लंगर- एक नि:स्वार्थ प्रेम की कहानी

आदर्श :प्रेम

उप आदर्श: कृपा,दयालुता

कई सौ सालों से पहले, गुरु गोबिंद राय सिख धर्म के दस्वें मदगुरु थे. भगवान के प्रति उनका प्यार गहरा और स्थिर था. जो भी उनके आसपास थे, वे हमेशा सुख और आनंद का अनुभव करते थे. सिख लोग हमेशा गुरु के सीख के लिए उत्सुक थे.

एक बार वे अपने प्यारे जनता से बोले ,”सभी के घरों में लंगर होना जरूरी है. आपके घर यात्रियों और अतिथियों के खानपान और खातिरदारी के लिए हमेशा तैयार रहने चाहिए. जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाइए. कोई भी आदमी आप के घर से भूखे या खाए बिना नहीं जायें “

सभी लोग गुरु के बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे. सिख समुदाय सेवा के लिए मशहूर हैं . फिर भी गुरुजी उनकी परीक्षा लेकर यह जानना चाहते थे कि वे कितने तैयार हैं; हमेशा तैयार थे या कभी कभी…..

एक दिन सवेरे एक मजेदार घटना घटी.यह गुरूजी की अनोखी लीला थी. गुरु गोबिंद राय साधारण यात्री के वेष में अपने भक्तों के घर के लिए निकल पड़े.

साधारणत: गुरुजी स्वच्छ और बिना सिकुडे हुए कपडे पहनते हैं. लेकिन उस दिन सुबह वे मैले और सिकुडे कपडे पहनकर निकले ताकि कोई उन्हें पहचान न पाए.

वे अपने भक्तों के घर एक वे असुविधा जनक समय पर पहुंचे ! सूर्योदय के पहले का समय था. इसलिए कई भक्त तब ही जाग रहे थे. दिनभर के कामों जैसे नहाना,धोना और प्रार्थना करने में व्यस्थ थे. गुरूजी उनके दरवाजे पर दस्तक देकर कहते थे,”भाई,तकलीफ के लिए माफ़ करना. मैं एक यात्री हूँ. मुझे भूख लगी है. क्या आप मुझे कुछ रोटी खाने के लिए दे सकते हैं?

लोगों का जवाब था “माफ़ कीजिये आप अपने कार्यक्रम में जल्दी निकले हैं; हमारे पास इस वक्त आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. हमारे घर खाना देर से बनती है. आप थोड़ी समय बाद आते तो ,हम आपको कुछ परोस सकते हैं.”गुरु अपने प्रियजनों की परीक्षा ले रहे थे.एक मामूली बात को वे अविस्मरणीय तरीके से दिखाना चाहते थे. वे उनको यह दिखाना चाहते थे कि वे (लोग) अभी भी थोड़े स्वार्थी हैं,पूर्ण रूप से नि:स्वार्थ नहीं थे. खुद को सुधारने के लिए उन्हें अब भी समय की जरूरत थी.

किसी घर पर अगर गुरुजी दाल के लिए पूछते वहां उन्हें जवाब मिलता; “माफ़ करना भैय्या , दाल पकने में तो बहुत समय लगता है; हमारे यहाँ तो अब तक नाश्ता भी नहीं बना है. आप को परोसने में हमें खुशी है,… मगर कृपया थोड़ी देर बाद आइये.

एक घर के बाद दूसरा घर….गुरुजी चलते गए. उनके होंठों पर एक मुस्कान और आँखों में चमक थी.

कोई भी सिख ने अब तक उन्हें खाने में कुछ नहीं दिया.

अंत में गुरुजी नंदलाल नाम के आदमी के घर आये. नंदलाल एक कवि था और सच्चे गुरुओं को प्रेम भाव से आदर करता था. गुरु गोबिंद राय से २३ वर्ष उम्र में बड़े होने के बावजूद ,वह उनका भक्त था. गुरुजी के दरबार में  उसका मन खिल जाता था. वह हमेशा प्रेम और भक्ति से गुरु की सेवा करता था.

नंदलाल ने खुशी से अपने अतिथि का स्वागत करते हुए कहा “सु स्वागत है, मेरे दोस्त “

गुरुजी के बात करने से पेहले ही नंदलाल ने कहा “अन्दर आकर बैठकर आराम कीजिये”. तब गुरु ने कहा “मैं एक मामूली यात्री हूँ. क्या आप के पास कुछ खाने के लिए है?” नंदलाल ने बेझिझक जवाब दिया, “आपको पूछने की जरूरत नहीं है. खाना अभी आ रहा है.”

खाना परोसने (सेवा) का अवसर पाकर वह बहुत खुश हुआ. वह अन्दरसे रोटी के कच्चे आटा, अध् पके दाल, सब्जियां और मक्खन ले आया.

अध् पके खाने को उसने अतिथि के सामने बड़े कृपा और गौरव के साथ रखा. नंदलाल ने कहा “आप जो चाहे, जितना चाहे खाइए. अगर आप थोड़ी प्रतीक्षा करें तो मैं आप के लिए गरम गरम रोटियाँ, स्वादिष्ट दाल और सब्जियोंको पका कर ले आऊँगा. आप की सेवा करना मेरा सौभाग्य है. यह मेरी गुरु की कृपा है. तब तक आप आराम कीजिये.

नंदलाल भाई की सेवा भाव देख, गुरुजी खुश हुए. इतने प्यार से बना खाना खाकर संतुष्ट हुए. नंदलाल अपने गुरुजी की सीख का सच्चा पालन करता था . जो कोई नंदलाल भाई के घर आता, वह बिना खाये कभी नहीं लौटता था.

अगले दिन सुबह गुरुजी ने सभी लोगों से कहा “इस गाँव में एक ही अतिथि-सत्कार मंदिर है, और वह है नंदलाल भाई का घर. नंदलाल प्रेम और भक्ति की भाषा बोलता है. हम सबको दुआएं देता है. उसकी वचन-बद्धता प्रशंसनीय है. उसका प्रेम सब के मन को जीत लेता है. ऐसे लंगर चलाने से ही सिख लोग सही माय्न्ने मे अमीर बनते हैं. इस प्रकार से नंदलाल का लंगर सफलपूर्वक है”

सभी भक्त यह सुनकर मन ही मन हसें और समझ गए कि गुरुजी ने उनकी परीक्षा ली है. स्नेहभाव से रहने पर भी ,वे सफलता न पा सके. भाई नंदलाल हमेशा सेवा केलिए तत्पर रहता था. वह खुशी से,बिना कुछ बहाने किये बेझिझक सब को लंगर परोसता था. जब हम नि:स्वार्थ बनते हैं, तब हमें कोई बहाने की जरूरत नहीं होती  है, हम हमेशा खुश रहेंगे. अतिथि-सत्कार करने के लिए भाई नंदलाल एक उदाहरण बना.

भाई नंदलाल ने कहा; “साधुओं को पानी देना संसार के बड़े बादशाह होने के समान है. उनके लिए खाना देना सभी स्वर्गों से भी आरामदायक है.गुरु के लिए लंगर बनाना सभी धन, दौलत से बढ़कर है. महान लोग जरूरतमंदों की सेवा करते हैं और उनके समक्ष रहकर दुसरे आदमी विनम्रता सीखतें हैं . गुरु की सीख इन सभी चीजों और हर जगह पर है.”

सीख :

आदमी को लगातार अच्छे कर्मों से अपने में परिवर्तन लाना चाहिए. प्रेम और सेवा की कोई सीमा नहीं होती है. अतिथि देवो भवः अतिथि भगवान का रूप होते हैं. जो भी अतिथि अपने घर आये ,उनका आदर प्रेम और सम्मान पूर्वक करना चाहिए. सभी से प्रेम करें सभी की सेवा करें.

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आम का पेड़

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: आदर, देख-रेख

एक बार आम का एक बहुत बड़ा पेड़ था. एक नन्हा बालक हर रोज़ उस पेड़ के आस-पास खेला करता था. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ता था, कभी पेड़ के पक्के आम तोड़कर खाता था और कभी पेड़ की छाया में सो जाता था. उसे आम का वह पेड़ बहुत पसंद था और पेड़ को भी उसके साथ खेलना अच्छा लगता था.

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समय बीतता रहा….. नन्हा बालक बड़ा हो गया और अब वह पेड़ के आस-पास नहीं खेलता था.

एक दिन उदास चेहरा लेकर वह लड़का पेड़ के पास वापस आया.

लड़के को देखकर पेड़ बोला, “आओ, मेरे साथ खेलो.”
“नहीं, अब मैं बच्चा नहीं रहा. मैंने पेड़ के आस-पास खेलना छोड़ दिया है,” लड़के ने जवाब दिया. “मुझे खिलौने चाहिए हैं और उन्हें खरीदने के लिए मुझे पैसों की आवश्यकता है.”aam3
“माफ़ करना, मेरे पास पैसे नहीं हैं…. पर तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बेचकर तुम्हें पैसे मिल जाएंगें.”
पेड़ का सुझाव सुनकर लड़का बहुत ही खुश हो गया. फिर पेड़ के सारे आम तोड़कर वह वहाँ से ख़ुशी-ख़ुशी चला गया. काफी समय तक वह लड़का वापस नहीं आया और पेड़ उदास था.

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एक दिन वह लड़का पेड़ के पास पुनः लौटा. इस बार वह बड़ा होकर आदमी बन चुका था. उसे देखकर पेड़ बहुत ही खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो, ” पेड़ ने कहा.
“मेरे पास खेलने का समय नहीं है. मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है. हमें एक घर की ज़रुरत है. क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?”
“माफ़ करना, मेरे पास घर नहीं है. पर अपना घर बनाने के लिए तुम मेरी शाखाएँ काट सकते हो.”

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अतः युवक ने पेड़ की सारी शाखाएँ काट लीं और ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया. उसे खुश देखकर पेड़ प्रसन्न था पर उसके बाद वह युवक वापस नहीं आया. एक बार फिर पेड़ अकेला व उदास था.

कड़ी गर्मी के एक दिन वह युवक लौटा और उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो.”
“मैं उदास हूँ और वृद्ध हो रहा हूँ. अपने विश्राम के लिए मैं नौकायान पर जाना चाहता हूँ. क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?”
“तुम मेरे तने से नाव बना लो. नाव लेकर तुम लम्बी जलयात्रा पर निकल जाओ और यात्रा का आनंद लो.”

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पेड़ की बात सुनकर उस व्यक्ति ने पेड़ का तना काटा और अपने लिए एक नाव तैयार कर ली. वह जलयात्रा पर चला गया और काफी समय तक वापस नहीं आया.

अंततः कई वर्षों के बाद वह व्यक्ति वापस लौटा.
“माफ़ करना, मेरे बच्चे, पर अब मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हें देने के लिए आम भी नहीं बचे हैं, पेड़ ने कहा.
व्यक्ति ने उत्तर दिया, ” अब तो मेरे पास दांत भी नहीं हैं.”
“तुम्हारे चढ़ने के लिए तना भी नहीं बचा है.”
व्यक्ति बोला, “उसके लिए मैं बूढ़ा हो चुका हूँ.”
“मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है…. केवल मेरी मुरझाई हुई जड़ें ही बाकी बची हैं, ” पेड़ ने निराश होकर कहा.
“अब मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. इतने वर्षों के बाद मैं थक चुका हूँ, ” व्यक्ति ने उत्तर दिया.
“अच्छा है! टेक लगाकर आराम करने के लिए पुराने वृक्ष की जड़ें सर्वोत्तम होती हैं.”

वह व्यक्ति मुस्कुराया और वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया.

सीख:
कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता को दर्शाता है. जब हम छोटे होते हैं तब हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम बड़े हो जाते हैं तब हम उन्हें छोड़कर चले जाते हैं और वापस तभी आते हैं जब हमें मदद चाहिए होती है. माता-पिता हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान करते हैं. हमें उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और जब उन्हें हमारी सबसे अधिक ज़रुरत होती है, हमें उनकी मदद अवश्य करनी चाहिए. उन्हें केवल हमारे प्रेम की आवश्यकता होती है और हमारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

दृष्टिकोण

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: आलोचनात्मक बनने से स्वयं को बचाना

एक २४ वर्षीय लड़का रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर चिल्लाया….
“पापा, देखो पेड़ पीछे जा रहे हैं!”

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पिता मुस्कुराए. एक युवा दम्पति पास ही बैठा हुआ था और उन्होंने दयापूर्ण भाव से २४ वर्ष के युवक की बचकाना हरकत को देखा. इतने में अचानक वह लड़का फिर से चिल्लाकर बोला,
“पापा, देखो बादल हमारे साथ-साथ भाग रहे हैं.”

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दम्पति स्वयं को रोक नहीं पाए और युवक के पिता से बोले…..
“आप अपने बेटे को किसी अच्छे चिकित्सक के पास क्यों नहीं ले जाते? ”

पिता ने मुस्कुराकर उत्तर दिया…..

“मैं इसे ले गया था और हम अभी अस्पताल से ही लौट रहे हैं. मेरा बेटा जन्म से ही अंधा था और इसे आज ही आँखों की रोशनी मिली है.”

सीख:
पृथवी पर हर एक व्यक्ति की अपनी कहानी है. दूसरों को ठीक से जाने बिना हमें उन्हें आंकना नहीं चाहिए. संभव है कि सच जानने पर हमें आश्चर्य हो और उनके प्रति अपनी सोच पर पश्चात्ताप भी.

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अनुवादक- अर्चना

एक तपस्वी का संकल्प

 

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: दृढ़ निश्चय, श्रद्धा

भगवान् को प्रसन्न करने के मुख्य उद्देश्य से बहुत सारे लोग तप करते हैं. एक तपस्वी ने एक बार भगवान् को प्रसन्न करने का निश्चय किया और अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या करने लगा. उसने सोचा कि अगर वह भगवान् को प्रसन्न करने में सफल हो जाएगा तो उसे आशीर्वाद में भगवान् के दर्शन मिलेंगें. अतः वह प्रतिदिन पेड़ की परिक्रमा करता था और भोजन में रोज़ाना पेड़ के पत्ते खाता था.

एक दिन नारदजी भगवान् के धाम जा रहे थे. रास्ते में तपस्वी को देखकर वह उससे मिलने आ गए. नारदजी को देखकर तपस्वी ने तुरंत उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया. नारदजी के पूछने पर तपस्वी ने भगवान् की कृपा पाने के अपने निश्चय का वर्णन किया. तपस्वी बोला, “नारदजी, मैं कई वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ और इस अम्बली वृक्ष के पत्तों का ही भोजन करता हूँ ताकि मुझे भगवान् के दर्शन हो सकें. आप जब भगवान् से मिलेंगें तो कृपया मेरी ओर से उन्हें मुझे दर्शन प्रदान करने के लिए कहना.” तपस्वी की कहानी सुनकर नारदजी ने निश्चय किया कि वह उसका सन्देश भगवान् तक अवश्य पहुँचाएंगें.

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नारद के आगमन पर भगवान् ने उनसे पूछा, “नारद! पृथ्वी से क्या समाचार लाए हो?”

तपस्वी से अपनी मुलाकात का स्मरण करते हुए नारदजी बोले, “भगवन! एक तपस्वी अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा है ताकि उसे आपके दर्शन हो सकें. आप उसे अपने दर्शन कब देंगें?”

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भगवान् बोले, “उससे कहो कि मेरे दर्शन पाने के लिए उसे उतने वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने कि अम्बली पेड़ पर पत्ते हैं! ”

प्रभु का कथन सुनकर नारदजी के घुटने ठिठुरने लगे. उनकी टांगें सुन्न हो गयीं मानो वह एक कदम भी नहीं ले पाएंगीं और उनका दिल बैठ गया. उत्सुक तपस्वी को वह यह समाचार कैसे दे पायेंगें. वह तो बेचारा बिलकुल टूट जाएगा. नारदजी ने मन ही मन सोचा, “मैं उससे क्या कहूँगा? वह हिम्मत हार जाएगा और तपस्या के लिए सारा उत्साह गँवा देगा.” इस प्रकार चिंतन करते हुए नारदजी आसमान से पृथ्वी की ओर आ रहे थे जब तपस्वी ने उन्हें देखा. अपना नाम सुनकर, नारदजी तपस्वी के पास गए. तपस्वी यह सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ कि नारदजी भगवान् से मिले थे.god

उसने नारदजी से पूछा, “मेरे लिए भगवान् का क्या सन्देश है?”
नारदजी ने उदासी से उत्तर दिया, “वह मैं नहीं बता सकता क्योंकि मेरी बात सुनकर तुम हिम्मत हार जाओगे और अपनी तपस्या त्याग दोगे.”
तपस्वी ने जवाब दिया, “भगवान् ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं हिम्मत नहीं हारूँगा. कम से कम मुझे प्रभु के दिव्य शब्द सुनने का अवसर प्राप्त होगा. कृपया मुझे ठीक-ठीक बताएं कि भगवान् ने क्या कहा है.”

नारदजी अभी भी अनिश्चित थे. वह सोचने लगे, “क्या मैं इसे बता दूँ? कहीं इस बेचारे का विश्वास न टूट जाए. मैं इसके साथ ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.”

तपस्वी ने पुनः विनती की, “कृपया मुझे भगवान् का सन्देश बताएं.”
इस पर नारदजी बोले, “भगवान् ने कहा है कि तुम्हें और कई वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी. असल में, भगवान् के दर्शन पाने के लिए तुम्हें उतने सालों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने इस अम्बली वृक्ष पर पत्ते हैं.”
तपस्वी आनंदोल्लास हो गया. वह नाचने और गाने लगा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. भगवान् ने अपने धाम से मेरे लिए सन्देश भेजा है. उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वह मुझे दर्शन देंगें.यह वर्ष तो तुरंत ही बीत जायेंगें.”
तपस्वी का प्रेम और हौसला देखकर भगवान् ने तत्क्षण तपस्वी के सामने प्रकट होकर उसे अपने दर्शन दिए. तपस्वी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा.

नारदजी अचंभित थे. उन्होंने भगवान् से पूछा, “प्रभु, आप यहाँ कैसे? आपने तो कहा था कि आप इसे कई वर्षों की तपस्या के बाद दर्शन देंगें.”

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भगवान् ने जवाब दिया, “इसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को देखो! यह जानने के बाद भी कि इसे अभी कई और वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी, इसने हिम्मत नहीं हारी और अपना विश्वास बनाए रखा. ऐसे व्यक्ति को मैं दर्शन अवश्य देता हूँ.”

 

सीख:
अगर तपस्वी अपना विश्वास खो देता तो क्या उसे भगवान् के दर्शन प्राप्त हो पाते? नहीं! चूँकि उसने हिम्मत नहीं हारी, भगवान् ने उसे दर्शन दिए. दृढ़ संकल्पी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने पर हमें हार न मानने का निश्चय करना चाहिए और उद्देश्य हासिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास, उचित प्रवृत्ति व विश्वास से काम करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

परिस्थितियों को देखने का एक ख़ूबसूरत तरीका

 

    आदर्श : आशावाद
उप आदर्श: विचार में स्पष्टता

एक पिता एक पत्रिका पढ़ रहे थे और उनकी नन्ही बेटी समय-समय पर उनका ध्यान भंग कर रही थी. बेटी को व्यस्त रखने के लिए उन्होंने एक पृष्ठ फाड़ा जिस पर विश्व का नक्शा छपा हुआ था. पिता ने उस पृष्ठ को अनेकों छोटे-छोटे टुकड़ों में फाड़ा और अपनी बेटी से उन सभी टुकड़ों को जोड़कर दुबारा से नक्शा बनाने को कहा. कागज़ की पहेली सुलझाने वह नन्ही लड़की ख़ुशी-ख़ुशी भागकर अपने कमरे में गई.

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पिता को पूरा विश्वास था कि पहेली सुलझाने में बच्ची को पूरा दिन लग जाएगा. वह अपनी इस परियोजना से बेहद प्रसन्न थे और निश्चिन्त होकर पुनः पत्रिका पढ़ने लगे. परन्तु शीघ्र ही नन्ही बालिका पूर्णतया संकलित नक्शा लेकर वापस आ गई. आश्चर्यचकित पिता ने उससे पूछा कि उसने नक्शा इतनी जल्दी कैसे बना लिया. उनकी बेटी ने जवाब दिया, “ओह……पिताजी! कागज़ के दूसरी तरफ एक व्यक्ति का चेहरा था…..map3चेहरा परिपूर्ण करने के लिए मैंने टुकड़ों को जोड़ दिया और इस तरह नक्शा भी सही तरह से बन गया.” ऐसा कहकर पिता को हक्का-बक्का छोड़कर वह भागकर बाहर खेलने चली गई.

 

 

    सीख:
इस संसार में हम जो भी अनुभव करते हैं उनका सदैव एक दूसरा पहलू भी होता है. जब भी हम किसी चुनौती या पेचीदा परिस्थिति का सामना करते हैं तो हमें उसके दूसरे पहलू पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए….इससे हमें समस्या के समाधान का आसान तरीका नज़र आएगा.

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अनुवादक-अर्चना

कूड़ा-कचरे की गाड़ी का सिद्धांत

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आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: प्रवृत्ति, रवैया

एक दिन हवाई अड्डे जाने के लिए मैं एक टैक्सी में बैठी. गाड़ी चालक सही लेन में गाड़ी चला रहा था पर तभी एक काले रंग की गाड़ी अकस्मात् ही कहीं से निकलकर हमारी गाड़ी के सामने आ गई. गाड़ी चालक ने झटपट गतिरोधक को ज़ोर से दबाया जिस कारण गाड़ी फिसलकर एकदम से रुकी और दोनों गाड़ियों की टक्कर होते-होते बची.

दूसरी गाड़ी के वाहक ने झटके से सर घुमाया और हमारे ऊपर चिल्लाने लगा. मेरे टैक्सी चालक ने मुस्कुराकर दूसरे चालक को हाथ से इशारा किया. मेरा वाहन चालक वास्तव में स्नेहशील व मित्रवत था.

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मैंने उससे पूछा, “उस वाहक के गुस्से से चिल्लाने के बावजूद तुमने उसे मुस्कुराकर हाथ से इशारा क्यों किया? उस व्यक्ति ने तुम्हारी गाड़ी लगभग बर्बाद कर दी थी और हमें अस्पताल पहुँचा दिया था!” इस पर मेरे टैक्सी चालक ने मुझे वह सीख दी जिसे मैंने “कूड़ा-कचरे के गाड़ी का सिद्धांत” का नाम दिया.

वाहक ने मुझे समझाया कि अधिकतर लोग कूड़ा-कचरे की गाड़ी के समान होते हैं. वह गंदगी, कुंठा, क्रोध व निराशा से परिपूर्ण हर तरफ भागते रहते हैं. जब उनका कूड़ा इकट्ठा हो जाता है तब उन्हें उसे फेंकने के लिए जगह चाहिए होती है और कभी-कभी वह उस गंदगी को आप पर उलट देते हैं. उनकी इस करतूत को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए, केवल मुस्कुराकर उनकी ओर इशारा करके, उन्हें शुभकामना देकर आगे बढ़ जाना चाहिए.

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सीख:
किसी भी परिस्थिति में विरूद्ध प्रतिक्रिया न दिखाकर हमें सदा परिस्थिति के अनुकूल रहना चाहिए. हमारी प्रवृत्ति बहुत मायने रखती है. नकारात्मक रूप से की गई प्रतिक्रिया से परिस्थिति कभी संवरती नहीं है. हमें अपनी प्रवृत्ति में बदलाव लाना चाहिए विशेषतर तब जब हम परिस्थिति बदल नहीं सकते या परिस्थिति घट चुकी होती है. मन की शान्ति का यही रहस्य है.

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माँ के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: आदर

एक नन्हा बालक अपनी माँ के साथ रहता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बालक बहुत ही रूपवान और अत्यंत बुद्धिमान था. समय के साथ-साथ वह बालक और भी अधिक आकर्षक व तीव्रबुद्धि होता गया. परन्तु उसकी माँ हमेशा उदास रहती थी.

एक दिन बालक ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, तुम सदा उदास क्यों रहती हो?”
माँ ने उत्तर दिया, “बेटा, एक ज्योतिषी ने एक बार मुझसे कहा था कि जिनके दाँत तुम्हारे जैसे होते हैं वह जीवन में बहुत विख्यात होते हैं.”
इस पर बालक ने पूछा, “अगर मैं प्रसिद्ध हो जाऊँगा तो क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा?”
“अरे, मेरे बच्चे! ऐसी कौन सी माँ होगी जो अपने बच्चे को प्रसिद्ध देखकर खुश नहीं होगी. मैं तो यह सोचकर उदास रहती हूँ कि जब तुम प्रसिद्ध हो जाओगे तब तुम मुझे भूल जाओगे.”

माँ की बात सुनकर लड़का रोने लगा. वह कुछ देर माँ के सामने खड़ा रहा और फिर घर से बाहर भाग गया. बाहर जाकर उसने एक पत्थर उठाया और अपने दाँतों पर ज़ोर से मारकर आगे के २ दाँत तोड़ दिए. पत्थर के प्रहार से दाँत टूटने पर उसके मुँह से खून बहने लगा.

उसकी माँ भागकर बाहर आई और अपने पुत्र की हालत देखकर दंग रह गई. माँ ने पूछा, “बेटा! यह तुमने क्या किया?”
माँ का हाथ पकड़कर बालक बोला, “माँ, अगर इन दाँतों से तुम्हें कष्ट पहुँचता है और अगर यह तुम्हारी उदासी का कारण हैं तो मुझे यह दाँत नहीं चाहियें. यह मेरे किसी काम के नहीं हैं. मैं इन दाँतों से विख्यात नहीं होना चाहता. मैं आपकी सेवा करके और आपके आशीर्वाद से प्रसिद्ध होना चाहता हूँ.”

दोस्तों, यह बालक और कोई नहीं बल्कि चाणक्य था.

सीख:
माता-पिता व बड़ों का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. हमारे माता-पिता हमसे निस्स्वार्थ प्रेम करते हैं. जो भी अपने माता-पिता से प्रेम करता है, उनका सम्मान करता है और उनकी सेवा करता है उन्हें माता-पिता का आशीर्वाद प्रचुरता में मिलता है जिसकी बदौलत वह सदा खुश रहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना