Archive | November 2019

      आनंद भीतर से आता है 

 

          आदर्श: उचित आचरण 

      उप आदर्श:  सही मनोभाव 

             एक ज़ेन सन्यासी छोटे से गाँव में गए. ग्रामवासी उनके आसपास एकत्रित हुए और उनके समक्ष अपने अनुरोध रखते हुए विनम्रता से बोले, “प्रिय महोदय, हमारी समस्याओं से छुटकारा पाने में कृपया हमारी सहायता करें; हमारी इच्छाओं को पूर्ण होने दीजिये- केवल तभी हमारा जीवन आनंद से परिपूर्ण होगा.”

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           महंत ने शांतिपूर्वक उनकी बात सुनी. अगले दिन वह एक देववाणी होने के लिए सहमत हो हुए. देववाणी एक आवाज़ का जरिया होता है जिसके द्वारा ईश्वर सलाह या भविष्यवाणी करते हैं. 

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          “कल दोपहर इस गाँव में एक चमत्कार होने वाला है. अपनी समस्त समस्याओं को एक काल्पनिक बोरी में बाँधकर नदी के पार ले जाओ और वहाँ छोड़ आओ. फिर उसी काल्पनिक बोरी में वह सब डालो जो तुम चाहते हो जैसे कि सोना, जवाहरात, अन्न और उसे घर ले जाओ. ऐसा करने से तुम्हारी इच्छाएँ वास्तविकता में बदल जाएंगी.” 

           ग्रामवासी संशय में थे कि यह भविष्यवाणी सत्य थी या नहीं. मगर स्वर्ग से आई आवाज़ ने उन्हें चकित कर दिया था. सब ने आपस में विचार-विमर्श करने के बाद फैसला किया कि निर्देश का पालन करने से उन्हें कोई हानि नहीं होगी. यदि वह भविष्यवाणी सत्य थी तो जो वह चाहते थे, वह उन्हें वास्तव में मिलेगा और यदि वह असत्य थी तो भी कोई बड़ी बात नहीं थी. अतः जैसा उन्हें बताया गया था उन्होंने वैसा ही करने का फैसला किया. 

         अगले दिन दोपहर में सभी गाँव वालों ने अपनी परेशानियों को एक काल्पनिक बोरी में डाला और नदी के उस पार जाकर छोड़ आए. परेशानियों के बदले सब वह वापस लेकर आए जो उनकी समझ में खुशियों का कारण था जैसे कि सोना, गाड़ी, घर, गहने व हीरे.

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       घर लौटने पर सभी ग्रामवासी अवाक थे. भविष्यवक्ता ने जो भी कहा था वह सच हो गया था. जिस व्यक्ति को गाड़ी चाहिए थी, उसे अपने घर के बाहर गाड़ी खड़ी मिली. जिसने आलीशान घर की कामना की थी उसने पाया कि उसका घर महल में बदल गया था. सभी अत्यधिक प्रसन्न थे. उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.   

लेकिन अफ़सोस! आनंद और उत्सव-काल कुछ समय तक ही चला. जब वह स्वयं की तुलना अपने पड़ोसियों से करने लगे तो सभी को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनका पड़ोसी उनसे अधिक खुश व अमीर था. सभी एक दूसरे से अधिक विवरण जानने के लिए खोद-खोदकर बातें करने लगे. जल्द ही उनका हर्ष और आनंद, पछतावे व अफ़सोस में बदल गया.

    “मैंने एक साधारण सी माला की अपेक्षा की थी जबकि मेरे पड़ोस की लड़की ने सोने के एक अलंकृत हार की माँग की थी और उसे वह मिल गया. मैंने केवल एक घर का ही निवेदन किया था लेकिन विपरीत घर में रहने वाले व्यक्ति ने एक महल की प्रार्थना की थी. हमें भी इस प्रकार की चीज़ों की याचना करनी चाहिए थी. इतना अनोखा अवसर था; जीवन भर का सुनहरा मौका था. हमने अपने मूर्खता से इसे जाने दिया.” 

 इस प्रकार के विचार सभी गाँव वालों को परेशान कर रहे थे. अतः एक बार पुनः सभी ग्राम वासी महंत के पास गए और उनके समक्ष अपनी शिकायतों का ढेर लगाया. सारा गाँव एक बार फिर निराशा व असंतोष में डूब गया. 

     सीख:

    बहुतों को लगता है कि अगर उन्हें परेशानियाँ होंगी तो वह खुश नहीं रह पाएंगे. लेकिन हमें अपनी खुशियों को समस्याओं से नहीं जोड़ना चाहिए. परेशानियाँ हर किसी के जीवन में होती हैं. हमें स्वयं से यह कहना चाहिए, मैं प्रसन्नचित्त बना रहूँगा और हँसमुख रहूँगा. इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें परेशानियों को सुलझाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए.  

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    बालावस्था से ही प्रार्थना करना, मौन बैठना, सहानुभूति जैसे गुणों का विकास और सेवाभाव में कुछ समय बिताना अति आवश्यक है. हम जो युवावस्था में नहीं सीख सकते उसे बड़ी उम्र में सीखना बहुत कठिन होता है. हम युवावस्था में सांसारिक कामकाज में तल्लीन रहते हैं और इस प्रकार की गतिविधियों को हम बाद की उम्र के लिए स्थगित करते रहते हैं. अपने कर्तव्यों का पालन करना और भौतिक संसार में अपने सपने पूरा करने की कोशिश करना अवश्य ही महत्वपूर्ण है परन्तु युवावस्था से ही अपने आध्यात्मिक पक्ष को विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है. आध्यात्मिकता को अपने जीवन का हिस्सा बनाने से वृद्धावस्था में हम स्वयं को सँभालने में बेहतर सक्षम रहेंगे और एक सार्थक व शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर पाएंगे.

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    अनुवादक- अर्चना 

    बटुआ 

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    एक वृद्ध व्यक्ति तीर्थयात्रा के लिए रेलगाड़ी से वृंदावन जा रहा था. रात को सोते समय उसका बटुआ जेब से गिर गया. अगली सुबह एक सहयात्री को बटुआ मिला और पूछताछ करने पर पता चला कि बटुआ वृद्ध व्यक्ति का था. बटुए में श्री कृष्ण की तस्वीर इसका प्रमाण था कि वह बटुआ वास्तव में उस वृद्ध व्यक्ति का था. 

    कुछ समय के बाद वृद्ध व्यक्ति अपने बटुए की कहानी सुनाने लगा. जल्द ही उसके आस-पास उत्सुक श्रोताओं का समूह बन गया. सभी को दिखाने के लिए बटुआ ऊपर उठाते हुए वह बोला, “इस बटुए के पीछे एक लम्बा इतिहास है.  मेरे पिता ने यह बटुआ मुझे वर्षों पहले दिया था जब मैं एक स्कूली छात्र था. मैं इसमें जेब खर्च के पैसे और अपने माता-पिता की एक तस्वीर रखता था. 

    कुछ वर्षों बाद जब मैं और बड़ा हुआ तो विश्वविद्यालय में पढ़ने लगा. हर युवा की तरह मैं अपने रूप-रंग के बारे में सचेत हो गया और अपने माता-पिता की तस्वीर को मैंने अपनी तस्वीर से बदल दिया. मैं अपनी तस्वीर को अक्सर देखता था और अब मैं स्वयं का प्रशंसक बन गया था. 

   फिर मेरा विवाह हो गया और परिवार की चेतना ने आत्म-प्रशंसा का स्थान ले लिया. मैंने स्वयं की तस्वीर हटाकर उसके स्थान पर अपनी पत्नी की तस्वीर लगा ली. दिन के दौरान मैं अनेकों बार बटुआ खोलकर तस्वीर को निहारता था. पत्नी की तस्वीर देखकर मेरी थकावट ग़ायब हो जाती थी और मैं अपना काम पुनः जोश से आरम्भ कर देता था.

    जल्द ही मेरे पहले बच्चे का जन्म हुआ. पिता बनने पर मैं बेहद खुश था. काम के बाद अपने नन्हे शिशु के साथ खेलने के लिए मैं झटपट घर की ओर भागता था. कहने की ज़रुरत नहीं कि बच्चे की तस्वीर ने अब पत्नी की तस्वीर का स्थान ले लिया था.”  

  वृद्ध व्यक्ति रूका, अपनी अश्रुपूर्ण आँखें पोंछकर चारों ओर देखते हुए उदासीन स्वर में बोला, “दोस्तों, मेरे माता-पिता का निधन बहुत समय पहले हो गया था. पाँच वर्ष पूर्व मेरी पत्नी की भी मृत्यु हो गई थी. मेरा पुत्र- मेरा इकलौता पुत्र- अब शादीशुदा है. वह अपने व्यवसाय व परिवार में इतना अधिक व्यस्त है कि उसके पास मेरे लिए समय नहीं है. अब मैं मौत के कगार पर खड़ा हूँ और पता नहीं भविष्य में मेरे लिए क्या है. हर वह चीज़ जिससे मुझे प्रेम था और जिसे मैं अपना समझता था, मुझे छोड़ चुकी है. 

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   अब मेरे बटुए में भगवान् कृष्ण की तस्वीर रहती है. मुझे पता है कि वह मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे. मैं अक्सर सोचता हूँ कि काश मैंने शुरू से ही उनकी तस्वीर अपने साथ रखी होती. केवल एक वह ही सत्य हैं; अन्य सभी क्षणिक छायामात्र हैं.” 

    सीख:

     सांसारिक सम्बन्ध अस्थायी हैं. आज वह जीवन के एकमात्र और सबसे अधिक महत्वपूर्ण रिश्ते प्रतीत होते हैं और अगले ही दिन वह अदृष्ट हो जाते हैं. हमारा असली सम्बन्ध ईश्वर के साथ है. यह रिश्ता शाश्वत है. एक ईश्वर ही हमारे अपने हैं और सदा हमारी देखभाल करते हैं. उस ईश्वर का आह्वान करो जो सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं. वह तुम पर अपना आशीर्वाद बरसाएंगे. हमारा धन धरती पर रहेगा; हमारे मवेशी अस्तबल में रहेंगे, हमारे जीवनसाथी प्रवेशद्वार तक आएँगे, हमारे रिश्तेदार व दोस्त शमशान घाट तक आएँगे, हमारा शरीर अंतिम संस्कार की चिता तक साथ देगा लेकिन इस जीवन के बाद के रास्ते में हमारे कर्म ही हमारा साथ देंगे; इसलिए हमें सदैव अच्छा करने का प्रयास करना चाहिए. 

    इच्छाएँ हमें कभी नहीं छोड़ती हैं. इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती है. एक इच्छा संतुष्ट होने पर दूसरी इच्छा उभरकर आ जाती है. यह सिलसिला हमारी अंतिम सांस तक जारी रहता है जब तक कि हम सत्य को नहीं समझ लेते. जीवन एक चक्र की तरह है जिसमें एक केंद्र और एक परिधि है. हमारा अधिकांश जीवन परिधि में व्यतीत होता है; बाहरी भौतिक वस्तुओं और लोगों की तलाश करते हुए; हम चक्र के भीतर, केंद्र में देखना भूल जाते हैं.

  शरीर हर दिन बदलता है; बालों का सफ़ेद होना, दांत गँवाना, हड्डियों का चरमराना, सहारे की छड़ी का इस्तेमाल- यह सब उम्रवृद्धि का अनिवार्य हिस्सा हैं. यह सभी लक्षण इस बात का संकेत हैं कि हमें धीरे-धीरे मोह-माया के त्याग का अभ्यास शुरू करना चाहिए और वास्तविकता को समझना चाहिए ताकि हम शान्ति से जी सकें. हम इच्छाओं रुपी अंधकार में रहने के कारण निराशा व दुःख में रहते हैं. जब हम ज्ञान व समझ से इच्छाओं का त्याग करते हैं, हम ईश्वर की सदा बहने वाली कृपा के प्रति अधिक ग्रहणशील हो जाते हैं.  

  मनुष्य सम्पति, परिवार इत्यादि से जुड़ जाता है जिसे उसे एक दिन छोड़ना पड़ता है. यदि हम इस तथ्य को जानते व समझते हैं तो हम अपनी इच्छाओं और चिंताओं का त्याग करके उन्हें प्रभु के हवाले क्यों नहीं कर देते, जो हमारे रखवाले हैं? अपनी युवावस्था से ही यदि हम मनन करके वास्तविकता को समझने हेतु कार्य करने के लिए कुछ समय निकालने की आदत का विकास करते हैं तो अपनी वृद्धावस्था में हम अधिक खुश रह पाएंगे. इसका अर्थ यह नहीं है कि हम आरामदायक व खुशहाल जीवन न जीयें; बस उसका आनंद लें, उसको पकड़कर न रखें. विरक्त रहें और सदैव यह याद रखें कि एक दिन हमें यह सब छोड़ना होगा. अतः गुरु नसीहत देते हैं – उस चिंतन के लिए समय निकालो; गोविन्द की तलाश करो.

   source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com   

अनुवादक- अर्चना