भगवान मेरे प्रदाता हैं 

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    एक धनवान व्यक्ति रेलगाड़ी में यात्रा कर रहा था. उसके सामने एक अनजान व्यक्ति बैठा हुआ था जो एक संत था. वह अमीर व्यक्ति संत को अत्यंत ही घृणा व नफ़रत से देख रहा था. मध्याह्न भोजन के समय उसने अपने नौकर, जो एक कोने में बैठा हुआ था, को भोजन परोसने का इशारा किया. भोजन करते समय अचानक ही वह संत को डाँटने-फटकारने लगा, “तुम कामचोर, बेकार भिखारी, आवारा और निकम्मे!! तुम केवल भगवान् का समय व्यर्थ करते हो और किसी काम के नहीं हो. क्या तुम दूसरों से यह अपेक्षा करते हो कि वह तुम्हें खाना खिलाएं और तुम्हारी सहायता करें? दूसरों का सम्मान तुम केवल काम करके और जीविकापार्जन करके ही हासिल कर सकते हो. मैंने कठिन परिश्रम करके अपना रास्ता बनाया है और अपने असामान्य प्रयासों से स्वयं को इतना अमीर व समर्थ बनाया है कि आज मैं कुछ भी खरीद सकता हूँ. देखो, मैं कितने आलीशान ढंग से खाता हूँ पर मुझे नहीं लगता कि मैं अपना खाना तुम्हारे साथ बाटूँगा- देखते हैं तुम्हें भोजन कहाँ से मिलता है.“ 

  संत ने विनम्र व स्नेहशील आवाज़ में कहा, “श्रीमान, मुझे डाँटने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि मैं आपसे कुछ नहीं माँग रहा हूँ. अगर मैंने अनजाने में आपको नाराज़ कर दिया हो तो मुझे क्षमा कर दीजिये. मेरा ऐसा इरादा नहीं था. मुझे जब और जहाँ ज़रुरत होती है, भगवान् सदैव सभी अत्यावश्यक वस्तुएँ प्रदान कर देते हैं. अतः श्रीमान, आप डरे नहीं कि मैं आपसे कुछ माँगूंगा.”

   अमीर व्यक्ति ताना मारते हुए बोला, “हाँ, हाँ सब कुछ आसमान से गिरता है और अपने आप आता है. मुझे हँसाओ मत. मेरा सिद्धांत ‘कठिन परिश्रम’ है क्योंकि कुछ भी स्वर्ग से नहीं गिरता है.”

     संत ने चुपचाप नज़रे नीचे झुका लीं और कुछ नहीं बोला.

   अगले स्टेशन पर रेलगाड़ी जैसे ही रुकी, एक पहरेदार झटपट गलियारी में चिल्लाकर बोलने लगा कि गाड़ी उस स्टेशन पर आधे घंटे के लिए रूकेगी.

   संत धीरता व शांति से उठा और पानी पीने के लिए गाड़ी से निकलकर बाहर आया. अमीर व्यक्ति रेलगाड़ी की खिड़की से संत को ग़ौर से देख रहा था. उसने देखा कि बहुभागी डब्बे वाला खाने का डब्बा लिए एक व्यक्ति संत को पुकार रहा था, “स्वामी, स्वामी! मेरे गुरु ने मुझे आपको यह भोजन भेट करने के लिए भेजा है.” जैसे ही संत ने भोजन का डब्बा ग्रहण किया वह व्यक्ति आँखों से ओझल हो गया. 

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धनी व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर देखता रहा. जब उसका ध्यान संत पर पुनः गया तो उसने पाया कि ज़मीन पर बैठकर संत ने सारे डब्बे खोले और भगवान् की इस अद्भुत देखभाल के लिए उनका धन्यवाद देते हुए प्रभु को सारा भोजन अर्पित किया. तत्पश्चात उसने आसपास के सभी भिखारियों को बुलाया, स्वयं के लिए भोजन का छोटा सा हिस्सा रखा और बाकी का खाना भिखारियों में बाँट दिया. आश्चर्य व ईर्ष्या से परिपूर्ण अमीर व्यक्ति को तब अहसास हुआ कि संत का खाना उसके अपने खाने से कहीं अधिक शानदार व लुभावना था. 

   जब संत अपने कुप्पे में वापस आया तो कोमल व स्नेहमय नज़रों से धनवान व्यक्ति को देखते हुए बोला, “देखिए श्रीमान, मेरे प्रभु ने मुझे एक भरपूर भोजन से प्रफुल्लित किया है. आप इस संसार के सज्जन मात्र हैं परन्तु मेरे प्रभु पूरे ब्रह्माण्ड के शासक हैं. चूंकि मैं केवल उनके लिए जीता हूँ, उनपर भरोसा करता हूँ और उनसे प्रेम करता हूँ, वह हर पल मेरा ध्यान रखते हैं और मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ते हैं. हर ज़रुरत की वस्तु से वह हर पल और हर जगह मेरा भरण-पोषण करते हैं. मैंने अपना जीवन पूर्णतः उन्हें समर्पित कर दिया है. प्रभु पर सम्पूर्ण भरोसा करके मैं निरंतर उनका चिंतन करता हूँ.”

     सारांश:

  मनुष्य होने के नाते हम अपने परिवार व संसार की भौतिक वस्तुओं से जुड़े हुए हैं. हम भय और असुरक्षा में जीते हैं. हम नित्य उनकी चिंता करते रहते हैं और सदा उनकी रक्षा का प्रयास करते रहते हैं. चिंता एक दोलन कुर्सी के समान है; यह हमें व्यस्त रखती है परन्तु हमारा मार्गदर्शन नहीं करती है. जब हम चिंता करते हैं तो ऊर्जाओं का रिसाव होता है. जब ऊर्जाओं का रिसाव होता है तो अधिकता संभव नहीं है. ऊर्जा की अधिकता से ही हम स्वयं को ईश्वर के रहस्य से परिपूर्ण कर सकते हैं. हमें चिंतारहित होना होगा. इसके लिए यदि हम ईश्वर में विश्वास करना सीख लेंगे और भरोसे के आधार पर काम करेंगे तो चिंता अपने आप ही ख़त्म हो जाएगी.

   अच्छे व समझदार लोगों की संगति में रहकर विश्वास, निष्ठा और कृतज्ञता का विकास आसान हो जाता है. यद्यपि अच्छी संगत में रहने से हमारे विकास की अभिवृद्धि संभावित है परन्तु केवल बुद्धिमानों की संगत में होना ही पर्याप्त शर्त नहीं है.

  उत्तर भारत के एक आश्रम में एक गाय थी जो निरंतर आदि शंकराचार्य की संगत में रहती थी. यद्यपि उस गाय को कई दिनों तक लगातार श्री आदि शंकराचार्य के आध्यात्मिक प्रवचनों को सुनने का सुअवसर मिला पर बेचारी गाय उससे कोई लाभ नहीं उठा पाई. कारण- गाय का सारा धयान शंकर के खूबसूरत प्रवचनों के बजाय उस घास पर था जो वह खा रही थी. अतः सत्संग में सिखाए जाने वाले ज्ञान को समझने की चेष्टा किए बिना उसमें बैठने वाले व्यक्ति की दशा उस गाय से ज़्यादा बेहतर नहीं है, जिसे अब तक के सबसे अधिक बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक की संगति का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. इसलिए हमें सत्संग के सार व उद्देश्य को समझना चाहिए क्योंकि ख़ुशी व शांति के पथ पर यह हमारा मार्गदर्शन करता है.

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  अनुवादक- अर्चना    

 

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        क्रोधी साधु 

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    यह कहानी एक साधु की है जो एक गाँव में रहता था. गाँव में साधु को बहुत सम्मान दिया जाता था और गाँव घनी आबादी का होने के कारण कई लोग उस साधु से आशीर्वाद लेने और आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करने आते थे. मिलनेवालों और ग्रामीणों के निरंतर व भारी मात्रा में आने का मतलब था कि साधु सदैव उनके प्रश्नों और समस्याओं में व्यस्त रहता था. इसके परिणामस्वरूप साधु अपनी रोज़मर्रा की आध्यात्मिक कार्यप्रणाली व साधना नहीं कर पाता था और इसलिए आसानी से चिड़चिड़ा व क्रोधित हो जाता था. उसने सोचा कि यदि वह गाँव छोड़कर कहीं दूर पहाड़ों में चला जाएगा तो बिना किसी बाधा के जप-तप कर पाएगा और फिर कभी क्रोधित नहीं होगा.  

  ऐसा सोचकर साधु एक दूरवर्ती पहाड़ की ओर चला गया. यह पहाड़ फलों से लदे पेड़ों से घिरा हुआ था और पास ही एक नदी थी जिसमें ताज़ा व मधुर पानी बहता था. साधु ने वहाँ अपनी कुटिया बनाई और निर्बाध तप करना शुरू कर दिया.

     एक दिन साधु को बहुत प्यास लगी और एक पात्र लेकर वह पानी लेने पहाड़ी से नीचे आया. पानी लेते समय पात्र उसके हाथ से फिसल गया और पहाड़ी से लुढ़क गया. वह पुनः एक पात्र लेकर आया और पानी लेकर वापस जाने लगा. लौटते समय गलती से एक पत्थर से ठोकर लगने के कारण वह लड़खड़ा गया. एक बार फिर पानी का पात्र साधु के हाथ से फिसल गया. इस बार साधु को गुस्सा आया. 

    तब उसे एकाएक अहसास हुआ- जब वह गाँव में था तब वह सोचता था कि उसके गुस्से का कारण वहाँ के लोग थे पर अब यहाँ तो कोई भी नहीं था. फिर भी वह अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था. तब उसे समझ में आया कि उसके क्रोध का कारण लोग नहीं थे परन्तु यह उसके स्वभाव का परिणाम था.

   उसे स्पष्ट समझ में आया कि उसने अपने परिवार आदि का त्याग करके गेरू वस्त्र इसलिए धारण किये थे ताकि वह अपनी आध्यात्मिक खोज का लक्षण हासिल कर सके. उसे क्रोध व अहंकार जैसे भीतरी शत्रुओं का त्याग करना था और प्रेम व धैर्य जैसे सद्गुणों का विकास करना था. यद्यपि लोग उसे एक आदरणीय संत मानते थे पर दुर्भाग्यवश वह अपने क्रोध पर भी नियंत्रण नहीं कर पाया था. 

    बाहरी रूप का क्या लाभ था जब वह सहनशीलता व क्रोध पर नियंत्रण जैसे उत्तम सद्गुणों का अभ्यास करने में असक्षम था. 

    उन आदर्शों को व्यवहार में लाने का संकल्प करके वह गाँव वापस गया. वहाँ उसने अपना तप जारी रखा और दुबारा कभी गुस्सा नहीं किया. 

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     सारांश:

    गुरु कहते हैं कि उलझे बाल या सिर मुंडा वाले भिक्षु, सिद्ध पुरुष हो भी सकते हैं और नहीं भी. ऐसे बाहरी परिवर्तन, अंतरात्मा के सूचक नहीं होते हैं. हमें प्रभु व सत्य की तलाश में अपने अंदर के मौलिक तत्त्व पर ध्यान देना चाहिए.

   भीतरी बदलाव ही वास्तविक बदलाव है.

   यद्यपि बाहरी बदलाव आतंरिक परिवर्तन पर असर डाल सकता है, भीतरी परिवर्तन बाहरी बदलाव को और भी अधिक प्रभावित करता है. उन विशेषताओं को अपनाने वाले व्यक्ति के चेहरे पर अंतरीय सुंदरता झलकती है; बाहरी श्रृंगार केवल कुछ समय के लिए ही क़ायम रहता है.

   अतः आत्म-निरिक्षण बहुत महत्वपूर्ण है. पवित्र मन से आत्म-निरिक्षण हमें हमारी आध्यत्मिक यात्रा में मदद करता है.

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   अनुवादक-अर्चना    

    कृतज्ञता नसीब बदल सकती है 

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    एक छोटी सी चिड़िया रेगिस्तान में रहती थी. मरूस्थल में हरियाली न होने के कारण वह चिड़िया दिनभर गर्म रेत पर फुदकती रहती थी.

    भगवन के पास जा रहे एक देवदूत ने नन्हीं चिड़िया को देखा और उसकी दशा देखकर उस पर तरस आया. उसने चिड़िया से पूछा, “अरे नन्हीं चिड़िया ! तुम इस गर्म रेगिस्तान में क्या कर रही हो? क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ?”little bird1

   नन्हीं चिड़िया बोली, “वैसे तो मैं अपने जीवन से बहुत प्रसन्न हूँ लेकिन यह गर्मी असहनीय है. मेरे दोनों पैर जल रहे हैं. मुझे ख़ुशी होती यदि यहाँ एक पेड़ होता.” 

    देवदूत बोला, “रेगिस्तान के बीच में पेड़ उगाना मेरे कार्यक्षेत्र के बाहर है. मैं भगवान् से मिलने जा रहा हूँ. उनसे मिलकर पूछता हूँ यदि वह तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकते हैं.”

    भगवान् से मिलने पर देवदूत ने उनसे पूछा यदि वह चिड़िया की मदद कर सकते थे. भगवान् बोले, “मैं एक पेड़ अवश्य उगा सकता हूँ पर उस चिड़िया की नियति इसकी अनुमति नहीं देती है. मैं उसका नसीब नहीं बदल सकता हूँ. लेकिन तुम उस तक मेरा यह सन्देश पहुँचा दो जो उसे गर्मी से बचे रहने में मदद करेगा. उससे कहो कि वह एक समय में केवल एक पैर से कूदे और बीच-बीच में पैर बदलती रहे. ऐसा करने से केवल एक पैर को ही ताप सहना पड़ेगा और दूसरे पैर को कुछ देर आराम करके पुनः स्वस्थ होने का समय मिलेगा. उससे यह भी कहो कि वह अपने जीवन में घटित सभी अच्छी घटनाओं को याद करके ईश्वर की आभारी रहे.”

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     देवदूत चिड़िया के पास आया और उसे भगवान् का सन्देश दिया.

     चिड़िया इस सुझाव से प्रसन्न हुई और उसके जीवन को आरामदायक व सुखद बनाने के लिए देवदूत द्वारा किये गए प्रयास के लिए उसका आभार माना. 

     कुछ दिनों बाद देवदूत उसी रेगिस्तान से गुज़र रहा था और उसने नन्हीं चिड़िया का हाल-चाल पूछने का सोचा. उसने देखा कि वह चिड़िया रेगिस्तान के ठीक बीच में एक बड़े से हरे-भरे पेड़ पर बैठी हुई थी. चिड़िया को आनंदित देखकर देवदूत खुश था लेकिन ईश्वर से बहुत निराश था क्योंकि उन्होंने उसे संकेत दिया था कि इस चिड़िया के नसीब में कोई पेड़ नहीं था. 

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    देवदूत भगवान् से मिलने गया और उन्हें सारी कहानी सुनाई. भगवान् बोले, “मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला. चिड़िया के नसीब में कोई पेड़ नहीं था. लेकिन तुमने जब चिड़िया को मेरा सन्देश दिया और उससे सभी हितकर चीज़ों के लिए भगवान् के प्रति आभारी होने के लिए कहा तो उसने वास्तव में उन शब्दों को कार्यान्वित किया. अपने जीवन की हर संभव बात को याद करके उसने एक निर्मल मन से प्रभु को धन्यवाद दिया. उसकी कृतज्ञता की भावना ने मुझे द्रवित कर दिया और इसी कारण मुझे उसका नसीब बदलना पड़ा.” 

प्रभु का उत्तर सुनकर देवदूत प्रसन्न था. 

      सीख:

  कृतज्ञता सदैव अनुग्रह उत्पन्न करती है. जीवन में हमारे पास जो कुछ भी है हमें उसके लिए सदा आभारी रहना चाहिए और इन्हें प्रदान करने के लिए ब्रह्माण्ड का धन्यवाद करना चाहिए. हमें जीवन में मिले आशीर्वादों की गणना करनी चाहिए. एक छोटी सी कृतज्ञता हमारे जीवन में सकारात्मकता ला सकती है.

   यह अतिआवश्यक है कि अपनी दैनिक गतिविधियों को करते हुए बच्चे कुछ समय निकालकर ईश्वर का ध्यान करें और अपने ऊपर बरसाए सभी आशीर्वादों के लिए प्रभु का आभार प्रकट करें. यदि अच्छी व प्रेरक किताबें पढ़ने में समय निवेश किया जाए और मौन बैठकर कुछ समय व्यतीत किया जाए तो यह एक संतुलित व संतोषजनक जीवन बिताने में बहुत मदद करता है.

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    अनुवादक-अर्चना    

          ९९ संघ 

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एक राजा था जो अपनी शानदार जीवनचर्या के बावजूद बहुत अप्रसन्न रहता था. एक दिन वह अपने एक नौकर से मिला जो खुश था और काम करते हुए ख़ुशी से गा रहा था. नौकर की खुशहाल प्रवृत्ति ने राजा का ध्यान आकर्षित किया और वह आश्चर्य में पड़ गया, “ऐसा क्यों कि वह, राष्ट्र का सर्वोच्च शासक, अप्रसन्न व उदास था जबकि एक अधीन नौकर इतने आनंद में था?” 

   राजा ने नौकर से पूछा, “तुम इतने खुश क्यों हो?”

   नौकर ने जवाब दिया, “महाराज, मैं मात्र एक नौकर हूँ और मेरे परिवार और मुझे बहुत सारी चीज़ों की ज़रुरत नहीं है- केवल सिर छुपाने के लिए एक छत और पेट भरने के लिए गरम भोजन.”

   नौकर की बात सुनकर राजा ने अपने सबसे अधिक विश्वसनीय सलाहकार की सलाह माँगी. नौकर की कहानी सुनने के बाद सलाहकार बोला, “महाराज, नौकर अभी तक ‘९९ संघ’ में शामिल नहीं हुआ है.”

   “९९ संघ? वह क्या है? ” राजा ने पूछा.

   सलाहकार ने उत्तर दिया, “९९ संघ को सही में जानने के लिए आप एक बटुए में ९९ सिक्के डालकर इस नौकर की दहलीज़ पर छोड़ दीजिये. ”

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    अगले दिन अपने घर के बाहर बटुआ देखकर नौकर ख़ुशी से खूब ज़ोर से चिल्लाया….इतने सारे सोने के सिक्के!! और वह उन्हें गिनने लगा. कई बार गिनने के बाद उसे आखिरकार विश्वास हुआ कि बटुए में केवल ९९ सिक्के ही थे. 99 club3

    वह अचम्भे में पड़ गया, “सोने के उस आखिरी सिक्के का क्या हुआ होगा? यक़ीनन ९९ सिक्के कोई नहीं छोड़ेगा! ”

 

   वह काफ़ी समय तक ढूँढ़ता रहा पर आखिरी सिक्का लापता था. अंततः उसने निश्चय किया कि सोने के उस १००वें सिक्के को हासिल करने के लिए वह पहले से भी अधिक मेहनत करेगा.

   उस दिन के बाद से वह नौकर एक परिवर्तित व्यक्ति था. वह अत्यधिक थका हुआ, चिड़चिड़ा रहता था और उस १००वें  सिक्के को कमाने में मदद न करने के लिए अपने परिवार को दोषी ठहराने लगा. उसने काम करते समय गाना भी बंद कर दिया. 

    नौकर में ऐसा मौलिक परिवर्तन देखकर राजा अचंभित था. 

    सलाहकार बोला, “महाराज, यह नौकर अब आधिकारिक रूप से ‘९९ संघ’ में शामिल हो गया है.” वह बोला, “९९ संघ का नाम उन लोगों को दिया जाता है जिनके पास खुश रहने के लिए पर्याप्त है लेकिन वह कभी संतुष्ट नहीं होते क्योंकि वह सदा उस अतिरिक्त १ की अभिलाषा करते रहते हैं. वह स्वयं से कहते हैं: मुझे बस वह अंतिम वस्तु मिल जाए और फिर मैं जीवनभर खुश रहूँगा. “ 

       सीख:

    जीवन में हम बहुत कम में भी खुश रह सकते हैं परन्तु जैसे ही हमें कुछ और अधिक बड़ा और बेहतर दिया जाता है, हम और अधिक की इच्छा करने लगते हैं. अपनी बढ़ती हुई ज़रूरतों व इच्छाओं की कीमत हम अपनी नींद और ख़ुशी गवांकर चुकाते हैं. सभी की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त साधन हैं पर हमारी लालच के लिए यथेष्ट नहीं है.

    बच्चों को उदाहरणों, कहानियों व खेल के द्वारा इच्छाओं को सीमित रखने की आवश्यकता सिखाई जा सकती है. बच्चों को खुश रखने के लिए उन्हें हर प्रकार के यंत्र व कीमती सामान दिलाकर बिगाड़ने में माता-पिता भी आजकल बराबर के जिम्मेदार हैं. बाहरी दुनिआ भौतिकवाद से भरी हुई है और संचार माध्यम इसे और अधिक प्रोत्साहित करता है. अधिकतर बच्चे अपने दोस्तों से तुलना करते हैं और अपने माता-पिता से लगातार माँग करते रहते हैं और उन वस्तुओं के न मिलने पर गुस्से के आवेश में आ जाते हैं. यदि माता-पिता बच्चों को उनकी वांछित वस्तु दिलवाने में असमर्थ रहते हैं तो कुछ बच्चे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए गलत तरीकों का शिकार हो जाते हैं. इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती है. जितनी अधिक इच्छाएँ तृप्त होती हैं, हम उतना ही अधिक की लालसा करते हैं. समझदारी इसमें है कि निरंतर असंतुष्ट रहने के बजाए हमारे पास उतना ही होना चाहिए जितना सुविधापूर्वक रहने के लिए पर्याप्त है.

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अनुवादक-अर्चना  

    

   

    

धनवान व्यक्ति और उसके पुत्र 

                

     एक समय एक अमीर व्यापारी था जिसे केवल धन कमाने व विलासमय जीवन का उपभोग करने में रुचि थी. उसे अपने परिवार और अपनी समस्त सम्पत्ति से बहुत लगाव था. वह अपने कारोबार में इतना तल्लीन था कि उसके पास किसी भी आध्यात्मिक गतिविधियों या प्रार्थनाओं के लिए समय नहीं था. उसका एक परिचित एक दिन उससे मिलने आया और उसने व्यापारी को संकेत दिया कि वह पैसा कमाने में इतना अधिक मगन था कि उसके पास उस ईश्वर को स्मरण करने का समय नहीं था जिसने उसे जीवन में ढेर सारी अच्छी चीज़ें प्रदान कीं थी. मित्र ने व्यापारी को समझाया कि उसे कृतज्ञ रहना चाहिए और कभी-कभी प्रभु का धन्यवाद अवश्य करना चाहिए; तभी वह अपने अंतिम दिनों में ईश्वर का ध्यान कर सकता है.   

 अमीर व्यक्ति ने अपने दोस्त की बात सुनी और भगवान् के साथ चालाकी करने की योजना बनाई. उसने सोचा कि अगर वह अपने बच्चों का नाम भगवान् के नाम पर रखेगा तो अपने जीवन के अंतिम क्षणों में वह उन्हें ही बुलाएगा और यह सबसे पक्का और आसान तरीका था. बचपन में उसने अजमिला की कहानी सुनी थी. अजमिला एक दुष्ट व्यक्ति था पर चूँकि उसने अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ रखा था, अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उसने पुत्र का नाम पुकारा. प्रभु का नाम लेने के कारण यमराज ने उसे क्षमा कर दिया था और उसने वैकुण्ठ सिद्ध कर लिया. व्यापारी ने भी उसी रणनीति को लागू करने का फैसला किया. 

   उसने अपने चार पुत्रों का नाम माधव, गोपाल, नारायण और राम रखा. उसे यकीन था कि अपने अंतिम क्षणों में इन नामों को पुकार कर वह स्वर्ग हासिल कर लेगा. इस प्रकार की योजना बनाकर वह धन व आर्थिक संपत्ति की तलाश में पुनः जुट गया. समय बीतता गया, वह बूढ़ा हो गया और अब वह अपनी मृत्यु शय्या पर था. अपने आखिरी समय का अहसास होने पर उसने अपने पुत्रों को बुलाया.    

  सारा परिवार उसके पास खड़ा हुआ था. उसने सब को देखा और अपने चारों बेटों को वहाँ देखकर चिल्लाया, “तुम सब यहाँ क्या कर रहे हो? कम से कम किसी एक को दुकान पर होना चाहिए था; हमारा व्यापार नष्ट हो जाएगा.” उन अंतिम शब्दों के साथ उसका निधन हो गया. अपने जीवन के अंतकाल में उसने वही स्मरण किया जो वह जीवनभर करता आया था. भगवान् को चकमा देने में उसकी चतुराई काम नहीं आई.

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 अतः अपने जीवन के अंतिम चरण में हम ईश्वर का स्मरण तभी कर सकते हैं जब हम अपनी युवावस्था में प्रभु का ध्यान करते हैं.

    सारांश:

   इस पद्य में शंकर बताते हैं कि जीवन क्षणिक है. मौसम, उतार-चढ़ाव आते जाते रहते हैं पर हम कभी अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं करते. दिन-प्रतिदिन हमारी इच्छाएँ बढ़ती ही जाती हैं. हम ख़ुशी की तलाश बाहर करते हैं जबकि वह ख़ुशी अस्थायी है; हम उसका पीछा करते रहते हैं और भ्रम में पड़ जाते हैं. फिर भी हम बाहरी ख़ुशी का पीछा करना नहीं छोड़ते और अपने भीतर देखना भूल जाते हैं. हम आध्यात्मिकता की तलाश नहीं करते जो हमें परम आनंद की ओर ले जाएगी.  

शंकर हमें आध्यात्मिक खोज की आवश्यकता की नसीहत देते हैं और हमसे उसकी तलाश करने का आग्रह करते हैं जो चिरस्थायी है. इस मार्ग पर अभ्यास अति आवश्यक है. यदि हम बचपन में ईश्वर का ध्यान नहीं कर सकते तो जीवन के अंतिम चरण में प्रभु को याद करने की कामना कैसे कर सकते हैं? जीवन का हर पल बहुमूल्य है और हमें इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए. अपनी अस्थायी इच्छाओं को दूर करने के लिए हमें सभी इन्द्रियों व बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए; इसे चिरस्थायी शांन्ति व सुख की तलाश की ओर निदेशित करना चाहिए.

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  अनुवादक- अर्चना 

आत्म-स्मरण का मार्ग 

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    एक प्रमुख गुरु का एक विशाल मठ था जिसमें ५०० भिक्षुक रहते थे और सभी आत्म-स्मरण के मार्ग का अभ्यास करते थे. आत्म-स्मरण बुद्ध के द्वारा बताए मार्गों में से एक है. 

    एक समय एक व्यक्ति मठ में आया क्योंकि वह शिष्य बनना चाहता था. गुरु ने उसे स्वीकार कर लिया. चूँकि वह व्यक्ति एक बहुत ही सीधा-साधा व अशिक्षित ग्रामीण था, गुरु ने उससे कहा, “तुम्हारा काम रसोईघर में चावल साफ़ करने का होगा.” रसोई काफ़ी बड़ी थी क्योंकि उसमें ५०० भिक्षुओं का खाना बनता था. बेचारा आदमी सूर्यास्त से लेकर देर रात तक चावल साफ़ करता रहता था. 

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    मठ में रहने वाले सभी ५०० भिक्षु विख्यात विद्वान् थे और वह मठ देशभर में प्रसिद्ध था. पर इस व्यक्ति के पास न ही धर्मोपदेश या पूजा में जाने का समय था और ना ही धर्मग्रन्थ पढ़ने या नीतिवचन सुनने का.  २० वर्ष गुज़र गए और वह व्यक्ति सिर्फ़ चावल साफ़ करता रहा. उसे वर्षों की गिनती भूल चुकी थी. उसे दिनों और तिथियों का भी ध्यान नहीं था और धीरे-धीरे उसे अपने नाम के बारे में भी संदेह होने लगा. २० साल से किसी ने प्रयोग नहीं किया था; किसी ने उसे उसके नाम से नहीं बुलाया था- कदाचित वह उसका नाम ही नहीं था. २० साल से सुबह उठने से रात को सोने तक वह लगातार एक ही लघु काम कर रहा था: चावल साफ़ करना. 

   गुरु ने घोषणा की कि उनका शरीर त्यागने का समय आ गया था. वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करना चाहते थे और उन्होंने यह कार्य कुछ इस प्रकार किया. गुरु ने उद्घोषणा की, “जिस किसी व्यक्ति को यह लगता है कि वह आत्म-स्मरण में सफल हो गया है, वह मेरी कुटिया की दीवार पर कुछ ऐसा परिज्ञान लिखे जो प्रमाणित कर सके कि उसने सत्य को देखा है.”

   एक भिक्षु, जिसे समुदाय का महानतम विद्वान् समझा जाता था, ने प्रयास किया. लेकिन वह उस वाक्य को लिखने से बहुत डर रहा था क्योंकि वह उसकी अंतर्दृष्टि नहीं थी. उसे ज्ञात था कि वह उसका परिज्ञान नहीं था, उसने शास्त्रों से उधार लिया था. वह उसका अपना अनुभव नहीं था और उस वृद्ध व्यक्ति को धोखा देना आसान नहीं था. अगली सुबह वृद्ध गुरु बाहर आये और नौकर से दीवार पर से सब कुछ मिटाने को कहा. गुरु नौकर से बोले, “पता लगाओ कि यह मूर्ख कौन है जिसने मेरी दीवार खराब की है.”   

  उस महान भिक्षु ने पकड़े जाने के डर से अपने हस्ताक्षर नहीं किये थे. उसकी योजना के अनुसार, यदि गुरु लेखन की प्रशंसा करते और कहते कि वह वास्तव में एक सर्वोत्कृष्ट अंतर्दृष्टि है तो वह बाहर आकर कहेगा, “यह मैंने लिखा है.” वरना वह ख़ामोश रहेगा….. किसे पता चलेगा? ५०० लोगों में वह किसी का भी काम हो सकता था.  

  लगभग १ दर्ज़न महान विद्वानों ने कोशिश की पर किसी को भी अपने हस्ताक्षर करने की हिम्मत नहीं हुई. हर बार गुरु की प्रतिक्रिया एक सी होती थी; वह पंक्ति को मिटवाकर कहते थे, “तुम में से किसी ने भी आत्म-स्मरण को हासिल नहीं किया है. तुम सब स्वयं के नाम पर अहंकार को बढ़ावा दे रहे हो. मैंने तुम सब को बार-बार याद कराया था परन्तु एक विशाल अहम् बहुत ख़ुशी देता है. आध्यात्मिक अहंकार, सांसारिक अहंकार, दैवी अहंकार और भी अधिक सुखद लगते हैं. अब मुझे स्वयं ही उस व्यक्ति को ढूँढना पड़ेगा.”

   बीच रात में गुरु उस व्यक्ति के पास गए जो २० वर्ष पहले आया था. वह व्यक्ति २० साल से केवल चावल साफ़ कर रहा था और गुरु ने उसे २० साल से नहीं देखा था. वह नींद से उठा और गुरु को पास खड़े देखकर बोला, “कौन हो तुम?” क्योंकि २० साल पहले….. दीक्षा संस्कार के समय उसने उन्हें कुछ पलों के लिए ही देखा था- “और मेरी नींद खराब करने का क्या कारण है?”

    गुरु बोले, “मैं तुम्हारा गुरु हूँ. तुम भूल गए……..? क्या तुम्हें अपना नाम याद है?”

    वह व्यक्ति बोला, ” यही मेरी समस्या है. आपने मुझे जो काम दिया है उसमें किसी नाम, प्रसिद्धि, पांडित्य या तपस्या की आवश्यकता नहीं है. मेरा कार्य इतना सहज है कि मैं सब कुछ भूल चुका हूँ. मुझे अपने नाम पर भी पक्का विश्वास नहीं है. मेरे ध्यान में कुछ नाम आते हैं पर मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि इनमें से कौन सा मेरा नाम है. पर मैं आपका आभारी हूँ.” उसने गुरु के चरण स्पर्श किए और बोला, “कृपया मेरा काम मत बदलिए. सब कुछ भूल जाने के बावजूद मैंने सब कुछ हासिल कर लिया है.”

   “मैंने ऐसे सुकून का अनुभव किया है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी- ऐसी शान्ति जिसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते. मैंने परमानन्द के ऐसे क्षणों का अनुभव किया है कि अगर मैं मर भी जाऊँ तो मुझे यह शिकायत नहीं होगी कि ज़िन्दगी ने मेरे साथ इन्साफ नहीं किया. मेरे इस काम ने मुझे मेरी योग्यता से कहीं अधिक दिया है. आप बस मेरी नौकरी मत बदलिए. मैं इसे बखूबी निभा रहा हूँ. वैसे क्या किसी ने मेरे काम के बारे में शिकायत की है? ”

    गुरु बोले, “नहीं, किसी ने तुम्हारी शिकायत नहीं की है. पर तुम्हारी नौकरी बदलनी पड़ेगी क्योंकि मैं तुम्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर रहा हूँ.”

     व्यक्ति बोला, “मैं मात्र एक चावल साफ़ करने वाला हूँ. मुझे गुरु या शिष्य होने के बारे में कुछ नहीं पता है. मैं कुछ नहीं जानता हूँ. कृपया मुझे माफ़ कीजिए- मैं आपका उत्तराधिकारी नहीं बनना चाहता क्योंकि मैं इतना बड़ा काम संभाल नहीं सकता हूँ, मैं केवल इस चावल की सफाई कर सकता हूँ.”  

 उस व्यक्ति को प्रेमपूर्वक समझाते हुए गुरु बोले, “तुमने वह हासिल किया है जो अन्य हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. तुमने हासिल कर लिया क्योंकि तुम प्रयास नहीं कर रहे थे. तुम बस अपना छोटा सा काम कर रहे थे. तुम्हारा काम करने के लिए सोच-विचार, भावनाओं, क्रोध, मतभेद, तुलना और आकांक्षा का होना आवश्यक नहीं था और इस कारण धीरे-धीरे तुम्हारा अहंकार ख़त्म हो गया. मनुष्य का जन्म नाम के साथ नहीं होता है. वह अहंकार है जिसे नाम दिया जाता है- यह अहम् की शुरूआत है. तुम्हारा अहम् ख़त्म होने पर तुम अपने गुरु को भी भूल गए क्योंकि वह तुम्हारा अहम् था जो तुम्हें मेरे पास लाया था. उस पल तक तुम आध्यात्मिक रूप से महत्वाकांक्षी यात्रा पर थे. तुम बिलकुल सही व्यक्ति हो इसलिए मेरा चोला, मेरी टोपी और मेरी तलवार लो जो एक गुरु हमेशा से अपने उत्तराधिकारी को देता आया है.”

    गुरु आगे बोले, “पर एक बात का ध्यान रहे: इन्हें लेकर तुम मठ से जितनी दूर भाग सकते हो उतनी दूर भाग जाओ क्योंकि तुम्हारे जीवन को खतरा होगा. यह सब ५०० अहंकारी तुम्हें मार देंगे. तुम इतने सरल हो और इतने मासूम बन गए हो कि अगर यह सभी तुम्हें rice2चोले, टोपी और तलवार के लिए पूछेंगे तो तुम सहज ही दे दोगे. तुम इन्हें लेकर जितनी दूर हो सके पहाड़ों में निकल जाओ. जल्द ही लोग तुम्हारे पास आने लगेंगे जिस प्रकार फूलों के खिलने पर मधुमक्खियाँ फूलों की तरफ रास्ता खोज लेती हैं. तुम अब खिल चुके हो. तुम्हें शिष्यों के बारे में चिंता करने की ज़रुरत नहीं है. एक दूरवर्ती जगह पर जाकर तुम केवल शांत रहो. लोग तुम्हारे पास आएंगे; तुम जो भी करते रहे हो बस वही लोगों को सिखाओ.”

 

 वह व्यक्ति बोला, “लेकिन मैंने कोई विशेष शिक्षा ग्रहण नहीं की है और मुझे नहीं पता कि मैं उन्हें क्या सिखाऊँगा.”

 गुरु बोले, “तुम उन्हें शान्ति व नीरवता से केवल छोटी-छोटी चीज़ें करना सिखाओ, उन्हें सिखाओ कि वह यह कार्य इस संसार या दूसरी दुनिया में कुछ हासिल करने की लालसा से न करें ताकि वह एक बच्चे के समान मासूम बन सकें. यह सादगी ही वास्तविक धार्मिकता है.” 

     सारांश:

   हमें जीवन के हर पल को संजोकर रखना चाहिए और उसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. अपने लक्ष्य की ओर सतर्कता और जागरूकता होनी चाहिए. यह हमें परम सत्य पर केंद्रित रखती है. मनुष्य को अभिमानी नहीं होना चाहिए और दौलत, रिश्तों, सामर्थ्य व सौंदर्य से आसक्त व उनमें लीन नहीं होना चाहिए. यह सब अस्थायी है. यह हर रोज़ बदलते रहते हैं. समस्त संसार भ्रम से परिपूर्ण है. इसलिए स्थायी की तलाश करने के बजाए अस्थायी में स्वयं को उलझाना मूर्खता है. अतः हमें उस अनंत की तलाश करनी चाहिए जो परम सत्य है और इसके लिए अहंकार का उन्मूलन अति आवश्यक है.   

अनुवादक- अर्चना 

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

“मैं ना होता तो क्या होता” – एक कथा 

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  एक बार हनुमानजी प्रभु श्रीराम से बोले, “प्रभु, अशोक वाटिका में जिस समय क्रोधित रावण तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा था, उस समय मुझे ऐसा लगा था कि उसकी तलवार छीनकर उसका सर काट दूँ. परन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़कर उसे रोक लिया. यह देखकर मैं अति प्रसन्न था क्योंकि अगर मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं ना होता तो क्या होता? ”

    “बहुधा हमें ऐसा ही भ्रम हो जाता है. मुझे भी लगता कि यदि मैं नहीं होता तो सीताजी को कौन बचाता? परन्तु आज आपने न केवल उन्हें बचाया बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया. तब मुझे समझ में आया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं. इस में हमारा किसी का कोई महत्व नहीं है.”

  “कुछ समय बाद जब त्रिजटा ने लंकापति से कहा कि लंका में एक बन्दर आया हुआ है और वह लंका जलाएगा तब मैं गहरी सोच में पड़ गया. मैं सोचने लगा कि प्रभु ने तो मुझे लंका जलाने का आदेश नहीं दिया है तो फिर यह त्रिजटा ऐसा क्यों कह रही है. त्रिजटा की बात से उत्तेजित होकर रावण ने मुझे मारने के लिए अपने सैनिक भेजे. स्वयं को बचाने के लिए मैंने तनिक भी चेष्टा नहीं की. तभी विभीषण ने वहाँ आकर रावण को सलाह दी कि एक दूत को मारना अनीति है . तब मैं समझ गया कि मेरी रक्षा के लिए मेरे प्रभु ने यह उपाय किया था.” 

  “मुझे सबसे अधिक आश्चर्य तब हुआ जब रावण ने कहा कि बन्दर को मारा नहीं जाएगा. उसके बदले घी से भीगे कपड़े से उसकी पूंछ को बाँधकर उसमें आग लगाई जाएगी. रावण का कथन सुनकर मैं चकित था क्योंकि संत त्रिजटा की भविष्यवाणी सच साबित हो रही थी. वरना लंका को जलाने के लिए मैं घी, कपड़ा और आग का प्रबंध कहाँ से करता? परन्तु आपने सारी व्यवस्था रावण के द्वारा करवा दी. जब आप रावण से भी काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में क्या आश्चर्य की बात है.”

   इसलिए हमें सदा याद रखना चाहिए कि संसार में जी कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है. हम और आप केवल निमित्त मात्र हैं. अतः कभी भी यह भ्रम न पालें कि …..

     मैं ना होता तो क्या होता!