साधु और राजा 

                                sadhusadhu1

            एक असामान्य महात्मा किसी जंगल में एक पेड़ के नीचे साधु के रूप में रहते थे और सदा अपने साथ तीन पत्थर रखते थे. सोते समय एक पत्थर वह अपने सिर के नीचे रखते थे, दूसरा अपनी कमर के नीचे और तीसरा अपने पैरों के नीचे रखते थे और स्वयं को चादर से ढकते थे. जब बारिश होती थी तो उनका शरीर पत्थरों पर होने के कारण, बारिश का पानी उनके शरीर के नीचे से बह जाता था और जो पानी उनकी चादर पर गिरता था वह भी नीचे बह जाता था. इसलिए उनकी नींद में विघ्न नहीं पड़ता था और वह गहरी नींद सोते थे. बैठते समय तीनों पत्थरों को एक साथ चूल्हे की तरह रखकर वह उनपर आराम से बैठते थे. इस प्रकार साँप और अन्य कीड़े-मकोड़े उन्हें परेशान नहीं करते थे क्योंकि वह पत्थरों के नीचे से रेंगकर निकल जाते थे. कोई उनके लिए खाना लेकर आता था और वह भोजन  कर लिया करते थे.  इस प्रकार उन्हें किसी प्रकार की चिंता नहीं थी.      

       इस जंगल में एक राजा शिकार खेलने आया. साधु को देखकर राजा ने सोचा, “बेचारा साधु! अपने शरीर को उन पत्थरों पर व्यवस्थित करके सोने में उसे कितनी पीड़ा होती होगी? मैं इसे अपने साथ राजमहल लेकर जाऊँगा और १-२ दिन अपने साथ रखकर आराम करवाऊँगा.”

  ऐसा सोचकर राजा घर लौटा और अपने २ सैनिकों को एक पालकी और धारकों के साथ जंगल भेज दिया. सैनिकों को निर्देश था कि वह साधु को सम्मानपूर्वक आमंत्रित करके राजा के महल में लेकर आएं. राजा ने सैनिकों से कहा कि यदि वह साधु को लाने में असफल रहे तो उन्हें दंडित किया जाएगा. 

     जंगल में आकर सैनिकों ने साधु को देखा और उन्हें बताया कि राजा ने उन्हें महल में लाने का आदेश दिया है. सैनिकों ने साधु से आग्रह किया कि वह उनके साथ चलें. जब साधु ने उनके साथ चलने में अरुचि दिखाई तो सैनिक प्रार्थना करते हुए बोले कि यदि वह उनके बिना लौटेंगे तो उन्हें दंड दिया जाएगा. अतः सैनिकों ने साधु से निवेदन किया कि उन्हें परेशानी से बचाने के लिए वह उनके साथ चलें. साधु नहीं चाहते थे कि उनके कारण सैनिक किसी मुसीबत में पड़ें और वह उनके साथ चलने के लिए सहमत हो गए.        

     सामान के नाम पर साधु के पास सिर्फ एक लंगोट, एक चादर और तीन पत्थर थे. उन्होंने लंगोट को तह करके चादर में रखा और तीनों पत्थरों को भी चादर में रखकर सबको एक साथ बाँध दिया. 

      सैनिकों ने सोचा, “यह क्या? राजा के महल में जाने के लिए यह स्वामी अपने साथ इन पत्थरों को लेकर आ रहा है? यह पागल है क्या?”

      साधु अपनी गठरी के साथ पालकी में बैठे और राजमहल आ गए. 

      साधु के सामान की गठरी देखकर राजा ने सोचा कि उसमें उनका निजी सामान होगा. उचित सम्मान के साथ राजा साधु को राजमहल के भीतर ले गया और साधु को शानदार भोजन कराया. साधु के सोने के लिए रेशम के गद्दे और चारपाई की व्यवस्था की गई. विश्राम करने के समय साधु ने अपनी गठरी खोली, तीनों पत्थर निकालकर बिस्तर पर फैलाए और हमेशा की तरह चादर ओढ़कर सो गए.

sadhu2

      अगली सुबह राजा साधु के कक्ष में आया, झुककर सादर प्रणाम किया और साधु से पूछा, “स्वामी, यहाँ आप आराम से तो हैं ना?”

      स्वामी: “हाँ! यहाँ क्या कमी हो सकती है? मैं सदैव खुश रहता हूँ.”

      राजा: “ऐसा नहीं है, स्वामी. जंगल में उन पत्थरों पर सोने के कारण आपको कष्ट हो रहा था. यहाँ यह घर और बिस्तर आपको ख़ुशी व आराम दे रहे होंगे. इसीलिए पूछ रहा हूँ.”

      स्वामी: “जो बिस्तर वहाँ था, वह यहाँ भी है. जो बिस्तर यहाँ है वह वहाँ पर भी है. अतः मैं हर जगह एक समान खुश रहता हूँ. मेरी नींद या ख़ुशी को लेकर कभी भी कोई कमी नहीं रहती है.”

       राजा बहुत हैरान था और उसने चारपाई की तरफ देखा. उसने देखा कि रेशम के कोमल बिस्तर पर तीन पत्थर थे. राजा ने तुरंत साधु को साष्टांग प्रणाम किया और बोला, “हे महापुरुष! मैं आपकी महानता से अनजान था और इस कारण आपको खुश करने के इरादे से यहाँ ले आया था.  मुझे पता नहीं था कि आप हमेशा ख़ुशी की स्थिति में रहते हैं और इस कारण मैंने ऐसा मूर्खतापूर्ण व्यवहार किया. कृपया मुझे क्षमा करके आशीर्वाद दीजिए.”

      इस प्रकार अपनी गलती की क्षतिपूर्ति करने के बाद राजा ने साधु को अपने रास्ते जाने की अनुमति दी. यह साधु की कहानी है.

      “तो महात्माओं की नज़र में स्वाधीन जीवन ही वास्तविक सुखी जीवन है? ” उस भक्त ने पूछा.

      “और क्या? इस तरह की बड़ी इमारतों में ज़िन्दगी कारागार के जीवन की तरह होती है. अंतर इतना है कि मैं एक “ए” श्रेणी का कैदी हो सकता हूँ. जब मैं इस तरह के गद्दों पर बैठता हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं नागफनी पर बैठा हुआ हूँ. शांति और आराम कहाँ है?” भगवान् बोले.    

