बरसाती दिन, सूर्यवत दिन 

    आदर्श: आशावाद 

    उप आदर्श: दृष्टिकोण 

    एक समय एक वृद्ध महिला थी जो हर समय रोती रहती थी. महिला की ज्येष्ठ बेटी छाते के व्यापारी से विवाहित थी जबकि उसकी कनिष्ठ बेटी की शादी सेवईं बेचने वाले से हुई थी.

     सूर्यवत दिनों में चिंताग्रस्त होकर वह महिला शोक प्रकट करती, “हे भगवान! आज तो मौसम बहुत ही अच्छा व गरम है. ऐसे day3मौसम में कोई भी छाता नहीं खरीदेगा. क्या होगा अगर मेरी बेटी को दुकान बंद करनी पड़ जाएगी? ” इस प्रकार के विचार उसे दुखी व उदासीन कर देते थे और वह रोए बिना रह नहीं पाती थी. 

   

जब बारिश होती थी तब वह अपनी छोटी बेटी के लिए रोती थी. “मेरी छोटी बेटी की शादी तो एक सेवईं बेचने वाले से हुई है. बारिश के इस मौसम में सूरज के बिना वह सेवईं सूखा नहीं पाएगी. उनके पास बेचने के लिए सेवईं ही नहीं होगी. अब क्या होगा?”

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     इस प्रकार लगातार चिंता करने के कारण वह महिला प्रतिदिन दुखी रहती थी. मौसम चाहे कैसा भी हो वह अपनी किसी एक बेटी के लिए शोक मना रही होती थी. उसके पड़ोसी उसे सांत्वना देने में असमर्थ थे और मज़ाक में उसे “रोंदू’ बुलाते थे.  

     एक दिन महिला की मुलाक़ात एक साधु से हुई. वह यह जानने के लिए बहुत उत्सुक थे कि वह महिला हमेशा रोती क्यों रहती थी. महिला ने साधु से अपनी समस्या बतलाई. साधु धीरे से मुस्कुराए और बोले, “महोदया! आप चिंता न करें. मैं आपको खुश रहने का रास्ता दिखाऊँगा. आपको दुखित होने की कोई आवश्यकता नहीं है.”

    सन्यासी की बात सुनकर रोंदू महिला बहुत खुश हुई. उसने तुरंत सन्यासी से पूछा कि उसे क्या करना चाहिए. साधु बोले, “यह बहुत ही सहज है. आपको केवल अपना दृष्टिकोण बदलने की ज़रुरत है. सूर्यवत दिनों में अपनी जयेष्ठ बेटी के छाते बेचने की असमर्थता के विषय में मत सोचो. इसके बदले अपनी छोटी बेटी के सेवईं सूखाने की समर्थता के बारे में सोचो. इतनी अच्छी व तेज़ धूप में वह ढेर सारी सेवईं बना सकती है और इससे उसके कारोबार में बढ़ोतरी होगी. बारिश होने पर अपनी जयेष्ठ पुत्री की छाते की दुकान के बारे में सोचो. बारिश के मौसम में हर कोई छाता खरीद रहा होगा. वह बहुत सारे छाते बेच पाएगी और उसकी दुकान खूब फले-फूलेगी.” 

   महिला को ज्ञान का बोध हुआ. उसने साधु की हिदायत का अनुसरण किया. कुछ समय के बाद उसका रोना बंद हो गया और अब वह सदा मुस्कुराती रहती थी. उस दिन के बाद से उसका नाम “हँसमुख महिला” पड़ गया.

     सीख:

    जब हम किसी परिस्थिति का सामना सकारात्मक दृष्टिकोण से करते हैं, हम उसे बेहतर संभाल सकते हैं और हमेशा ख़ुशी का अहसास करते हैं.

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     अनुवादक- अर्चना 

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  पदचिन्हों की प्रार्थना 

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       आदर्श: प्रेम

   उप आदर्श: विश्वास, प्रभु की इनायत 

    एक रात मैंने एक सपना देखा…….मैंने देखा कि समुद्रतट के किनारे मैं प्रभु के साथ टहल रहा था और आसमान में हर तरफ मेरे जीवनकाल की विभिन्न घटनाएँ प्रदर्शित हो रही थीं. प्रत्येक घटना के दौरान मैंने रेत पर पदचिन्हों के दो जोड़े देखे : जिसमें से एक मेरा था और दूसरा प्रभु का. foot4जब मेरे जीवन की अंतिम घटना प्रसारित हो रही थी, मैंने मुड़कर रेत पर पड़े पदचिन्हों को देखा. मैंने पाया कि मेरे जीवन की राह में कई बार पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा था. पदचिन्हों के एक जोड़ों को गौर से देखने पर मुझे अहसास हुआ कि ऐसा मेरे जीवन के सबसे अधिक दुखद व उदासीन समय में था. पदचिन्हों का एक जोड़ा देखकर मैं बहुत परेशान था और मैंने इस विषय में प्रभु से प्रश्न किया. 

 “प्रभु, आपने कहा था कि एक बार जब मैं आपका अनुसरण करने का निश्चय करूँगा तब आप सदा मेरे साथ रहेंगें;  परन्तु मेरे जीवन की सबसे अधिक कष्टप्रद परिस्थितियों में मैंने पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा देखा है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जब मुझे आपकी सबसे अधिक ज़रुरत थी, आपने मेरा साथ क्यों छोड़ दिया.”

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   प्रभु ने उत्तर दिया, “मेरे प्रियतम व अनमोल बच्चे. मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे मुसीबत व आपत्ति के समय में मैं कभी भी तुम्हारा साथ नहीं छोडूँगा. तुमने जब-जब पदचिन्हों का एक जोड़ा देखा है तभी वह समय था जब मैंने तुम्हें अपने पास उठाया हुआ था.”

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     सीख:

    भगवान् के प्रति आस्था, प्रेम व निष्ठा रखने से वह कभी भी हमारा त्याग नहीं करते हैं. वह हमारी परेशानियाँ पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं करते परन्तु कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त साहस व सहारा अवश्य देते हैं. वह हमारा मार्गदर्शन करते हैं और दुःख व आपत्ति के समय में हमें सँभालते हैं.

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    अनुवादक- अर्चना    

      गाँव वाला और एक सुखी व्यक्ति 

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     आदर्श: शांति 

    उप आदर्श: मन को शांत करना

     एक घाटी के छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था जो सदा खुश रहता था और सब के प्रति दयालु व सहानुभूतिशील रहता था. वह हमेशा मुस्कुराता रहता था और जब भी ज़रुरत होती थी सदा विनम्र व उत्साहपूर्वक शब्द बोलता था. उससे मिलने के बाद सभी खुश हो जाते थे. लोगों को उस पर भरोसा था और सभी उसे अपना विशेष मित्र समझते थे. 

    एक ग्राम वासी इस व्यक्ति के हमेशा खुश रहने के रहस्य को जानना चाहता था. वह हैरान था कि कैसे इस व्यक्ति के मन में किसी के भी प्रति द्वेष नहीं था और वह सदा प्रसन्नचित्त रहता था.

    एक बार यह जिज्ञासु व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को राह चलते मिल गया और उससे पूछा, “हमारे आसपास अधिकतर लोग स्वार्थी व असंतुष्ट हैं. तुम्हारी तरह वह हर समय मुस्कुराते नहीं हैं; और न ही तुम्हारी तरह वह मेहरबान व मददगार हैं. इसका क्या कारण है?”   

   उसने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जब तुम अपने अंदर शांति स्थापित करते हो, तुम समस्त विश्व के साथ शान्ति कायम कर सकते हो. अगर तुम अपनी अंतरात्मा को पहचान सकते हो, तुम सबके भीतर की आत्मा को भी पहचान लोगे और तब सबके प्रति दयालु व विनम्र होना तुम्हें स्वाभाविक प्रतीत होगा. यदि तुम्हारे विचार तुम्हारे नियंत्रण में हैं तो तुम प्रबल व सुदृढ़ बनोगे. तुम्हारा व्यक्तित्व एक रोबोट के समान है जो कुछ नियत कार्य करने के लिए योजनाबद्ध होता है. तुम्हारे विचार व स्वभाव साधन हैं जो तुम्हारे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. इनसे स्वयं को स्वाधीन करने पर तुम्हारे भीतर की अच्छाई व ख़ुशी प्रकट होगी.”

    अपने साथी की बात सुनकर ग्रामवासी शोक प्रकट करते हुए बोला, “पर उसके लिए बहुत सारा कार्य करना पड़ेगा. हमें अच्छी व अनुकूल आदतें विकसित करनी पड़ेंगी. ध्यान केंद्रित करने तथा विचारों को नियंत्रित करने की क्षमता सुदृढ़ करनी होगी. सफल होने के लिए कार्य कठिन व अनंत हैं. बहुत सारी बाधाएं पार करनी पड़ेंगी. यह कोई सरल कार्य नहीं है.”  

    “कठिनाइयों के बारे में मत सोचो वरना तुम सब कुछ वैसा ही देखोगे और उसी प्रकार से अनुभव करोगे. अपनी भावनाओं व विचारों को शांत करो और इसी शान्ति की अवस्था में स्थिर रहने की चेष्टा करो. तुम केवल निश्चल रहो और अपने विचारों को स्वयं पर हावी मत होने दो.”

   “मुझे बस इतना ही करना है? ” ग्रामीण ने पूछा. 

   “अपने विचारों पर विशेष निगरानी रखो और ध्यान दो कि वह कैसे आते और जाते हैं. इससे उत्पन्न शांति में स्थिर रहो. शुरूआत में शांति के पल संक्षिप्त होंगे पर समय के साथ यह पल लम्बे समय तक बरकरार रहेंगे. यह शान्ति शक्ति, सामर्थ्य, करुणा और प्रेम है. समय के साथ तुम्हें अपनी और सर्वव्यापी शक्ति में एकता का अहसास होगा और यह तुम्हें एक अलग ही दृष्टिकोण से काम करने का रास्ता दिखाएगा. यह नया पहलू स्वार्थी व संकुचित अहम् का नहीं होगा बल्कि चेतना का होगा. ”

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   ग्रामवासी बोला, “मैं तुम्हारा कथन याद रखने की कोशिश करूँगा. पर मैं एक और बात को लेकर उत्सुक हूँ. ऐसा प्रतीत होता है कि तुम परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते हो. तुम्हारे पास सबके लिए विनम्र वचन हैं और तुम सदा सहायक रहते हो. लोग तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और तुम्हारी अच्छाई का कभी शोषण नहीं करते हैं.”  

     “ज़रूरी नहीं है कि अच्छा व हितैषी होना कमज़ोरी का संकेत है. एक अच्छे व्यक्ति होने के साथ तुम सशक्त भी बन सकते हो. लोग तुम्हारी भीतरी शक्ति महसूस कर लेते हैं और इस कारण तुम पर हावी नहीं होते हैं. जब तुम सशक्त व भीतर से शांत होते हो, तुम दूसरों की मदद करते हो क्योंकि तुम सहायता करना चाहते हो और मदद करने की सक्षमता रखते हो. तुम निर्बलता से नहीं बल्कि शक्ति के फलस्वरूप काम करते हो. अच्छाई दुर्बलता का प्रतीक नहीं है जैसा कि कुछ लोगों की ग़लतफहमी है. ताकत व क्षमता से साथ भी अच्छाई  ज़ाहिर की जा सकती है.”

  “तुम्हारे उपदेश व स्पष्टीकरण के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद” , ग्रामीण बोला और खुश व संतोष होकर घर लौट गया.

   सीख:

    हमें स्वयं में विश्वास रखना चाहिए और सही कार्य काने के लिए भीतरी शक्ति व आस्था विकसित करनी चाहिए. मन की शान्ति के फलस्वरूप अन्य आदर्श जैसे प्रेम व धार्मिकता भी प्रदर्शित होते हैं.

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     अनुवादक- अर्चना 

  गुरु और शेर 

     

    आदर्श: शान्ति 

   उप आदर्श: धीरज, एकाग्रता

   एक शिक्षक और उनका छात्र एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे. अचानक उन्होंने एक दहाड़ सुनी. उन्होंने पीछे मुड़कर गौर से देखा और पाया कि एक विशाल शेर उनका पीछा कर रहा था. 

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छात्र झटपट वहाँ से भागने को तैयार था पर तभी उसे अपनी आत्मसंयम की शिक्षा और अभ्यास का ध्यान आया. उसने स्वयं को संभाला, शांत किया और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने लगा कि उसके शिक्षक क्या करेंगे.

   शिष्य ने पूछा, “हम क्या करें, गुरूजी? ”

   शिष्य की ओर देखकर शिक्षक शांत स्वर में बोले, “हमारे पास अनेकों विकल्प हैं. अपने मन में ख़ौफ़नाक डर भर कर हम स्वयं को शक्तिहीन बना सकते हैं ताकि शेर जैसे चाहे वैसे पेश आ सकता है. हम बेहोश होकर गिर सकते हैं. हम भाग सकते हैं पर शेर भी हमारे पीछे भागेगा. हम शेर के साथ संघर्ष कर सकते हैं  पर शेर शारीरिक रूप से हमसे अधिक शक्तिमान हैं.” 

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   “हम भगवान् से अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर सकते हैं. यदि हमारी एकाग्रता यथेष्ट सुदृढ़ है तो हम अपने मन की ताकत से शेर को प्रभावित कर सकते हैं. हम शेर को प्रेम प्रेषित कर सकते हैं. हम अपनी भीतरी शक्ति पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. हम इस सत्य पर मनन कर सकते हैं कि शेर सहित हम और सम्पूर्ण जगत एक ही इकाई हैं और इस प्रकार हम शेर की अंतरात्मा को प्रभावित कर सकते हैं.”

    “तुम किस विकल्प का चयन करना पसंद करोगे?”

    “आप गुरु हैं. आप मुझे बताएं कि हमें क्या करना चाहिए. हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है, “छात्र ने उत्तर दिया.

    शिक्षक ने निडर होकर शेर की तरफ देखा, अपने मन से सारे विचार निकाले और गहरे ध्यान की स्थिति में चले गए. उन्होंने अपनी चेतना में शेर सहित समस्त जगत को समाविष्ट कर लिया. इस अवस्था में शिक्षक और शेर की चेतना मिलकर एक हो गई.

    इस दौरान छात्र डर कर काँप रहा था क्योंकि शेर उनके काफी नज़दीक था और उनपर छलांग लगाने के लिए तैयार था. छात्र अपने शिक्षक को देखकर हैरान था कि ऐसी खतरनाक परिस्थिति में भी वह कैसे इतने शांत व निर्लिप्त थे.

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    शिक्षक निरंतर निडरतापूर्वक ध्यानमग्न थे.

    कुछ समय के बाद शेर ने अपना सर और पूँछ नीचे की और वहाँ से चला गया. 

  अचम्भित शिष्य ने शिक्षक से पूछा, “आपने क्या किया?” 

    “कुछ नहीं. मैंने केवल अपने मन से सारे विचार निकालकर, शेर की आत्मा को अपने आप में संयुक्त कर लिया था. इससे guruji4आध्यात्मिक स्तर पर हम दोनों में शान्ति का रिश्ता जुड़ गया और इसके परिणाम स्वरूप शेर ने भीतरी शान्ति, शीतलता और एकता भाँप ली. उसे किसी खतरे का आभास या उग्र व्यवहार करने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई और वह वहाँ से चुपचाप चला गया.”

    शिक्षक ने अंत में कहा, “जब मन शांत व स्थिर होता है, उसकी शांति स्वतः ही आसपास के वातावरण व व्यक्तियों में संचारित हो जाती है और उन्हें अत्यंत प्रभावित करती है.”

    सीख:

  यदि हमारा मन शांत व विचार केंद्रित होंगे तो सब कुछ सरलता से सुलझ जाता है और हम सफलता हासिल कर सकते हैं.

 

source: saibalsanskaar.wordpress.com

 अनुवादक- अर्चना 

 

  ध्यान रखने वाला बेटा

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       आदर्श: उचित आचरण 

   उप आदर्श: सम्मान, प्रेम 

    एक बेटा अपनी बूढ़ी माँ को एक शाम खाने के लिए रेस्टोरेंट ले गया. माँ बुज़ुर्ग व कमज़ोर थी और इस कारण खाना खाते समय उससे खाना उसके कपड़ों पर गिर गया. अन्य भोजन करने वाले लोग उसे घृणापूर्ण निगाहों से देखने लगे पर पुत्र शांत था.

    माँ ने जब खाना ख़त्म कर लिया तब बेटा बिलकुल भी लज्जित नहीं था.वह माँ को धीरे से शौचघर ले गया, उसके कपड़ों से खाने के कण पोंछे, दाग साफ़ किए, उसके बाल ठीक किए और उसे चश्मा ठीक से पहनाया. जब माँ और बेटा शौचघर से बाहर निकले तो समस्त रेस्टोरेंट उन्हें अचूक ख़ामोशी से देख रहा था. वहाँ मौजूद सभी लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि इस प्रकार खुले आम कोई स्वयं को कैसे लज्जित कर सकता है.

 पुत्र ने बिल का भुगतान किया और माँ के साथ बाहर जाने लगा. 

 तभी भोजन करने वालों में से एक वृद्ध पुरुष ने बेटे को बुलाया और उससे पूछा, “तुम्हें नहीं लगता कि तुम कुछ छोड़कर जा रहे हो?”

   पुत्र ने उत्तर दिया, “नहीं महाशय! ”

  वृद्ध पुरुष ने प्रत्त्युतर दिया, “हाँ, तुमने छोड़ा है. तुमने प्रत्येक पुत्र के लिए एक सीख और हर माँ के लिए उम्मीद छोड़ी है.”

   रेस्टोरेंट में सन्नाटा छा गया.

    सीख:

  जब हमारे माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं तब हमें उन्हें भूलना नहीं चाहिए. हमें उनके रूप व व्यवहार को लेकर कभी भी शर्मिंदा नहीं होना चाहिए. हमें हमारे माता-पिता, खासतौर से माँ, के समान कोई भी और निस्स्वार्थ भाव से प्यार नहीं कर सकता है. हमें सदा उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और उन्हें प्रेम व सम्मान देना चाहिए.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना    

      गुरु का प्रिय 

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        आदर्श: उचित आचरण

    उप आदर्श: सकारात्मकता, प्रभु को समर्पण 

     एक समय किसी जंगल में अंगिरस नामक एक महान ऋषि रहते थे. उनके बहुत सारे शिष्य थे. उन सभी ने ऋषि के ज्ञान व विवेक से काफी लाभ उठाया था. ऋषि के शिष्यों में कुछ शिष्य ऐसे थे जो दूसरों की अपेक्षा अधिक सक्षम थे और अपने गुरु की सीख का ध्यानपूर्वक अनुसरण करते थे. अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण अन्य शिष्य उनका सम्मान करते थे. 

     परन्तु कुछ मूर्ख शिष्य अपने प्रतिभावान साथियों से धीरे-धीरे ईर्ष्या करने लगे. हालांकि अपने गुरु की शिक्षा को मंद गति से सीखने के लिए वह स्वयं ज़िम्मेवार थे परन्तु वह अपने गुरु की निष्पक्षता पर संदेह करने लगे. उन्हें ऐसा लगने लगा कि गुरुजी अपने प्रतिभावान शिष्यों को गुप्त रूप से विशेष शिक्षा प्रदान कर रहे थे. 

     एक दिन जब गुरुजी अकेले थे तब यह मंदबुद्धि शिष्यों का गुट उनके पास गया और बोला, “गुरुजी! हमें ऐसा लगता है कि आप हमारे प्रति अन्यायी हैं. हमारी समझ से आप अपने ज्ञान का सम्पूर्ण लाभ केवल कुछ चुनिंदा शिष्यों को ही देते हैं. इस प्रकार के विशेषाधिकार आप हमें भी क्यों नहीं दे सकते?”

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     इस प्रकार के शब्द सुनकर गुरु कुछ अचंभित थे पर उन्होंने धीरतापूर्वक उत्तर दिया, “मैंने हमेशा तुम सब के साथ एक समान व्यवहार किया है और कभी किसी के प्रति कोई पक्षपात नहीं किया है. यदि तुममें से कुछ शीघ्र प्रगति करते हो तो उसका एकमात्र कारण मेरी शिक्षाओं पर ध्यानपूर्वक अमल करना है. तुम्हें पहलकदमी करने से किसने रोका है?” 

