कांटेदार जंगली चूहे

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आदर्श: शान्ति
उप आदर्श: एकता, धैर्य

उस साल शीतऋतु का प्रकोप कुछ ज़्यादा ही था और अत्यधिक जाड़े के कारण बहुत सारे पशुओं की मृत्यु हो गई थी.

परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वयं को गरम रखने के लिए सभी चूहों ने एक साथ समूह बनाकर रहने का निश्चय किया. एक जुट होकर रहने से उन्होंने स्वयं को संरक्षित तो कर लिया परन्तु उनके शरीर के कांटों से उनके करीबी साथी घायल होने लगे.

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कुछ समय बाद चूहों ने स्वयं को एक दूसरे से दूर करने का फैसला किया. ऐसा करने से प्रचंड सर्दी का उन्हें अकेले ही सामना पड़ा. उनका शरीर अकड़ने लगा और धीरे-धीरे चूहे मरने लगे. अब उन्हें बहुत ही सावधानी से फैसला लेना था: या तो वह अपने मित्रों के कांटों को स्वीकार करते या फिर धरती से ओझल होते.

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सभी चूहों ने आपस में विचार-विमर्श किया और एक बार पुनः एक जुट होकर रहने का फैसला किया. दूसरों से गर्माहट ग्रहण करने के लिए उन्होंने अपने साथियों से करीबी सम्बन्ध के कारण होने वाले घावों के साथ जीना सीख लिया. इस प्रकार वह जीवित रह पाए.

सीख:

सर्वश्रेष्ठ सम्बन्ध वह नहीं है जो परिपूर्ण व्यक्तियों को साथ लेकर आता है. एक सामंजस्यपूर्ण रिश्ते में प्रत्येक व्यक्ति दूसरों की त्रुटियों के साथ जीना सीखता है और दूसरों के विशिष्ट गुणों की सराहना करता है. सहनशीलता और एक दूसरे के स्वीकरण से हम किसी भी रिश्ते में सामंजस्य ला सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

गरीब व्यक्ति की संपत्ति

 

आदर्श: शांति
उप आदर्श: संतोष

रामचंद और प्रेमचंद पड़ोसी थे. रामचंद एक गरीब किसान था और प्रेमचंद ज़मींदार था.

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रामचंद अपने जीवन से खुश था और हमेशा निश्चिन्त रहता था. रात में वह अपने घर की खिड़कियाँ व दरवाज़े खुले रखता था और गहरी नींद सोता था. यद्यपि वह गरीब था पर फिर भी वह शांत और खुश था.

प्रेमचंद सदैव बेचैन रहता था. हर रात वह अपने घर की खिड़कियाँ व दरवाज़े अवश्य बंद करता था. पर फिर भी उसे ठीक से नींद नहीं आती थी. उसे सदा यह चिंता रहती थी कि कोई उसकी तिजोरी तोड़कर सारे पैसे चोरी कर लेगा. अपने पड़ोसी रामचंद की खुशहाल व निश्चिन्त ज़िन्दगी देखकर उसे ईर्ष्या होती थी.

एक दिन प्रेमचंद ने रामचंद को बुलाया और नकद धन से भरा एक बक्सा देते हुए बोला, “मेरे प्रिय मित्र, भगवान् की कृपा से मेरे पास प्रचुर धन-दौलत है. तुम्हें अभाव में देखकर मुझे दुःख होता है. इसलिए यह धन रखो और खुशहाली का जीवन व्यतीत करो.”

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रामचंद अत्यंत खुश हुआ. सारा दिन वह परम आनंद में था और इस कारण उसके चहरे पर मुस्कराहट थी. रात होने पर हमेशा की तरह वह सोने गया परन्तु किसी कारणवश वह सो ही नहीं पाया. उसने घर के सारे दरवाज़े व खिड़कियाँ बंद कर दीं पर फिर भी वह सो नहीं पाया. उसकी नज़र बार-बार धन से भरे बक्से पर टिकी हुई थी. रात भर वह अशांत और व्याकुल रहा.