      सारांश :

   मनुष्य संसार के कारण नहीं बल्कि समाज से अपनी अपेक्षाओं के कारण कष्ट भोगता है. हमारा मन पसंद व नापसंद से भरा रहता है और यदि हम संसार को उसके अनुरूप नहीं पाते हैं तो हम निराश हो जाते हैं. हम अपने दुःख के लिए संसार को दोषी ठहराते हैं. हम समझे बिना ही संसार का त्याग कर देते हैं और यह भूल जाते हैं कि परित्याग आंतरिक है. हमें संसार के बजाय मनस का त्याग करना चाहिए, जो दुःख से पूरित है. सादगी बाहरी नहीं बल्कि भीतरी होती है. यदि हम भीतर से सरल होंगे तो हम कहीं भी खुश रहेंगे. ऐसे मनुष्य को संसार त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं है. वह सदैव खुश रहता है क्योंकि यह ख़ुशी भीतर से आती है. ऐसा व्यक्ति संसार में रहता अवश्य है पर उससे जुड़ता नहीं है. 

    हममें से अधिकांश के लिए; यह हमारा अहंकार है जो हमारे रास्ते में आता है. यद्यपि हम बाहर से त्यागने की कोशिश करते हैं; हमारे भीतर का अहंकार कायम रहता है. संसार में बहुत ज़्यादा उलझने से हम संसार से जुड़ जाते हैं और फिर स्वयं को मुक्त करना आसान नहीं होता है. बाहरी बदलावों का प्रयास करने के बावजूद, भीतर से उस ‘वैराग्य’ को विकसित करना चुनौतीपूर्ण होता है. विवेक (वास्तविक व काल्पनिक में भेदभाव करने की क्षमता) से उत्पन्न वैराग्य निर्लिप्तता है. स्वयं को जानने के लिए निरंतर आध्यात्मिक अभ्यास ही हमें अनासक्त बनाता है. अतः स्वामी हमें पुनः याद दिलाते है कि अपने चंचल व मूर्ख मनस को अपने भीतर न कि बाहर की ओर अग्रसर करो.

sadhu4

source: http://www.saibalsanskaarhindi.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना              

             

  अपने उपदेश का पालन करना 

                   

          आदर्श: सत्य 

     उप आदर्श:  शब्दों, विचारों व कर्मों की एकता 

      संत हमें केवल वही सिखाते हैं जिसका उन्होंने स्वयं अभ्यास किया होता है. इसीलिए उनकी सलाह में हमारा भला करने की ताकत होती है. 

      महान गुरु रामकृष्ण परमहंस के अनुयायियों में एक गरीब महिला थी. एक दिन वह अपने बेटे के साथ गुरूजी के पास आई और बोली, “गुरुदेव, मेरा बेटा हर रोज़ मिठाई खाना चाहता है. यह आदत उसके दांत खराब कर रही है और मैं आर्थिक रूप से हर रोज़ मिठाई खरीदने में असमर्थ हूँ.  मेरी सलाह, चेतावनी और यहाँ तक कि पिटाई सब व्यर्थ रहे हैं. कृपया उसे हिदायत देकर आशीर्वाद दीजिए कि वह इस बुरी आदत को ख़त्म कर सके.

rkp

    श्री रामकृष्ण ने लड़के को देखा लेकिन उससे बात करने के बजाए, महिला से कहा कि वह उसे दो सप्ताह के बाद वापस लेकर आए. 

   दो सप्ताह के बाद, महिला लड़के को पुनः उनके पास लेकर आई. जैसे दोनों बैठे, श्री रामकृष्ण कृपापूर्वक लड़के को देखकर बोले, “मेरे प्रिय पुत्र, क्या यह सच है कि तुम हर रोज़ अपनी माँ को मिठाई के लिए परेशान करते हो?”

rkp1

   लड़के ने सिर झुकाकर कहा, “जी, गुरूजी, ” और चुप हो गया. 

   “तुम एक बुद्धिमान लड़के हो. तुम्हें पता है कि वह मिठाइयाँ तुम्हारे दाँतों को खराब कर रहीं है. तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए चिंतित है. अगर वह हर रोज़ मिठाई पर पैसे खर्च करती है तो वह तुम्हारे लिए नई किताबें और नए कपड़ें कैसे खरीदेगी? तुम्हें नहीं लगता कि तुम गलती कर रहे हो? “           

   श्री रामकृष्ण के शब्दों ने लड़के के दिल को छू लिया. उसने श्री रामकृष्ण को देखा और बोला, “जी, महाशय” और पुनः चुप हो गया. 

    “फिर तुम आज से मिठाई माँगना बंद कर दोगे?” श्री रामकृष्ण ने प्रभावशाली स्वर में पूछा.

     इस बार लड़का मुस्कुराया और बोला, “जी महाशय, मैं आज से माँ को मिठाई के लिए परेशान करना बंद कर दूँगा और मिठाई हर रोज़ नहीं खाऊँगा.”

     लड़के के उत्तर से प्रसन्न होकर श्री रामकृष्ण सप्रेम उसे अपने पास लाए और बोले, “मेरे बच्चे, तुम एक अच्छे लड़के हो. तुम समझते हो कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है. तुम यक़ीनन बड़े होकर एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति बनोगे.”

     लड़के ने झुककर श्री रामकृष्ण को प्रणाम किया और उसे आशीर्वाद देकर, गुरूजी अन्य भक्तों की ओर चले गए. 

  लड़के के बाहर बगीचे में जाने के बाद उसकी कृतज्ञ माँ ने श्री रामकृष्ण से पूछा, “गुरुदेव, सलाह के यह कुछ शब्द देने के लिए आपने हमें दो हफ्ते इंतज़ार क्यों करवाया?”

   श्री रामकृष्ण मुस्कुराये और बोले, “देखो, आप जब दो हफ्ते पहले आईं थी तब मुझे भी भक्तों द्वारा लाई मिठाई खाने की आदत थी. मैं आपके बेटे को कुछ ऐसा न करने के लिए कैसे कह सकता था जो मैं स्वयं लगभग हर रोज़ कर रहा था? ”

    इसलिए उस दिन से मैंने मिठाई खानी बंद कर दी. इससे मुझे काफ़ी शक्ति और ताकत मिली और मैं आपके पुत्र को वह करने का उपदेश दे पाया जो मैंने स्वयं किया था. 

rkp3

    हम जो उपदेश देते हैं, उसका पालन करने पर ही हमारे शब्द ईमानदारी से परिपूर्ण होते हैं और श्रोताओं को प्रभावित करते हैं. 

    कमरे में उपस्थित सभी भक्तों ने महसूस किया कि उन्होंने भी श्री रामकृष्ण से एक महान सबक सीखा था.   

      सीख:

    जैसा कि यह कहानी दर्शाती है, दूसरों को अच्छा बनाने या एक आध्यात्मिक अभ्यास कराने का सबसे प्रभावकारी तरीका स्वयं अभ्यास करके बताना है. दूसरों को उपदेश देने से पहले हममें दृढ़ विश्वास होना चाहिए और सही मूल्यों को व्यवहार में लाना चाहिए.

    विचार, शब्द और कर्म की एकता बहुत आवश्यक है. युवावस्था से ही इन विशेषताओं का विकास करना चाहिए. माता-पिता व शिक्षकों को उदाहरण बनकर नेतृत्व करना चाहिए. जब विचारों, शब्दों और कार्यों में सामंजस्य होता है तब कोई भ्रम या दिखावा नहीं होता है. अपने सही अस्तित्व से हटकर बनावटी व दोहरी ज़िन्दगी जीना आसान नहीं होता है. यद्यपि आरम्भ में ऐसे लोगों की मीठी बात सुनकर लोग बहल जाते हैं परन्तु दीर्घावधि में ऐसे लोगों को दूसरों का भरोसा व सम्मान नहीं मिलता है. इसके अलावा  ऐसे लोग स्वयं भी भीतर से शांत नहीं होते हैं क्योंकि वह भी दिव्य स्वरुप हैं और यह उन्हें सदा याद दिलाता है कि उनका कार्य उनके विचारों और शब्दों के अनुरूप नहीं है.            

     source: saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना 

        ज्ञान और सिद्ध

gyaan1

     कर्नाटक प्रदेश में प्रचलित लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक, प्रभुलिंग, आध्यात्मिक प्रवृत्ति के लोगों के उत्थान के लिए देश का भ्रमण कर रहे थे. भ्रमण के दौरान भारत के पश्चिमी तट पर हिन्दू तीर्थयात्रा के प्रसिद्द स्थान, गोकर्ण में वह प्रख्यात योगी गोरखनाथ से मिले. यद्यपि गोरखनाथ योगी को तत्त्वों पर अपनी असाधारण शक्तियों को लेकर गर्व था पर फिर भी उन्होंने प्रभुलिंग का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया. योगी ने प्रभुलिंग से मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त की और उनका स्वागत करते हुए उनसे पूछा कि वह कौन थे.       

    प्रभुलिंग ने उत्तर दिया कि वह कौन हैं, यह केवल वही जान सकता था जिसने अपने अहंकार, जड़ व शाखा, का विनाश करके स्वयं को पहचान लिया हो. वह अचम्भे में थे कि ऐसे तुच्छ व्यक्ति से क्या कहें जो अपने नश्वर शरीर से चिपका हुआ है. 

     गोरखनाथ, जो स्वयं की पहचान अपने शरीर से करते थे, ने उत्तर दिया, “केवल वही व्यक्ति मृत्यु से परे है जिसने शिव के अनुग्रह और गुलिक जैसी औषधीय जड़ी से अपने शरीर का अमरत्व हासिल किया हो. अतः जिसने ऐसा अमरत्व प्राप्त नहीं किया है, वह मर जाता है.”

     गोरखनाथ की बात सुनकर प्रभुलिंग ने टिप्पणी की कि वास्तविक ज्ञान, आत्म को साकार करने में निहित है न कि शरीर को अमर बनाने में. उन्होंने सविस्तार समझाया कि शरीर वास्तविक आत्म नहीं हो सकता है.

    परन्तु गोरखनाथ को विश्वास दिलाना असंभव था और वह अपने मत से टस से मस नहीं हुए. प्रभुलिंग को एक लम्बी, उज्जवल व तेज़ तलवार सौंपते हुए योगी ने उन्हें गर्व से चुनौती दी कि वह उनका शरीर काटने का प्रयास करें. गोरखनाथ के शरीर पर जब तलवार से प्रहार हुआ तो उन्हें कोई चोट नहीं आई बल्कि वह तलवार नष्ट हो गयी. 

gyaan2

      प्रभुलिंग ने आश्चर्यचकित होने का स्वांग करते हुए गोरखनाथ से अपना शरीर काटने का प्रयास करने के लिए कहा. शुरू में गोरखनाथ यह कहते हुए हिचकिचाए कि प्रभुलिंग की मृत्यु हो जाएगी लेकिन प्रभुलिंग के ज़ोर डालने पर उन्होंने तलवार उठाई और प्रभुलिंग के शरीर को काटने की कोशिश की. गोरखनाथ को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि प्रभुलिंग को किसी भी प्रकार प्रभावित किये बिना वह तलवार उनके शरीर से इस प्रकार गुज़री मानो वह शून्य से गुज़र रही हो.

    गोरखनाथ, जो एक सिद्ध पुरुष थे, इस घटना के बाद ही प्रभुलिंग, जो ज्ञान स्वरुप थे, की श्रेष्ठता को स्वीकार करने के लिए राज़ी हुए. इस प्रकार उनका अभिमान टूटा और तब उन्होंने प्रभुलिंग से उन्हें सच्चाई सिखाने की याचना की. प्रभुलिंग ने गोरखनाथ को ब्रह्म-विद्या की व्याख्या इस प्रकार की: “गोरखनाथ, अपने शरीर को अपना मत समझो. अन्तर्निवासी(गुफा-निवासी) की तलाश करो और तुम जन्म एवं मृत्यु के रोग से हमेशा के लिए छुटकारा पा लोगे. यह गुफा तुम्हारा हृदय ही है; उसमें निवास करने वाला भगवान कहलाता है और मैं वह हूँ.”

     सारांश :

  वेदों के दो भाग हैं- विधि-विधान सम्बंधित यानि कर्म कांड और बोध भाग यानि ज्ञान कांड. कर्म कांड अनुशासन को प्रकाशित करता है परन्तु सम्पूर्ण समझ केवल कर्म कांड से नहीं होती है. जब अनुष्ठान, समझ और ज्ञान से समर्थित नहीं होते हैं तब वह निरर्थक हो जाते हैं. 

  अभ्यास एक आवश्यक होता है और एक अमुख्य. धार्मिक संस्कार जैसे अमुख्य अभ्यास, मनुष्य को अनुशासन, विश्वास और वैराग्य से सन्नद्ध करते हैं. यह चित्त की शुद्धि के लिए अनिवार्य हैं लेकिन सच्चे ज्ञान की खोज वास्तविक मूलभूत अभ्यास है. सच्चा ज्ञान, आत्म का ज्ञान है. मल, विक्षेप और आवरण, अहंकार के रूप में सत्य को छिपाकर असत्य को व्यक्त करते हैं.  इस कारण   हम बाहरी बनावटी संसार में फंस जाते हैं परन्तु जब तक हम इससे बाहर नहीं निकलेंगे; हमें आत्म का ज्ञान नहीं होगा.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक- अर्चना 

    अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक है 

 

         आदर्श: सत्य 

     उप आदर्श: सच व झूठ का भेद करना 

    एक शिक्षक का एक शिष्य था जिसने न कभी गाय देखी थी न ही कभी उसके दूध का आस्वादन किया था. लेकिन उसने ऐसा पढ़ा था कि गाय का दूध बहुत पौष्टिक होता है और इस कारण वह गाय देखने और उसका दूध चखने के लिए उत्सुक था. वह अपने गुरु के पास गया और उनसे पूछा, “क्या आप गायों के बारे में जानते हैं? ”

     “हाँ “, गुरु ने उत्तर दिया.

      शिष्य ने अनुरोध किया, “तो क्या आप मुझे समझाएंगे कि एक गाय कैसी दिखती है?”

gaay1     

      गुरु ने बतलाया, “एक गाय के चार पैर होते हैं, वह एक पालतू  जानवर है. वह जंगल में नहीं रहती है, उसे गाँवों में पाया जाता है. गाय दूध देती है जो सफ़ेद रंग का तरल होता है और स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है.” गुरु ने उसे गाय की विशेषताओं के बारे में और भी बहुत सारी  जानकारी दी: जैसे कि उसकी आँखें, कान, पेट, थन व सींग .

      कुछ समय बाद शिष्य एक गाँव में गया जहाँ उसने गाय की प्रतिमा देखी. गाय की प्रतिमा के पास किसी व्यक्ति ने, जो पास वाली परिसर की दीवार पर चूने से रंग चढ़ा रहा था, चूने के पानी से भरी एक बाल्टी रखी हुई थी. शिष्य ने गाय को देखा, उसकी विशेषताओं पर ग़ौर से विचार किया और निष्कर्ष पर पहुँचा कि वह गाय ही होगी. उसने पास ही बाल्टी में सफ़ेद तरल भी देखा और सोचा, “यह निश्चित ही गाय है और इसलिए बाल्टी में दूध ही होगा.”

gaay2gaay3

     ऐसा सोचकर उसने बाल्टी में से थोड़ा सा तरल पी लिया. जल्द ही वह दर्द से चिल्लाने लगा और उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा.

     गुरु उससे मिलने अस्पताल गए और पूछा, “क्या हुआ? ”

    “गुरूजी, आप बिलकुल गलत थे, आप गायों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं” , शिष्य ने उत्तर दिया.

     “मुझे बताओ कि क्या हुआ” , गुरु ने स्पष्टीकरण माँगा. 

      शिष्य ने सब कुछ विस्तार से बताया. 

      गुरु ने पूछा, “क्या तुमने स्वयं गाय का दूध निकाला था?”

       “नहीं” .

      “इसीलिए तुम मुसीबत में हो. यदि तुम दूसरों के कथन पर आँख मूंदकर भरोसा करोगे, तुम उस सत्य तक कभी नहीं पहुँच पाओगे जो तुम्हें मुक्त कर सकता है” , ज्ञानी गुरु ने शिष्य को समझाया.

     सीख:

     हमें केवल ज्ञान प्राप्त व दूसरों को अंधाधुन्द अनुसरण नहीं करना चाहिए बल्कि अनुभव भी करना चाहिए. भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुभव सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है. 

     विद्यार्थी विद्यालय से बहुत सारा किताबी ज्ञान प्राप्त करते हैं और अच्छे अंकों से परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं. ज्ञान तो अनेकों हासिल करते हैं लेकिन केवल कुछ ही इसे व्यावहारिक रूप में प्रयोग कर पाते हैं. हमारे द्वारा हासिल किया गया ज्ञान किस प्रकार काम करता है; इसे वास्तव में समझने के लिए अनुभव व क्रियात्मक काम करना अत्यधिक आवश्यक है. 

    आम जैसे फल की व्याख्या में बस इतना कहना कि वह एक खूबसूरत सुनहरा पीले रंग का फल है जो शहद से अधिक मीठा है और जिसकी अद्भुत खुशबू है, उस व्यक्ति के लिए सहायक नहीं है जिसने उसे कभी नहीं चखा है. इस स्वादिष्ट फल का अनुभव केवल इसे खाने पर ही हो सकता है. इसी प्रकार सभी आदर्शों को बिना अभ्यास किए केवल पढ़ना व जानना पर्याप्त नहीं है. 

     प्रेम, करुणा व दया से पूर्ण कार्यों को जब समाज में व्यवहार में लाया जाता है तो इस प्रकार की सेवा से प्राप्त आनंद व ख़ुशी असीमित होती है. यह सच्चे आनंद के उदाहरणों में से एक है. जब हम अच्छे विचारों, शब्दों व कार्यों के माध्यम से अपने मन और चित को शुद्ध करने में लगातार लगे रहते हैं तो एक दिन हम अपने वास्तविक स्वरुप को समझने में सक्षम होंगे जो सत चित्त आनंद है- सत्य, चेतना और आनंद.   

 source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

      अनुवादक- अर्चना       

         गुरु- अज्ञानता दूर करने वाले 

dhaum2

         आदर्श: उचित आचरण 

    उप आदर्श:  सम्मान 

          गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः 

          गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ||

       गुरुर्ब्रह्मा : गुरु ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के समान होता है|

      गुरुर्विष्णु : गुरु विष्णु (संरक्षक) के समान होता है|

       गुरुदेवो  : गुरु महेश्वर (ध्वंसक) के समान होता है|

  गुरुः साक्षात : सच्चे गुरु (वास्तव में) हमारी आँखों के सामने 

       पर ब्रह्म  : सर्वोच्च वास्तविकता 

          तस्मै   : केवल उसी को 

    गुरुवे नमः   : केवल उस सच्चे गुरु को मैं नमन करता हूँ; 

                     “गुरु” –   गु: अंधकार    रु: हटाने वाला 

    एक समय किसी ख़ूबसूरत जंगल में एक आश्रम था. वहाँ महान ऋषि धौम्य अपने शिष्यों के साथ रहते थे. एक दिन उपमन्यु नामक एक हृष्ट-पुष्ट बालक आश्रम आया. वह गन्दा व मैला दिख रहा था. बालक ने महान ऋषि धौम्य को प्रणाम किया और स्वयं को ऋषि का छात्र स्वीकार करने की विनती की.

     प्राचीन समय के गुरुकुल दिनों में गुरु निश्चित करते थे: यदि कोई छात्र जीवन के वास्तविक मूल्यों व सभी में भगवान् को देखने के साथ प्रशिक्षित व शिक्षित होने के लिए गुरुकुल में स्वीकार किये जाने के वास्ते उपयुक्त था या नहीं.

     धौम्य ऋषि ने इस भारी-भरकम बालक को गुरुकुल में स्वीकृत करने का निश्चय किया. यद्यपि उपमन्यु सुस्त व मोटी बुद्धि का था, विद्वान् गुरु ने इस बात का ध्यान रखा कि उसे गुरुकुल के बाकी छात्रों, जो शायद उससे अधिक तीव्रबुद्धि के थे, के साथ शामिल किया जा रहा था. उपमन्यु ने अपनी शिक्षा में अधिक रूचि नहीं दिखाई. वह न तो शास्त्रों को समझ सकता था और न ही उन्हें याद कर सकता था. वह अवज्ञाकारी था और उसमें कई अच्छे गुणों का अभाव था.      

       धौम्य ऋषि, एक प्रबुद्ध आत्मा व दक्ष शिक्षक, उपमन्यु को उसकी कमज़ोरियों के बावजूद प्रेम करते थे. ऋषि उसे अपने अन्य होशियार छात्रों से भी अधिक प्रेम करते थे. जल्द ही उपमन्यु भी अपने गुरु, धौम्य ऋषि, के प्रति अपने प्रेम का प्रतिदान करने लगा. अब वह अपने गुरु के लिए कुछ भी करने को तैयार था. गुरु को अहसास हुआ कि उपमन्यु अपनी लोलुपता के कारण मंदबुद्धि था. 

        अत्याहार या लोलुपता, छात्रों में बुरा स्वास्थ्य और उनींदापन उत्पन्न करता है. ऐसे छात्र न तो सतर्क रहते हैं और न ही स्पष्टता से सोच पाते हैं. वास्तव में इस प्रकार का अतिभोग “बुद्धि की मंदता या तमोगुण” का कारण होता है. एक गुरु के रूप में धौम्य ऋषि चाहते थे कि उनके सभी छात्र अपना शरीर बरकरार रखने के लिए जितना भोजन अनिवार्य था उतना ही खाएं अर्थात जीने के लिए खाएं, खाने के लिए न जीएं और जीभ नामक ४ इंच के निरंकुश शासक को नियंत्रण में रखें.  

    उपमन्यु को सुधारने के उद्देश्य से धौम्य ऋषि ने उसे आश्रम की गायों की देख-भाल करने का काम दिया. उपमन्यु का काम था कि तड़के गायों को चराने लेकर जाना और संध्याकाल उन्हें वापस लेकर आना. ऋषि की पत्नी हर रोज़ उपमन्यु के लिए दोपहर का भोजन बाँधकर देतीं थी. 

dhaum6

   लेकिन हृष्ट-पुष्ट उपमन्यु की भूख बहुत बलवान थी. दोपहर के भोजन के बाद भी उसे बहुत भूख लगती थी और अपनी भूख शांत करने के लिए वह कुछ गायों का दूध निकालकर पी जाता था. धौम्य ऋषि ने ध्यान दिया कि उपमन्यु और अधिक मोटा हो रहा था. वह चकित थे कि गायों के साथ चारागाह तक चलने व सामान्य भोजन के बावजूद भी उपमन्यु पतला नहीं हो रहा था. इस विषय में उपमन्यु से प्रश्न करने पर उसने सच्चाई से जवाब देते हुए बताया कि वह गाय का दूध पी रहा था. तब धौम्य ऋषि ने उपमन्यु को आदेश दिया कि वह दूध न पीये क्योंकि गायें उसकी नहीं थीं. ऋषि ने उपमन्यु को समझाते हुए कहा कि गुरु की अनुमति के बिना वह दूध नहीं पी सकता था. 

    यद्यपि उपमन्यु अपने गुरु के आदेश का पालन करने के लिए सहज ही सहमत हो गया पर अपनी असंतुष्ट भूख को लेकर अभी भी व्यथित था. उपमन्यु ने देखा कि बछड़ों के अपनी माताओं के स्तन से दूध पीते समय दूध की कुछ बूँदें गिर जातीं थी. उसने अपनी हथेलिओं को प्याले के आकार का बनाकर दूध एकत्रित करना आरम्भ किया और फिर वह इस दूध को पीने लगा.  

    धौम्य ऋषि, जिनकी नज़र लगातार उपमन्यु पर थी, ने पाया कि बालक का वज़न अभी भी कम नहीं हो रहा था. उन्होंने एक बार फिर उपमन्यु से प्रश्न किया और सत्य सामने आया. धौम्य ऋषि ने उसे धीरता से समझाया कि बछड़ों के मुँह से गिरने वाला दूध अशुद्ध होता है अतः ऐसे दूध को पीना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता था. उपमन्यु ने वचन दिया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा. 

    इन सभी घटनाओं के बावजूद उपमन्यु अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था. एक दोपहर गायों को चराते हुए उसने एक पेड़ पर कुछ फल देखे और उसने वह फल खा लिए. अफ़सोस! वह फल जहरीले थे और उनका सेवन करने से वह अंधा हो गया. आश्रम लौटने का रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश करते हुए, भयभीत व अंधा उपमन्यु, ठोकर खाकर एक गहरे कुँए में गिर गया. 

    संध्याकाल जब गायें उपमन्यु के बिना घर लौटीं तो धौम्य ऋषि को अहसास हुआ कि कुछ गलत था और वह उपमन्यु की खोज में निकल पड़े. उन्हें उपमन्यु एक कुँए में गिरा दिखा और उन्होंने सावधानी व अत्यंत परिश्रम से उसे बाहर निकाला. इस भीषण अवस्था में उपमन्यु के प्रति करुणा से परिपूर्ण ऋषि ने उसे जुड़वां बच्चों, अश्विनी कुमारों, का आह्वान करने का मन्त्र सिखाया. अश्विनी कुमार स्वर्गिक चिकित्सक थे और मन्त्रों की जाप से वह दोनों प्रकट हुए और उन्होंने उपमन्यु की दृष्टि पुनः स्थापित कर दी.  

dhaum3

  अत्यंत धीरता से धौम्य ऋषि ने उपमन्यु को विशिष्ट रूप से समझाया कि किस प्रकार भोजन की इच्छा ने उसे वह फल खाने पर बाध्य किया था जो जहरीले थे और उसके अंधेपन का कारण थे. ऋषि ने उसे यह भी समझाया कि यदि समय पर उसका बचाव नहीं होता तो कुँए में उसकी मृत्यु भी हो सकती थी. आखिरकार उपमन्यु को अपनी गलती की गंभीरता स्पष्ट हुई और उसने अत्याहार का त्याग कर दिया. फिर वह जल्द ही तंदुरुस्त व स्वस्थ बनने के साथ-साथ बुद्धिमान व चतुर भी हो गया. 

    धौम्य ऋषि ने उपमन्यु के हृदय में गुरु के प्रति प्रेम उत्पन्न किया अतः गुरु ने ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता, का कार्य किया.

    ऋषि ने अपनी प्रेमपूर्ण सलाह से उपमन्यु की रक्षा की और उसे कुँए में मरने से बचाया, इस लिए गुरु ने विष्णु, रक्षक, का किरदार निभाया.

    अंत में गुरु ने उपमन्यु की लालच नष्ट करके महेश्वर का काम किया, जो बुरे गुणों के नाशक हैं.

dhaum5

     सीख: 

     गुरु/ शिक्षक वह होता है जो हमें सही आदर्श सिखाता है और सही मार्ग की ओर पथप्रदर्शन करता है. अपने शिक्षक के प्रति सदैव सम्मान व कृतज्ञता प्रदर्शित करनी चाहिए. 

    विधिशास्त्र व पवित्र ग्रंथों की सही समझ आवश्यक है. छात्रों को आदर्श, संस्कृति व विधिशास्त्र सिखाते समय, गुरु व शिक्षक को उदाहरण के माध्यम से निर्देशन करना चाहिए. ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए न कि केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए. एकाग्रता व मन की स्थिरता का विकास करने के लिए मौन बैठना आवश्यक है.  शिक्षक को दीपक जलाने जैसे अनुष्ठानों के महत्व को प्रकाश द्वारा अन्धकार को दूर करना और नकारात्मकता का सकरात्मक विचारों द्वारा दूर करने के उदाहरण से समझना चाहिए. ईश्वर से प्रेम करना न कि डरना सिखाना चाहिए. इस प्रकार गुरु छात्रों में अच्छे संस्कारों के बीज बोते हैं जो बाद में सही समय आने पर आध्यात्मिक मार्ग में मदद करते हैं. अतः एक सही शिक्षक या गुरु छात्रों का सही पथ पर मार्गप्रदर्शन करने में बहुत अधिक सहायक सिद्ध होते हैं.

dhaum4

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना   

         विट्ठोबा और नामदेव 

namdev2

   विट्ठोबा ने पाया कि नामदेव को अभी तक सर्वोच्च सत्य का अहसास नहीं हुआ था और वह नामदेव को सिखलाना चाहते थे. जब ज्ञानेश्वर और नामदेव तीर्थयात्रा से वापस लौटे तो गोरा कुंभार ने सभी संतों को अपने घर एक भोज पर आमंत्रित किया. अतिथियों में ज्ञानेश्वर और नामदेव भी थे. गोरा के साथ योजना बनाकर प्रीतिभोज में ज्ञानेश्वर गोरा से खुलेआम बोले, “तुम एक कुम्हार हो, रोज़ाना मटके बनाने में व्यस्त रहते हो और फिर उनकी जाँच करते हो कि वह सही प्रकार से सूखकर तैयार हुए हैं या नहीं.

namdev3

  तुम्हारे सामने यह मटके (अर्थात संत) ब्रह्मा के मटके हैं. देखो इनमें से कौन से मजबूत व ठोस हैं और कौन से नहीं.”

  इस पर गोरा बोला, ” जी स्वामी, मैं अभी जाँच करता हूँ. ऐसा कहकर गोरा ने वह छड़ी उठाई जिसे वह अपने मटकों की मजबूती जांचने हेतु उनको थपथपाने के लिए प्रयोग करता था. छड़ी हाथ में लेकर वह प्रत्येक मेहमान के पास गया और हर एक के सिर पर थपथपाने लगा जैसा कि वह आमतौर पर अपने मटकों पर करता था. प्रत्येक मेहमान से इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया. परन्तु गोरा जब नामदेव के पास गया तो नामदेव क्रोध से चिल्लाया, “अरे कुम्हार, मुझे उसे छड़ी से थपथपाने से क्या मतलब है तुम्हारा?”

इस पर गोरा ज्ञानेश्वर से बोला, “स्वामी, अन्य सभी मटके ठीक से सूखकर ठोस बन चुके हैं. सिर्फ यह (यानि नामदेव) अभी तक ठीक से तैयार नहीं है.”

  सभी एकत्रित मेहमान हँसी से फूट पड़े.    

नामदेव ने बहुत ही अपमानित महसूस किया और भागकर विट्ठल (जिस देवता की वह पूजा करता था) के पास गया. विट्ठल से namdev1नामदेव की घनिष्ट मित्रता थी और वह उनके साथ खेलता था, खाना खाता था और सोता था. नामदेव ने विट्ठल से अपने अपमान की शिकायत की जो विट्ठल के सबसे करीबी दोस्त व साथी के साथ हुआ था. यद्यपि विट्ठल को सब कुछ पता था पर फिर भी उन्होंने नामदेव के साथ सहानुभूति रखने का ढोंग किया और गोरा के घर हुई सभी घटनाओं का विवरण पूछा. सब सुनने के बाद विट्ठल बोले, “अन्य सभी मेहमानों की तरह चुप रहकर तुमने भी क्यों नहीं थपथपाहट स्वीकार कर ली? यह सारी मुसीबत इसी कारण आई है.” 

 नामदेव और अधिक ज़ोर से रोते हुए बोले, “दूसरों की तरह आप भी मुझे अपमानित करना चाहते हैं. औरों की तरह मुझे भी क्यों झुकना चाहिए था? क्या मैं आपका निकटतम मित्र, आपका बच्चा नहीं हूँ?”

 विट्ठल बोले, “तुमने अभी तक सत्य को ठीक से समझा नहीं है और यदि मैं बताऊँगा तो तुम समझोगे नहीं. लेकिन अमुक जंगल में एक संत के पास जाओ जो एक जर्जर मंदिर में रहता है. वह तुमको आत्म ज्ञान दे पाएगा.”   

   विट्ठल के कहेनुसार नामदेव उस मंदिर में गया और एक वृद्ध व सहज व्यक्ति को एक कोने में शिवलिंग पर पैर रखकर सोते हुए पाया. नामदेव को विश्वास नहीं हुआ कि यही वह व्यक्ति था जो उसे- विट्ठल के साथी- आत्मज्ञान देने वाला था. चूँकि वहाँ और कोई नहीं था, नामदेव उस व्यक्ति के पास गया और ताली बजाई. वृद्ध व्यक्ति झटके से उठा और नामदेव को देखकर बोला, “ओह- तुम नामदेव हो न जिसे विट्ठल ने भेजा है. आओ.”

   नामदेव हक्का-बक्का रह गया और सोचने लगा, “यह अवश्य ही महान व्यक्ति होगा.” 

   फिर भी उसे लगा कि कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, एक शिवलिंग पर पैर रखना द्रोही होने के बराबर है. उसने बूढ़े व्यक्ति से पूछा, “तुम एक श्रेष्ठ पुरुष लगते हो. लेकिन एक शिवलिंग पर पैर रखना क्या तुम्हारे लिए उचित है?”

    वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया, “ओह! क्या मेरे पैर शिवलिंग पैर हैं? कहाँ हैं? कृपया मेरे पैरों को कहीं और हटा दो.”

   नामदेव ने वृद्ध व्यक्ति के पैर शिवलिंग से हटाकर विभिन्न स्थानों पर रखने की चेष्टा की. परन्तु जहाँ भी पैरों को रखा, शिवलिंग वहीँ था. अंततः उसने पैरों को अपनी गोद में रखा और वह स्वयं ही शिवलिंग बन गया. तब उसे सच्चाई का अहसास हुआ और वृद्ध सज्जन बोले, “अब तुम वापस जा सकते हो.”

    सारांश:

   इस कहानी में ध्यान देने वाली बात यह है कि नामदेव का ज्ञानोदय केवल तभी हुआ जब उसने आत्मसमर्पण किया और अपने गुरु के चरण स्पर्श किए. नामदेव की ऐसी आदत थी कि वह प्रतिदिन न केवल विट्ठल से मिलने जाते था बल्कि अपना अधिकतम समय विट्ठल के साथ मंदिर में व्यतीत करता था. लेकिन इस अंतिम प्रबोधन के बाद नामदेव घर लौटा और कुछ दिनों तक विट्ठल के पास मंदिर नहीं गया.  इस कारण विट्ठल नामदेव के घर गए और बहुत भोलेपन से पूछा कि यह कैसे संभव था कि वह विट्ठल को भूल गया था और उनसे मिलने नहीं जा रहा था. नामदेव ने उत्तर दिया, “अब मुझे और बुद्धू नहीं बनाओ. अब मैं जान गया हूँ. ऐसी कौन सी जगह है जहाँ आप नहीं हो! आपके साथ रहने के लिए, क्या मुझे मंदिर जाने की ज़रुरत है? मेरा अस्तित्व क्या आपसे अलग है?”   

namdev9

 तब विट्ठल बोले, “तो अब तुम सत्य को समझते हो. इसीलिए मुझे तुम्हें इस अंतिम सीख के लिए भेजना पड़ा था.”

  तीर्थयात्रा, धर्मदान, शास्त्रों का अध्ययन जैसे बाहरी अनुष्ठान मनुष्य को अनुशासन, विश्वास व धैर्य से सन्नद्ध करते हैं जो चित्त की शुद्धि के लिए आवश्यक हैं लेकिन वास्तविक अनिवार्य अभ्यास सच्चा ज्ञान है जिसके लिए मनुष्य को स्वयं को जानने की आवश्यकता है. जो स्वयं को जानता है वह मिथ्या भ्रम से बंधता नहीं है. अज्ञानी व्यक्ति अहंकार से घिरे रहते हैं. अहंकार एक आत्म विकल्प है न कि वास्तविक आत्म. अहंकार ईश्वर को हमसे दूर रखता है. चूँकि हम अपनी वास्तविक अवस्था से परिचित नहीं हैं, इसलिए हममें अहंकार उपस्थित है. सच्चे स्व की अनुपस्थिति बनावटी स्वयं की रचना करता है. 

   हम बाहर से कितने भी अच्छे क्यों न हों; यदि हम अभी भी भीतर से अहंकार से घिरे हैं तो हमारे अंदर इच्छाएँ उत्पन्न होती रहेंगी. गुरु कहते हैं; हमें इस पर अवश्य कार्य करना चाहिए और अपने बनावटी स्वयं से बाहर आकर अपने स्वाभाविक स्व का विकास करना चाहिए.  अरे मूर्ख मन; गोविन्द की तलाश करो!

namdev5namdev6

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना 

      आनंद भीतर से आता है 

 

          आदर्श: उचित आचरण 

      उप आदर्श:  सही मनोभाव 

             एक ज़ेन सन्यासी छोटे से गाँव में गए. ग्रामवासी उनके आसपास एकत्रित हुए और उनके समक्ष अपने अनुरोध रखते हुए विनम्रता से बोले, “प्रिय महोदय, हमारी समस्याओं से छुटकारा पाने में कृपया हमारी सहायता करें; हमारी इच्छाओं को पूर्ण होने दीजिये- केवल तभी हमारा जीवन आनंद से परिपूर्ण होगा.”

oracle6oracle7

           महंत ने शांतिपूर्वक उनकी बात सुनी. अगले दिन वह एक देववाणी होने के लिए सहमत हो हुए. देववाणी एक आवाज़ का जरिया होता है जिसके द्वारा ईश्वर सलाह या भविष्यवाणी करते हैं. 

oracle1

          “कल दोपहर इस गाँव में एक चमत्कार होने वाला है. अपनी समस्त समस्याओं को एक काल्पनिक बोरी में बाँधकर नदी के पार ले जाओ और वहाँ छोड़ आओ. फिर उसी काल्पनिक बोरी में वह सब डालो जो तुम चाहते हो जैसे कि सोना, जवाहरात, अन्न और उसे घर ले जाओ. ऐसा करने से तुम्हारी इच्छाएँ वास्तविकता में बदल जाएंगी.” 

           ग्रामवासी संशय में थे कि यह भविष्यवाणी सत्य थी या नहीं. मगर स्वर्ग से आई आवाज़ ने उन्हें चकित कर दिया था. सब ने आपस में विचार-विमर्श करने के बाद फैसला किया कि निर्देश का पालन करने से उन्हें कोई हानि नहीं होगी. यदि वह भविष्यवाणी सत्य थी तो जो वह चाहते थे, वह उन्हें वास्तव में मिलेगा और यदि वह असत्य थी तो भी कोई बड़ी बात नहीं थी. अतः जैसा उन्हें बताया गया था उन्होंने वैसा ही करने का फैसला किया. 

         अगले दिन दोपहर में सभी गाँव वालों ने अपनी परेशानियों को एक काल्पनिक बोरी में डाला और नदी के उस पार जाकर छोड़ आए. परेशानियों के बदले सब वह वापस लेकर आए जो उनकी समझ में खुशियों का कारण था जैसे कि सोना, गाड़ी, घर, गहने व हीरे.

oracle2oracle3

       घर लौटने पर सभी ग्रामवासी अवाक थे. भविष्यवक्ता ने जो भी कहा था वह सच हो गया था. जिस व्यक्ति को गाड़ी चाहिए थी, उसे अपने घर के बाहर गाड़ी खड़ी मिली. जिसने आलीशान घर की कामना की थी उसने पाया कि उसका घर महल में बदल गया था. सभी अत्यधिक प्रसन्न थे. उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.   

लेकिन अफ़सोस! आनंद और उत्सव-काल कुछ समय तक ही चला. जब वह स्वयं की तुलना अपने पड़ोसियों से करने लगे तो सभी को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनका पड़ोसी उनसे अधिक खुश व अमीर था. सभी एक दूसरे से अधिक विवरण जानने के लिए खोद-खोदकर बातें करने लगे. जल्द ही उनका हर्ष और आनंद, पछतावे व अफ़सोस में बदल गया.

    “मैंने एक साधारण सी माला की अपेक्षा की थी जबकि मेरे पड़ोस की लड़की ने सोने के एक अलंकृत हार की माँग की थी और उसे वह मिल गया. मैंने केवल एक घर का ही निवेदन किया था लेकिन विपरीत घर में रहने वाले व्यक्ति ने एक महल की प्रार्थना की थी. हमें भी इस प्रकार की चीज़ों की याचना करनी चाहिए थी. इतना अनोखा अवसर था; जीवन भर का सुनहरा मौका था. हमने अपने मूर्खता से इसे जाने दिया.” 

 इस प्रकार के विचार सभी गाँव वालों को परेशान कर रहे थे. अतः एक बार पुनः सभी ग्राम वासी महंत के पास गए और उनके समक्ष अपनी शिकायतों का ढेर लगाया. सारा गाँव एक बार फिर निराशा व असंतोष में डूब गया. 

     सीख:

    बहुतों को लगता है कि अगर उन्हें परेशानियाँ होंगी तो वह खुश नहीं रह पाएंगे. लेकिन हमें अपनी खुशियों को समस्याओं से नहीं जोड़ना चाहिए. परेशानियाँ हर किसी के जीवन में होती हैं. हमें स्वयं से यह कहना चाहिए, मैं प्रसन्नचित्त बना रहूँगा और हँसमुख रहूँगा. इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें परेशानियों को सुलझाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए.  

oracle4

    बालावस्था से ही प्रार्थना करना, मौन बैठना, सहानुभूति जैसे गुणों का विकास और सेवाभाव में कुछ समय बिताना अति आवश्यक है. हम जो युवावस्था में नहीं सीख सकते उसे बड़ी उम्र में सीखना बहुत कठिन होता है. हम युवावस्था में सांसारिक कामकाज में तल्लीन रहते हैं और इस प्रकार की गतिविधियों को हम बाद की उम्र के लिए स्थगित करते रहते हैं. अपने कर्तव्यों का पालन करना और भौतिक संसार में अपने सपने पूरा करने की कोशिश करना अवश्य ही महत्वपूर्ण है परन्तु युवावस्था से ही अपने आध्यात्मिक पक्ष को विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है. आध्यात्मिकता को अपने जीवन का हिस्सा बनाने से वृद्धावस्था में हम स्वयं को सँभालने में बेहतर सक्षम रहेंगे और एक सार्थक व शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर पाएंगे.

http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना