Archive | January 2015

भगवान से भेंट

आदर्श : प्रेम
  उप आदर्श : देख भाल

एक बार एक नन्हा बालक था जो भगवान से मिलना चाहता था. उसे मालूम था कि जहाँ भगवान रहतें हैं, वहाँ तक की यात्रा लम्बी है. इसलिए उसने अपना सूटकेस कप केकरुट बीयर के बहुत सारे डिब्बों से भरा और अपनी यात्रा शुरू कर दी.

जब वह कुछ दूर ही गया था तो उसको एक बुजुर्ग महिला दिखी.meet god वह एक पार्क में बैंच पर बैठकर कबूतरों को देख रही थी. लड़का उसके पास बैठ गया और उसने अपना सूटकेस खोला. वह बीयर पीने ही वाला था कि उसने देखा कि वह औरत भूखी लग रही थी. अतः उसने महिला को एक कप केक दे दिया.meet god1महिला ने कृतज्ञता से स्वीकार किया और मुस्कुराई.

उसकी मुस्कान इतनी मोहक थी कि वह लड़का उस मुस्कान को दोबारा देखना चाहता था. अतः उसने महिला को बीयर भी दे दी. महिला एक बार फिर मुस्कुराई.meet god2 लड़का आनंदित हो गया. और इस प्रकार बिना कुछ बोले, सारी दोपहर, वे दोनों खाते और मुस्कुराते वहाँ बैठे रहे.

जैसे अँधेरा होने को आया, लड़के को अनुभव हुआ कि वह कितना थक गया था और वह घर जाना चाहता था. वह जाने के लिए उठा और अभी कुछ दूर ही गया था कि वह वापस मुड़ा, भागकर उस महिला के पास गया और उसे ज़ोर से गले लगाया. महिला ने भी उसे बड़ी-सी मुस्कान दी.

जब लड़का घर पहुँचा तो उसके चेहरे पर ख़ुशी देखकर उसकी माँ को आश्चर्य हुआ. माँ ने पूछा, “आज तुम्हें किस बात से इतनी ख़ुशी हुई है?” उसने जवाब दिया, “मैंने भगवान के साथ खाना खाया.” इसके पहले कि उसकी माँ कुछ कहती, लड़का बोला, “आपको पता है! उसकी मुस्कान सारे जहान में सबसे खूबसूरत है.”

इस दौरान वृद्ध महिला, जिसका चेहरा भी ख़ुशी से चमक रहा था, अपने घर पहुँची. महिला का शांत चेहरा देखकर उसका बेटा हैरान था. उसने पूछा, “माँ, आज तुम्हें किस बात से इतनी ख़ुशी हुई है?” महिला ने उत्तर दिया, “मैंने पार्क में भगवान के साथ कप केक खाए.” और इसके पहले कि उसका पुत्र उत्तर देता, उसने कहा, ” पता है भगवान, मेरी अपेक्षा से कहीं अधिक जवान हैं.”

सीख:

हम अक्सर एक स्पर्श, मुस्कान, मृदु बोल सुनने वाले कान, एक सच्ची प्रशंसा या देखभाल के अति तुच्छ कार्य की शक्ति का अनुमान नहीं लगा पाते हैं. परन्तु इन सब में जीवन बदलने का सामर्थ्य है. हमारी ज़िन्दगी में लोग किसी विशेष कारण, अवधि या जीवनकाल के लिए आते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

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बसंत पंचमी

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जिस प्रकार “दिवाली”- दीपों का त्यौहार- लक्ष्मी, जो दौलत व समृद्धि की देवी हैं, से जुड़ा है ; “नवरात्रि” का पर्व दुर्गा, जो शक्ति एवं वीरता का प्रतीक है, से जुड़ा है; ठीक उसी प्रकार बसंत पंचमी का त्यौहार सरस्वती से सम्बंधित है, जो ज्ञान, कला, संगीत तथा वाणी की देवी हैं. हर वर्ष इस त्यौहार को माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाते हैं. यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का संदेशवाहक है.

भारत देश में छह ऋतुएँ होती हैं, जो अपने क्रम से आकर अपना पृथक-पृथक रंग दिखातीं हैं. इन सब में बसंत ऋतु का अपना अलग एवं विशिष्ट महत्त्व है. इसमें प्रकृति का सौंदर्य सभी ऋतुओं से बढ़कर होता है. बसंत पंचमी के अवसर पर चारों ओर पीली सरसों लहलहाने लगती है. शरद ऋतु की विदाई के साथ पेड़-पौद्यों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होता है. वन-उपवन तरह-तरह के पुष्पों से लहलहा उठते हैं.

ऐसा माना जाता है कि इस दिन विद्या, कला व बुद्धिमत्ता कि देवी सरस्वती का जन्म हुआ था. हिन्दू इस त्यौहार को अत्यंत उत्साह और जोश के साथ मंदिरों, घरों, विद्यालयों तथा विश्वविद्यलयों में मनाते हैं. विद्यार्थियों के लिए यह त्यौहार खासतौर से महत्वपूर्ण व विशेष है. प्रायः सभी विद्यालयों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है. सरस्वती पूजा को अक्षर-अभ्यास या विद्या-आरम्भ भी कहते हैं क्योंकि इस दिन छोटे बच्चों को उनका पहला अक्षर सिखाया जाता है. किताबें, पेन, पेंसिल तथा पत्रिकाओं को देवी सरस्वती के चरणों के पास रखा जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है.

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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वति भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

बसंत पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्त्व है. पीले रंग तो सरसों के खिलते फूलों का प्रतीक मानते हैं. घर-घर में लोग पीले कपड़े पहनते हैं. इसके अतिरिक्त इस दिन पकवान और मिठाइयाँ भी पीले रंग कीं या केसर से बनतीं हैं. पीले रंग के मीठे चावल व केसर हलवा प्रायः प्रतेक घर में बनता है.

भारत के पूर्वी क्षेत्रों में, विशेषतः पश्चिम बंगाल में इसे सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं. देवी का आह्वान कर उनकी पूजा करने के लिए भव्य पंडाल लगाए जाते हैं. इसे श्री पंचमी भी कहा जाता है. bp5गंगा नदी के पवित्र पानी में सरस्वती की मूर्ति का विसर्जन करने के लिए रंगबिरंगी झाँकियाँ निकालीं जाती हैं. पंजाब तथा बिहार के राज्यों में इसे ‘पतंगों के पर्व’ के रूप में जाना जाता है.bpbp1

फिरोज़पुर में, इस दिन बच्चे और बड़े सभी भिन-भिन रंग तथा रूप की पतंगें उड़ाते हैं. इस त्यौहार को नेपाल में भी मनाते हैं. सरस्वती माँ का स्वागत करने के लिए मंदिर एक दिन पहले से ही सजाये जाते हैं.

अर्चना

निःस्वार्थ प्रेम

         आदर्श : प्रेम

    उप आदर्श : देखभाल, बिना शर्त प्रेम

मेरी पत्नी ने बुलाया, “तुम कब तक उस अखबार को पढ़ते रहोगे? sinduक्या तुम यहाँ आकर अपनी लाडली बेटी को खाना खिला सकते हो?” मैंने अखबार फेंका और झटपट घटनास्थान पर गया. मेरी इकलौती बेटी, सिन्दु डरी हुई लग रही थी. उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे और उसके सामने दही चावल से भरा एक कटोरा पड़ा हुआ था. सिन्दु एक अच्छी बच्ची है और अपनी उम्र के हिसाब से काफी समझदार है.

वह हाल ही में आठ साल की हुई है. वह दही चावल से खासतौर से नफ़रत करती है. मेरी माँ और मेरी पत्नी परम्परागत हैं और दही चावल के शीतलतन प्रभाव में दृढ़  विश्वास करते हैं. मैंने अपना गला साफ़ किया और कटोरा हाथ में लिया. ‘सिन्दु, बेटा, तुम इस दही चावल के कुछ ग्रास खा क्यों नहीं लेती?sindu1 अपने पापा की खातिर, बेटा. और अगर तुम नहीं खाओगी तो तुम्हारी माँ मेरे ऊपर चिल्लाएगी.’ मेरी पत्नी मेरे पीछे खड़ी थी और मैं उसके गुस्से को महसूस कर पा रहा था. सिन्दु थोड़ी शांत हुई और उसने अपने हाथ से अपने आँसू पोंछे.

‘ठीक है, पापा. मैं खाऊँगी- सिर्फ कुछ कौर ही नहीं बल्कि पूरा कटोरा. पर आपको…..’ सिन्दु सकुचाई. ‘पापा, अगर मैं सारा दही चावल खा लूँगी तो जो मैं माँगूंगी, आप देंगे?”
‘अवश्य, बेटी.’

‘वादा?’
‘वादा.’

अपनी बेटी के गुलाबी मुलायम हाथों को मैंने अपने हाथ में लिया और सौदा तय कर लिया. ‘माँ से भी कहो कि मुझे ऐसा ही वादा देंगीं,’ मेरी बेटी ने हठ किया. मेरी पत्नी ने सिन्दु के हाथ पर अपना हाथ मारा और बिना किसी भाव के बड़बड़ाई ‘वादा’ . अब मैं थोड़ा बेचैन हो गया. ‘सिन्दु बेटा, तुम्हें कंप्यूटर या ऐसी कोई महंगी चीज़ लेने की ज़िद्द नहीं करनी चाहिए. पापा के पास इस समय इतने पैसे नहीं हैं. ठीक है?’

‘नहीं पापा. मुझे कोई भी कीमती चीज़ नहीं चाहिए.’

धीरे-धीरे और कष्टपूर्वक उसने सारा खाना ख़त्म कर दिया. मन ही मन में मैं, मेरी बेटी को ज़बरदस्ती खिलाने के लिए, अपनी पत्नी व अपनी माँ से नाराज़ था. इस कठिन परीक्षा के बाद, आँखों में उम्मीद लिए, सिन्दु मेरे पास आई. हमारा पूरा ध्यान उस पर था.

‘पापा, मैं इस रविवार को अपना सर गंजा करवाना चाहती हूँ!’ यह मेरी माँग है.

‘भयानक! ‘ मेरी पत्नी चिल्लाई, “एक लड़की होकर गंजा होना? असंभव! ‘

‘हमारे परिवार में कभी नहीं! ‘ मेरी माँ कर्कश आवाज़ में बोली. ‘ यह बहुत ज़्यादा टेलीविज़न देख रही है. टेलीविज़न के इन कार्यक्रमों से हमारी संस्कृति दूषित हो रही है. ‘
“सिन्दु बेटा, तुम कुछ और क्यों नहीं माँग लेती? तुम्हें गंजा देखकर हमें बहुत दुःख होगा. ”

“नहीं, पापा! मुझे कुछ और नहीं चाहिए.’ सिन्दु ने निश्चयात्मकता से कहा.

‘सिन्दु, तुम हमारी भावनाओं को समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? ‘ मैंने उससे प्रार्थना करने की कोशिश की.

‘पापा, आपने देखा कि मेरे लिए दही चावल खाना कितना कठिन था. ‘ सिन्दु की आँखों में पानी था. और आपने मुझ से वादा किया था कि मैं जो भी माँगूंगी आप देंगें. अब आप अपने वादे से मुकर रहे हैं. आप ही ने मुझे राजा हरिश्चंद्र की कहानी और उसका आदर्श बताया था- चाहे कुछ भी हो, हमें हमारे वादों का सम्मान करना चाहिए.

मैंने घोषणा की, ‘हमें अपना वादा निभाना चाहिए.’
‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?’ मेरी माँ और पत्नी एक साथ बोले.

‘नहीं, अगर हम अपने वादे से हट गए तो यह अपने वचन का सम्मान करना कभी नहीं सीखेगी.’

‘सिन्दु, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी.’

अपने बाल मुंडवाकर सिन्दु का चेहरा गोल दिख रहा था और उसकी आँखें बड़ी और ख़ूबसूरत प्रतीत हो रहीं थीं.sindu2

सोमवार की सुबह, मैंने सिन्दु को उसके स्कूल छोड़ा. अपने बालों के बिना सिन्दु को अपनी कक्षा की ओर जाते देखना अपने आप में एक दृश्य था. उसने मुड़कर मुझे इशारा किया. मैंने भी उसे मुस्कुराकर इशारा किया. तभी एक लड़का एक गाड़ी से उतरा और चिल्लाया, “सिन्दूजा, मेरे लिए इंतज़ार करो.”

मुझे उस लड़के का बाल रहित सर देखकर आश्चर्य हुआ. “शायद, यह फैशन है, ” मैंने सोचा.

“महाशय, आपकी बेटी सिन्दूजा सचमुच महान है. अपना परिचय दिए बिना, एक महिला गाड़ी से निकली और बोली, ‘वह लड़का जो आपकी बेटी के साथ चल रहा है, वह मेरा बेटा हरीश है. वह लियूकेमिया से पीड़ित है.’ अपनी सिसकियाँ छुपाने के लिए वह कुछ देर रुकी. ‘पिछले महीने हरीश स्कूल नहीं जा पाया था. कीमोथेरेपी की दवाई के दुष्प्रभाव से उसने सारे बाल गवाँ दिए थे. विद्यालय के साथियों द्वारा अनजाने में, पर निष्ठुरता से चिढ़ाने के डर से उसने विद्यालय आने से इंकार कर दिया था.” पिछले हफ्ते सिन्दूजा हरीश से मिलने आई थी और हरीश से वादा किया था कि वह चिढ़ाने के मुद्दे को संभाल लेगी. पर मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि वह मेरे बेटे की खातिर अपने सुन्दर बालों का बलिदान देगी.

“महाशय, आप और आपकी पत्नी का सौभाग्य है कि ऐसी पवित्र आत्मा आपको अपनी बेटी के रूप में मिली है.”
मैं वहाँ स्तंभित खड़ा रहा. और फिर मैं रोया.

“मेरी नन्ही परी, तुम मुझे सचमुच का निस्स्वार्थ प्रेम सिखा रही हो.”

          सीख :

इस भूमण्डल पर सबसे अधिक खुश वो लोग नहीं हैं जो अपनी शर्तों पर जीतें हैं बल्कि वे हैं जो अपने प्रियजनों के लिए अपनी शर्तें बदल देते हैं……

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अनुवादक : अर्चना

भगवत गीता क्यों पढ़ें ?

       आदर्श : सत्य

  उप आदर्श : बदलाव

एक वृद्ध किसान अपने जवान पोते के साथ पहाड़ों में एक खेत पर रहता था. हर सुबह दादाजी जल्दी उठकर रसोईघर में मेज़ पर बैठकर अपनी भगवत गीता पढ़ते थे.gita उनका पोता बिलकुल उनकी तरह बनना चाहता था और हर संभव प्रकार से उनकी नक़ल करता था.

एक दिन पोते ने पूछा, “दादाजी! मैं बिलकुल आपकी तरह भगवत गीता पढ़ने की कोशिश करता हूँ मैं इसे समझ नहीं पाता हूँ; और जो समझ में आता है वह किताब बंद करते ही मैं भूल जाता हूँ. भगवत गीता का अध्ययन करना क्यों अच्छा है?

दादाजी, जो अंगीठी में कोयला डाल रहे थे, ने उत्तर दिया, “कोयले की यह टोकरी लेकर नदी तक जाओgita1 और मुझे एक टोकरी पानी लाकर दो.” लड़के ने वैसा ही किया जैसा उससे कहा गया था परन्तु घर लौटने से पहले ही सारा पानी चू गया.

दादाजी हँसे और बोले, “अगली बार तुम्हें थोड़ा अधिक तेज़ चलना होगा,” और उसे पुनः कोशिश करने के लिए टोकरी सहित वापस नदी पर भेज दिया.gita3 इस बार बालक और तेज़ दौड़ा पर फिर भी घर पहुँचने से पहले ही टोकरी खाली थी.

हाँफते हुए उसने अपने दादाजी से कहा कि टोकरी में पानी लाना असंभव था और वह उसके स्थान पर बाल्टी लाने गया.
वृद्ध व्यक्ति ने कहा, “मुझे पानी कि बाल्टी नहीं चाहिए; मुझे पानी कि एक टोकरी चाहिए. तुम पूरी कोशिश नहीं कर रहे हो,” और वे लड़के को पुनः प्रयास करते हुए देखने के लिए दरवाज़े से बाहर निकले.

इस समय, लड़का जानता था कि टोकरी में पानी लाना असंभव था परन्तु वह अपने दादाजी को दिखाना चाहता था वह चाहे कितना भी तेज़ भाग ले, घर पहुँचने से पहले पानी चू ही जाएगा. लड़के ने फिर से टोकरी को पानी में डुबायाgita2 और ज़ोर से भागा पर जब तक वह अपने दादाजी के पास पहुँचा, टोकरी फिर से खाली थी.

हाँफते हुए उसने कहा, “देखो दादाजी, यह व्यर्थ है!”
“तो तुम्हें लगता है कि यह बेकार है?” वृद्ध पुरुष ने कहा, “टोकरी को देखो.”
लड़के ने टोकरी को देखा और उसे पहली बार अहसास हुआ कि टोकरी अलग थी. एक गन्दी पुरानी कोयली की टोकरी से पूरी तरह बदल कर अब वह अंदर व बाहर से साफ़ टोकरी थी.gita4

“बेटा, भगवत गीता पढ़ने से ऐसा होता है. तुम्हें सब कुछ समझ में भले ही न आए या याद न रहे पर जब तुम इसे पढ़ते हो तो तुममें बदलाव अवश्य आएगा, अंदर से और बाहर से भी. हमारे जीवन में यह कृष्ण का काम है.

               सीख :

यह गीता में निहित श्रेष्ठ शिक्षाओं की शक्ति को केवल सिद्ध करता है. यद्यपि इन सर्वव्यापी सिद्धांतों को संसार के विभिन्न धर्मग्रंथों में अलग-अलग ढ़ंग से बताया गया है, फिर भी यह सिद्धांत दृढ़ हैं. यह एक अत्यधिक व्यवहारिक पुस्तक है और कई प्रकारों से सबसे खूबसूरत है. गीता हमें समझने में सहायता करती है कि कैसे समाज में रहते हुए हम आध्यात्मिक आदर्शों को अपने जीवन की असली प्रेरणा बना सकते हैं – क्योंकि गीता आत्मिक जीवन की महत्ता पर उपदेश देती है. यह हमारे साथ-साथ विश्व के सभी जीवों को प्रेरित करता है.

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अनुवादक- अर्चना

दोस्ती का जहाज

          आदर्श : उचित आचरण
    उप आदर्श : दूसरों के लिए प्रेम

एक समुद्री यात्रा करता हुआ जहाज समुद्र में तूफ़ान के दौरान नष्ट हो गया था.ship1 जहाज के केवल दो व्यक्ति एक छोटे से बंजर द्वीप पर तैर पाए थे.

दोनों जीवित व्यक्ति जो अच्छे दोस्त थे, समझ नहीं पा रहे थे की वे क्या करें. अतः दोनों इस बात से सहमत हुए कि उनके पास भगवान की प्रार्थना के इलावा और कोई उपाय नहीं था. पर यह पता लगाने के लिए कि किसकी प्रार्थना अधिक शक्तिशाली है, उन्होंने द्वीप को आपस में बाँटने का फैसला किया और उसके विपरीत भागों में रहने के लिए सहमत हुए.

उन्होंने सबसे पहले खाने के लिए प्रार्थना की. अगली सुबह पहले व्यक्ति ने द्वीप के अपने वाले हिस्से में एक फलों से भरा वृक्ष देखा.ship2 और उसने उस वृक्ष के फल को खा लिया. दूसरे व्यक्ति के ज़मीन का टुकड़ा बंजर रहा.

एक हफ्ते बाद पहला व्यक्ति अकेला था और उसने एक पत्नी के लिए विनती करने का निश्चय किया. अगले दिन एक और जहाज नष्ट हुआ और उस जहाज से एक ही महिला बच पाई. वह तैर कर पहले वाले व्यक्ति के हिस्से वाले टापू पर आ गई.ship3 द्वीप के दूसरे वाले भाग पर अभी भी कुछ भी नहीं था.

शीघ्र ही पहले व्यक्ति ने एक घर, कपड़े तथा और अधिक अन्न की प्रार्थना की. अगले दिन जादू से यह सब उसे प्राप्त हो गया. परन्तु दूसरे व्यक्ति के पास अभी भी कुछ भी नहीं था.ship4

अंततः पहले व्यक्ति ने एक जहाज के लिए विनय किया ताकि वह और उसकी पत्नी द्वीप छोड़ सकें. अगली सुबह उसे द्वीप के अपने टुकड़े पर एक जहाज खड़ा मिला. shipपहला व्यक्ति अपनी पत्नी सहित जहाज पर चढ़ गया और दूसरे व्यक्ति को टापू पर ही छोड़ने का फैसला किया.

उसने दूसरे व्यक्ति को भगवान का आशीर्वाद ग्रहण करने के लिए अयोग्य समझा चूँकि उसकी कोई भी प्रार्थना पूर्ण नहीं हुई थी.

जब जहाज चलने वाला था, पहले व्यक्ति ने स्वर्गलोक से एक आवाज़ की गर्जन सुनी, “तुम अपने साथी को द्वीप पर क्यों छोड़ रहे हो?”

“मेरे वरदान केवल मेरे हैं चूँकि वो मैं था जिसने उनके लिए प्रार्थना की थी,” पहले व्यक्ति ने उत्तर दिया. “उसकी सभी प्रार्थनाएँ अनुत्तरित हैं अतः वह किसी भी चीज़ का अधिकारी नहीं है.”

“तुमने गलत समझा है.” आवाज़ ने उसे फटकारा. “उसकी केवल एक ही प्रार्थना थी,ship5 जिसका मैंने उत्तर दे दिया. अगर उसकी प्रार्थना नहीं होती तो तुम्हें मेरा कोई भी वरदान नहीं मिलता.”
“मुझे बताइए,” पहले व्यक्ति ने आवाज़ से पूछा,”उसने ऐसी क्या प्रार्थना की थी कि मैं किसी भी चीज़ के लिए उसका आभारी रहूँ?”

“उसने प्रार्थना की थी कि तुम्हारी सभी प्रार्थनाएँ उत्तरित हों.”

                सीख :

हमारे आशीष केवल हमारी प्रार्थनाओं का फल नहीं है बल्कि दूसरों की हमारे लिए की गईं प्रार्थनाओं का भी फल है. अपने दोस्तों का मान करो, अपने प्रियजनों को पीछे मत छोड़ों.

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अनुवादक- अर्चना

सांसारिक संपत्ति के बदले अपने जीवन में लोगों का अधिक मान करें

         आदर्श : उचित आचरण

    उप आदर्श : क्षमाशील, कृतज्ञता

एक कहानी के अनुसार दो मित्र रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. यात्रा के दौरान दोनों में बहस हो गईfriends और एक दोस्त ने दूसरे को उसके चेहरे पर थप्पड़ मारा.

जिसे थप्पड़ पड़ा था उसे ठेस पहुँची पर बिना कुछ बोले उसने रेत पर लिखा, “आज मुझे मेरे सबसे अच्छे मित्र ने थप्पड़ मारा.”friends2
बे दोनों चलते-चलते एक मरूद्या पर पहुँचे. उन्होंने उसमें स्नान करने का फैसला किया. जिस दोस्त को थप्पड़ पड़ा था वह दलदल में फ़स गया और उसमें धसने लगा.friends1 परन्तु उसके दोस्त ने उसे बचा लिया. इस घटना से संभलने के बाद उसने एक पत्थर पर लिखा, ” आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचाई.”friends4

जिस दोस्त ने थप्पड़ मारा था और अपने सबसे अच्छे दोस्त की जान बचाई थी, उसने दूसरे दोस्त से पूछा, “मेरे ठेस पहुँचाने पर तुमने रेत पर लिखा और अब तुमने पत्थर पर लिखा, क्यों?” दूसरे दोस्त ने उत्तर दिया, “जब कोई हमें चोट पहुँचाता है तो हमें रेट पर लिखना चाहिए जहाँ क्षमा की हवा उसे मिटा सकती है. पर जब कोई हमारे लिए कुछ अच्छा करता है तो हमें पत्थर पर खोदना चाहिए जहाँ कोई हवा का झोंका उसे मिटा नहीं सकता.”

               सीख :

अपने जीवन में सांसारिक चीज़ों को महत्त्व न दें. परन्तु जो आपकी ज़िन्दगी में हैं उन्हें महत्व दें.

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अनुवादक- अर्चना