Archive | March 2016

विश्वास व दृढ़ता

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      आदर्श : उचित आचरण

उप आदर्श : विश्वास व दृढ़ता

वह एक अंधकारपूर्ण भयानक रात थी. तेज़ हवा चलने के कारण हर तरफ सांय-सांय की डरावनी आवाज़ थी मानो आने वाले तूफ़ान का संकेत दे रही हो. खादिजा और उसके तीन छोटे बच्चे अपने कमरे की पुरानी घिसी हुई कालीन पर बैठे हुए थे. खादिजा बार-बार खिड़की से बाहर झाँकती थी क्योंकि उसे डर था कि तूफ़ान कहीं उसके पति के घर लौटने से पहले न शुरू हो जाए. अंततः गाड़ी के रूकने की आहट सुनकर वह झटपट उठी और उसने बच्चों से उनके पिता का स्वागत करने को कहा.

सबसे छोटे बच्चे ने पूछा, “माँ, क्या वह हमारे लिए खाना लेकर आएं हैं ?” खादिजा ने बच्चे को हलके से झिड़का, “यह महत्त्वपूर्ण नहीं है. तुम उनसे यह प्रश्न मत करना.” बच्चे अपने पिता की ओर दौड़े और परेशान होने के बावजूद, खादिजा ने अपने पति का मुस्कुराकर स्वागत किया. खादिजा के पति ने उसे ब्रेड व पनीर के कुछ टुकड़े पकड़ाए. उसने जल्दी से खाना प्लेट में परोसा, जो लम्बे समय से इस्तेमाल के कारण बिरंगी हो चुकीं थीं.

खाना खाते समय खादिजा ने सबसे हँसकर बातें की.faith5 कुछ समय बाद बच्चे मिठाइयों व खिलौनों की कल्पना करते-करते सो गए. तब ख़दीजा और उसका पति कुछ देर चुपचाप बैठकर अपने जीवन के बारे में सोचने लगे.
“अब यह साल भी खत्म होने को है, “खादिजा के पति, हसन, ने कटुता से कहा, “और मुझे अभी तक कोई नौकरी नहीं मिली है. हमने अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दी है और जो भी फर्नीचर बेच सकते थे, उसे बेच चुके हैं. अब हमारे पास अपनी भूख व गरीबी से लड़ने के लिए कुछ भी बाकी नहीं बचा है.”

खादिजा बोली, “हमारे पास अभी भी विश्वास व निष्ठा है जो सभी अच्छाई व खुशियों की कुंजी है. ”

“हमारा विश्वास हमारे लिए क्या खुशियाँ लेकर आया है? हमारे बच्चे भूखे हैं और फटे हुए कपड़े पहन रहे हैं. इस निष्ठा ने तो हमारा जीवन मुश्किल बना दिया है और हमें गरीब व लाचार बना दिया है. इससे पहले तो हम बेहद सुख और आनंद से रह रहे थे…..”

खादिजा ने अपने पति को टोकते हुए कहा, “वह किस प्रकार का सुख था? जुआ कबसे अपने परिवार के लिए आजीविका कमाने का साधन बन गया है! अल्लाह ने कहा है कि मुसलमानों को जुआ नहीं खेलना चाहिए. यह जानते हुए कि हम जो खाना खा रहे थे और कपड़े पहन रहे थे वह हमें नरक में भेज सकते थे, हम कैसे खुश रह सकते थे? हमारे अभिलाभ ने दूसरों को भूखा व नंगा कर दिया था.”

“हाँ, खादिजा, ” हसन बोल, “तुम ठीक कह रही हो. इसी वजह से मैंने जूए का परित्याग किया था. उस दलदल से मुझे बाहर निकालने के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूँ. मेरा पथप्रदर्शन करने के लिए मैं अल्लाह का भी अति आभारी हूँ. लेकिन अच्छा बनने की कोशिश में हमने सब कुछ गवां दिया है. यह गरीबी बहुत ही पीड़ाकर है और दरिद्रता से होने वाला अपमान असहनीय है.”

