Archive | October 2016

विश्वास की ताकत

old2

     आदर्श : आशावाद
उप आदर्श: आत्म विश्वास

एक व्यापारी बुरी तरह क़र्ज़ में डूबा हुआ था और उसे इससे बाहर निकलने का रास्ता समझ नहीं आ रहा था. अनेकों लेनदार उसके पीछे पड़े हुए थे और विभिन्न आपूर्तिकर्ता अपने भुगतान की माँग कर रहे थे. पार्क में एक बेंच पर बैठकर, दोनों हाथों से अपना सर पकड़कर वह सोचने लगा कि अपनी कंपनी को दिवालियापन से कैसे बचा सकता है.old3

अचानक उसके पास एक वृद्ध पुरुष आया और बोला, “मैं देख रहा हूँ कि तुम किसी बात से बहुत परेशान हो.” व्यापारी की उदासी का कारण सुनने के बाद वह वृद्ध पुरुष बोला, “मुझे लगता है कि मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ.” उसने व्यापारी का नाम पूछा, एक चेक लिखा oldऔर उसके हाथ में पकड़ाते हुए बोला, “यह कुछ पैसे रखो. आज से ठीक एक साल के बाद तुम मुझे यहीं मिलना और उस समय मेरे पैसे लौटा देना.”

ऐसा कहकर वह मुड़ा और झट से गायब हो गया. व्यापारी ने अपने हाथ में ५ लाख डॉलर का चेक देखा जिसपर जॉन डी. रॉकफेलर के हस्ताक्षर थे. रॉकफेलर उन दिनों संसार के सबसे अधिक अमीर व्यक्ति हुआ करते थे.

“इन पैसों से मैं अपनी सारी परेशानियाँ पल भर में दूर कर सकता हूँ! ” उसने सोचा. परंतु काफ़ी सोच-विचार के बाद व्यापारी ने चेक की राशि इस्तेमाल करने के बजाय तिजोरी में रखने का फैसला किया. उसे यकीन था कि चेक के होने मात्र से उसे मानसिक शान्ति रहेगी और अपने डूबते हुए कारोबार को बचाने की हर संभव कोशिश करने की शक्ति व साहस मिलेगा.

इस प्रकार मन में निश्चय करके व्यापारी ने नए जोश और आशापूर्ण भाव से विस्तरित अवधि के भुगतान निर्धारित किए और बातचीत के माध्यम से बेहतर व्यापार तय किए. उसने बहुत सारे बड़े व महत्वपूर्ण सौदे किए. शीघ्र ही वह अपने क़र्ज़ के चंगुल से निकलने में सफल हो गया और उसका कारोबार पुनः पैसे बनाने लगा.

old5old7old6old9

ठीक एक साल बाद वह चेक लेकर पार्क में वापस गया. निर्धारित समय पर वह वृद्ध व्यक्ति भी वहाँ आया. पर जैसे ही व्यापारी उसे चेक वापस लौटाकर अपनी सफलता की कहानी बताने वाला था, एक नर्स वहाँ भागती हुई आई और उसने वृद्ध व्यक्ति को पकड़ लिया.

“शुक्र है मैंने इसे पकड़ लिया! ” नर्स बोली. “मैं उम्मीद करती हूँ कि यह आपको परेशान नहीं कर रहा था. यह मानसिक संस्था से हमेशा भाग जाता है और लोगों से कहता है कि यह ज. डी. रॉकफेलर है. ” ऐसा कहकर उस बूढ़े की बाह पकड़कर वह उसे वहाँ से ले गई.

अचंभित व्यापारी वहाँ भौचक्का खड़ा ही रह गया. इस यकीन में कि उसके पास ५ लाख डॉलर थे, वह सारा साल कठिन परिश्रम करके खरीद-बेच के बड़े-बड़े सौदे करता रहा था. और अब अचानक उसे अहसास हुआ था कि उसकी ज़िन्दगी में कायापलट होने का कारण तो पैसा था ही नहीं. उसकी सफलता का असली कारण उसका हाल ही में बरामत आत्म-विश्वास था जिसने उसे हर इच्छित तमन्ना को हासिल करने की शक्ति दी थी.

सीख:
हमें स्वयं में विश्वास अवश्य होना चाहिए. आत्म-विश्वास सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. जब तक हम स्वयं में विश्वास नहीं करते तब तक कोई भी हमारी सहायता नहीं करता है.

old1

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

वृद्ध व्यक्ति और उसका भगवान्

 

      आदर्श: सत्य
 उप आदर्श: ईमानदारी/ संतोष

यह कहानी श्रीमती सुधा मूर्ती की पुस्तक ‘वृद्ध व्यक्ति और उसका भगवान्‘ से ली गई है.

rain1rain2
कुछ वर्ष पूर्व मैं तमिलनाडु के तन्जावुर जिले की यात्रा कर रही थी. अँधेरा होने ही वाला था और बंगाल की खाड़ी से आने वाले तूफ़ान के कारण बहुत तेज़ बारिश हो रही थी. सड़कों पर लबालब पानी भरा हुआ था. rain3इसलिए मेरे गाड़ीवान ने एक गाँव के पास गाड़ी रोककर मुझसे कहा, “इस भयानक बारिश में हम किसी भी तरह आगे नहीं जा सकते. गाड़ी में बैठने के बजाय आप कहीं आश्रय क्यों नहीं देख लेतीं? ”

अनजान जगह में अपरिचित लोगों के बीच अकेले होने के कारण मैं ज़रा चिंतित थी. फिर भी मैंने छाता लिया और घनघोर बारिश में निकल पड़ी.rain4 बिना कुछ सोचे मैं एक छोटे से गाँव की ओर चल पड़ी जिसका नाम अब मुझे याद नहीं है. बिजली का वहाँ नामोनिशान नहीं था और घोर अंधकार व मूसलाधार बारिश में चलना अपने आप में एक चुनौती थी. दूर से मुझे एक मंदिर का सा आकार दिखाई दिया. मुझे लगा कि आश्रय के लिए वह आदर्श जगह होगी. बीच राह में बारिश और भी भयंकर रूप से पड़ने लगी और हवा अत्यधिक प्रबल होने के कारण मेरा छाता उड़ गया. इस कारण जब तक मैं मंदिर पहुँची, मैं पूरी तरह से भीगी हुई थी. मंदिर में प्रवेश होते ही मुझे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की आवाज़ सुनाई दी. यद्यपि मुझे तमिल भाषा का ज़्यादा ज्ञान नहीं है पर फिर भी मैंने उस आवाज़ में अपने प्रति सहानुभूति को महसूस किया. विभिन्न यात्राओं के दौरान मैंने यह जाना है कि भाषा चाहे कोई भी हो, दिल से निकली आवाज़ सदा पहचानी जाती है.

rain5

मंदिर के अंधेरे में ध्यान से देखने पर मुझे लगभग ८० वर्ष का एक बुज़ुर्ग आदमी दिखाई दिया. उसके साथ उसकी ही उम्र की एक औरत पारम्परिक सूती साड़ी पहने खड़ी हुई थी. महिला ने उससे कुछ कहा और फिर एक घिसा हुआ मगर साफ़ तौलिया लेकर मेरे पास आई. जब मैं अपना सर व चेहरा पोंछ रही थी तब मैंने देखा कि वह आदमी अंधा था. उनकी परिस्थिति देखकर इतना तो स्पष्ट था कि वे बहुत गरीब थे. भगवान् शिव का मंदिर, जहाँ अब मैं खड़ी हुई थी, बहुत ही सामान्य था और उसकी सजावट बहुत ही सादगी से की हुई थी.rain6 शिवलिंग पर बिल्वा पत्तों के अलावा और कुछ भी नहीं था. मंदिर में रोशनी वहाँ जल रहे एकमात्र दीये से आ रही थी. दीपक की अस्थिर रोशनी में मुझे अनंत शान्ति का अनुभव हुआ और मुझे भगवान् के साथ असीम आत्मीयता का अहसास हुआ.

अपनी टूटी-फूटी तमिल में मैंने उस आदमी से शाम की मंगल आरती करने का आग्रह किया और उसने बहुत ही प्रेम व श्रद्धा से आरती की. जब उसने आरती समाप्त की तो मैंने दक्षिणा के रूप में १०० रूपए का नोट थाली में रख दिया.

उसने १०० रूपए का नोट छूआ और कुछ व्याकुलता से अपना हाथ पीछे करते हुए विनम्रतापूर्वक बोला, “अम्मा, मेरी समझ से यह १० रूपए का नोट नहीं है. यहाँ १० रूपये से अधिक दान कोई नहीं देता है. आप जो कोई भी हों पर मंदिर में आपकी श्रद्धा महत्त्वपूर्ण है ना कि आपके पैसे. हमारे पूर्वजों ने भी कहा है कि हमें हमारे सामर्थ्य के अनुसार ही देना चाहिए. मेरे लिए आप यहाँ आने वाले अन्य सभी लोगों की तरह भगवान् शिव की भक्त हैं. कृपया यह पैसे वापस ले लीजिए.”

मैं बिलकुल अचंभित थी. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. मैंने उसकी पत्नी की ओर देखा- इस उम्मीद में कि वह उससे वाद-विवाद करके उसे पैसे वापस लेने के लिए राजी कर लेगी. पर वह चुपचाप खड़ी रही. कई परिवारों में अक्सर पत्नी अपने पति को लालच के लिए प्रोत्साहन देती है. पर यहाँ उसका विपरीत था. वह अपने पति के विचारों का समर्थन कर रही थी. बाहर बहुत ही तेज़ हवा चल रही थी और प्रचंड बारिश हो रही थी. अतः मैं उनके साथ बैठ गई और हमने अपने जीवन के बारे में बातें कीं. मैंने उन दोनों से उनके बारे में और गाँव के मंदिर के बारे में पूछा. मैंने उनसे यह भी पूछा कि वहाँ उनके देखभाल के लिए कौन था.

अंततः मैंने कहा, “आप दोनों वृद्ध हैं. आपके रोज़मर्रा की ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए आपकी कोई संतान भी नहीं है. वृद्धावस्था में हमें दवाइयों की सबसे अधिक ज़रुरत पड़ती है. यह गाँव ज़िले के किसी भी शहर से काफ़ी दूर है. इस कारण मैं आपको एक सलाह दे सकती हूँ? ”

उसी दौरान हमने वृद्धावस्था में निवृत्ति वेतन की योजना आरम्भ की थी. उनके साफ़ मगर घिसे हुए कपड़े देखकर मुझे लगा कि वह हमारी योजना के आदर्श उम्मीदवार होंगें.
मेरे सवाल पूछने पर पत्नी बोली, “बोलो, बेटा.”

“मैं आपको कुछ पैसे भेजूँगी. आप उन पैसों को डाकघर या एक राष्ट्रीयकृत बैंक में रखिए. उन पैसों से मिले ब्याज से आप अपनी मासिक ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं. यदि कभी चिकित्सीय आपातकाल आ जाए तो आप मूलधन का प्रयोग कर सकते हैं.”

मेरी बात सुनकर वृद्ध पुरुष मुस्कुराया और उसका चेहरा दीपक से भी अधिक उज्जवल हो गया.

“तुम हमसे काफ़ी छोटी प्रतीत होती हो. तुम अभी भी नासमझ हो. इस वयोवृद्ध उम्र में मुझे पैसों की क्या ज़रुरत है? भगवान् शिव को वैद्यनाथ भी कहते हैं. वह महावैद्य, उत्कृष्ट चिकित्सक हैं. rain7हमारे इस गाँव में बहुत सारे उदार लोग रहते हैं. मैं पूजा करता हूँ और इसके बदले में यहाँ के लोग मुझे चावल देते हैं. अगर हम दोनों में से कोई बीमार पड़ जाता है तो यहाँ का स्थानीय डॉक्टर हमें दवाई दे देता है. हमारी ज़रूरतें बहुत सीमित हैं. हम किसी अनजान व्यक्ति से क्यों पैसे लेंगें? अगर आपके कहेनुसार हम बैंक में पैसा रखेंगें और किसी को मालूम पड़ जाएगा तो वह हमें परेशान करेगा. इस बुढ़ापे में मैं इन सब झंझट में क्यों पड़ूँ? आप बहुत दयालु हैं जो दो अजनबी वृद्ध लोगों की सहायता करना चाहती हैं पर हम संतुष्ट हैं. हम जिस प्रकार से अब तक रहते आए हैं, हमें आगे भी उसी तरह रहने दीजिए. हमें और कुछ नहीं चाहिए.”

सीख:

ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास व निष्ठा और संतोष रखने से आनंद की प्राप्ति होती है. हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता है. अधूरी अपेक्षाओं से सदा दुःख ही मिलता है. अल्प इच्छायें तथा अधिक संतोष हमें प्रसन्नचित रखते हैं.

rain8

 

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

लुभावनी मुस्कान

mulla1

  आदर्श: उचित आचरण/ प्रेम
 उप आदर्श: मुस्कान, दूसरों की परवाह

अरब के सुल्तान मुल्ला नसरूदीन को बेहद पसंद करते थे. इस कारण सुल्तान अपनी यात्रओं पर मुल्ला को अक्सर साथ ले जाया करते थे. ऐसी ही एक यात्रा के दौरान राजशाही क़ाफ़िला रेगिस्तान के एक छोटे से नगर पहुँचा.

mulla3

अकस्मात ही सुल्तान ने मुल्ला से कहा, “पता नहीं इस छोटे से नगर के लोग मुझे पहचानते भी हैं या नहीं? ऐसा करते हैं- इस क़ाफ़िले को यहीं रोककर नगर में पैदल चलकर प्रवेश करते हैं और देखते हैं कि यहाँ के नागरिक मुझे पहचानते हैं या नहीं.”

सुल्तान की इच्छानुसार वे दोनों घोड़े से नीचे उतरे और धूल से भरे नगर की मुख्य सड़क पर पैदल चलने लगे. सुल्तान को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि बहुत से लोग नसरूदीन को देखकर मुस्कुरा रहे थे पर सुल्तान को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर रहे थे.

लोगों के इस व्यवहार को देखकर क्रुद्ध सुल्तान से अपनी अप्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा, “मैं देख रहा हूँ कि यहाँ के वासी तुम्हें जानते पर मुझे तो पहचानते भी नहीं हैं.”mulla5

मुल्ला ने भोलेपन से जवाब दिया, ” मान्यवर, यहाँ के नागरिक मुझे भी नहीं पहचानते हैं.”
“फिर ये सब तुम्हें ही देखकर क्यों मुस्कुरा रहे हैं?” सुल्तान ने पूछा.
“क्योंकि मैं भी उनको देखकर मुस्कुरा रहा था, ” नसरूदीन ने मुस्कुराकर कहा.

mulla4

सीख:
यह साधारण सी कहानी इस बात को बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से दर्शाती है कि एक मासूम सी मुस्कान किसी भी सांसारिक आडंबर या प्रभुत्व से कहीं अधिक प्रभावशाली होती है. हम हमारी बुद्धिमत्ता की शक्ति, प्रभावशालता और तर्क करने की क्षमता पर अक्सर विश्वास करते हैं पर अगर हम पाँच मानवीय आदर्शों को “क्रियाशील प्रेम” के रूप में अभिव्यक्त करेंगें तो लगभग हर बार हमें दूसरों के दिल से ही जवाब मिलेगा. “क्रियाशील प्रेम” प्रेम के नन्हें चमत्कार उत्पन्न करने की क्षमता रखता है. कभी-कभी हमारी आत्मा में छिपी ख़ामोश शक्ति एक साधारण मुस्कान के रूप में खिलकर उभरती है.

mulla6

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

चमत्कार

bhai1

     आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, दृढ़ता

एक आठ साल की बच्ची ने अपने माता-पिता को अपने भाई के बारे में बात करते हुए सुना. उनकी बातचीत से बस वह इतना ही समझ पाई कि उसका भाई बहुत बीमार था और उसके माता-पिता के पास भाई के इलाज के लिए पर्याप्त धन नहीं था. डॉक्टर का बिल अदा करने के बाद वह घर बदलकर छोटे घर में जाने का सोच रहे थे क्योंकि वर्त्तमान घर में रहना उनके लिए मुश्किल हो रहा था. केवल एक कीमती ऑपरेशन से ही बच्चे की जान बच सकती थी और उन्हें पैसे उधार देने वाला भी कोई नहीं था.

bhai2bhai3

बच्ची ने अपने मायूस पिता को अपनी शोकाकुल माँ से बोलते सुना, “केवल एक चमत्कार ही हमारे बेटे को बचा सकता है.” नन्हीं बालिका झटपट अपने कमरे में गई और अलमारी में से अपनी गुल्लक निकाली. गुल्लक के सारे पैसे जमीन पर उलटाकर वह उन्हें बहुत सावधानी से गिनने लगी.

bhai4

 

अपनी इस बेशकीमती गुल्लक को उसने बहुत ही सँभालकर पकड़ा और घर के पीछे वाले दरवाज़े से निकलकर पास की दवा की दुकान पर गई. bhai5बच्ची को गुल्लक के पैसे निकालकर काउंटर पर रखते हुए देख दुकानदार को बहुत ही हैरानी हुई. चकित दुकानदार ने बच्ची से पूछा, “तुम्हें क्या चाहिए?” लड़की ने उत्तर दिया, “यह मेरे छोटे भाई के लिए है. वह बहुत ही बीमार है और मैं उसके लिए एक चमत्कार खरीदना चाहती हूँ.” “मैं कुछ समझा नहीं, ” दुकानदार बोला.

“उसका नाम जॉन है और उसके सर के अंदर कोई अजीब सी चीज़ फैल रही है. मेरे पिता कहते हैं कि केवल एक चमत्कार ही उसे बचा सकता है. क्या आप मुझे बताएंगें कि एक चमत्कार की क्या कीमत होती है?” बच्ची की बात सुनकर दुकानदार को उसपर बहुत दया आई और दुखी मन से बोला, “मुझे दुःख है, बेटा, पर हम यहाँ चमत्कार नहीं बेचते हैं.”
बच्ची बोली, “मेरे पास चमत्कार खरीदने के पैसे हैं. अगर यह पर्याप्त नहीं हैं तो मैं और पैसों का बंदोबस्त कर सकती हूँ. आप बस मुझे इतना बताइए कि चमत्कार की कीमत क्या है.”

उस दुकान में एक अन्य ग्राहक खड़ा हुआ था जिसने काफी अच्छे कपड़े पहने हुए थे. उसने झुककर नन्हीं बालिका से पूछा, “तुम्हारे भाई को किस प्रकार के चमत्कार की ज़रुरत है?”
“मुझे नहीं पता, ” आँसूओं से भरी आँखें लिए उसने उत्तर दिया. “वह अत्यंत बीमार है और माँ कहती है कि उसे ऑपरेशन की सख्त ज़रुरत है. पर मेरे पिता के पास इतने पैसे नहीं हैं इसलिए मैं अपना संचित धन लेकर आई हूँ.”
उस व्यक्ति ने पूछा, “तुम्हारे पास कितने पैसे हैं?”
बच्ची ने धीरे से बोला, “१ डॉलर और ११ सेंट्स; पर मैं कोशिश करके और पैसे ला सकती हूँ.”
“अरे, कितने इत्तिफ़ाक़ की बात है, ” व्यक्ति मुस्कुराया, “१ डॉलर और ११ सेंट्स – छोटे भाइयों के लिए चमत्कार की बिलकुल सही कीमत है.”

उसने एक हाथ में पैसे पकड़े और दूसरे हाथ से लड़की का हाथ पकड़कर बोला, “मुझे अपने घर लेकर चलो. मैं तुम्हारे भाई को देखना चाहता हूँ और तुम्हारे माता-पिता से मिलना चाहता हूँ. चलो देखते हैं अगर मेरे पास तुम्हारी आवश्यकता का चमत्कार है या नहीं.”

bhai6

वह उस लड़की के भाई व माता-पिता से मिला और उसने उसके भाई का ऑपरेशन मुफ्त में कर दिया. कुछ हफ़्तों बाद जॉन स्वस्थ होकर घर वापस आ गया.

एक दोपहर नन्हीं बच्ची और उसकी माँ बातें कर रहे थे. माँ ने कहा, “वह ऑपरेशन तो वाक़ई एक चमत्कार था. पता नहीं उस पर कितने पैसे लगे होंगें” लड़की मुस्कुराई. उसे ठीक मालूम था कि चमत्कार की क्या कीमत थी. उसने झट से कहा, ” १ डॉलर और ११ सेंट्स.”
……….. और एक नन्हीं बालिका का विश्वास व निष्ठा.

दृढ़ विश्वास से चमत्कार अवश्य होते हैं.

सीख:

यह कहानी एक बहन का अपने भाई के प्रति प्यार और भाई को हर हाल में बचाने का विश्वास व दृढ़ता दर्शाती है. प्रेम, निष्ठा व दृढ़ता चमत्कार में अवश्य परिणित होते हैं. हमें सबके लिए इसी प्रकार का प्रेम रखना चाहिए.

bhai7

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना