Archive | November 2016

स्वर्गलोक हमारे भीतर ही होता है

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     आदर्श : सत्य
 उप आदर्श: जागरूकता

एक समुराई बौद्ध धर्म के ज़ेन मास्टर, हकुइन, के पास आया और उसने मास्टर से पूछा:

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स्वर्गलोक कहाँ है? नरक कहाँ है? स्वर्गलोक और नरक के द्वार कहाँ हैं?

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समुराई को केवल दो ही चीज़ों के बारे में पता था- जीवन और मृत्यु. उसे कोई तत्त्वज्ञान नहीं था. उसे मास्टर से सिर्फ़ इतना ही जानना था कि नरक के द्वार से बचकर वह स्वर्गलोक कैसे पहुँच सकता है. हकुइन ने समुराई के प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार से दिया जिससे कि योद्धा की समझ में आ सके-

तुम कौन हो? – हकुइन ने पूछा.
मैं समुराई का अध्यक्ष हूँ – योद्धा ने उत्तर दिया- और महाराज मेरा सम्मान करते हैं.

हकुइन ज़ोर से हँसा और बोला :
क्या तुम वास्तव में समुराई के अधिपति हो? तुम तो किसी बेचारे गरीब के समान लगते हो!

यह सुनकर समुराई के अहंकार को चोट पहुँची. मास्टर के पास आने की वजह भूलकर उसने झट से अपनी तलवार निकाली और हकुइन की जान लेने पर उतर आया.

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समुराई की दशा देखकर हकुइन एक बार पुनः हँसा और बोला:
यह नरक का द्वार है. अपने अहंकार व क्रोध में तलवार लेकर तुम नरक का द्वार खोलते हो.

समुराई समझ गया. उसने स्वयं को शांत किया और तलवार म्यान में डाली.

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इस पर हकुइन बोला:
और इस प्रकार तुम स्वर्गलोक का द्वार खोलते हो.

सीख:
स्वर्गलोक और नरक हमारे ही भीतर हैं. यही सत्य है. इनके द्वार भी हमारे ही अंदर हैं. यदि हम सतर्क नहीं हैं तो यह नरक का द्वार है. यदि हम चौकस और सचेत हैं तो यह स्वर्गलोक का द्वार है. परंतु अक्सर लोगों को लगता है कि स्वर्ग और नरक कहीं बाहर हैं. स्वर्ग और नरक मरनोपरांत जीवन नहीं हैं. यह दोनों यहीं वर्त्तमान में हैं. उनके द्वार सदा खुले रहते हैं. हर पल हम स्वर्ग व नरक में चयन करते हैं. निरंतर जागरूकता का अभ्यास करने से हम सही चुनाव करने में अवश्य सफल हो सकते हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

गरीब होने का क्या मतलब होता है?

 

  आदर्श: शान्ति
     उप आदर्श: संतोष/ कृतज्ञता

एक बहुत ही दौलतमंद पिता एक दिन अपने बेटे को गाँव के दौरे पर ले गया.poor1 अपने पुत्र को गाँव ले जाकर वह उसे गरीब लोगों के रहन-सहन से परिचित कराना चाहता था. poor2गाँव में वह दोनों एक बेहद गरीब परिवार के खेत पर १-२ दिन रहे.

 

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यात्रा से वापस लौटने पर पिता ने अपने बेटे से पूछा, “बेटा, यात्रा कैसी थी? ”
“बहुत बढ़िया, पिताजी.”
“तुमने देखा गरीब लोग कैसे रहते हैं? पिता ने पूछा.
“हाँ पिताजी” बेटा बोला.
“तो तुमने इस दौरे से क्या सीखा? ” पिता ने पूछा.

बेटे ने उत्तर दिया, “मैंने देखा कि हमारे पास एक कुत्ता है और उनके पास ४ कुत्ते हैं. हमारे घर के बगीचे के बीच में एक पूल है जबकि उनके घर के पास एक नदी है जो निरंतर बहती है.

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हमारे बगीचे में विदेशी लालटेन है और उनके पास रात में अनगिनत सितारे हैं.

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हमारा आँगन सीमित है और उनका आसमान के घेरे का है.
हमारे पास रहने के लिए जमीन का छोटा सा टुकड़ा है और उनके पास दूर-दूर तक फैले खेत हैं. हमारे पास नौकर हैं जो हमारी सेवा करते हैं पर वे लोग दूसरों की सेवा करते हैं. हम अपना आहार खरीदते हैं पर वे अपना स्वयं उपजाते हैं.

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हमारी सुरक्षा के लिए हमारी सम्पति के चारों ओर दीवारें हैं पर उनकी सुरक्षा के लिए उनके मित्र सदा तत्पर रहते हैं.”

अपने बेटे की बात सुनकर पिता अवाक रह गया. फिर पिता की ओर देखकर बेटे ने पूछा, “धन्यवाद पिताजी, मुझे यह दिखाने के लिए कि हम कितने गरीब हैं.”

सीख:

अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि हमारे पास क्या है और जो हमारे पास नहीं होता है हम उसपर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं. एक वस्तु जो किसी एक के लिए निरर्थक होती है वही किसी और के लिए बहुमूल्य सम्पति बन जाती है. यह सब हमारे दृष्टिकोण पर आधारित होता है. सदा और अधिक पाने की चिंता छोड़कर यदि हम अपनी प्रचुरता के प्रति कृतज्ञ रहना सीख लेंगें तो जीवन के प्रति हमारा नज़रिया ही बदल जाएगा. हम अधिक खुश रहने के साथ-साथ मानसिक शान्ति का अनुभव करेंगें और जीवन में मिली हर सौगात के लिए आभारी रहेंगें.

“न्यूनतम कामनाओं वाला व्यक्ति अमीर होता है और जो सबसे अधिक इच्छाएँ रखता है वह गरीब व्यक्ति होता है.”

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

शरणागति

 

एक बार यशोदा माँ यमुना नदी में दीप दान कर रहीं थीं. पत्तों में दीप रखकर जब वह उन्हें प्रवाह कर रहीं थीं तब उन्होंने देखा कि कोई भी दीप आगे नहीं जा रहा था….kri1
ध्यान से देखने पर उन्होंने पाया कि कान्हा जी एक लकड़ी लेकर सारे दीप जल से बाहर निकाल रहे थे.
यशोदा माँ ने कान्हा से पूछा, “लला, तुम यह क्या कर रहे हो……”

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कान्हा कहते हैं, “माँ, यह सब डूब रहे थे. इस कारण मैं इन्हें बचा रहा हूँ.”

कान्हा का उत्तर सुनकर माँ हँसने लगीं और बोलीं, “लला, तुम किस किस को बचाओगे?”
यह सुनकर कान्हा जी ने बहुत ही सुन्दर जवाब दिया, “माँ, मैंने सबका ठेका नहीं लिया हुआ है. पर जो मेरी ओर आयेंगें मैं उन्हें अवश्य बचाऊँगा.”

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इसलिए हमें सदा प्रभु का ध्यान करना चाहिए और उनकी शरण में रहना चाहिए.

एक अच्छा शिक्षक

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       आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श : कर्तव्य

एक छात्र जिसे पहले ही ३ विद्यालयों से निकाला जा चूका था, एक नए विद्यालय में लाया गया.

एक शिक्षक कक्षा में आया, नए छात्र की ओर देखा और सोचा, “पता नहीं ऐसे बच्चे कहाँ से चले आते हैं……..”
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दूसरा शिक्षक आया, नए बच्चे की ओर देखकर गुस्से में बोला, “तुम्हारे जैसों की कोई कमी नहीं है……..”

फिर तीसरा शिक्षक कक्षा में आया और खुशी व उल्लास से बोला, “हमारी कक्षा में क्या एक नया छात्र है?”

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वह शिक्षक उस छात्र के पास गया, उससे हाथ मिलाया, उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराते हुए बोला, “गुड मॉर्निंग. मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था.”

         सीख:

एक सच्चा शिक्षक प्रेरणाप्रद और प्रोत्साहित करने वाला होना चाहिए. एक शिक्षक अपने शिष्यों को उत्साहित करके सही मार्ग दर्शाता है. शिष्यों के जीवन में एक अध्यापक का बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान होता है. एक प्रेरणाप्रद शिक्षक का सदा आदर होता है और शिष्य उसे जीवनभर याद रखते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना