Archive | June 2015

दैवत्व तथा अहम्

divinity

            आदर्श : उचित आचरण

उप आदर्श : सभी में दैवत्व देखें

उत्तंग नाम के एक धर्मपरायण संत थे जो मानवता के कल्याण के लिए तपस्या कर रहे थे. उत्तंग जाति से ब्राह्मण थे और भगवान कृष्ण के परिचित थे. वह इच्छा, अभिलाषा, घृणा व लोभ से विमुक्त, एक बंजारे का जीवन व्यतीत करते थे; वह अपनी अलग ही दुनिया में रहते थे.

भगवान कृष्ण उत्तंग की तपस्या से अति प्रसन्न थे. उन्होंने उत्तंग को न केवल अपना विराट स्वरुप दिखायाdivinity1 बल्कि कृष्ण उन्हें एक वरदान भी देना चाहते थे. संत उत्तंग ने कृष्ण से कहा कि वह इच्छारहित हैं और इसलिए उन्हें कुछ नहीं चाहिए. परन्तु उत्तंग की तपस्या के लिए उन्हें इनाम के रूप में वरदान देने के लिए कृष्ण ज़िद करते रहे. अतः भगवान कृष्ण के लगातार आग्रह करने पर उत्तंग ने वर माँगा कि जब भी उन्हें पानी की आवश्यकता हो या जब भी वह प्यासे हों तब उनके लिए पानी उपलब्ध होना चाहिए. उत्तंग को वरदान देकर भगवान कृष्ण अंतर्ध्यान हो गए.

रेगिस्तान में एक दिन बहुत लंबा चलने के बाद संत उत्तंग को प्यास लगी परन्तु पानी का कहीं नामोनिशान नहीं था.divinity3 तब उन्हें भगवान कृष्ण का दिया वरदान याद आया. वरदान का ध्यान आते ही, उन्होंने फटे हुए कपड़े पहने एक शिकारी को एक भीषण कुत्ते के साथ देखा. divinity4शिकारी ने चमड़े की थैली में पानी रखा हुआ था और उसने संत से पूछा, “महाशय, क्या आप पानी पीयेंगें?” संत एक पक्के ब्राह्मण थे इसलिए शिकारी की अवस्था देखकर उन्हें घृणा महसूस हुई. संत ने नम्रता से इंकार किया, “नहीं, शुक्रिया.” शिकारी एक बार पुनः संत के निकट गया परन्तु संत ने अत्यंत गुस्से में और चिढ़कर शिकारी से चले जाने को कहा. संत के ऐसा कहते ही कि उन्हें पानी में कोई रूचि नहीं है, वह शिकारी और कुत्ता ओझल हो गए.

ऐसा देखकर संत तुरंत समझ गए कि वह भगवान थे जो भेष बदलकर उनकी प्यास बुझाने आए थे. संत को ठेस तो पहुँची पर उन्हें आश्चर्य भी हुआ कि भगवान कृष्ण एक निचली जाति के व्यक्ति द्वारा उनके लिए पानी कैसे भेज सकते हैं. संत चकित थे कि कृष्ण ने कैसे आशा कर ली कि संत एक चमड़े की थैली में से पानी ग्रहण करेंगें.divinity5

इसी दौरान, भगवान कृष्ण प्रकट हुए,divinity2 मुस्कुराए और उन्होंने संत से पूछा, “चांडाल कौन था? मैंने तो इंद्र देव से पानी ले जाने के लिए कहा था. परन्तु वास्तविकता में, तुम्हें अमर बनाने के लिए, वह पानी की जगह अमृत लेकर आए थे. वह केवल तुम्हें परखना चाहते थे यदि तुम सबमें दैवत्व देख सकते हो. और इसके लिए इंद्र को मैंने अनुमति दी थी.”

संत उत्तंग समझ गए कि वह परीक्षा में असफल रहे. अपने अहम् के कारण उन्होंने इंद्र देव द्वारा पानी के रूप में लाए अमृत को ठुकरा दिया था.