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हसन के शब्द सुनकर उसे दिलासा देते हुए खादिजा बोली, “हसन, यह केवल कुछ समय की बात है. अल्लाह कहते हैं कि हर कठिनाई राहत लेकर आती है. मुझे अभी भी उम्मीद है. वास्तव में मरनोपरांत का जीवन ही सत्य व अनन्त है. हमें अपने भविष्य के चिरस्थायी जीवन के लिए अच्छे कार्यों द्वारा पूरी तैयारी करनी चाहिए. जो बीत चुका है, उसपर अफ़सोस मत करो. खुशियाँ उन लोगों को मिलतीं हैं जो कठिनाईओं का सामना करते समय सहनशील रहते हैं और अल्लाह की अवज्ञा नहीं करते हैं.”

“खादिजा मुझे डर है कि ऐसी कष्टपूर्ण और तनावपूर्ण परिस्थितियों में मेरे अंदर का बदमाश कहीं मुझे अपराध करने पर विवश न करे. अगर मैंने ऐसा किया तो मैं सब कुछ खो दूँगा.”
“मेरे पास अभी भी मेरी शादी की सोने की अंगूठी है, ” उसकी पत्नी बोली. “मैं कल इसे बेच दूँगी और फिर हमारे पास कुछ समय के लिए पैसे आ जाएंगें. मेरा विश्वास करो, अल्लाह की मदद से तुम्हें नौकरी ज़रूर मिलेगी. जो अल्लाह की अनुकम्पा की उम्मीद में उन्हें पूजते हैं, उन्हें अल्लाह कभी निराश नहीं करते हैं. तुम देखना तुम्हारा भविष्य जल्द ही उज्जवल होगा. जो अल्लाह में विश्वास रखते हैं, अल्लाह उनके प्रति सदा उदार रहते हैं.”

गहरी सांस लेते हुए उसके पति ने उत्तर दिया, “अगर तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं तुम्हारा विश्वास करूँगा. पर हमारे इस कष्ट का कारण मुझे समझ नहीं आता है.”
ख़दीजा बोली, “हसन! क्या आपको क़ुरान का पंक्ति मालूम नहीं है : तुम जिस चीज़ से डरते हो, भूख व संपत्ति तथा जान की हानि से हम तुम्हारी परीक्षा अवश्य लेंगें. अतः सहनशील को यह शुभ समाचार दे दो.”

“पर हमारी तकलीफ़ों का कब अंत होगा?”
“जैसे ही हम अपनी इस परीक्षा में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण होंगें, ” खादिजा ने उत्तर दिया. “सहनशीलता, प्रार्थना तथा पैसे कमाने के अधर्मी तरीकों से दूर रहकर हम अवश्य सफल होंगें.”

ऐसा कहकर दोनों ने अल्लाह को याद किया और उनमें सम्पूर्ण विश्वास रखकर सो गए. सवेरे उठकर उन्होंने नमाज़ पढ़ी. उसके बाद खादिजा नाश्ते की तैयारी करने लगी और हसन कुरान के कुछ अध्याय पढ़ने बैठ गया. जब बच्चे सो कर उठे तो खादिजा ने उन्हें चाय दी. एक बच्चे ने ब्रेड की माँग करते हुए कहा, “मेरा दोस्त और उसके भाई रोज़ सुबह अंडा और मक्खन खाते हैं.”
बच्चे की बात सुनकर खादिजा को बेहद कष्ट हुआ पर फिर भी उसने मुस्कुराकर बच्चे को चूमाfaith3 और कहा, “अल्लाह ने चाहा तो कल तुम्हारे पास वह सब कुछ होगा जो तुम्हें अच्छा लगता है.”
बच्चे ने भोलेपन से पूछा, “आप ऐसे क्यों बोल रहीं हैं: अगर अल्लाह ने चाहा? ”
माँ ने उत्तर दिया, “क्योंकि अल्लाह ही हमें सब कुछ देते हैं और हर कार्य करने में हमारी मदद करते हैं. उनकी इच्छा के बिना तो हम सांस भी नहीं ले सकते हैं.”
“माँ, इसका मतलब है कि हमें नाश्ते के लिए अंडा और ब्रेड अल्लाह देंगें? ”
“हाँ, मेरे बच्चे. अल्लाह की इच्छा से ऐसा अवश्य होगा.”

अपनी पत्नी की बात सुनकर हसन को उसके दृढ़ विश्वास पर बहुत आश्चर्य हुआ. पत्नी की सांत्वना सुनकर वह भी आशान्वित व विश्वस्त महसूस करने लगा. वह बच्चों से आने वाले अच्छे दिनों के बारे में और अल्लाह की मदद से एक अच्छी नौकरी ढूँढ़ने के बारे में बातें करने लगा. उसने बच्चों से कहा कि उनके हालात ठीक होने पर वह उनके लिए उनकी मनपसंद मिठाइयाँ और फल लेकर आएगा.

उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई. हैरान कि इतने सवेरे दरवाज़े पर कौन होगा, हसन देखने गया. जब वह वापस आया तो उसका चेहरा खुशी से खिला हुआ था. हसन को खुश देखकर उसकी पत्नी ने कहा, “हसन, लगता है हमारी परीक्षा ख़त्म हो गई है.”
हसन ने भावुकता से भरी आवाज़ में उत्तर दिया, “हाँ, मेरी प्रिय पत्नी. अल्लाह महान हैं. उन्होंने हमारी परीक्षा समाप्त कर दी है. यह सब तुम्हारे धैर्य, प्रयास व निष्ठा के कारण संभव हुआ है. कहा जाता है: ‘एक भली महिला १००० पुरुषों से बेहतर होती है.’ अल्लाह की मेहरबानी और तुम्हारे अटल विश्वास के कारण हमारी कठिनाइयाँ समाप्त हुई हैं.”
“क्या वह हज साहिब का संदेशवाहक था? ”
“नहीं, स्वयं हज साहिब थे. उन्होंने कहा कि वह अपना कारोबार संभालने के लिए किसी को ढूँढ़ रहे थे. उन्होंने हमारी परिस्थिति व मेरे पिछले अनुभव के बारे में सुना. अपने धैर्यशील उपासकों को दिए वादे के अनुसार, अल्लाह ने हज साहिब के माध्यम से हमें निराशा से बचाकर उम्मीद दी है. हज साहिब ने मुझसे कहा, “अब तुम हम सब से अधिक साफ़ व पवित्र हो. अब तुम एक नवजात के समान हो.”
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 सीख:

विश्वास और दृढ़ता सदा सफलता की ओर ले जाते हैं. हमें सदा अपना सर्वश्रेष्ठ करना चाहिए और बाकी परमात्मा पर छोड़ देना चाहिए. परमात्मा को मालूम है कि हमारे लिए क्या सर्वोत्तम है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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हर अच्छा कार्य महत्त्व रखता है

 

          आदर्श : उचित आचरण
   उप आचरण : दूसरों का ध्यान रखना और उनका सम्मान करना

जॉन एक मांस वितरण फैक्ट्री में काम करता था. एक दिन अपना कार्य समाप्त करने के बाद कुछ परीक्षण करने वह मांस के फ्रीज़र कक्ष में गया. freeze1पर दुर्भाग्यवश कक्ष का दरवाज़ा अचानक बंद हो गया और जॉन अंदर रह गया. यद्यपि वह चिल्लाया और उसने पूरे बलपूर्वक दरवाज़ा भी खटखटाया पर उसकी चीख सुनने के लिए वहाँ कोई भी नहीं था. लगभग सभी कर्मचारी घर के लिए निकल चुके थे. इसके अलावा फ्रीज़र कक्ष के बाहर से कमरे के अंदर की आवाज़ सुन पाना असंभव था.

कुछ घंटों बाद जब जॉन का अंत लगभग निकट था, फैक्ट्री के चौकीदार ने दरवाज़ा खोला और जॉन को समय पर बचा लिया. जॉन ने चौकीदार का शुक्रिया अदा किया और उससे freezer2पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहा था चूँकि साधारणतः यह उसके कार्य का हिस्सा नहीं था.
चौकीदार ने उत्तर दिया, “मैं इस फैक्ट्री में ३५ वर्षों से काम कर रहा हूँ. हर रोज़ हज़ारों कर्मचारी आते-जाते हैं पर आप उन कुछ लोगों में से हैं जो हर सुबह अभिवादन करते हैं और रात को काम के बाद घर लौटते समय मुझे अलविदा कहते हैं. बहुत सारे लोग मुझे अनदेखा कर देते हैं. अन्य दिनों के समान आज सुबह भी प्रवेश द्वार पर आपने अपने सहज ढ़ंग से ‘हेलो’ बोलकर मेरा अभिवादन किया था. परन्तु दिन समाप्त होने पर सभी कर्मचारियों के चले जाने पर मुझे अहसास हुआ कि मैंने आपका ‘अलविदा, कल फिर मिलेंगें ‘ नहीं सुना था. मैं हर रोज़ आपके अभिवादन की प्रतीक्षा करता हूँ क्योंकि आपके कारण मेरी पहचान है. शाम को आपका ‘अलविदा’ नहीं सुनने पर मुझे लगा कि शायद आप किसी मुसीबत में हैं. freezer3अतः मैंने फैक्ट्री का परीक्षण करने का निश्चय किया. मैंने आपकी तलाश की और आपको ढूँढ़ निकाला. ”

 

  सीख :

हमें विनम्र रहकर अपने आस-पास सभी को प्रेम व उनका सम्मान करना चाहिए. इस तरह हम लोगों, खासकर वे जिन्हें हम रोज़ मिलते हैं, पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं. किसी दूसरे की ज़िन्दगी के अंतर लाने के लिए साधारण सी मुस्कान भी बहुत काम आ सकती है. किसी भी अच्छे कार्य की ताकत को कभी भी कम महत्व नहीं देना चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

एक बुरी आदत बदलने से बदलाव

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आदर्श : सत्य
उप आदर्श : ईमानदारी

एक व्यक्ति पैगम्बर मोहम्मद के पास आया और बोला, “हे अल्लाह के पैगम्बर, मुझमें अनेकों बुरी आदतें हैं. मैं सबसे पहले किसका त्याग करूँ? ”

पैगम्बर बोले, “सबसे पहले तुम झूठ बोला छोड़ दो. तुम सदा सच बोला करो.” उस व्यक्ति ने झूठ न बोलने का वादा किया और घर चला गया.
उस रात जब वह व्यक्ति चोरी करने के लिए घर से निकलने लगा तो उसने क्षणभर रूककर पैगम्बर से किए वादे के बारे में सोचा.chori2
“अगर पैगम्बर कल मुझसे पूछेंगें कि मैं कहाँ गया था तो मैं क्या जवाब दूँगा? क्या मैं उन्हें बता पाऊँगा कि मैं चोरी करने गया था? नहीं, मैं ऐसा नहीं कह सकता. परन्तु मैं उनसे झूठ भी नहीं कह सकता. यदि मैं सच बता दूँगा तो सभी मुझसे नफरत करने लगेंगें और मुझे चोर बुलाएंगें. फिर चोरी करने के लिए मुझे सज़ा मिलेगी. “

अतः उस व्यक्ति ने निश्चय किया कि वह चोरी नहीं करेगा और उसने इस बुरी आदत का परित्याग कर दिया.

अगले दिन उस व्यक्ति को शराब पीने की इच्छा हुई.chori3 जैसे ही वह शराब पीने लगा उसने अपने आप से पूछा, “अगर पैगम्बर मुझसे सवाल करेंगें कि मैंने दिन में क्या किया तो मैं उन्हें क्या जवाब दूँगा. मैं झूठ तो बोल नहीं सकता और अगर मैंने सच बताया तो लोग मुझसे घृणा करेंगें क्योंकि एक सच्चे मुस्लिम को शराब पीने की अनुमति नहीं होती है. ”

इस प्रकार जब भी वह व्यक्ति कुछ बुरा करने का सोचता, उसे सदा सच बोलेने का अपना वादा याद आता था. धीर-धीरे उसने एक-एक करके अपनी सभी बुरी आदतों का परित्याग कर दिया. अंततः वह एक अच्छा मुस्लिम व एक नेक इंसान बन गया.

सीख:
हमें सदा सच बोलना चाहिए. एक बुरी आदत दूसरी बुरी आदत को बढ़ावा देती है. एक बुरी अादत पर नियंत्रण हमें अन्य कई अवगुणों को वश में करने में मदद करता है. इससे हमारे व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव आता है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

Volunteer request for translation

प्रिय पाठकों,

 

सरल कहानियों तथा लेखों द्वारा मानवीय आदर्शों के प्रसार के लिए हमारे इस विनम्र प्रयास में समर्थन तथा प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. हम स्वयं सेवकों का एक समूह हैं जो भारत तथा विश्वभर में अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने के लिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में काम करता है. हम ग्रामीण भारत के विविध विद्यालयों के लिए पूर्णतावादी शैक्षिक किताबों का भी अनुवाद करते हैं. हम अपने समूह का विस्तार कर रहे हैं. अतः हम ऐसे स्वयं सेवकों की तलाश में हैं जो इस उत्तम कार्य के लिए अपना कुछ समय दे सकते हैं. यदि आप या आपके दोस्तों या आपके परिवार में से कोई इस समूह का हिस्सा बनना चाहेंगें तो कृपया हमें संपर्क करें. हमारे समूह का हिस्सा बनने के लिए मूल योग्यतायें इस प्रकार हैं- अंग्रज़ी भाषा से अन्य क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद करने की सहजता, गूगल के माध्यम से लिखने, सम्पादन तथा संशोधन करने का मूल कंप्यूटर प्रशिक्षण, अनुशासन तथा प्रतिबद्धता. अपने आप में तथा दूसरों में अंतर लाने के लिए यह सेवानिवृत्त अध्यापकों तथा गृहिणियों के लिए सुनहरा अवसर है क्योंकि वे अपने खाली समय में घर बैठकर भी काम कर सकते हैं. हमारे समूह में शामिल होने की रुचि रखने वाले आप सभी का हमें इंतज़ार है.

 

धन्यवाद- साइबलसंस्कार समूह

तुम्हारे समय के लिए धन्यवाद

 

     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : ध्यान रखने वाला, दूसरों के लिए चिंता

जैक ने उस वृद्ध व्यक्ति को काफ़ी समय से नहीं देखा था. पहले वह कॉलेज, फिर लड़कियों, उसके बाद व्यवसाय तथा अपने जीवन में पूरी तरह से संलग्न था. jack1अपने सपनों को साकार करने के लिए जैक हर संभव प्रयास में लगा हुआ था. अपने व्यस्त जीवन की दौड़ में जैक को अपने अतीत के बारे में सोचने का बिलकुल समय नहीं था. अक्सर अपनी पत्नी व बेटे के लिए भी उसके पास समय नहीं होता था. वह पूरे ज़ोर-शोर से अपना भविष्य बनाने में लगा हुआ था.

जैक की माँ ने उसे फ़ोन पर बताया, “कल रात श्री बेलसर का देहांत हो गया है और उनका अंतिम संस्कार बुधवार को है.”jack2
माँ की बात सुनकर जैक ख़ामोश रहा और अपने बचपन के दिनों को याद करने लगा. किसी पुरानी समाचार फिल्म के समान समस्त यादें उसके मन में स्फुरित होने लगीं.

“जैक, तुम सुन रहे हो न?”
“ओह! क्षमा कीजिए, माँ. हाँ, मैं सुन रहा हूँ. मैंने तो बहुत समय से उन्हें याद भी नहीं किया है. मुझे क्षमा कीजिए पर मुझे लगा था कि उनकी मृत्यु काफी वर्ष पहले ही हो गई थी” ,जैक बोला.
“पर वह तुम्हें कभी नहीं भूले. मैं जब भी उन्हें देखती थी, वह हर बार तुम्हारे बारे में अवश्य पूछते थे. वह अक्सर उन दिनों को याद करते थे जो तुमने उनके साथ गुज़ारे थे” ,माँ ने जैक से कहा.
“मुझे उनका वह पुराना घर, जिसमें वह रहते थे, बहुत प्रिय था” ,जैक बोला.

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“तुम्हें पता है, जैक, तुम्हारे पिता की मृत्यु के बाद, श्री बेलसर ने सदा इस बात का ध्यान रखा कि तुम्हारी ज़िन्दगी में एक पुरुष का प्रभाव रहे” ,माँ ने कहा.
जैक बोला,”उन्होंने ही मुझे बढ़ईगिरी सिखाई थी. अगर वह नहीं होते तो आज मैं इस व्यापार में नहीं होता. उन्होंने अपना कीमती समय लगाकर मुझे वह सब सिखाया जो उनके अनुसार महत्त्वपूर्ण था…..माँ, मैं उनके अंतिम संस्कार के लिए अवश्य आऊँगा” .jack3

व्यस्त होने के बावजूद अपने कथनानुसार, अगला विमान लेकर जैक अपनी माँ के घर के लिए रवाना हो गया. श्री बेलसर का अंतिम संस्कार लघु व शांतिपूर्ण था. उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी और उनके अधिकतर रिश्तेदारों का देहांत हो चुका था.

घर वापस लौटने से एक रात पहले जैक और उसकी माँ एक बार पुनः पड़ोस के उस पुराने घर को देखने गए. दरवाज़े पर खड़े होकर जैक क्षणभर के लिए रूका- मानो पुराने समय में वापस जाकर वह उन यादों को पुनः महसूस कर रहा हो. घर बिलकुल वैसा ही था जैसा उसे याद था. हर कदम यादों से भरा हुआ था. हर तस्वीर, हर वस्तु…… अचानक जैक रूका.

jack6            “क्या बात है, जैक? ” उसकी माँ ने पूछा.
“संदूक गायब है” , उसने कहा.
“कौन-सा संदूक? “माँ ने पूछा.
 

“एक सोने का छोटा-सा संदूक था जिसे श्री बेलसर सदा अपने मेज़ पर रखते थे. मैंने उनसे कितनी ही बार पूछा होगा कि उसके अंदर क्या है. पर वह हमेशा इतना ही बताते थे कि, “इसके अंदर वह है जिसकी वह सबसे अधिक कदर करते हैं” ,जैक ने कहा.

वह संदूक गायब था. उसके अलावा बाकी सब कुछ वैसे ही था जैसा जैक को याद था. उसने अनुमान लगाया कि बेलसर परिवार में से किसी ने वह संदूक लिया होगा.

श्री बेलसर के देहांत को लगभग २ हफ्ते हुए थे. कारोबार से घर लौटते समय एक दिन जैक ने अपनी डाक पेटी में एक नोट पाया- “पार्सल पर हस्ताक्षर की आवश्यकता है. घर पर कोई नहीं था. अगले ३ दिनों के भीतर कृपया मुख्य डाकघर आएँ.”
अगले दिन सुबह डाकघर जाकर जैक पार्सल लेकर आया. पार्सल का छोटा सा बक्सा काफी पुराना था और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी ने उसे १०० वर्ष पहले भेजा हो. लिखावट बहुत मुश्किल से पढ़ने में आ रही थी पर तभी जैक का ध्यान भेजने वाले के पते पर गया.
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लिखा था, “श्री हैरोल्ड बेलसर. ”

जैक ने पार्सल गाड़ी से बाहर निकाला और उसे खोलकर देखा. उसके अंदर सोने का संदूक व एक लिफ़ाफ़ा था. जैसे उसने लिफ़ाफ़ा खोलकर पत्र पढ़ना शुरू किया, उसके हाथों में कम्पन थी.
“मेरी मृत्यु के उपरान्त, कृपया इस संदूक तथा उसमें रखी वस्तुओं को जैक बेन्नेट को भेजा जाए. यही वह वस्तु है जिसकी मैंने अपने जीवन में सबसे अधिक कदर की है.’

चिट्ठी पर एक छोटी-सी चाबी चिपकाई हुई थी. चाबी हाथ में लेकर जब जैक संदूक खोल रहा था तब उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था और उसकी आँखें भरी हुईं थीं. संदूक को सप्रेम सराहते हुए जैक ने उसे सावधानी से खोला और उसके अंदर उसे एक अति ख़ूबसूरत सोने की घड़ी मिली जिसपर लिखा था:

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“जैक, तुम्हारे समय के लिए शुक्रिया! -हैरोल्ड बेलसर. “

“जिस चीज़ का उन्हें सबसे ज़्यादा मोल था- वह……. मेरा समय था.”

जैक ने कुछ समय के लिए घड़ी को पकड़े रखा और फिर दफ्तर फ़ोन करके अगले २ दिनों की अपनी सारी आयोजित भेटें रद्द कर दीं. उनकी सहायक, जेनेट, ने पूछा, “क्यों? ”
जैक ने कहा, “मुझे अपने बेटे के साथ कुछ समय व्यतीत करना है. ”
“ओह, जेनेट….. तुम्हारे समय के लिए शुक्रिया! ”

सीख:

अक्सर लोग चाहते हैं कि कोई उनकी बात धैर्यपूर्वक सुने, उनका ध्यान रखे, उनकी ओर मुस्कुराकर देखे या उनके साथ कुछ समय व्यतीत करे. आज के व्यस्त जीवन में हमारे पास अपने बुजुर्गों तथा बच्चों के साथ समय बिताने का समय नहीं होता है. परन्तु हम उनके साथ कुछ समय व्यतीत करके उन्हें खुश कर सकते हैं. हमारे जीवन का कुछ समय किसी और के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना