Archive | November 2017

दो महासागर : दो दृष्टिकोण

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सहभाजन व देखरेख

दो महासागरों से सम्बंधित एक ख़ूबसूरत लघु कथा है:

भूमध्यसागर की घाटी में विख्यात मृत सागर स्थित है. प्रत्येक विद्यार्थी को यह सच्चाई मालूम है कि मृत सागर ही पानी की एक ऐसी संरचना है जो समुद्र न होते हुए भी सागर की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है : वास्तव में यह एक सरोवर है. अब प्रश्न यह उठता है कि इसे मृतसागर क्यों कहते हैं? या फिर इसे घातक सागर का नाम क्यों दिया गया है? यद्यपि यह ६७ किलोमीटर लम्बा, १८ किलोमीटर चौड़ा और १२३७ फुट गहरा है परन्तु फिर भी इस सागर में कोई जीवन नहीं है. इस सागर का पानी पृथ्वी का सबसे अधिक खारा पानी है; तथ्यों के आधार पर इस सागर का पानी सामान्य सागर के पानी से लगभग ९ गुना अधिक खारा है. पानी में नमक की इतनी अधिकता किसी भी प्रकार के समुद्री पेड़-पौधे व जीव-जंतु को पनपने नहीं देती. पर इस सरोवर का पानी इतना खारा क्यों है? इसका उत्तर बहुत ही सरल है. मृत महासागर में जॉर्डन नदी से पानी आता है और यह सागर सारा पानी अपने पास रख लेता है. इसका पानी कभी बाहर की ओर नहीं बहता है. यह सागर औसत समुद्र तल से इतना नीचे स्थित है कि पानी के निकास का कोई माध्यम ही नहीं है. वातावरण की गर्मी से जो पानी वाष्पित हो जाता है वह वापस नमक में परिवर्तित हो जाता है और यही इस महासागर के निर्जन व निर्जीव पर्यावरण का कारण है.

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इस मृतसागर के उत्तर में गलिली महासागर है. यद्यपि इसका आकार मृतमहासागर की तुलना में काफ़ी छोटा है परन्तु फिर भी यह अनोखे व विचित्र पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से संपन्न है. ऐसा कहा जाता है कि यह २० प्रकार की अलग-अलग मछलियों का वास-स्थान है. वास्तव में इस सागर ने २ हज़ार वर्षों से कई प्राणियों का भरण-पोषण किया है. इस क्षेत्र का समृद्धिशाली मछली-पालन व महासागर के आस-पास की ज़मीन पर भरपूर फ़सल का उतरना इस बात का प्रमाण है.

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यहाँ गौरतलब प्रश्न यह है कि गलिली महासागर, विशाल मृतमहासागर की तुलना में इतना छोटा होने के बावजूद भी सक्रीय कैसे है? एक सरल भेद: गलिली महासागर अपना पानी बाँटता है. जॉर्डन नदी का पानी गलिली महासागर में भी गिरता है पर गलिली महासागर अपने पानी को बाहर बहने की अनुमति देता है. यही इस महासागर के पानी को हितकर, उपयोगी व सक्रीय बनाता है.

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सीख:
जब हम बाँटते हैं तब हम धनवान बनते हैं. इस गणित को समझकर बहुत लोगों ने अपना जीवन संवारा है. यदि हमारे पास धन, ज्ञान, प्रेम, समादर या ईश्वर से प्राप्त अन्य कोई उपहार है और हम उन्हें बाँटना नहीं सीखते तो यह सब धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं. कहा जाता है कि किसी वस्तु का संग्रह करने से उसका विकास नहीं होता है. ईश्वर की अनुकम्पा पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम आपस में मिल-बाँटकर रहना सीखें. जब एक कटोरा खाली होने लगता है तभी उसमें स्वच्छ पानी डाल सकते हैं. अतः हमें देने की कला को अंतर्ग्रहण करना चाहिए.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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श्री कृष्ण, अर्जुन और कबूतर की कहानी

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आदर्श: विश्वास
उप आदर्श : भरोसा

श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच घटित एक विख्यात उपकथा इस प्रकार से है:
“कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से अधिक विश्वसनीय हैं.”

श्री कृष्ण और अर्जुन एक बगीचे में घूम रहे थे जब आसमान में उन्हें एक पक्षी उड़ता दिखा.
पक्षी की ओर इशारा करते हुए श्री कृष्ण बोले,
“अर्जुन, वह पक्षी देख रहे हो…..क्या वह कबूतर है? ”

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“जी, मेरे प्रभु! वह निस्संदेह कबूतर है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.
“अरे रूको …..मेरा ऐसा सोचना है कि वह बाज है. देखो तो, क्या वह बाज नहीं है? “कृष्ण ने पूछा.

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“आप सही कह रहे हैं, कृष्ण. वह पक्षी निश्चित रूप से बाज ही है” ,अर्जुन बोला.
“अरे नहीं! वह बाज के समान प्रतीत नहीं हो रहा है” ,कृष्ण बोले. “वह अवश्य ही कौआ है.”
“निःसंदेह कृष्णा, वह कौआ ही है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.

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अर्जुन की बात सुनकर कृष्ण हँसते हैं और अर्जुन से झिड़ककर कहते हैं,
“अर्जुन, क्या तुम अंधे हो? तुम्हारी अपनी आँखें नहीं हैं, क्या? मैं जो भी कह रहा हूँ तुम उससे सहजता से सहमत होते जा रहे हो.”

अर्जुन बोला, “कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से कहीं अधिक विश्वसनीय हैं. आप जब कुछ कहते हैं तो उसे हकीकत में बदलने की ताकत रखते हैं- चाहे वह कौआ हो, कबूतर हो या बाज. अतः यदि आपने कहा है कि वह पक्षी कौआ है तो वह अवश्य कौआ ही होगा! ”

सीख:
इस कहानी का उद्धरण प्रायः विश्वास का दृष्टांत देने के लिए दिया जाता है. अपने गुरु व प्रभु पर हमें भी इसी प्रकार का विश्वास स्थापित करना चाहिए. श्री कृष्ण पर इस प्रकार के सम्पूर्ण व दृढ़ विश्वास के कारण ही अर्जुन अच्छाई और बुराई में हुए युद्ध को जीत पाया था.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना