Archive | January 2018

एक चोर का बदलाव

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आदर्श: सच्चाई, उचित आचरण
उप आदर्श: ईमानदारी

एक चोर चोरी की तलाश में था पर उसके हाथ कुछ विशेष व ठोस नहीं लग रहा था. मायूस होकर वह एक मंदिर पहुँचा जहाँ पुजारी एकत्रित लोगों को सच्चाई के विषय में भाषण दे रहा था. कुछ देर भाषण सुनने के बाद चोर को भाषण अच्छा लगने लगा और वह सच्चाई के सिद्धांत को पूरे ध्यान से एकाग्रचित होकर सुनने लगा. कार्यक्रम समाप्त होने पर सभी घर चले गए लेकिन चोर वहीँ बैठा रहा.

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स्वयं को वहाँ अकेले पाकर चोर को मन ही मन चिंता होने लगी कि पुजारी कहीं यह न समझे कि वह मंदिर में कुछ गलत करने आया है. उसने पुजारी से कहा, “वैसे तो यहाँ मेरा कोई काम नहीं है पर मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सच्चाई की महत्ता पर आपने बहुत ही गूढ़ भाषण दिया. मुझे आपका भाषण बहुत अच्छा लगा.” सत्यता के प्रभाव को लेकर चोर के मन में काफ़ी विवाद व प्रश्न थे. अतः उसने पुजारी से पूछा कि वह अपनी झूठ बोलने की आदत पर कैसे काबू पा सकता है. पुजारी ने उसे समझाया वह चाहे कहीं भी हो और उसने चाहे कैसी भी चोरी की हो पर सच्चाई के बल पर वह सदा सुरक्षित और निर्भय रहेगा. पुजारी ने चोर को विश्वास दिलाया कि चोरी करते हुए भी वह कामयाब हो सकता है. पुजारी की बातों से प्रोत्साहित होकर चोर ने संकल्प किया कि अपनी व्यवहारिक ज़िन्दगी में वह पुजारी द्वारा दी हिदायत का सदा पालन करेगा. चोर ने स्वयं से वादा किया कि उस दिन से वह हर परिस्थिति में सच्चाई व ईमानदारी के पथ पर चलेगा. उसने उसी क्षण से हमेशा सच बोलने और असलियत का साथ देने का फैसला किया.

सदा सच बोलने का संकल्प लेकर जैसे ही चोर मंदिर से बाहर निकला तभी उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई. यह व्यक्ति वास्तव में राजा था जो एक साधारण नागरिक के भेष में अपने राज्य का मुआयना करने निकला था.thief2 चोर से मिलने पर उस व्यक्ति ने चोर से पूछा कि वह कौन है. यद्यपि अपनी असलियत बताने में चोर को हिचकिचाहट हो रही थी पर फिर सदा सत्य बोलने की अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करके चोर ने बताया कि वह एक चोर है. वह व्यक्ति बेहद खुश हुआ और उसने कहा कि वह भी एक चोर ही है. दोनों व्यक्ति आपस में गले मिले और एक दूसरे से हाथ मिलाकर जल्द ही दोस्त बन गए. नए चोर ने कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ चुराने का सुझाव दिया और कहा कि उसे ठीक मालूम है कि ऐसे अनमोल रत्न कहाँ मिलेंगें. वह उसे एक गुप्त रास्ते से ले गया और दोनों एक शानदार राजभवन के सामने पहुँच गए. वहाँ से वह नया चोर उसे राजवंशी राजकोष ले गया और उससे तिजोरी तोड़ने को कहा. तिजोरी तोड़ने पर उन्हें उसमें पाँच बेशकीमती हीरे मिले. thief4नए चोर ने सलाह दी कि वह दोनों चार हीरे ही चुरायें ताकि दोनों बराबर का हिस्सा कर पाए. पाँचवे हीरे को आधा करने से वह हीरा मूल्यहीन हो जाएगा. दोनों ने सहमत होकर तिजोरी में से चार हीरे निकाले और एक हीरा राजकोष में ही छोड़ दिया. लूट का माल आपस में बाँट कर दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए.

अगले दिन जब राजमहल का कार्यालय खुला तो अधिकारियों ने राजवंशी तिजोरी खुली पाई. जांच करने पर शाही कोषाध्यक्ष ने पाया कि तिजोरी में से चार हीरे ग़ायब थे. thief5उपयुक्त व सटीक अवसर देखकर उसने बचा हुआ हीरा अपनी जेब में डाल लिया और राजा को बतलाया कि राजकोष के पाँचों हीरे चोरी हो गए हैं. राजा ने चौकीदारों को आज्ञा दी कि चोर को पकड़कर राजभवन लेकर आएँ. सिपाहियों ने चोर को ढूँढ़कर महाराज के सामने प्रस्तुत किया. राजा ने चोर को ग़ौर से देखा और बोला, “तो तुम ही वह चोर हो? तुमने क्या चुराया है.”

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चोर ने उत्तर दिया, “मैं झूठ नहीं बोल सकता इसलिए आपको बतला रहा हूँ कि मैंने ही अपने एक दोस्त के साथ मिलकर आपके राजकोष से हीरे चुराए हैं.”
राजा ने पूछा, “तुम दोनों ने कितने हीरे चुराए थे?”
“हमने चार हीरे चुराए थे. दो-दो दोनों के लिए. चूँकि हम पाँचवे हीरे को तोड़ नहीं सकते थे इसलिए हमने उसे तिजोरी में ही छोड़ दिया था.”
राजा ने फिर कोषाध्यक्ष से पूछा, “कितने हीरे ग़ायब हैं? ”
“सभी पाँच, जनाहपनाह.”

राजा तुरंत सारी कहानी समझ गया और उसने कोषाध्यक्ष को नौकरी से निकालकर चोर को उसकी सत्यवादी के लिए राजमहल का नया कोषाध्यक्ष नियुक्त कर लिया.

सदा सच बोलने की आदत विकसित करने पर उचित रूप से पुरस्कृत होने से प्रोत्साहित होने पर चोर ने शीघ्र ही अन्य सभी बुरी आदतों का भी त्याग कर दिया. दृढ़ता और पूर्ण विश्वास के साथ व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने से हम अपनी बुरी आदतों का त्यागकर स्वयं में सुधार ला सकते हैं.

सीख:
हमें दूसरों द्वारा किए गलत व स्वयं द्वारा की गई अच्छाई को भुला देना चाहिए. अच्छा कार्य करने से नकारात्मक भाव में कमी आती है. अच्छी आदतें बुराई को निकाल बाहर करती हैं.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

सेवानिवृत्त समुद्री कप्तान

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: विश्वास, कर्तव्य भाव, विचारों में स्पष्टता

यह कहानी एक समुद्री कप्तान की है जो कार्य से निवृत्त हो चुका था. अब वह एक दिवसीय यात्रा करने वाले पर्यटकों को नाव में शैट्लैंड द्वीप पर ले जाया करता था.

ऐसी एक यात्रा के दौरान उसकी नाव युवकों से भरी हुई थी. यात्रा शुरू होने से पहले वृद्ध कप्तान को प्रार्थना करते देख सभी यात्री उस पर हँसने लगे क्योंकि उस समय समुद्र शांत था एवं आसमान साफ़ और स्पष्ट था.

मगर यात्रा शुरू होने के कुछ समय बाद ही अचानक घने बादल छा गए. शीघ्र ही काले व घने बादलों ने भयंकर तूफ़ान का रूप ले लिया और नाव हिंसात्मक रूप से डगमगाने लगी. भयभीत यात्री कप्तान के पास आए और उनके साथ प्रार्थना में शामिल होने के लिए उससे आग्रह करने लगे.

कप्तान ने उत्तर दिया, ” मैं निश्चलता व स्थिरता में प्रार्थना करता हूँ. कठिनाई व मुसीबत के समय मैं अपनी नाव पर ध्यान देता हूँ.”

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सीख:

अपने जीवन के शांत व स्थिर समय में यदि हम भगवान् को नहीं पा सकते तो प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने पर ईश्वर को पाना असंभव है. संभवतः ऐसे में हम घबराये हुए होंगें. लेकिन निश्चल लम्हों में यदि हम प्रभु की तलाश और उन पर विश्वास करना सीख लेंगें तो कठिनाई का सामना करने पर हम निस्संदेह ही उन्हें ढूँढ़ लेंगें.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना