Archive | September 2016

हाथी और रस्सी

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     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: अपनी शक्ति व सामर्थ्य को जानना

एक आदमी कुछ हाथियों के समूह के पास से गुजर रहा था. अचानक वह रुका और उसे यह देखकर बेहद हैरानी हुई कि इतने विशाल प्राणी अपने आगे के पाँव में केवल एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए थे. r3न कोई ज़ंजीर थी और न ही कोई कैदखाना. किसी भी समय वह इस बंधन को तोड़ सकते थे पर किसी कारणवश वे सभी एक साथ बंधे हुए थे.

उसने पास ही एक प्रशिक्षक को देखा और उससे जिज्ञासापूर्वक पूछा कि उन सभी पशुओं के एक साथ होने की क्या वजह थी और वे भागने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे थे. प्रशिक्षक ने कहा, “युवावस्था से ही जब हाथी आकार में छोटे होते हैं, हम उन्हें इसी रस्सी से बाँधकर रखते हैं.उस समय इन्हें नियंत्रण में r2रखने के लिए एक छोटी सी रस्सी भी पर्याप्त होती है. इस प्रकार हम इन्हें यह मानने के लिए प्रशिक्षित करते हैं कि यह रस्सी तोड़कर भाग नहीं सकते. समय के साथ इन्हें विश्वास हो जाता है कि रस्सी इन्हें बाँधकर रखती है और इस कारण यह भागने का प्रयास भी नहीं करते हैं.”

वह व्यक्ति आश्चर्यचकित था. यह जंतु किसी भी समय अपने बंधन से आज़ाद होने का सामर्थ्य रखते थे पर चूंकि इन्हें विश्वास था कि यह ऐसा नहीं कर सकते इसलिए यह ऐसा प्रयास भी नहीं करते.

सीख:

हाथियों की तरह हम भी अक्सर इसी धारणा पर दृढ़ रहते हैं कि हम कुछ भी नहीं कर सकते. केवल एक बार किसी कार्य में निष्फल हो जाने से हम अपना आत्मविश्वास खोने लगते हैं. हममें से कई इस कहानी को समझ सकते हैं क्योंकि जीवन में कभी न कभी हमने असफलता का अनुभव किया है. प्रायः असफल होने से हम यह मानने लगते हैं कि हम कुछ भी करने के योग्य नहीं हैं, हम इसे सच समझ लेते हैं और स्वयं को एक सीमित संसार में परिमित कर लेते हैं. परंतु अगर हम अपने जीवन की तथाकथित विफलताओं को मात्र प्रारम्भिक प्रयास समझें और सकारात्मक व सकेंद्रित रहकर अपने लक्ष्य की दिशा में परिश्रम जारी रखें तो हम अवश्य सफल होंगें.

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हमें स्वयं को छोटे से संसार में सीमित नहीं करना चाहिए. अगर हम अपनी मानसिक सीमाओं का विस्तार कर लें और अपने सामर्थ्य में दृढ़ विश्वास कर लें तो हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं.

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source: saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

एक अमीर आदमी का मानसिक शान्ति तलाशना

 

आदर्श : शान्ति
उप आदर्श: कृतज्ञता

एक बहुत ही अमीर व्यक्ति था जो अपनी जिंदगी से पूरी तरह ऊब चुका था. वह हर प्रकार की सम्पदा से संपन्न था और उसके पास वह हर खुशी थी जो पैसे से खरीदी जा सकती थी. rich1पर इन सब के बावजूद भी वह संतुष्ट नहीं था. वह अभी भी वास्तविकता की तलाश में था. वह बहुत से ऋषियों तथा महात्माओं से पूछताछ कर चुका था और उनके द्वारा सुझाये पूजन, अर्चन, उपासना तथा संस्कारों का पालन करने के बाद भी वह असंतुष्ट था.

अंततः वह अमीर व्यक्ति एक अन्य संत के पास गया और उसे सविस्तार अपनी व्यथा सुनाने लगा- “समय बीतता जा रहा है. जीवन सीमित है. तुम किस प्रकार के संत हो? तुम मुझे सही मार्ग भी नहीं rich2दिखा सकते. मैं अपने २४ घंटे समर्पित करने को तैयार हूँ- मुझे आजीविका कमाने के लिए काम करने की आवश्यकता नहीं है, मेरे बच्चे नहीं हैं और मैंने इतना पैसा कमा लिया है कि दस जन्मों के लिए पर्याप्त है.” उस महात्मा ने अमीर व्यक्ति को एक सूफी संत के पास भेज दिया. इस सूफी को लोग पागल समझते थे और कई साधु अक्सर अपने शिष्यों से छुटकारा पाने के लिए उन्हें इस सूफी के पास भेज दिया करते थे. परंतु यह सूफी पागल केवल दिखता था: वास्तव में वह बहुत ही बुद्धिमान था.

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अमीर आदमी ने एक बड़े से बोरे में हीरे-जवाहरात भरे और सूफी के पास गया. rich3सूफी एक पेड़ के नीचे बैठा हुआ था. उसने सूफी से अपनी सारी कहानी सुनाई – कि उसके पास दुनिया की वह हर चीज़ थी जो खरीदी जा सकती थी पर फिर भी वह अत्यंत दुखी था. अमीर व्यक्ति ने सूफी से कहा, “प्रमाण के रूप में मैं यह थैला लाया हूँ जिसका मूल्य करोड़ों का होगा. मुझे केवल मन की शान्ति चाहिए.” इसपर सूफी बोला, “मैं तुम्हें मन की शान्ति अवश्य दूँगा. तुम तैयार हो न?” अमीर व्यक्ति ने सोचा, “यह आदमी तो बहुत ही अजीब लगता है. इससे पहले मैं इतने सारे साधुओं के पास गया पर किसी ने भी मुझे इतनी जल्दी शान्ति का वादा नहीं दिया था. सबने किसी न किसी प्रकार के संस्कार, पूजा, प्रार्थना या चिंतन के लिए कहा या फिर मुझे इन सबसे स्वयं ही निबटने के लिए कहा. केवल यह ही ऐसा व्यक्ति है…..शायद लोग ठीक ही कहते हैं कि यह पागल है.”

कुछ हिचकिचाते हुए उसने कहा, “अच्छा, मैं तैयार हूँ.” हालाँकि वह मन की शान्ति की खोज में आया था पर अंदर ही अंदर वह डरा हुआ था. जैसे ही उसने कहा कि वह तैयार है, सूफी ने अमीर व्यक्ति के हाथ से उसका थैला लिया और वहाँ से भाग गया.

उस छोटे से गाँव की गलियाँ बहुत ही पतली और संकुचित थीं और सूफी उन सब से भली भाँती परिचित था.rich6 अमीर आदमी अपने जीवन में कभी नहीं भागा था पर अपने थैले के लिए सूफी के पीछे भागते हुए चिल्ला रहा था, “मेरे साथ धोखा हुआ है! यह आदमी कोई संत नहीं है. यह पागल भी नहीं है. यह तो बहुत ही चालू है.” पर वह सूफी को पकड़ नहीं पाया क्योंकि सूफी गाँव की विभिन्न टेढ़ी-मेढ़ी व संकरी गलियों से बहुत तेज गति से भाग रहा था. अमीर व्यक्ति मोटा था अतः उसे हांफते, रोते तथा पसीने से भरा देखकर सभी लोग उसपर हॅंस रहे थे. गाँव वालों को यह अच्छे से मालूम था कि सूफी पागल नहीं, अत्यंत बुद्धिमान था. उसका काम करने का ढंग कुछ अलग ही था.

अंततः अमीर व्यक्ति उसी पेड़ पर पहुँच गया जहाँ उसे शुरू में सूफी बैठा मिला था. सूफी वहाँ पहले से ही पहुँचा हुआ था. सूफी वहाँ थैले के साथ बैठा हुआ था. अमीर आदमी अभी भी गुस्से से चिल्ला रहा था और अपशब्द बोल रहा था. सूफी बोला, “बकवास बंद करो और अपनी थैली ले लो.”

अमीर आदमी ने झटपट सूफी के हाथ से अपनी थैली ले ली. rich5सूफी ने पूछा, “तुम्हें कैसा महसूस हो रहा है?” व्यक्ति बोला, “मुझे प्रचुर शान्ति का अनुभव हो रहा है.” सूफी ने कहा, “मैं तुम्हें यही बताना चाह रहा था कि अगर तुम तैयार हो तो मैं तुम्हें तुरंत शान्ति दे सकता हूँ. तुम्हें शान्ति मिल गई?” उसने उत्तर दिया, “हाँ, मुझे मिल गई.”

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इसके बाद सूफी ने उस व्यक्ति को सुझाव दिया, “दुबारा कभी किसी को इसके बारे में मत पूछना. तुम अपनी धन-संपत्ति का सही मूल्य नहीं समझते हो. मैंने तुम्हें तुम्हारी दौलत से एक बार अलग किया और तुम फौरन वह बन गए जो तुम वास्तव में हो- एक भिखारी. और यह अनमोल पत्थर जो पहले तुम्हें निरर्थक प्रतीत हो रहे थे, अचानक एक बार फिर अमूल्य बन गए. पर ऐसा अक्सर होता है.”

           सीख:

जो लोग महलों में रहते हैं वे उसका महत्त्व भूल जाते हैं; जो लोग अमीर होते हैं वे गरीबों के कष्ट के बारे में नहीं सोचते हैं. जिन लोगों का गुरु होता है, उनके लिए गुरु घर की मुर्गी के समान होता है. उन्हें लगता है कि वे जब चाहें गुरु से सवाल कर सकते हैं और गुरु उनके हर प्रश्न का उत्तर दे देंगें. जीवन में हमें जो भी उपहार में मिला है उसे हमें बहुमूल्य समझकर संजोकर रखना चाहिए.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

छड़ियों की गठरी

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श: एकता

एक पिता के तीन बेटे थे जो हमेशा आपस में झगड़ते रहते थे. पिता के लाख समझाने पर भी उन तीनों में कोई परिवर्तन नहीं आया. अपने बेटों को यह सिखाने के लिए कि आपसी मतभेद सदा दुर्भाग्य में परिणत होता है, चिंतित पिता ने एक बहुत ही अद्भुत उदाहरण सोचा.

एक दिन जब तीनों बेटे बहुत हिंसक व असभ्य रूप से झगड़ रहे थे तब उन्होंने एक बेटे से छड़ियों की एक गठरी लाने को कहा.stick2 फिर पिता ने वह गठरी एक-एक करके प्रत्येक पुत्र को सौंपी और उसे तोड़ने को कहा. हालाँकि हर एक ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया पर कोई भी उस गठरी को तोड़ नहीं पाया.

फिर पिता ने गठरी खोली और बेटों को एक-एक छड़ी देकर उसे तोड़ने को कहा. ऐसा उन सभी ने बहुत ही आसानी से कर दिया.

 

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“मेरे बच्चों” , पिता ने कहा, “इस गठरी को देखकर तुम्हें नहीं लगता कि अगर तुम एक साथ मिल जुलकर, आपसी सहयोग से रहोगे तो तुम्हारे शत्रु तुम्हें कभी चोट नहीं पहुँचा पायेंगें? परंतु अगर तुम अलग-अलग रहोगे तो तुम इस गठरी की एक छड़ी के समान कमज़ोर रहोगे.”

सीख:

एकता ही बल है. एक टोली आपसी सहयोग से एक अकेले व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक उपार्जित कर सकती है.

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अनुवादक- अर्चना

दो भेड़िये

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : सही व गलत में भेदभाव

एक शाम एक वृद्ध दादाजी ने बातचीत के दौरान अपने पोते को लोगों के अंदर चलने वाले संघर्ष के बारे में बताया. उन्होंने कहा, “बेटा, यह युद्ध हम सब के अंदर छुपे २ भेड़ियों का है.”

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“एक बुराई है. यह हमारे अंदर क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, संताप, पछतावा, लालच, अभिमान, आत्मदया, पाप, अप्रसन्नता, हीनभाव, मिथ्यागर्व, झूठ, उत्कृष्टता तथा अहंकार के रूप में होता है.”fox3

“दूसरा बुराई है. यह हमारे अंदर आनंद, शान्ति, प्रेम, आशा, प्रशांति, विनम्रता, दयालुता, उदारता, सहानुभूति, दानशीलता, सत्य, अनुकंपा तथा विश्वास के रूप में होता है.”

बच्चे ने इस विषय में क्षणभर सोचा और फिर अपने दादाजी से पूछा, “कौन सा भेड़िया जीतता है? ”

दादाजी ने उत्तर दिया, “तुम जिसे बढ़ावा देते हो.”

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सीख:

जीत सदा उन विशेषताओं की होती है जिनको हम बढ़ावा देते हैं और जिनका अभ्यास करते हैं. हमारे पास अच्छी या बुरी आदतों का विकास करने का विकल्प रहता है. इसलिए यह आवश्यक है कि बच्चों को बचपन से ही सही आदर्श सीखाए जाएँ ताकि वह अच्छे मनुष्य व संसार के बेहतर नागरिक बन सकें.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना