Archive | October 2018

    अकबर और सूफी संत 

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       एक महान सूफी फ़क़ीर (एक मुस्लिम सन्यासी जो पूरी तरह से भिक्षा पर जीता है) ने एक बार सम्राट अकबर से कुछ सहायता की इच्छा रखी. अकबर मुग़ल साम्राज्य के तीसरे सम्राट थे और उन्होंने भारत पर १५५६ से १६०५ तक शासन किया था. 

       वह संत अकबर से मिलने राजमहल गया. जब वह राजभवन पहुँचा, उस समय अकबर पूजा कर रहे थे. अतः फ़क़ीर धैर्यपूर्वक राजा की पूजा समाप्त होने का इंतज़ार करने लगा. फ़क़ीर ने देखा कि अकबर अपने हाथ आसमान की तरफ उठाकर प्रार्थना कर रहे थे तथा ईश्वर से और अधिक दौलत व राजकीय सत्ता के लिए निवेदन कर रहे थे. पूजा समाप्त होने के बाद जब अकबर खड़े हुए तब उन्होंने फ़क़ीर को कमरे से बाहर जाते देखा. अकबर तेज़ी से दौड़े और फ़क़ीर के चरणों में गिरकर उसके वहाँ आने का उद्देश्य पूछा. 

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       फ़क़ीर बोला, “मैं आपसे कुछ माँगने आया था परन्तु जब मैंने आपको ईश्वर से माँगते देखा तो मैं अचरज में पड़ गया कि एक याचक दूसरे भिखारी को भला क्या दे सकता है. मैं एक भिक्षु हूँ, एक फ़क़ीर, पर आप तो मुझ से भी बड़े भिखारी हैं. मैं केवल भोजन व सांसारिक वस्तुओं के लिए भीख माँगता हूँ. परन्तु आप तो विशालतर चीज़ें जैसे दौलत व कीर्ति के लिए भीख माँगते हैं. आखिरकार हम दोनों ही भिक्षुक हैं. आपसे मदद माँगने के बजाय मैं सीधे ईश्वर से सहायता की याचना करूँगा.”

  अकबर समझ गए और उन्हें अहसास हुआ कि सम्राट होने के बावजूद वह कितने गरीब व असुरक्षित थे.

     सारांश:

   आदि शंकर हमसे प्रश्न करते हैं: हम किस चीज़ की भीख माँगते हैं? हमारी याचना मूर्खतापूर्ण हो सकती है.

     शंकर कहते हैं- मूर्ख- मूढ़मते; अगर भक्ति की गहराई में हम संतृप्ति नहीं ढूँढ़ सकते तो ऐसी भक्ति अर्थहीन है. क्या हमारी भक्ति प्रभु से आदान-प्रदान व्यवस्था का प्रसारण है?

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    आदि शंकर चाहते हैं कि हम अपेक्षा रहित भक्ति विकसित करें. भक्ति वह प्रेम है जो सत्य का मार्ग दिखाती है. एक सच्चा भक्त यह जानता है और ऐसा अनुभव भी करता है कि मूर्खतापूर्ण मनोकामना से रहित भक्ति अपने आप में निर्भयता है. संसार की बाहरी वस्तुएँ हमारी सुरक्षा नहीं करती हैं; केवल सच्ची भक्ति ही हमारा संरक्षण करती है. 

    यद्यपि संसार में रहकर भौतिक ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता है; परन्तु इसके साथ-साथ ज़रुरत व लालच में अंतर जानने के लिए सच्ची भक्ति बहुत आवश्यक है वरना जीवनभर और अपने अंतिम क्षणों में भी यह हमारी असुरक्षा और अप्रसन्नता का कारण बन जाती है.  

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना 

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प्राण का महत्व- जीवनशक्ति 

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      आदर्श: शाश्वत सत्य 

    उप आदर्श: ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण 

    एक समय ६ जिज्ञासु थे जो सत्य व बुद्धिमत्ता की तलाश में दूर-दूर विभिन्न जगहों की यात्रा कर रहे थे. कई लम्बी यात्राओं के बाद उन्होंने एक ऋषि के बारे में सुना जो उन्हें उनकी खोज में मदद करने के योग्य था. ऋषि से मिलने सभी जिज्ञासु घने जंगल में एक कुटिया में पहुँचे. ऋषि ने उनसे कहा कि उसके साथ १ वर्ष रहने के बाद वह उससे अपनी इच्छानुसार प्रश्न पूछ सकते हैं. जिज्ञासु सहमत हो गए और उस ऋषि के शिष्य बन गए. 

   एक साल के बाद १ जिज्ञासु ने ऋषि से पूछा, “शरीर का पोषण करने के लिए किस ज्ञानेन्द्रिय की सबसे अधिक महत्ता है?”

    प्रश्न के उत्तर में ऋषि ने उन्हें एक कहानी सुनाई:

     एक समय पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ थीं: श्रवण, दृष्टि, गंध, स्वाद और स्पर्श. एक दिन पाँचों बैठकर अपनी-अपनी क्षमताओं के बारे में बात करने लगीं. अपनी अहमियत व योग्यता के विषय में ज्ञानेन्द्रियों को थोड़ा घमंड था और वह शरीर की शासक होने का दावा कर रहीं थीं. उन्होंने ज़ोर देकर दृढ़तापूर्वक कहा, “हमें देखो, हम असामान्य रूप से विशिष्ट हैं.” वह डींग मारते हुए बोलीं, “हमारे बिना शरीर किसी भी तरह जीवित नहीं रह सकता है.”

  प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया. श्रवण ने हर तरफ ऐसा मनमोहक संगीत फैलाया जो भावनाओं व वासनाओं को अभिव्यक्त करने वाला था. संगीत की बराबरी करते हुए, दृष्टि ने उत्कृष्ट रंगों के उतार-चढ़ाव में दिलकश मुद्राओं की अद्भुत भव्यता प्रदर्शित की. गंध ने क्षणभर में चारों ओर दिव्य व उत्तम सुगंध फैला दी. अन्य ज्ञानेन्द्रियों से बेहतर परिणाम दिखाने के लिए, स्वाद ने भरपूर मात्रा में मुँह में पानी लाने वाले विशिष्ट स्वाद की श्वास छोड़ी. प्रत्येक श्वास में सौम्य उत्साह व मधुर शीतलता के सिहरन से स्पर्श ने सम्पूर्ण शरीर को सजीव कर दिया. सभी आपस में एक-दूसरे के लिए प्रशंसा लुटा रहे थे. अपने आप में यह एक दृश्य था. 

  इस अद्भुत तमाशे को देखते हुए प्राण चुपचाप धीरे-धीरे श्वास अंदर-बाहर कर रहा था. प्राण शरीर में बस, विद्यमान था. श्वास लेते समय वह ज्ञानेन्द्रियों को ग़ौर से देखता था और श्वास छोड़ते समय भी वह ज्ञानेन्द्रियों का अनुपालन कर रहा था. कुछ देर ज्ञानेन्द्रियों को ध्यान से देखने के बाद प्राण बोला, “तुममें से किसी का भी शरीर पर सबसे अधिक आधिपत्य नहीं है.” लेकिन प्राण की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. ज्ञानेन्द्रियों के पास अन्य किसी बात के लिए समय ही नहीं था. वह अपने अतिरिक्त हर चीज़ से बेख़बर थीं और प्राण की ओर उनका ज़रा भी ध्यान नहीं था. प्राण ने पुनः चेष्टा की. परन्तु ज्ञानेन्द्रियाँ स्वयं में इस हद तक तल्लीन थीं कि इस बार भी उन्होंने प्राण को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया. क्रोधित होकर प्राण चला गया.

 प्राण के जाते ही ध्वनि, रंग, खुशबू, स्वाद, शारीरिक अनुभूति और चित्त, सभी फीके पड़ने लगे और धीरे-धीरे लुप्त हो गए. ज्ञानेन्द्रियों का अस्तित्व समाप्त हो गया. जब प्राण वापस आया तब उन्हें अपने अस्तित्व का आभास हुआ. प्राण की अनुपस्थिति में ज्ञानेन्द्रियों की अपनी कोई पहचान नहीं थी और वह कमज़ोर व भयभीत थीं.

    प्राण फिर से वापस आया और एकाएक सभी ज्ञानेन्द्रियाँ प्राण के प्रति सचेत हुईं. बिजली के स्विच के समान, यह प्राणाधार शक्ति उन्हें चालू कर रही थी और बुझा रही थी. उनका इस पर कोई नियंत्रण नहीं था परन्तु उस ऊर्जा का उनपर पूरा प्रभुत्व था. इस जागरूकता के साथ उन्हें तुरंत अहसास हुआ कि उनका अस्तित्व प्राण के कारण था और यह प्राणाधार शक्ति उनसे कहीं अधिक बलवान थी. ज्ञानेन्द्रियों को समझ में आया कि शरीर किसी भी प्रकार से उनके अधीन नहीं था. शरीर पूर्णतया प्राण के वश में था.   

   जब वह सम्मान से प्राण के समक्ष झुकीं तब प्राण बोला, “स्वयं को पाँच भागों में बाँटकर और समस्त शरीर में फैलाकर, मैं अपना रूप बदलता हूँ और स्वतः ज्ञानेन्द्रियों की सृष्टि करता हूँ. इस प्रकार मैं शरीर को जीवन प्रदान करता हूँ.”

    सीख:

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   इस कहानी में प्राण महाप्राण है और अपान, प्राण, समन, उदान व वयान पाँच उप-प्राण हैं. शक्ति के यह पाँच उप-वर्ग शरीर के विभिन्न भागों को दर्शाते हैं. अपान, श्रेणि से नाभि तक होता है; प्राण का बहाव हृदय से कंठ तक होता है; समन, मध्यपट में नाभि से हृदय की ओर संचालित होता है; उदान- सर, बाहों व टांगों में होता है; व्यान, पूरे शरीर भर में होता है. इस कहानी को सुनाने के बाद क्या हमारे भीतर का अचेत अंश किसी स्तर पर सहज-बोध से कहानी का सन्देश समझ सकता है? किसी मलिन गंध का सामना करने पर हम स्वाभाविक रूप से क्या करते हैं?   हम सांस रोक लेते हैं- सांस के अभाव में गंध महसूस नहीं होती है. कुछ बेस्वाद खाने पर भी हम सांस रोक लेते हैं- सांस की अनुपस्थिति में हमें स्वाद का आभास नहीं होता है. ज्ञानेन्द्रियों व चित्त का जन्म प्राण से होता है, वह प्राण के अभिव्यक्ति हैं और वापस प्राण में समाहित हो जाते हैं. वास्तव में, हर रात गूढ़ निद्रा की अवस्था में ज्ञानेन्द्रियाँ व चित्त प्राण में सम्मिलित हो जाते हैं. गूढ़ निद्रा हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. ज्ञानेन्द्रियों व चित्त की निरंतर क्रियाशीलता हमारी जीवन-शक्ति चूसकर हमें कमज़ोर बनाती है. यदि हम रात को बेचैन रहते हैं और बहुत सारे सपनों का अनुभव करते हैं तो हमारी नींद ताज़गी देने वाली नहीं बल्कि थकानेवाली कहलाती है. गूढ़ निद्रा ताज़गी देने वाली व स्फूर्तिदायक होती है. मगर गूढ़ निद्रा के दौरान हम सचेत नहीं होते हैं.

   ध्यान व तपस्या के माध्यम से ज्ञानेन्द्रियों व चित्त की निरंतर चहक से जागरूकता को अलग करना संभव है. ऐसा करने से हम प्राण के प्रति पूर्णतया सचेत रहकर उसी स्थायी विश्रांति का अनुभव कर सकते हैं जैसी हमें गूढ़ नींद में होती है. अगर हम ध्यान देकर सुनेंगे तो हम जीवन के श्वास, प्राण, के संगीत की ध्वनि सुन पाएंगे.

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 source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com 

  अनुवादक- अर्चना