Archive | November 2013

तानसेन से भी मधुर- उप आदर्श: भक्ति- आदर्श: प्रेम

tansen

अकबर, मुग़ल साम्राज्य के १५४२-१६०५ तक , एक महान सम्राट थे. उनके दरबार में तानसेन एक संगीतकार थे. जब भी तानसेन गाना गाते थे, अकबर प्रसन्न हो जाते थे.  तानसेन, अपने ज़माने के, सबसे महान संगीतकार थे. जब तानसेन राग ‘मेघमाला’ गाते थे तो आसमान में घने बादल छा जाते थे ; जब वे राग ‘वरुण’ गाते थे तो रिमझिम-रिमझिम बरसात होने लगती थी और जब वे राग ‘ नागस्वर’ का आलाप करते थे तब वहाँ सर्प इक्कठे हो जाते थे. अकबर को बहुत गर्व था कि उनके दरबार में ऐसे प्रतिष्ठित संगीतकार थे.

लेकिन एक दिन, जब अकबर प्रार्थना में मग्न थे, उन्हें दूर से हरिदास का संगीत सुना. हरिदास, एक रमते राम और भिक्षु थे, जो एकतारा की धुन पर गाते थे. अकबर हरिदास के संगीत से बहुत प्रसन्न, मंत्रमुग्ध और प्रेरित हुए.

अकबर ने तानसेन से पूछा कि उन्हें, तानसेन की गाये सभी गानों की अपेक्षा, हरिदास का गाना क्यों अधिक भाता है? तानसेन बोले,” जहाँपनाह! मैं आपको देख कर गाता हूँ, इस उम्मीद में कि मुझे प्रशंसा के साथ-साथ कुछ रत्न या चंद एकड़ ज़मीन इनाम में मिलेगी . हरिदास, ईश्वर का ध्यान कर के गाते हैं. उन्हें किसी भौतिक धन-दौलत की लालच या अभिलाषा नहीं है. हम दोनों के गायन में यही अंतर है. ”

  सीख :

कोई भी कार्य, जो बिना किसी आकंक्षा के ईश्वर के प्रेम में किया जाता है, चिरस्थायी आनंद देता है .

ब्लॉग के बारे में

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यह ब्लॉग , विभिन्न कथाओं एवं बच्चों के अनुभवों द्वारा,  बालकों में अच्छे चरित्र और मानवीय सिद्धांतों के निर्माण को समर्पित है. मैं इसे श्रद्धांजलि के रूप में, अपने प्रभु और मार्गदर्शक : भगवान् श्री सत्य साईं बाबा(स्वामी) एवं अपनी माताजी श्रीमती आनंदी परमेश्वरन , को समर्पित करती हूँ. मेरी माताजी एक अनुकरणीय बालविकास गुरु थीं और उन्होंने सही आदर्शों में, मेरी परवरिश की है. स्वामी की कृपा से , मैं मानवीय सिद्धांतों की शिक्षा में दस वर्षों से भी अधिक से निहित हूँ और युवा के विकास में एक लघु भूमिका अदा कर रही हूँ.

स्वामी कहते हैं, “एक पौधे को ढाल सकते हैं पर  एक पेड़ को ढालना कठिन है.” बच्चों के मन में उचित आदर्श डाल कर उन्हें सही मार्ग दर्शाना पड़ता है. चरित्र निर्माण बहुत आवश्यक है. इस सन्दर्भ में, मैं स्वामी के सन्देश प्रस्तुत करती हूँ : “शिक्षा का अंत चरित्र है.”  “एक चरित्रहीन व्यक्ति उस घर के समान है जो अन्धकार में है.”  प्रार्थना और आदर्शों पर आधारित कहानियाँ – बच्चों को सिद्धांत सिखाने के कुछ तरीके हैं. इस ब्लॉग का अभिप्राय उन सभी से है जो मानवीय आदर्शों का अभ्यास करना चाहते हैं और जाति, वर्ग या धर्म पर ध्यान दिए बिना, बच्चों में इन सिद्धांतों को बढ़ाना चाहते हैं. यह किसी भी धर्म, भगवान या गुरु का प्रचार नहीं करता है. अच्छे सिद्धांत सर्वव्यापक हैं. कथाएँ विभिन्न स्त्रोतों से लीं गयीं हैं और स्त्रोतों को उपयुक्त श्रेय देने की हर सम्भव कोशिश की गयी हैँ. उम्मीद करती हूँ कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए मूल्यवान होगी, ऐसे समय में जबकि मानवीय आदर्शों का तेज़ी से नाश हो रहा हैँ.

मैं श्रीमती अर्चना राजीव का धन्यवाद करना चाहूँगी जिन्होंने हिंदी भाषित समुदायों, विशेष कर उत्तरी भारत के ग्रामीण विद्यालयों,  तक पहुँचने के लिए सिद्धांतों पर आधारित कहानियों का अनुवाद करने का उत्तम कार्य लिया हैँ.  हम आशा करते हैं कि विश्व के हर सम्भव हिंदी भाषित समुदायों तक पहुँच पाएंगे.  अर्चना की अतुल्य जिम्मेदारी  और समर्पण अनुकरण करने योग्य हैँ.

अर्चना के शब्दों में , ” यह मेरा असीम सौभाग्य हैँ कि मेरे प्रभु, भगवान श्री सत्य साईं बाबा, ने मुझे इस उत्तम कार्य के लिए नियुक्त किया हैँ. यह मेरे अपने आघ्यात्मिक विकास का माध्यम हैं क्योंकि “करत करत अभ्यास से जड़मति होत सुजान” . स्वामी ने हमेशा मातृभाषा पर विशेष ज़ोर दिया हैँ. स्वामी से विनम्र प्रार्थना करतीं हूँ कि मेरी इस छोटी सी कोशिश को सफल बनाएं. ”

  मैं, एक प्रेम और शान्ति पूर्ण विश्व की उम्मीद और कामना करती हूँ. ऐसे समाज की जिसमें मानव श्रेष्ठता के पथ पर चलने वाले लोग भरपूर हों और जिनका मानना हो कि, ” शिक्षा जीवन के लिए होती हैँ कि जीविका मात्र के लिए. ”   

 

नंदिनी रमेश