Archive | December 2016

आलू उपजाना

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: जीवन में अंतर लाना, भलाई का एक कार्य भी मूल्यवान होता है.

जब मैं छोटा सा लड़का था तब हमारे पुराने घर के आस-पास अनेकों खेत थे. उनमें से सबसे बड़े खेत का प्रयोग केवल आलू उगाने के लिए ही होता था. मुझे अपने वह आलू उगाने के दिन अभी भी याद हैं. हमारा सारा परिवार इस प्रक्रिया में सहायता करता था.

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मेरी माँ, मेरे भाइयों और मेरा काम पिताजी के खेत जोतने के बाद शुरू होता था. मैं आलू के नन्हें बीज कतारों में गिराता था और मेरी माँ मुट्ठीभर खाद बीज के समीप डालती थी. फिर मेरे भाई हाल ही में जोति मिट्टी से बीजों को ढक देते थे. उसके बाद काफी महीनों तक बाहर खेलते समय खेत की ओर देखकर मैं अक्सर अचंभित होता था कि ज़मीन के नीचे क्या हो रहा होगा. फ़सल काटने के समय जब मेरे पिताजी ज़मीन से विशाल आलू निकालते थे तब मैं दंग रह जाता था.aloo3

 

 

वह नन्हें बीज हज़ारों की संख्या में अंकुरित होकर अब हमारे भोजन के लिए उपलब्ध थे. इन आलूओं से हम विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाते थे- बेक किए हुए आलू, मसले हुए आलू, तले हुए आलू और मेरा पसंदीदा व्यंजन- स्पैगेटी की चटनी में धीमी आंच पर पकाए हुए आलू.

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इन आलूओं से हमारा समस्त परिवार सारा साल परिपुष्ट रहता था. यह सारी प्रक्रिया अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं थी.

सीख:
उन विशिष्ट यादों के बारे में सोचकर मुझे अक्सर आश्चर्य होता है कि ऐसे कितने ही बीज मैंने दूसरों के मन व हृदय में रोपे होंगें जो यद्यपि अप्रत्यक्ष हैं पर किसी न किसी रूप में अवश्य विकसित हुए हैं. कितनी ही बार मेरे द्वारा कहे कुछ शब्द या किए कार्य, प्रभु की कृपा से खूबसूरती से अंकुरित हुए हैं. कितनी ही बार परमात्मा ने इन नन्हें पौधों के माध्यम से किसी और आत्मा को जीविका प्रदान की हैं. प्रतिदिन हम इस संसार के खेत में निकलते हैं और ऐसे बीज रोपते हैं जो किसी अद्भुत पौधे के रूप में पनपते हैं. हमारे द्वारा कहे मधुर शब्द या किए स्नेहमय कार्य से उपार्जित विकास को हम स्वयं नहीं देख सकते हैं पर ईश्वर देख सकते हैं. इस कारण हमें अपने आसपास के खेत की सावधानी से देखभाल करनी चाहिए और हर एक के जीवन में अच्छाई, शान्ति व अनुकंपा ही उपजानी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

रस्सी

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आदर्श: विश्वास
उप आदर्श: पकड़ ढीली करना

एक पर्वतारोही की कहानी बताई जाती है जिसे अपने आनंद तथा दोस्तों को प्रभावित करने के लिए ऊँचे पहाड़ों की चढ़ाई करना अच्छा लगता था. सालों के प्रशिक्षण तथा तैयारी के बाद उसे यकीन था कि चढ़ाई कितनी भी कठिन क्यों न हो, वह संसार के किसी भी पर्वत का आरोहण कर सकता है.

यह घटना उस समय की है जब वह अपने ५ दोस्तों के साथ एक आरोहण यात्रा पर था. उसने निश्चय किया कि रात में दोस्तों के सो जाने पर वह अकेले ही शिखर की चढ़ाई पूरी करेगा और सबसे पहले शिखर पर पहुँचकर अपनी जीत का दावा करेगा.mt2 उस रात सभी के सो जाने पर उसने अपने आरोहण के कपड़े पहने और शिखर की ओर निकल पड़ा. संयोग से वह पूर्णिमा की रात थी और वह खुश था की चाँद की रोशनी से उसे मार्गदर्शन में सहायता मिलेगी.

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यद्यपि वह पूर्णतया सतर्क था और अपने सहारे व संतुलन के लिए रस्सी का इस्तेमाल कर रहा था पर फिर भी रात के समय अकेले चढ़ाई करना मूर्खता थी. आरम्भ में पूर्णिमा के चाँद का लाभ उठाकर उसने बहुत ही तीव्रता से प्रगति की. जैसे-जैसे वह शिखर के करीब पहुँच रहा था वह अत्यंत खुश था और उसका आत्मविश्वास तेज़ी से बढ़ रहा था. पर दुर्भाग्यवश अचानक पहाड़ के चारों ओर घने बादल बनने लगे और शीतकालीन तूफ़ान आने के कारण दृश्यता तेज़ी से कम होने लगी. तुरंत ही कुछ भी देख पाना असंभव हो गया और उसके आसपास घनिष्ट बादल फैल गए व गहरा कोहरा छा गया. इतनी दूर पहुँचकर उसके लिए वापस जाना नामुमकिन था अतः उसने चढ़ाई ज़ारी रखी – इस उम्मीद में कि शायद तूफ़ान जल्द ही टल जाएगा.

चूँकि हर तरफ गहरा अँधेरा था और पर्वतारोही संकरे पथ पर तिरछा आरोहण कर रहा था, अचानक से उसका संतुलन बिगड़ा और पहाड़ी के किनारे से वह फिसल गया. संयोगवश गिरने के बावजूद भी वह जीवित था हालांकि रस्सी के सहारे से वह हवा में झूल रहा था. घोर अंधकार होने के कारण उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. पहाड़ पर चढ़ाई करते समय उसने अपनी भारी वाली जैकेट अपनी पीठ पर लटकाए थैले पर हलके से बाँधी थी पर दुर्भाग्यवश गिरने के दौरान उसकी जैकेट खुलकर गिर गयी थी. धीरे-धीरे ठंडी तूफ़ानी हवा उसे अपने अंदर तक महसूस होने लगी. कठिन संघर्ष के बाद उसने स्वयं को गोले के आकार में समेटा पर मजबूत सहारे के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था. मायूस व निराश होकर वह चिल्लाया, “प्रिय प्रभु, कृपया मेरी मदद कीजिए.”

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अचानक पर्वतारोही को एक गंभीर आकाशवाणी सुनाई दी, “रस्सी को काट दो! ”
“क्या! ” पर्वतारोही ने तूफ़ानी हवा के शोर में ठीक से सुनने की कोशिश की.
एक बार पुनः उसे वही गंभीर आकाशवाणी सुनाई दी, “रस्सी को काट दो!”

इसके बाद केवल तेज़ तूफ़ानी हवा की ज़ोरदार आवाज़ ही सुनाई दे रही थी. आकाशवाणी सुनने के बाद भी वह रस्सी पकड़कर टंगा रहा और उम्मीद करता रहा कि शायद वह कुछ बंदोबस्त करके स्वयं को बचा पाएगा. चारों ओर घनघोर अँधेरा होने के कारण उसे अपनी वास्तविक परिस्थिति का बिल्कुल भी अनुमान नहीं था. इस कारण उसने निश्चय किया कि वह रस्सी से लटक कर ही सुबह होने का इंतज़ार करेगा.

अगले दिन उसके गुट के लोगों ने जब उसकी खोज की तो उसे मरा हुआ पाया. कठोर सर्दी के कारण उसका शरीर जम गया था. उसका मृत शरीर रस्सी से लटका हुआ था हालांकि वह एक विशाल चट्टान से मात्र ८ फ़ीट ही ऊपर था. अगर उसने रस्सी काट दी होती तो शायद किसी सुरक्षित स्थान पर गिरकर, आसपास की झाड़ियों से आग जलाकर स्वयं को रात की सर्दी से बचा पाता.

सीख:

इस दुखद और शायद कल्पित कहानी से हमें भगवान् में विश्वास रखने की सीख मिलती है. क्या हम भी किसी ‘रस्सी’ में अपनी सुरक्षा ढूँढ़ते हैं? या फिर अपने ज्ञान व नियंत्रण के बाहर हो रही जीवन की घटनाओं के आधार पर हम भगवान् पर विश्वास करने के लिए तैयार हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

घर का निर्माण

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     आदर्श : उचित आचरण
 उप आदर्श: सही प्रवृत्ति

एक वयोवृद्ध बढ़ई सेवामुक्त होने की तैयारी में था.house2 उसने अपने मालिक- ठेकेदार को अपनी योजना के बारे में बताया. उसने मालिक से कहा कि घर-बनाने का कारोबार छोड़कर वह अपनी पत्नी के साथ इत्मीनान से रहना चाहता है और अपने विस्तृत परिवार का आनंद उठाना चाहता है. यद्यपि उसे हर हफ्ते अपनी तनख्वाह के पैसों की कमी महसूस होगी पर फिर भी वह सेवामुक्त होना चाहता था.

ठेकेदार को दुख था कि उसका एक बेहतरीन कर्मचारी काम छोड़कर चला जाएगा. मालिक ने बढ़ई से पूछा यदि जाने से पहले, एक व्यक्तिगत उपकार के रूप में, वह एक आखिरी घर का निर्माण कर सकता था. बढ़ई सहमत हो गया और उसने घर बनाने का काम शुरू कर दिया.house4 बढ़ई ने काम तो शुरू कर दिया पर उसके व्यवहार से यह स्पष्ट था कि उसका काम करने का बिलकुल मन नहीं था. उसने घटिया कारीगरी का सहारा लेकर तुच्छ पदार्थों का प्रयोग किया. एक निष्ठावान कार्यकाल का इस प्रकार से अंत होना बेहद खेदजनक था.

जब बढ़ई ने अपना काम ख़त्म कर लिया तब उसका मालिक घर का निरीक्षण करने आया. और फिर बढ़ई को सामने वाले दरवाज़े की चाबी देते हुए बोला, “यह घर तुम्हारा है…..तुम्हारे लिए मेरा उपहार.”

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बढ़ई स्तंभित था.

कितनी शर्मनाक बात थी. यदि बढ़ई को पता होता कि वह अपने लिए घर बना रहा है तो वह उसे अलग ही ढ़ंग से बनाता.

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सीख :
हम हर रोज़ अपनी ज़िन्दगी का निर्माण करते हैं परंतु अक्सर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास नहीं करते हैं. हमें सदमा तब पहुँचता है जब हमें यह मालूम चलता है कि हमें अपने बनाए घर में ही रहना है. हम सोचते हैं कि ज़िन्दगी में दूसरा अवसर मिलने पर हम इसे अलग ढ़ंग से करेंगें पर दुर्भाग्यवश ऐसा होता नहीं है.

हमें जीवन एक बार मिलता है. हम अपने बढ़ई स्वयं हैं. हम प्रतिदिन कील ठोकते हैं, तख़्त लगाते हैं और दीवार का निर्माण करते हैं. हमारी प्रवृत्ति और वर्त्तमान में किए गए विकल्पों का चयन, हमारे भविष्यत ‘घर’ का निर्माण करते हैं. आगामी समय में हमें इसी ‘घर’ में रहना पड़ता है.

इस कारण हमें समझदारी से ‘घर’ का निर्माण करना चाहिए. हमें हर पल प्रत्येक कार्य में अपनी सर्वश्रेष्ठ चेष्ठा करनी चाहिए.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना