ध्यान रखने वाला बेटा

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       आदर्श: उचित आचरण 

   उप आदर्श: सम्मान, प्रेम 

    एक बेटा अपनी बूढ़ी माँ को एक शाम खाने के लिए रेस्टोरेंट ले गया. माँ बुज़ुर्ग व कमज़ोर थी और इस कारण खाना खाते समय उससे खाना उसके कपड़ों पर गिर गया. अन्य भोजन करने वाले लोग उसे घृणापूर्ण निगाहों से देखने लगे पर पुत्र शांत था.

    माँ ने जब खाना ख़त्म कर लिया तब बेटा बिलकुल भी लज्जित नहीं था.वह माँ को धीरे से शौचघर ले गया, उसके कपड़ों से खाने के कण पोंछे, दाग साफ़ किए, उसके बाल ठीक किए और उसे चश्मा ठीक से पहनाया. जब माँ और बेटा शौचघर से बाहर निकले तो समस्त रेस्टोरेंट उन्हें अचूक ख़ामोशी से देख रहा था. वहाँ मौजूद सभी लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि इस प्रकार खुले आम कोई स्वयं को कैसे लज्जित कर सकता है.

 पुत्र ने बिल का भुगतान किया और माँ के साथ बाहर जाने लगा. 

 तभी भोजन करने वालों में से एक वृद्ध पुरुष ने बेटे को बुलाया और उससे पूछा, “तुम्हें नहीं लगता कि तुम कुछ छोड़कर जा रहे हो?”

   पुत्र ने उत्तर दिया, “नहीं महाशय! ”

  वृद्ध पुरुष ने प्रत्त्युतर दिया, “हाँ, तुमने छोड़ा है. तुमने प्रत्येक पुत्र के लिए एक सीख और हर माँ के लिए उम्मीद छोड़ी है.”

   रेस्टोरेंट में सन्नाटा छा गया.

    सीख:

  जब हमारे माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं तब हमें उन्हें भूलना नहीं चाहिए. हमें उनके रूप व व्यवहार को लेकर कभी भी शर्मिंदा नहीं होना चाहिए. हमें हमारे माता-पिता, खासतौर से माँ, के समान कोई भी और निस्स्वार्थ भाव से प्यार नहीं कर सकता है. हमें सदा उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और उन्हें प्रेम व सम्मान देना चाहिए.

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  अनुवादक- अर्चना    

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      गुरु का प्रिय 

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        आदर्श: उचित आचरण

    उप आदर्श: सकारात्मकता, प्रभु को समर्पण 

     एक समय किसी जंगल में अंगिरस नामक एक महान ऋषि रहते थे. उनके बहुत सारे शिष्य थे. उन सभी ने ऋषि के ज्ञान व विवेक से काफी लाभ उठाया था. ऋषि के शिष्यों में कुछ शिष्य ऐसे थे जो दूसरों की अपेक्षा अधिक सक्षम थे और अपने गुरु की सीख का ध्यानपूर्वक अनुसरण करते थे. अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण अन्य शिष्य उनका सम्मान करते थे. 

     परन्तु कुछ मूर्ख शिष्य अपने प्रतिभावान साथियों से धीरे-धीरे ईर्ष्या करने लगे. हालांकि अपने गुरु की शिक्षा को मंद गति से सीखने के लिए वह स्वयं ज़िम्मेवार थे परन्तु वह अपने गुरु की निष्पक्षता पर संदेह करने लगे. उन्हें ऐसा लगने लगा कि गुरुजी अपने प्रतिभावान शिष्यों को गुप्त रूप से विशेष शिक्षा प्रदान कर रहे थे. 

     एक दिन जब गुरुजी अकेले थे तब यह मंदबुद्धि शिष्यों का गुट उनके पास गया और बोला, “गुरुजी! हमें ऐसा लगता है कि आप हमारे प्रति अन्यायी हैं. हमारी समझ से आप अपने ज्ञान का सम्पूर्ण लाभ केवल कुछ चुनिंदा शिष्यों को ही देते हैं. इस प्रकार के विशेषाधिकार आप हमें भी क्यों नहीं दे सकते?”

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     इस प्रकार के शब्द सुनकर गुरु कुछ अचंभित थे पर उन्होंने धीरतापूर्वक उत्तर दिया, “मैंने हमेशा तुम सब के साथ एक समान व्यवहार किया है और कभी किसी के प्रति कोई पक्षपात नहीं किया है. यदि तुममें से कुछ शीघ्र प्रगति करते हो तो उसका एकमात्र कारण मेरी शिक्षाओं पर ध्यानपूर्वक अमल करना है. तुम्हें पहलकदमी करने से किसने रोका है?” 

   परन्तु शिष्य अपने गुरु की बात से सहमत नहीं थे. अतः कुछ देर सोचने के बाद गुरु बोले, “ठीक है, तुममें से जिन्हें शिकायत है, मैं उन पर विशेष ध्यान दूँगा पर एक शर्त पर. मैं तुम्हें एक सामान्य सी सरल परीक्षा दूँगा और तुम्हें उसमें उत्तीर्ण होना होगा. तुम्हारी परीक्षा यह है कि पास के गाँव में, जहाँ तुम अक्सर जाते हो, जाकर एक अच्छा व्यक्ति मेरे पास लेकर आओ.”

     शिकायत करने वाले शिष्य बहुत खुश थे कि इतनी सरल सी परीक्षा का इनाम इतना अमित होगा. उन्होंने तुरंत अपने गुट का प्रतिनिधि चुना जिसने पूरे जोश व उत्साह के साथ खोज शुरू कर दी. गुट के सभी शिष्यों को पूरा विश्वास था कि उनका प्रतिनिधि अवश्य ही एक अच्छे व्यक्ति को ढूँढ निकालेगा. परन्तु दुर्भाग्यवश वह जहाँ भी गया और जिससे भी मिला, सभी ने कोई न कोई अपराध या कुकर्म किया हुआ था. लम्बी व निरर्थक खोज के बाद, पूर्णतय निराश होकर वह अपने गुट व गुरु के पास वापस लौटा और हताशपूर्ण स्वर में बोला, “गुरुजी, यह बताते हुए मुझे बहुत खेद हो रहा है कि पूरे गाँव में एक भी अच्छा व्यक्ति नहीं है. सभी ने बुरा कर्म, अपराध या अनैतिक काम किया हुआ है. समस्त गाँव बुरे व्यक्तियों से भरा हुआ है.”

   “ओह! ऐसी बात है?” गुरु ने नकली खेद करते हुए कहा. “अब मैं उस गाँव में दूसरे गुट से एक शिष्य को भेजता हूँ जिससे तुम्हें शिकवा है.”

   गुरु ने दूसरे गुट के एक शिष्य को बुलाया और बोले, “निकट के जिस गाँव में तुम्हारा यह साथी गया था, क्या तुम वहाँ जाकर अपने साथ एक बुरा व्यक्ति ला सकते हो?”

    शिष्य बोला, “गुरुजी, आपके आशीर्वाद से मैं कोशिश करूँगा.” ऐसा कहकर वह वहाँ से चला गया. 

    शिकायत करने वाले शिष्य एक बार पुनः चकित थे और गुरुजी से बोले, “इस बार भी आपने हमारे साथ बेइंसाफी की है. वह गाँव बुरे व्यक्तियों से भरा हुआ है अतः आपका वह शिष्य निस्संदेह अनेकों बुरे व्यक्ति लेकर आएगा.”  

    गुरु ने सभी शिष्यों को धीरज रखने का सुझाव दिया.

    कुछ समय के बाद जब अन्य गुट का शिष्य भी खाली हाथ लौटकर आया तो शिकायत करने वाला गुट बहुत ही हैरान व चकित हुआ. शिष्य ने गुरु को प्रणाम किया और बोला, “गुरुजी! आपको निराश करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ. मैंने समूचा गाँव ढूँढा पर मुझे एक भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला.”

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   अपने साथी की उक्ति सुनकर शिकायत करने वाला गुट खूब ज़ोर से हँसा. 

   पर दूसरे गुट के शिष्य ने अपने कथन की व्याख्या करते हुए कहा, “गाँव के प्रत्येक वासी ने कोई न कोई अच्छा कार्य अवश्य किया है. मेरी असफलता के लिए मुझे क्षमा कीजिए.” ऐसा कहकर उसने गुरु की अनुमति ली और वहाँ से चला गया. 

   शिष्य के जाने के बाद गुरु अपने स्तंभित व चकित शिकायत करने वाले शिष्यों से बोले, “मेरे प्रिय भक्तों! हमारा विवेक अच्छा व बुरा, सही व गलत, सकारात्मक व नकारात्मक में भेद करने की क्षमता रखता है. जब हम हर चीज़ में अच्छाई की चिंगारी देखते हैं तब हमारे विवेक का और अधिक विकास होता है. इसके विपरीत दूसरों में खोट देखने पर हमारा विवेक मुरझा जाता है. 

     सीख: 

   यह संसार खुशी व दुःख का मिश्रण है. जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारे विवेक पर निर्भर करता है. जीवन में सकारात्मक प्रवृत्ति रखने वाले लोग शीघ्र प्रगति करते हैं और नकारात्मक प्रवृत्ति रखने वाले, यदि अग्रसर होते हैं तो, बहुत ही धीमी गति से होते हैं. गुरु के लिए सभी निकट व प्रिय हैं. यदि शिष्य स्वयं को गुरु से दूर पाता है तो उसमें दोष शिष्य का ही है. 

   “तुम जितना स्वयं को और मुझे एक समझोगे, तुम्हारा विकास भी उतना ही होगा. तुम्हारे सारे कर्म इसी मूलभूत समझ के अनुरूप होने चाहिए.”

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     अनुवादक- अर्चना   

    हमारे बनाए खाने पर हमारे विचार प्रभाव डालते हैं

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   आदर्श: धार्मिकता 

  उप आदर्श: विचारों में शुद्धता 

   मैसूर राज्य में मलूर नामक स्थान पर एक धार्मिक ब्राह्मण रहता था जो एक महान विद्वान् था. उसकी पत्नी भी उसी के समान धार्मिक थी. वह सदा पूजा और जप-ध्यान के लिए तत्पर रहता था और अपने सच्चरित्र के लिए दूर-दूर तक प्रख्यात था. एक दिन नित्यानंद नामक संयासी उसके दरवाज़े पर भिक्षा माँगने आए.

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संयासी को अपने घर देखकर ब्राह्मण अत्यंत खुश हुआ. उसने संयासी को अपने घर अगले दिन भोजन करने का आमंत्रण दिया ताकि वह अपने अतिथि-सत्कार से उसका सम्मान कर सके. संयासी के स्वागत के लिए ब्राह्मण ने अपने घर के दरवाज़ों पर हरे रंग की तोरण लगाई और अन्य विस्तृत व्यवस्था की. परन्तु आखिरी समय में किसी कारणवश उसकी पत्नी अपने माननीय अतिथि के लिए खाना बनाने में समर्थ थी. एक पड़ोसी महिला ने स्वेच्छा से ब्राह्मण के घर खाना बनाने में अपनी मदद पेश की. ब्राह्मण की पत्नी ख़ुशी-ख़ुशी पड़ोसी को अपने घर लेकर आई और रसोईघर से परिचित कराया.

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    अगले दिन सब कुछ भली भाँती निबट गया और सभी भोजन की व्यवस्थाओं से प्रसन्न और संतुष्ट थे. केवल, किसी कारणवश भोजन के दौरान संयासी अपनी प्लेट के पास रखे चांदी के कटोरे को चुराने की अत्यधिक तीव्र इच्छा के शिकार हो गए. अपनी सर्वश्रेष्ठ सचेत कोशिशों के बावजूद वह बुरा भाव नित्यानंदजी पर हावी हो गया और कटोरे को अपनी पोशाक में छुपाकर वह झटपट घर लौट आए. अपनी इस हरकत के बाद संयासी रात भर सो नहीं पाए क्योंकि उनकी अंतरात्मा उन्हें लगातार कोस रही थी. संयासी को लगा कि उन्होंने अपने गुरु का अपमान किया है और उन सभी ऋषिओं का निरादर किया है जिनका उन्होंने, मन्त्र उच्चारण करते समय, आह्वान किया था. वह तब तक बेचैन रहे जब तक कि उन्होंने ब्राह्मण के घर वापस जाकर, उसके पैरों में गिरकर और आँखों में पश्चाताप के आँसू लेकर चांदी का कटोरा वापस नहीं कर दिया. 

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   सभी हैरान थे कि नित्यानंद जैसा महात्मा इतना नीचे कैसे गिर सकता था. किसी ने सुझाव दिया कि संभवतः यह दोष खाना बनाने वाले व्यक्ति के माध्यम से भोजन में संचारित हुआ होगा. तत्पश्चात खाना बनाने वाली पड़ोसी की जीवनी का विवरण किया गया और लोगों ने पाया कि वह एक अदम्य चोर थी. अतिसूक्ष्म संपर्क द्वारा उस महिला की चोरी करने की प्रवृत्ति ने उसके पकाये खाने को प्रभावित किया था. इसी कारण साधकों को उपदेश दिया जाता है कि एक निश्चित अवस्था पर पहुँचने तक उन्हें फल व कंद पर ही जीवन निर्वाह करना चाहिए.

     सीख:

   ऐसा कहा जाता है कि जब भोजन प्रेम व अनुकूल विचारों से बनाया जाता है तब वह गुणकारी होता है और स्वाद में सर्वश्रेष्ठ होता है.

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     अनुवादक- अर्चना 

     पंचकोष

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      आदर्श:      शाश्वत सत्य 

   उप आदर्श: पवित्रता, शुद्धता 

    कई वर्ष पूर्व जब गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी उस समय भृगु नाम का एक व्यक्ति था. एक योग्य गुरु की देखरेख में कई वर्षों तक विद्या अर्जित करने के बाद वह घर लौटा. घर वापस लौटने पर उसका खूब धूमधाम से स्वागत हुआ. इस सबके बाद उसके पिता, वरुण, ने उससे पूछा, “तुम्हारा मूलभूत सत्य क्या है?”  

   कुछ समय सोचने के बाद पुत्र बोला,”क्षमा कीजिए, पिताजी, मेरे गुरु ने यह कभी नहीं सिखाया.”

   इस पर पिता बोले, “यदि तुम मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते तो तुम्हारी शिक्षा अधूरी है.”

   स्तब्ध भृगु बोला, “मुझे क्या करना चाहिए? मैं अपनी शिक्षा कैसे सम्पूर्ण कर सकता हूँ, पिताजी? ”

   वरुण धीरता से बोले, “तपस्या! शिक्षा प्राप्त करने का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है. जंगल जाकर तपस्या करो, प्रिय पुत्र. तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा.”

     जंगल में कुछ समय तपस्या करने के बाद पुत्र ने सोचा कि उसे उत्तर मिल गया है. अतः अपने पिता के पास वापस लौटकर उसने कहा, “पिताजी, मेरा शरीर मूलभूत सत्य है- अन्नमय कोष. अगर शरीर स्वस्थ है और सभी अंग ठीक से काम कर रहे हैं तो कुछ भी और सब कुछ संभव है. रोगग्रस्त शरीर से मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ.”

     पुत्र का उत्तर सुनकर पिता बहुत हताश हुए और उससे अपनी निराशा व्यक्त करते हैं.

     उचित उत्तर की तलाश में पुत्र फिर से जंगल जाकर तपस्या करता है.

    कई वर्षों तक तपस्या करने के बाद भृगु घर वापस लौटता है. “पिताजी, मैं बिल्कुल गलत था. एक शरीर मात्र से मैं क्या कर सकता हूँ? शरीर में मुझे प्राण भी चाहिए. शरीर में शक्ति के प्रवाह के लिए प्राण का होना अनिवार्य है. अतः यह प्राणमय कोष           है जो महत्वपूर्ण है.”

    पिता पुनः निराश होते हैं. “नहीं पुत्र, वापस जाओ और इस बार मुझे सही उत्तर लाकर दो, ” वरुण बोले.

   और अधिक कठोर तपस्या के बाद भृगु एक बार फिर वापस लौटता है और पिता से कहता है, “पिताजी, मैं गलत था. केवल प्राण ही महत्वपूर्ण नहीं हैं. सदा उचित मानसिक स्थिति का होना भी आवश्यक है. मेरा मस्तिष्क इतना प्रशिक्षित होना चाहिए कि मैं स्वयं को सदा एक संतुलित व्यक्ति बनाए रख सकूँ. यह मनोमय कोष है. 

   वरुण ने उदास भाव से कहा, “पुत्र, तुम्हें नहीं लगता कि अब समय आ गया है कि तुम सही उत्तर लेकर आओ.”  

  भृगु ने एक बार फिर से तपस्या की और कदाचित सही उत्तर लेकर प्रसन्नतापूर्वक वापस लौटा. 

   “पिताजी, पिताजी, अंततः मैंने आपके प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ निकाला. मुझमें मौलिक सत्य यह है कि मुझे सही व गलत से परिचित होना चाहिए. मुझे इस बात की जानकारी अवश्य होनी चाहिए. यह विज्ञानमय कोष है. मैं सही हूँ न, पिताजी?” भृगु ने व्यग्रता से पूछा. 

    “नहीं” , पिता ने स्पष्ट रूप से कहा. “तुम्हें चार अवसर देने के बाद भी हर बार गलत उत्तर सुनकर मैं बहुत निराश हूँ. तुम इसे भूल जाओ; और इंतज़ार करो. एक दिन शायद तुम्हें स्वयं ही सही उत्तर का आभास होगा.”

   “नहीं पिताजी, मुझे एक आखिरी मौका दीजिए. जितना आपको सही उत्तर जानना है उतनी ही मुझे भी सही उत्तर जानने की इच्छा है. कृपया मुझे एक और अवसर की अनुमति दे दीजिए.” 

   स्पष्टतः इस बार पिता को अपने पुत्र की वापसी के लिए ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ा. पुत्र को अपने पिता की अपेक्षा से अधिक समय लग रहा था. भृगु को जंगल में गए दस वर्ष से भी अधिक हो चुके थे और पिता को अब पुत्र की सलामती को लेकर चिंता हो रही थी. पुत्र की खोज में वरुण जंगल की ओर निकल पड़े. जंगल में पुत्र की खोज के दौरान उन्होंने देखा कि एक उज्जवल रोशनी चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी. वरुण रोशनी की दिशा में चलने लगे और कुछ दूर चलने के बाद उस स्थान पर पहुँचे जहाँ से रोशनी आ रही थी. वहाँ का दृश्य देखकर वरुण मिश्रित भावनाओं से घिर गए. एक ही समय में वह उल्लसित, विस्मित, उदास, आनंदित, प्रमुदित, गर्वित व हैरान थे. उन्होंने पाया कि एक व्यक्ति पद्मासन में बैठा हुआ था और उसके हाथ ध्यान मुद्रा में थे. वह रोशनी वास्तव में उसके दैवी शरीर से उत्पन्न हो रही थी. उसका तेजस हज़ारों सूर्यों के बराबर था. वह निःसंदेह संसार का सबसे अधिक संतुष्ट व्यक्ति था. उसपर एक नज़र ही किसी भी व्यक्ति को हर्ष, आनंद व संतोष से भर देने के लिए काफ़ी थी. यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि भृगु था जो अपने पिता के प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने के लिए तपस्या करने निकला था. पुत्र को इस अवस्था में देखकर वरुण ने धीरे से अपनी आँखें पोंछीं, अपने पुत्र को पूर्ण आदर के साथ झुककर प्रणाम किया और घर वापस लौट आए.

      उन्हें ठीक मालूम था कि उनके पुत्र ने उत्तर समझ लिया था. उन्हें पता था कि भृगु उत्तर में इतना मगन था कि वह अपने पिता के पास वापस लौटकर उन्हें मौलिक सत्य के बारे में बताना भूल गया था. उसने आनंदमय कोष पर निपुणता प्राप्त कर ली थी. उसने समझ लिया था कि पहले चार कोष कितने मिथ्या व कमजोर थे और आनंदमय कोष कितना यथार्थ था. उसने समाधि स्थिति सिद्ध कर ली थी. वह सम्पूर्ण आनंद में, परमानंद में संयुक्त था.   

     सीख:

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    अन्नमय कोष: यह पाँचों कोषों में सबसे भौतिक व अंतरतम कोष है. हम जो भोजन करते हैं वह इस कोष का पोषण करता है. गुणकारी प्राकृतिक आहार व यौगिक साधना के कारण ही हमारा शरीर स्वस्थ व निरोग रहता है.

    प्राणमय कोष: यह द्वितीय कोष है और अन्नमय कोष से अधिक बड़ा व सूक्ष्म है. जो वायु हम शरीर में लेते हैं और शरीर से बाहर छोड़ते हैं वह शक्ति का स्त्रोत है. इस कोष की तंदरुस्ती भी स्वस्थ शरीर का भाग है. विकसित प्राणमय कोष के कारण ही शरीर में शक्ति का प्रवाह ठीक रहता है. 

   मनोमय कोष: इस कोष में हमारे मन के भावात्मक व बोधात्मक पहलू शामिल हैं. हमारे विचार इस कोष का आहार हैं. सुविकसित मनस सकारात्मक सोचविचार व निश्चयात्मक शक्ति का प्रतीक है.

     विज्ञानमय कोष: यह कोष सचेत अवस्था में बुद्धिमत्ता को दर्शाता है. यह कोष सही व गलत, अस्थायी व शाश्वत, निर्णय लेने की योग्यता, सत्य व मिथ्या, पीड़ा व ख़ुशी में भेद करने के सामर्थ्य से बना है.

     आनंदमय कोष: सभी कोषों में आनंदमय कोष सबसे अधिक बड़ा, सबसे बाहरी और सबसे अधिक सूक्ष्म है. इसकी व्याख्या करना या इसे समझना सबसे अधिक कठिन है. यह स्वाभाविक आनंद व हर्ष की अवस्था है. यह कोष अनुभवातीत शरीर है. आनंद स्वयं ब्रह्मा का अवतरण है. वह परमानन्द का अपरिमित स्त्रोत है. केवल इसी अवस्था में साधक परमात्मा से पूर्णतया सम्बद्ध रहता है. उसे कोई भी चीज़/ परिस्थिति उदास नहीं कर सकती और केवल इसी में उसकी ख़ुशी संयुक्त होती है. इस अवस्था में साधक अंतरिक्ष व समय जैसी मिथ्या धारणा से सीमित नहीं रहता है.

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     अनुवादक- अर्चना  

          ईंट

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    आदर्श: उचित आचरण 

   उप आदर्श: रफ़्तार कम करना, धैर्य 

   एक जवान व क़ामयाब प्रबंधक अपनी नई जैगुआर कार में पड़ोस की सड़क पर कुछ ज़्यादा ही तेज़ रफ़्तार से जा रहा था. गाड़ी car2की गति तेज़ होने के बावजूद वह सावधान था और पड़ोस में खेल रहे बच्चों के अचानक इधर-उधर भागने को लेकर सचेत था. अचानक किसी ने उसकी नई गाड़ी के दरवाज़े पर ईंट फेंकी. उसने ज़ोर से ब्रेक लगाई और गाड़ी उस स्थान पर लेकर आया जहाँ से वार हुआ था. 

   क्रोधित चालक झटपट गाड़ी से बाहर निकला, नज़दीक के बच्चे को झपटकर पकड़ा और पास खड़ी गाड़ी पर धकेलकर चिल्लाया, “यह क्या हो रहा है और तुम कौन हो? तुम क्या कर रहे हो? वह गाड़ी बिलकुल नयी है और तुम्हारा ईंट फेंकना मुझे बहुत महँगा पड़ेगा. तुमने ईंट क्यों फेंकी?”

   बालक क्षमाशील और शर्मिंदा था. “मुझे क्षमा कीजिए, साहिब…मुझे माफ़ कीजिए पर मुझे और कुछ समझ नहीं आ रहा था, ” उसने निवेदन किया. “मैंने ईंट इसलिए फेंकी क्योंकि कोई भी गाड़ी नहीं रोक रहा था…” बालक के चहरे से लगातार आंसू टपक रहे थे और रोते-रोते एक स्थान की ओर संकेत करते हुए बोला, “वह मेरा भाई है.  उसकी पहिएदार कुर्सी के फुटपाथ से लुढ़कने के कारण वह कुर्सी से गिर गया है और मैं अकेले उसे उठा नहीं पा रहा हूँ.”  रोते हुए उसने निस्तब्ध प्रबंधक से कहा, “उसे वापस कुर्सी पर बैठाने में क्या आप कृपया मेरी मदद करेंगें? उसे चोट लगी है और मेरे अकेले के लिए वह बहुत भारी है.”  

   वाहन चालाक अकथ्य रूप से विचलित व द्रवित था. उसका शरीर मानो सन्न हो गया हो. उसने स्वयं को सँभाला और झटपट विकलांग बालक को पहिएदार कुर्सी पर वापस बैठाया. फिर उसने अपना रेशमी रूमाल निकालकर उसके घाव व खरोंचों पर थपकाया. बालक को देखकर उसे पूरा विश्वास था कि सब कुछ अच्छा ही होगा. कृतज्ञ बालक अजनबी से बोला, “आपका धन्यवाद. भगवान् आपका भला करे.”

 

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   वाहन चालाक स्पष्ट रुप से व्याकुल व परेशान था. अवाक चालक कुछ देर वहाँ खड़ा होकर बच्चे को पहिएदार कुर्सी पर सीमित अपने भाई को लेकर घर जाते देखता रहा. फिर वह अपनी गाड़ी तक जाने के लिए मुड़ा. पर अपनी नूतन व कीमती कार तक का car6रास्ता उसके लिए बेहद लम्बा व नीरस था. नुक्सान सुस्पष्ट व प्रत्यक्ष था पर चालक ने अपनी गाड़ी के दरवाज़े पर पड़े खरोचों के निशानों की मरम्मत नहीं कराई. गाड़ी के दरवाज़े पर निशान उसने स्वयं को यह सन्देश याद दिलाने के लिए बरकरार रखा- “ज़िन्दगी इतनी रफ़्तार से मत जीओ कि किसी को तुम्हारा ध्यान आकर्षित करने के लिए ईंट फेंकनी पड़े.”

 

 

  सीख:

  ईश्वर हमारी अंतरात्मा में धीरे से बोलते हैं और हमारे ह्रदय से उनकी आवाज़ आती है. कभी-कभी जब हमारे पास सुनने का समय नहीं होता है तब ईश्वर को हमारे ऊपर ईंट फेंकनी पड़ती है. ईश्वर के वार के बाद उनकी ओर ध्यान देने या न देने का निर्णय हमारा होता है. जीवन में हमें अपनी रफ़्तार कम करके दूसरों के प्रति भी चौकस रहना चाहिए.  

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अनुवादक- अर्चना 

  मंत्री और कुत्ते 

      

       आदर्श: उचित आचरण, प्रेम

   उप आदर्श: कृतज्ञता, अनुकम्पा 

     एक निष्ठुर व सनकी राजा की कैद में १० जंगली कुत्ते थे. यह कुत्ते इतने ताकतवर थे कि एक इंसान को भी चीरकर फाड़ सकते थे. राजा का आदेश था कि किसी व्यक्ति द्वारा अपराध या अक्षम्य ग़लती होने पर उस व्यक्ति को सज़ा के रूप में जंगली कुत्तों के क़ैदख़ाने में फेंक दिया जाए. क़ैद में रखे कुत्तों को भूखा रखकर व कष्ट पहुँचाकर, राजा उन्हें खूँखार व उत्तेजित रखता था.  

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      एक बार ऐसा हुआ कि किसी विषय पर एक मंत्री द्वारा दी गई राय राजा को बिलकुल पसंद नहीं आई. निष्ठुर व अभिमानी होने के कारण राजा ने उस मंत्री को जंगली कुत्तों के बीच फेंकने का आदेश दिया. 

    मंत्री ने हाथ जोड़कर राजा से प्रार्थना की, “मैंने १० साल आपकी सेवा की है और आप मुझसे इस प्रकार का बर्ताव कर रहें हैं? ”

    मंत्री ने राजा से आग्रह किया कि कुत्तों के बीच फेंकने से पहले उसे १० दिनों का समय दिया जाए. सभी आश्चर्यचकित थे पर  राजा मंत्री की बात से सहमत हो गया. 

   मंत्री ने सबसे पहले उस संतरी से मित्रता की जो कुत्तों का उत्तरदायी था और उससे कहा कि अगले १० दिनों तक वह कुत्तों की देखभाल करना चाहता है. 

  संतरी चकित था पर सहमत हो गया. 

    होशियार मंत्री ने भयानक कुत्तों को खाना खिलाना, नहलाना, उनके साथ खेलना और टहलना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे प्रेमपूर्वक उन्हें प्रशिक्षित किया.

     जल्द ही १० दिन बीत गए…..

      राजा अपने आदेश का पालन करवाने के लिए तत्पर था और मंत्री को उसकी सज़ा के अनुरूप कुत्तों के क़ैदख़ाने में फेंकवाना चाहता था.

    राजा की आज्ञानुसार मंत्री को जंगली कुत्तों के बंदीगृह में झोंक दिया गया.

     इसके बाद का दृश्य देखकर सभी भौंचक्के थे…..

     सभी ने देखा कि कुत्ते मंत्री के पाँव चाट रहे थे!

     अचंभित राजा ज़ोर से चिल्लाकर बोला, “ये कुत्तों को क्या हो गया है? ”

     इस पर मंत्री बोला, “मैंने इन कुत्तों की १० दिन देखभाल की और यह मेरी सेवा नहीं भूले….यद्यपि मैंने निस्स्वार्थ भाव व निष्ठा से आपकी १० वर्ष सेवा की परन्तु मेरी पहली ग़लती पर आप सब भूल गए! ”

     राजा को अपनी ग़लती का अहसास हो गया और उसने मंत्री को मुक्त करने का आदेश दिया. 

   सीख:

    यह कहानी उन सभी के लिए सबक है जो समस्या आने पर दूसरों की अच्छाई भूल जाते हैं. अपनी पसंद के प्रतिकूल हुई एक छोटी सी घटना के कारण अच्छाई से भरा इतिहास नष्ट नहीं करना चाहिए. हमें अपने ऊपर हुआ उपकार सदैव याद रखना चाहिए. 

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अनुवादक- अर्चना 

        आलोचना के प्रति सही मनोभाव 

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      आदर्श: उचित आचरण 

  उप आदर्श: सही नज़रिया

  हज़रत मुहम्मद का अली नामक एक शिष्य था. हज़रत मुहम्मद के अन्य शिष्य अक्सर अली की आलोचना करते थे पर अली धीरता ali3से बर्दाश्त करता था. एक दिन अपने मालिक की उपस्थिति में दूसरों ने अली की निंदा की; काफी समय तक धैर्ययुक्त व सहनशील रहने के बाद आख़िरकार अली अपने प्रतिरक्षा के लिए खड़ा हुआ. अली के ऐसा करते ही, हज़रत मुहम्मद तुरंत वहाँ से चले गए. अली ने मालिक का अनुगमन किया और उनसे पूछा, “मालिक, जब दूसरों ने मेरी आलोचना करनी आरम्भ की तब आप वहाँ से चले क्यों आए? आपने ने मेरा समर्थन क्यों नहीं किया?”

  हज़रत बोले, “मैंने देखा कि जब तक तुम मौन थे तब तक तुम्हारे पीछे १० फरिश्ते खड़े थे और तुम्हारी रक्षा कर रहे थे; लेकिन जैसे ही तुमने अपनी वक़ालत करनी शुरू की, उसी क्षण फरिश्ते लुप्त हो गए और मैं भी वहाँ से चला आया.” 

  सीख:

    यह ज़रूरी नहीं है कि फरिश्ते मानव शरीर में हों. फरिश्ते आनंद, धैर्य, सहनशीलता तथा क्षमा के रूप में भी विद्यमान हो सकते हैं. जब हम पलट कर हमला करते हैं तब हम प्रतिशोध व द्वेष जैसे नकारात्मक स्वभाव का प्रदर्शन करते हैं. ऐसा विचार सही नहीं है कि जो अपनी प्रतिरक्षा करते हैं वह ही सशक्त होते हैं. यदि हमारा लक्ष्य शांत जीवन व्यतीत करना या भगवान् की खोज करना है तो दूसरों द्वारा निंदा किए जाने पर हमें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए. हमें दूसरों की त्रुटियों में संलग्न नहीं होना चाहिए. हम स्वयं में परिवर्तन लाकर अपने उदाहरण से दूसरों में बदलाव ला सकते हैं. हमें हिदायत तभी देनी चाहिए जब हमसे सलाह माँगी जाए. और वह उपदेश दूसरों के प्रति प्रेम से आना चाहिए… वरना हमें दूसरों की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है.

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  अनुवादक- अर्चना