सुबह होते ही वह धन से भरा बक्सा लेकर प्रेमचंद के पास गया और उससे बोला, “मेरे दोस्त, मैं गरीब ज़रूर हूँ पर तुम्हारे पैसों ने मुझसे मेरी शान्ति छीन ली है. मुझे गलत मत समझना पर कृपया अपने पैसे वापस ले लो.”

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सीख:

धन-दौलत से हम सब कुछ हासिल नहीं कर सकते हैं. हमारे पास जो भी है यदि हम उसमें संतुष्ट होना सीख लें तो हम सदैव खुश रहेंगें.

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अनुवादक- अर्चना

जीवन के संघर्ष

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      आदर्श: आशावाद
 उप आदर्श: रवैया

एक दिन एक बेटी ने अपने पिता से शिकायत करते हुए कहा कि उसकी ज़िन्दगी बहुत तकलीफ़देह थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस प्रकार सफल हो पाएगी. हर पल जूझते और संघर्ष करते-करते वह पूरी तरह से थक चुकी थी. जैसे ही एक परेशानी का समाधान निकलता था तभी दूसरी परेशानी सामने आ खड़ी होती थी. उसके पिता जो व्यवसाय से एक रसोइया थे, उसे रसोई में ले गए. उन्होंने ३ बर्तनों में पानी भरा और उन्हें तेज आँच पर रख दिया.

जब तीनों बर्तनों में पानी उबलने लगा तब उन्होंने एक में आलू डाले, दूसरे में अंडे और तीसरे में कॉफ़ी के बीज डाल दिए. अपनी बेटी से बिना कुछ बोले एक बार पुनः वह तीनों बर्तनो में उबाल आने का इंतज़ार करने लगे.

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बेटी हैरान थी कि उसके पिता क्या कर रहे थे परन्तु नाखुश होने के बावजूद वह बेताबी से इंतज़ार करने लगी. २० मिनट के बाद पिता ने तीनों चूल्हे बंद कर दिए. फिर उन्होंने पहले बर्तन में से आलू निकालकर एक कटोरे में रख दिए. इसी प्रकार दूसरे बर्तन में से अंडे निकालकर एक अन्य कटोरे में रख दिए और फिर एक कड़छी से कॉफ़ी निकालकर एक कप में डाल दी.

इस के बाद अपनी बेटी को देखकर उन्होंने पूछा, ” तुम्हें क्या दिख रहा है?”
उसने फौरन जवाब दिया, ” आलू, अंडे और कॉफ़ी.”

पिता बोले, ध्यान से देखो और आलूओं को छूकर महसूस करो. आलूओं को छूने पर उसने पाया कि आलू नरम थे.

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फिर उन्होंने एक अंडे को लेकर उसे फोड़ने को कहा. अंडे का छिलका छिलने पर बेटी ने पाया कि अंडा पूर्णतया उबलकर अब कठोर था.

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अंत में उन्होंने उसे कॉफ़ी का एक घूँट लेने को कहा. कॉफ़ी की लुभावनी महक सूँघते ही उसका चेहरा खिल उठा.

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उसने अपने पिता से पूछा, “इसका क्या मतलब है?”

तब पिता ने समझाया कि सभी- आलू, अंडे व कॉफ़ी के बीज- ने ही उबलते हुए पानी नामक कठिनाई का सामना किया था. परन्तु फिर भी सभी की प्रतिक्रिया भिन्न थी. उबलते पानी में जाने से पहले आलू सशक्त, सख्त व कठोर था पर उबलते पानी में कुछ देर रहने के बाद वह नरम व कमजोर हो गया. इसी प्रकार उबलते पानी में जाने से पहले अंडे नाज़ुक थे और उनके अंदर के द्रव्य की रक्षा उनका ठोस बाहरी छिलका कर रहा था. परन्तु उबलते पानी में रहने के बाद अंडे भीतर से सख्त हो गए. इन दोनों की अपेक्षा कॉफ़ी के पिसे हुए बीज बिलकुल अनोखे थे. उन्हें उबलते पानी में डालने से पानी ही बदल गया और सबका पसंदीदा एक नया पेय बनकर तैयार हो गया.

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फिर उन्होंने अपनी बेटी से पूछा, “तुम इन सब में से कौन सी हो?” “विपत्ति का सामना करने पर तुम्हारी अनुक्रिया क्या होती है? क्या तुम आलू हो, अंडा हो या फिर कॉफ़ी का बीज हो?”

सीख:
जीवन में हमारे आस-पास और हमारे साथ बहुत सी घटनाएँ होतीं हैं. परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि हम किस भाव से उनका सामना करते हैं और उससे क्या सबक सीखते हैं. जीवन निरंतर सीखने व परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को अपनाने के साथ-साथ प्रत्येक कठिनाई को सकारात्मकता में परिवर्तित करने का नाम है.

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अनुवादक- अर्चना

नामस्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, प्रार्थना की शक्ति

एक बार नारद मुनि भगवान् नारायण से मिलने गए.
भगवान ने नारद से पूछा …..nm1

नारायण: नारद, कैसे हो?
नारद : मैं ठीक हूँ, भगवन और हमेशा की तरह तीनो लोकों का भ्रमण कर रहा हूँ.
नारायण: तो तुम किस इरादे से भ्रमण करते हो?
नारद : भगवन मैं सिर्फ आपका ही ध्यान करता हूँ. मैं सतत नारायण, नारायण का गुणगान करता रहता हूँ. पर भगवन मुझे समझ में नहीं आता कि आपके नाम का भजन करने का क्या इनाम है.nm2
नारायण: नारद! तुम लगातार नामस्मरण करते हो पर फिर भी तुम्हें उसकी शक्ति की समझ नहीं है. जाओ और उस पेड़ पर बैठे कौए से पूछो.

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नारद उस कौए के पास गए और बोले, “नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
यह सुनते ही कौआ पेड़ से गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई. नारद भगवान् नारायण के पास गए और बोले,

नारद: भगवन, मैंने कौए से पूछा पर वह तो मुझे सुनते ही पेड़ से गिरकर मर गया. क्या नामस्मरण का यही इनाम है? नारायण: सत्य तक पहुँचने के लिए समय का सदुपयोग बहुत आवश्यक है. नारद, तुम उस गरीब ब्राह्मण के घर जाओ. वहाँ पिंजरे में एक ख़ूबसूरत तोता है. उसका शरीर हरे रंग का है और चोंच लाल रंग की है. तुम जाकर उससे पूछो.”

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नारद ने तोते के पास जाकर उससे पूछा, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
यह सुनते ही तोता तुरंत गिरकर मर गया.
नारद एक बार फिर भगवान् नारायण के पास गए.

नारद : मैंने तोते से पूछा. पर वह तुरंत गिरकर मर गया. क्या यही इनाम है?
नारायण : नारद, सत्य जानने के लिए सदा दृढ़ रहना चाहिए. तुम ब्राह्मण के घर जाओ. वहाँ कल ही एक बछड़े का जन्म हुआ है. जाकर उससे पूछो.

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नारद बछड़े के पास गए और बोले, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
बछड़े ने सिर उठाया, नारद को देखा और गिरकर मर गया.
नारद पुनः नारायण के पास गए.

नारद: मैं सत्य जाने बिना अब यहाँ से नहीं जाऊँगा. हे भगवन! क्या यही इनाम है?
नारायण : नारद, तुम जल्दबाज़ी मत करो. जल्दबाज़ी से काम खराब हो जाता है. हानि दुःख का कारण होती है. इस कारण तुम हड़बड़ी मत करो और धैर्य रखो. पृथवी पर राजा के घर कल ही एक पुत्र का जन्म हुआ है. राजा बहुत ही प्रसन्न है. जाकर उस नवजात से पूछो.
नारद भयभीत थे. उन्होंने सोचा, “यदि वह नवजात भी मर गया तो सिपाही मुझे गिरफ्तार कर लेंगें. मेरी भी मृत्यु हो जाएगी. क्या यही इनाम है?”

नारायण: नारद, उतावले मत हो. जाकर बच्चे से पूछो.

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नारद राजा के पास गए. जब नारद ने बच्चे को देखने की इच्छा प्रकट की तब बच्चे को सोने की थाल में लाया गया.
नारद ने राजा से पूछा,”महाराज! क्या मैं इस बच्चे से एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?”
राजा की सहमत मिलने पर नारद ने बच्चे से पूछा, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
नारद का प्रश्न सुनकर नन्हा राजकुमार बोला:

“नारद, क्या आपने अब तक यही सीखा है? यद्यपि आप रात-दिन प्रभु के नाम का गुणगान करते रहते हैं फिर भी आपको समझ नहीं है. सबसे पहले मैं एक कौआ था. आप आए और मुझसे नामस्मरण के इनाम के बारे में पूछा. नारायण का नाम सुनते ही मेरा जीवन परिपूर्ण हो गया और मैंने जीवन त्याग दिया. फिर मेरा जन्म एक तोते के रूप में हुआ. कहाँ एक कौआ और कहाँ एक तोता? एक तोते का पोषण पिंजरे में होता है. आपने पुनः आकर मुझसे वही सवाल एक बार फिर किया. इसके बाद मेरा जन्म एक बछड़े के रूप में हुआ. यह और भी अधिक श्रेष्ठ और बेहतर जीवन है. भारतीय गाय की पूजा करते हैं. मैंने आपके माध्यम से भगवान् का नाम सुना और मर गया. और अब मेरा जन्म एक राजकुमार के रूप में हुआ है. कहाँ एक कौआ, तोता, बछड़ा और कहाँ एक राजकुमार? नामस्मरण से हमारी जागृति व सुगति होती है और इस कारण इस जन्म में मैं एक राजकुमार हूँ. नारायण के नाम का भजन करने का यही इनाम है.”
सीख:
जब हममें प्रेम, विश्वास व श्रद्धा होती है तब हमारी चेतना का विकास अवश्य होता है. भगवान् का नाम सुनने मात्र से एक कौआ तोता बना और फिर बछड़ा और अंततः राजकुमार. नारायण के नाम के श्रवण से ही उसे मनुष्य जीवन मिला जो सबसे अधिक दुर्लभ है. यदि भगवान् का नाम सुनना इतना चमत्कारिक है तो भगवान् के नाम का उच्चारण कितना शक्तिशाली होगा? इसलिए हमें अपने पूरे होशो-हवास में भरपूर श्रद्धा से नामस्मरण करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

अपने मालिक के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श : श्रद्धा, सम्मान

हज़रत अमीर खुसरो के बारे में एक अनोखी कहानी विख्यात है जो अपने पीर के प्रति उनकी असीम श्रद्धा व प्रेम को स्पष्ट करती है.

हज़रत निज़ामुद्दीन की उदारता के बारे में सुनकर एक बार भारत के दूर-दराज़ इलाके से एक गरीब व्यक्ति उनसे मिलने दिल्ली आया. वह व्यक्ति अपनी आर्थिक समस्याओं के समाधान में उनकी सहायता चाहता था. संयोग से उस दिन उनके पास देने के लिए उनके पुराने जूतों के सिवाय और कुछ नहीं था. यद्यपि गरीब व्यक्ति बहुत निराश हुआ पर फिर भी पीर का शुक्रिया अदा कर के वह वहाँ से चला गया.

वापस लौटते समय रात बिताने के लिए उसने एक सराय में आश्रय लिया. संयोगवश उसी रात हज़रत अमीर खुसरो, जो बंगाल से व्यापारिक यात्रा से लौट रहा था, भी उसी सराय में ठहरा. हज़रत अमीर खुसरो उस समय हीरे-जवाहरात में व्यापार करता था और दिल्ली का सबसे अधिक अमीर नागरिक माना जाता था. अगली सुबह जब हज़रत अमीर खुसरो उठा तब उसने . टिप्पणी की: यहाँ मुझे अपने पीर की खुशबू आ रही है.”

खुशबू का स्त्रोत ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह उस व्यक्ति तक पहुँचा और उससे पूछा यदि वह दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से मिला था. उसने हाँ में जवाब देते हुए हज़रत अमीर खुसरो को हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से अपनी मुलाक़ात की सारी कहानी सुनाई. फिर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया द्वारा दिए जूतों को दिखाकर उसने शोक प्रकट किया कि वह कितने पुराने और मूल्यहीन थे.

हज़रत अमीर खुसरो ने तुरंत अपनी सारी दौलत के बदले में उस व्यक्ति से अपने पीर के जूते माँगे. अपनी इस आकस्मिक खुशकिस्मती पर वह व्यक्ति अत्यधिक खुश हुआ. उसने हज़रत अमीर खुसरो को जूते दिए, उसका बार-बार शुक्रिया अदा किया और आनंदित होकर घर लौट गया. अमीर खुसरो आखिरकार अपने गुरु के पास पहुँचा और जूते उनके चरणों में रख दिए. जब उसने पीर को बताया कि उन जूतों के बदले में उसने अपनी समस्त दौलत प्रतिदान की है तब हज़रत निज़ामुद्दीन बोले, “खुसरो, तुम तो इन्हें बहुत सस्ते में ले आए.”

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सीख:
एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति प्रेम का यह एक अति उत्तम उदाहरण है. शिष्य के लिए उसके गुरु की पादुका सबसे अधिक पूजनीय होती है. यह हमें अपने अहम् पर पकड़ ढीली कर के आत्मसमर्पण करना सिखाती हैं.

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प्रेम क्या होता है

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     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा/ प्रतिबद्धता

सुबह के ८:३० बजे थे और हर तरफ चहल-पहल थी. सभी कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे. एक वयोवृद्ध सज्जन, जिनकी उम्र ८० साल के लगभग थी, अपने अंगूठे के टांके कटवाने आए. उन्होंने निवेदन किया कि वह जल्दी में थे क्योंकि ९ बजे उन्हें किसी से मिलने जाना था. मैंने उनके प्राणाधार आंकड़े लिए और उन्हें बैठाया क्योंकि मुझे मालूम था कि उन्हें कम से कम एक घंटा इंतज़ार करना पड़ेगा.old3 जब मैंने उन्हें अपनी घड़ी की ओर बार-बार देखते हुए देखा तो मैंने निश्चय किया कि मैं स्वयं ही उनके ज़ख़्म का निरीक्षण करूँगा. वैसे भी मैं किसी मरीज़ के साथ व्यस्त नहीं था. निरीक्षण करने पर मैंने पाया कि उनका घाव भर चुका था. मैंने एक अन्य डॉक्टर से बात की और उनके टांके खोलने के लिए आवश्यक सामान लेकर आया. टांके खोलने के बाद मैंने दुबारा से उनके घाव पर पट्टी बाँध दी. इस दौरान मैं उनसे बातचीत करने लगा. मैंने उनसे पूछा उनके इतनी जल्दबाज़ी में होने का कारण क्या एक अन्य डॉक्टर से मिलने जाना था. उन्होंने कहा नहीं- उन्हें नर्सिंग होम जाकर अपनी पत्नी के साथ सुबह का नाश्ता करना था. उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि उनकी पत्नी काफ़ी समय से नर्सिंग होम में थी और मानसिक रोग से पीड़ित थी. कुछ समय बाद जब मैंने उनकी मरहम-पट्टी पूरी तरह से कर दी तब मैंने उनसे पूछा कि क्या थोड़ी देर से पहुँचने पर उनकी पत्नी चिंतित होगी. उन्होंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया कि अब उनकी पत्नी को पता नहीं था कि वह कौन हैं. पिछले पाँच सालों से वह उन्हें पहचानती नहीं थी. मैं आश्चर्यचकित था और मैंने उनसे पूछा, “वह आपको पहचानती भी नहीं है और आप फिर भी हर सुबह उनके पास जातें हैं?” सज्जन पुरुष मुस्कुराए और मेरा हाथ को थपथपाते हुए बोले, “वह मुझे नहीं जानती है पर मुझे अभी भी पता है कि वह कौन है.”

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सीख:

सच्चा प्रेम बिना किसी अपेक्षा का होता है. ऐसे व्यक्ति केवल इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि वे प्रेम करना चाहते हैं और बदले में कोई उम्मीद नहीं रखते हैं- ना किसी सराहना की, ना आभार की और ना ही सम्मान की. धन्य हैं ऐसे लोग जो कहानी के वृद्ध पुरुष के समान प्रेम व सेवा कर सकते हैं.

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प्रतिक्रिया या अनुक्रिया

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: आत्म विश्लेषण, परिस्थिति संभालना

अचानक एक तिलचट्टा कहीं से उड़ कर आया और एक महिला पर बैठ गया. मुझे आश्चर्य हुआ यदि ऐसा तिलचट्टों की परिचर्चा के फलस्वरूप हुआ था. वह महिला भयभीत होकर चिल्लाने लगी. घबराया हुआ चेहरा और काँपती हुई आवाज़ में चिल्लाती हुई, वह कूदने लगी और अपने दोनों हाथों से तिलचट्टे को स्वयं पर से हटाने की उग्र कोशिश करने लगी.panic4 महिला की प्रतिक्रिया से उसके समूह के अन्य सभी सदस्य भी व्याकुल और विक्षुब्ध हो गए. तिलचट्टे को स्वयं पर से हटाने की लगातार कोशिश के कारण अब वह तिलचट्टा एक दूसरी महिला पर जा बैठा. तिलचट्टे को स्वयं पर बैठा पाते ही दूसरी महिला ने सारा नाटक दोहराया और समस्त समूह में कोलाहल व अस्तव्यस्थता फैल गई. महिलओं की दशा देखकर रेस्टोरेंट का बैरा झटपट उनके बचाव के लिए आगे आया. तिलचट्टे से छुटकारा पाने की हड़बड़ी में अब वह तिलचट्टा बैरे पर जा गिरा. बैरा शांतचित्त व स्थिर खड़ा रहा और अपनी कमीज पर तिलचट्टे का व्यवहार गौर से देखने लगा. आश्वस्त और निश्चित होने पर उसने तिलचट्टे को पकड़ा और बाहर फेंक दिया.

कॉफ़ी का घूंट लेते हुए और सारा तमाशा देखते हुए मैं मन ही मन सोचने लगी कि क्या महिलाओं के नाटकीय व्यवहार के लिए वह तिलचट्टा जिम्मेवार था. और यदि ऐसा था तो वह बैरा क्यों नहीं व्याकुल हुआ? उसने तो सारे बवाल को बहुत ही निपुणता से संभाला.

वास्तव में सारी खलबली का कारण तिलचट्टा था ही नहीं. महिलाओं के समूह में अशांति की वजह तिलचट्टे द्वारा उत्पन्न बवाल को संभालने की उनकी अक्षमता थी.

इस घटना से मुझे भी यह अहसास हुआ कि मेरे परेशान होने की वजह मेरे पिता या मेरे प्रबंधकर्ता द्वारा मुझ पर चिल्लाना नहीं था. वास्तव में उनके चिल्लाने से उत्पन्न अशांति को संभालने की मेरी अक्षमता मुझे उत्तेजित करती है.

वास्तव में सड़कों पर यातायात जाम मुझे परेशान नहीं करता है बल्कि यातायात जाम से उत्पन्न अशांन्ति को संभालने की मेरी अक्षमता मुझे व्याकुल करती है.

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समस्या से अधिक उसके प्रति मेरी प्रतिक्रिया मुझे कष्ट देती है.

सीख:
इस घटना से मुझे समझ में आया कि जीवन में मुझे विरूद्ध प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए. मुझे सदा अनुकूल रहना चाहिए.
महिलाओं ने प्रतिक्रिया उत्पन्न की जबकि बैरा परिस्थिति के अनुकूल रहा.
प्रतिक्रिया सदा स्वाभाविक होती है जबकि अनुक्रिया सदा बौद्धिक….

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अनुवादक- अर्चना