अगर उत्तंग जैसे ऋषि परीक्षा में विफल हो सकते हैं, तो हम क्या चीज़ हैं? क्या हम भगवान की माया या लीला समझने योग्य हैं? इसलिए हमें सदा सतर्क रहकर, जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए. भगवान हमेशा हमारी परीक्षा लेते हैं. वह सदा हमारा भला करते हैं. वह जो भी करते हैं, वह हमारे अच्छे के लिए ही होता है. ईश्वर की करनी कभी प्रतिकूल नहीं होती है.

  सीख:

हम सब एक हैं. हम सबका एक ही स्त्रोत है. जब हमें इसका अहसास हो जाएगा और हम सभी में दैवत्व देखने लगेंगें तो हम अंदर से अति प्रसन्न रहेंगें.divinity8

   सर्वदैवत्वा स्वरूपं

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अनुवादक- अर्चना

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ख़ुशी अंदर से आती है

happiness

 आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : सही प्रवृत्ति

एक जैन महंत एक छोटे से गाँव में गए. सभी ग्राम वासी उनके आस-पास इकट्ठे हो गए happiness1और उन्होंने महंत के समक्ष अपनी फरियादें रखीं, ‘हमें हमारी परेशानियों से छुटकारा पाने में कृपया मदद कीजिए; हमारा जीवन खुशियों से तब भरेगा जब हमारी इच्छाएँ पूर्ण होंगीं.’

महंत ने चुपचाप सबकी बातें सुनीं. अगले दिन उन्होंने चुपके से एक दिव्यवाणी के रूप में घोषणा की- ‘इस गाँव में कल दोपहर एक चमत्कार होने वाला है. सभी गाँव वासी अपनी सारी समस्याएँ एक काल्पनिक बोरी में बाँध लें और उसे नदी के उस पार ले जाकर छोड़ दें. फिर, उसी काल्पनिक बोरी में वह सब डाल लें जो आपको चाहिए….सोना, आभूषण, अन्न…और उसे अपने घर ले आयें. ऐसा करने से आपकी समस्त इच्छाएँ पूरी हो जायेंगीं.’

गाँववाले संदेह में थे कि यह आकाशवाणी सत्य है या झूठ. हालाँकि आकाशवाणी सुनकर गाँववाले हक्के-बक्के थे परन्तु…..उन्होंने सोचा कि हिदायत का पालन करने में कोई हानि नहीं है. अगर देववाणी सच है तो जो वह चाहते हैं, वह उन्हें वास्तव में मिल जाएगा और अगर देववाणी झूठी है तब भी कोई अंतर नहीं पड़ेगा. अतः उन्होंने घोषणा का पालन करने का निश्चय किया.

अगली दोपहर, सबने अपनी मुसीबतें एक काल्पनिक बोरी में बाँधीं,happiness2 उन्हें नदी के उस पार छोड़ा और वह सब ले आए जो उनकी सोच के अनुसार उन्हें ख़ुशी देने वाला था….सोना, गाड़ी, घर, आभूषण, हीरे.happiness3

गाँव वापस लौटने पर सभी भौंचक्के थे. आकाशवाणी सच साबित हुई थी. जिस व्यक्ति को गाड़ी चाहिए थी, उसके घर के आगे गाड़ी खड़ी थी.happiness4 जिसने आलीशान घर की कामना की थी, उसने देखा कि उसका घर एक शानदार घर में बदल गया था. happiness5सब अत्यंत खुश थे. उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.

पर आह! हर्ष व उल्लास कुछ समय तक ही कायम रह पाया. जल्द ही सब अपनी तुलना अपने पड़ोसियों से करने लगे. सब महसूस करने लगे कि उनके बगल वाला उनसे अधिक प्रसन्न व धनी था. अतः दूसरों के बारे में और अधिक जानने के लिए सब आपस में बात करने लगे.happiness6 इस व्यवहार से सबको पछतावा होने लगा. ‘मैंने एक साधारण सोने की चेन की माँग की थी परन्तु पड़ोस की लड़की ने आकर्षक सोने के हार माँगा था और उसे वह मिल गया! मैंने केवल एक मकान की माँग की थी पर सामने के घर में रहने वाले व्यक्ति ने हवेली माँगी थी. हमें भी ऐसी वस्तुओं की माँग करनी चाहिए थी! यह एक अनोखा व सुनहरा मौक़ा था परन्तु हमने अपनी मूर्खता के कारण इसे गवाँ दिया.’

सबके मन में इस प्रकार के विचार थे. इसलिए सभी गाँववाले एक बार पुनः महंत के पास गए और उनके समक्ष अपनी परेशानियों का ढेर लगा दिया. इस तरह सारा गाँव एक बार फिर निराशा व असंतोष में डूब गया.

 सीख :

प्रायः लोगों को लगता है कि परेशानी में वह खुश नहीं रह सकते. पर हमें अपनी खुशियों को परेशानियों से नहीं जोड़ना चाहिए. समस्याऐं हर किसी के जीवन में हैं. हमें स्वयं से इस प्रकार कहना चाहिए, “समस्याओं को एक तरफ करके मैं खुश रहूँगा.’ और प्रसन्न रहना चाहिए. इसका यह अर्थ नहीं है कि हमें समस्याओं का हल नहीं सोचना चाहिए.

भगवान कृष्ण से अधिक मुसीबतों का सामना और कौन कर सकता है? कृष्ण के मामा तो उनके जन्म के पहले से ही उन्हें मारने का षड्यंत्र रच रहे थे. महाभारत के युद्ध में भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथी बने थे. परन्तु कुरुक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध के ठीक पहले अर्जुन ने अपना कवच त्यागकर, लड़ने से इंकार करके कई समस्याएँ उत्पन्न कीं थीं. प्रत्येक दिन विभिन्न प्रकार की समस्याओं से भरा होता था. इसके बावजूद, कृष्ण के चेहरे पर सदा आनंदित मुस्कान रहती थी.

भगवान कृष्ण happiness8ने भगवत गीता में आगे बताया है, “दुःख व ख़ुशी को एक समान देखना सीखो. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों से सीख लेने की कोशिश करोगे तो स्पष्टता उभर कर आएगी. और यह स्पष्टता परमानंद लाएगी.”

जीवन में हमारा रवैया सबसे महत्वपूर्ण है. खुशी बाह्य वस्तुओं में नहीं है.

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अनुवादक- अर्चना

 चुराए हुए बिस्कुटों की कहानी

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श: आलोचना से दूर रहें

एक हवाई अड्डे पर एक महिला अपने हवाई जहाज का इंतज़ार कर रही थी.plane6 चूँकि उसे लम्बे समय तक इंतज़ार करना था, उसने एक किताब खरीदने का निश्चय किया. उसने साथ में बिस्कुट का एक पैकेट भी ख़रीदा.

आराम से एकांत में पढ़ने के लिए वह महिला हवाई अड्डे के वी. ई. पी. कमरे में एक आरामकुर्सी पर बैठ गई.

कुर्सी के पास जहाँ बिस्कुट का पैकेट रखा हुआ था, उसकी अगली कुर्सी पर एक आदमी आकर बैठा और अपनी पत्रिका निकालकर पढ़ने लगा. जब महिला ने पहला बिस्कुट निकाला, उस व्यक्ति ने भी एक बिस्कुट लिया. महिला को चिढ़ महसूस हुई पर उसने कुछ नहीं कहा. उसने केवल सोचा, “कैसा अजीब व्यक्ति है! मन तो करता है कि इसके इस दुस्साहस के लिए इसे एक घूँसा मारूँ.” महिला के हर बार बिस्कुट लेने पर वह व्यक्ति भी एक बिस्कुट लेता था. उस महिला को क्रोध तो काफ़ी आ रहा था परन्तु फिर भी वह शांत रही.

जब केवल एक बिस्कुट बाकी बचा, तब महिला ने सोचा, “आह…अब यह बद्तमीज़ आदमी क्या करेगा?” उस व्यक्ति ने बिस्कुट को दो भागों में बाँटा और महिला को आधा दे दिया. “अरे! यह तो हद ही हो गई?” महिला ने सोचा.

अब तो वह महिला अत्यधिक क्रोधित थी! झुँझलाते हुए उसने अपनी किताब व अन्य सामान उठाया और हवाई जहाज की ओर अंधड़ चल पड़ी.plane4

जहाज़ की सीट पर बैठकर उसने अपना चश्मा निकालने के लिए अपने पर्स में झाँका. plane3आश्चर्य के साथ उसने पाया कि उसका बिस्कुट का पैकेट वहीँ था, अनछूआ …..बंद. उसे अत्यंत शर्मिंदगी महसूस हुई. उसे आभास हुआ कि वह गलत थी….उसे भूल गया था कि उसने बिस्कुट का पैकेट अपने पर्स में रखा था.

पर अब, कुछ भी समझाने या माफ़ी माँगने का समय नहीं था.

सीख:

कभी भी आलोचनात्मक न हों. तथ्य जाने बिना कभी न जाँचें. आलोचना करने से पहले ठीक से परिक्षण कर लें. दूसरे पक्ष के बारे में जाने बिना, टिप्पणी न करना ही बेहतर है.

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अनुवादक- अर्चना

कुम्हार और चिकनी मिट्टी

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आदर्श : उचित आचरण
 उप आदर्श : धैर्य, सहनशीलता

एक दम्पति की कहानी बताई जाती है जो अपनी शादी की २५वीं सालगिरह मनाने इंग्लैंड गए. वहाँ दोनों एक दुकान में खरीदारी करने गए, जहाँ पुराकालीन चीज़ें मिलतीं थीं. उन दोनों को पुरानी मिट्टी की वस्तुऐं पसंद थीं, खासतौर से चाय का कप. उन्होंने एक विशिष्ट और आकर्षक प्याला देखा potter4और दुकान में महिला से आग्रह किया, “क्या हम वह देख सकते हैं? हमने ऐसा ख़ूबसूरत प्याला पहले कभी नहीं देखा है!”

जैसे ही उस महिला ने दम्पति को प्याला दिया, वह प्याला एकदम से बोला…….”तुम समझते नहीं हो.” “मैं हमेशा से चाय का प्याला नहीं हूँ. एक समय था जब मैं केवल लाल मिट्टी का ढेला था. मेरे मालिक ने मुझे अनेकों बार लपेटा, कूटा और थपथपाया और मैं हर बार चिल्लाया, “ऐसा मत करो. मुझे पसंद नहीं है. मुझे अकेला छोड़ दो.” परन्तु वह केवल मुस्कुराया और नरमी से बोला,”अभी नहीं !!” और फिर धाड़! मुझे चक्के पर रख दिया गया potter wheelऔर मैं गोल, गोल, गोल घूमता गया. “रोको! मुझे चक्कर आ रहे हैं. मैं बीमार पड़ जाऊँगा!” मैं चिल्लाया.

लेकिन मास्टर ने केवल सर हिलाया और धीरे से कहा, “अभी नहीं.”

उसने मुझे न केवल घुमाया और कुरेदा बल्कि अपनी पसंद के अनुसार कोंचा भी potter1और मेरा आकार तोड़-मरोड़ दिया. इस के बाद उसने मुझे भट्ठी में डाल दिया जहाँ मुझे अत्यधिक गर्मी महसूस हुई. मैं चिल्लाया और मैंने दरवाज़े पर खटखटाकर धम धम प्रहार किया.
“बचाओ! मुझे यहाँ से बाहर निकालो!” ‘अभी नहीं!’ जब मुझे लगा कि मैं और सहन नहीं कर पाऊँगा, दरवाज़ा खुला. उसने मुझे सावधानी से बाहर निकाला और ताक़ पर रख कर ठंडा होने के लिए छोड़ दिया.potter3
ओह, कितना अच्छा महसूस हो रहा था. “आह, यह पहले से कहीं अच्छा है, ” मैंने सोचा. परन्तु जब मैं ठंडा हो गया तो मास्टर ने मुझे उठाया और मुझे झाड़ पोंछ कर हर तरफ से रंग दिया. रंग की तेज़ गंध से निकला धुँआ भयंकर था…”अरे, रोको! रोको! ” मैं चिल्लाया. पर मास्टर ने केवल सर हिलाया और कहा, “अभी नहीं……”
और फिर एक बार पुनः उसने मुझे भट्ठी में डाल दिया. पर इस बार पहले बार की तरह नहीं था. इस बार पहली बार की अपेक्षा दुगना गरम था potter2और मुझे विश्वास था कि मेरा दम घुट जाएगा. मैंने विनती की….मैंने निवेदन किया….मैं चिल्लाया….. मैं रोया…. मुझे यकीन था कि मैं झेल नहीं पाऊँगा. मैं हार मानने को तैयार था पर तभी दरवाज़ा खुला और उसने मुझे बाहर निकालकर पुनः ताक़ पर रखा. ताक़ पर पड़े- पड़े मैं ठंडा हुआ और इंतज़ार करते-करते अचरज में था, “यह मेरे साथ आगे क्या करने वाला है?”

एक घंटे बाद उसने मुझे शीशा दिया और कहा, “अपने आप को देखो.”

और मैंने देखा….मैंने कहा, “यह मैं नहीं हूँ. मैं यह हो ही नहीं सकता. यह बहुत सुन्दर है.”
वह धीरे से बोला, “अब मैं चाहता हूँ कि तुम याद रखो, ” उसने आगे कहा, “मुझे पता है कि घुमाने, कुरेदने व कोंचने से तुम्हें दर्द हो रहा था लेकिन अगर मैं तुम्हें अकेला छोड़ देता तो तुम सूख गए होते. मुझे मालूम है कि चाख पर तुम्हें चक्कर आ रहे थे पर अगर मैंने रोक दिया होता तो तुम चूर-चूर हो गए होते. यद्यपि तुम्हें तकलीफ़ हुई और भट्ठी बहुत गरम व कष्टपूर्ण थी, पर यदि मैंने तुम्हें वहाँ नहीं रखा होता तो तुम फट गए होते. जब मैंने तुम्हें हर तरफ से रगड़ा और रंगा तब यद्यपि तुम्हें पसंद नहीं था पर तुम्हें सख्त व मज़बूत बनाने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा. अन्यथा तुम्हारे जीवन में कोई रंग नहीं होता.”

“और अगर मैंने तुम्हें भट्ठी में दूसरी बार नहीं रखा होता तो तुम लम्बे समय तक रह पाने के लिए इतने मज़बूत नहीं बन पाते. अब तुम एक तैयार वस्तु हो. अब तुम वैसे हो, जैसी मैंने शुरूआत में कल्पना की थी.”

 सीख:

खुद को ढालने के लिए अपने प्रभु- भगवान/गुरु/मार्गदर्शक पर विश्वास रखो. उनको मालूम है कि तुम्हारे लिए क्या सर्वोत्तम है.
कठिन परिश्रम तथा मुसीबतों व कठिनाइयों में  दृढ़ रहकर हम जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं. हमें अपना उद्देश्य ध्यान में रखना चाहिए और हार माने बिना अपना कार्य करते रहना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना