, बलराम से पूछे; “क्या तुम इसी राक्षस की बात कर रहे हो?”

बलराम ने जवाब दिया कि “जी हाँ. मगर वह तो बड़ा था, कैसे इस तरह सिकुड़ गया?”

कृष्ण ने कहा “जब मैं उससे प्रश्न पूछने लगा,तो वह सिकुड़ता गया, और अंत में इस तरह बन गया”. बलराम कृष्ण को यह बताने लगे कि पिछली रात को जब वे डर रहे थे ,तब वह राक्षस आकार र्में बढता गया. अंत में कृष्ण ने कहा कि “जब हम डरते हैं ,तब हमारी समस्या भयानक हो जाती हैं; मगर जब हम निडर होकर, साहस के साथ समस्या का सामना करते हैं, तब हमारा डर कम हो जाता है.

शिक्षा :

जब हम किसी समस्या को सामना करने से झिझकते या डरते हैं ,तब वह समस्या बढ़ जाता है. साहस के साथ सामना करने से हम सभी  समस्या का समाधान दूंढ़ सकते हैं. समाधान अपने अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है परन्तु हम समस्या का सामना तो कर चुके होंगे. परिस्तिथि का सामना करके ही हम जीवन में प्रगति पा सकते हैं. टालना प्रगति में बाधा डालता है और आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करता है.

http://saibalsanskaar.wordpress.com