   परन्तु शिष्य अपने गुरु की बात से सहमत नहीं थे. अतः कुछ देर सोचने के बाद गुरु बोले, “ठीक है, तुममें से जिन्हें शिकायत है, मैं उन पर विशेष ध्यान दूँगा पर एक शर्त पर. मैं तुम्हें एक सामान्य सी सरल परीक्षा दूँगा और तुम्हें उसमें उत्तीर्ण होना होगा. तुम्हारी परीक्षा यह है कि पास के गाँव में, जहाँ तुम अक्सर जाते हो, जाकर एक अच्छा व्यक्ति मेरे पास लेकर आओ.”

     शिकायत करने वाले शिष्य बहुत खुश थे कि इतनी सरल सी परीक्षा का इनाम इतना अमित होगा. उन्होंने तुरंत अपने गुट का प्रतिनिधि चुना जिसने पूरे जोश व उत्साह के साथ खोज शुरू कर दी. गुट के सभी शिष्यों को पूरा विश्वास था कि उनका प्रतिनिधि अवश्य ही एक अच्छे व्यक्ति को ढूँढ निकालेगा. परन्तु दुर्भाग्यवश वह जहाँ भी गया और जिससे भी मिला, सभी ने कोई न कोई अपराध या कुकर्म किया हुआ था. लम्बी व निरर्थक खोज के बाद, पूर्णतय निराश होकर वह अपने गुट व गुरु के पास वापस लौटा और हताशपूर्ण स्वर में बोला, “गुरुजी, यह बताते हुए मुझे बहुत खेद हो रहा है कि पूरे गाँव में एक भी अच्छा व्यक्ति नहीं है. सभी ने बुरा कर्म, अपराध या अनैतिक काम किया हुआ है. समस्त गाँव बुरे व्यक्तियों से भरा हुआ है.”

   “ओह! ऐसी बात है?” गुरु ने नकली खेद करते हुए कहा. “अब मैं उस गाँव में दूसरे गुट से एक शिष्य को भेजता हूँ जिससे तुम्हें शिकवा है.”

   गुरु ने दूसरे गुट के एक शिष्य को बुलाया और बोले, “निकट के जिस गाँव में तुम्हारा यह साथी गया था, क्या तुम वहाँ जाकर अपने साथ एक बुरा व्यक्ति ला सकते हो?”

    शिष्य बोला, “गुरुजी, आपके आशीर्वाद से मैं कोशिश करूँगा.” ऐसा कहकर वह वहाँ से चला गया. 

    शिकायत करने वाले शिष्य एक बार पुनः चकित थे और गुरुजी से बोले, “इस बार भी आपने हमारे साथ बेइंसाफी की है. वह गाँव बुरे व्यक्तियों से भरा हुआ है अतः आपका वह शिष्य निस्संदेह अनेकों बुरे व्यक्ति लेकर आएगा.”  

    गुरु ने सभी शिष्यों को धीरज रखने का सुझाव दिया.

    कुछ समय के बाद जब अन्य गुट का शिष्य भी खाली हाथ लौटकर आया तो शिकायत करने वाला गुट बहुत ही हैरान व चकित हुआ. शिष्य ने गुरु को प्रणाम किया और बोला, “गुरुजी! आपको निराश करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ. मैंने समूचा गाँव ढूँढा पर मुझे एक भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला.”

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   अपने साथी की उक्ति सुनकर शिकायत करने वाला गुट खूब ज़ोर से हँसा. 

   पर दूसरे गुट के शिष्य ने अपने कथन की व्याख्या करते हुए कहा, “गाँव के प्रत्येक वासी ने कोई न कोई अच्छा कार्य अवश्य किया है. मेरी असफलता के लिए मुझे क्षमा कीजिए.” ऐसा कहकर उसने गुरु की अनुमति ली और वहाँ से चला गया. 

   शिष्य के जाने के बाद गुरु अपने स्तंभित व चकित शिकायत करने वाले शिष्यों से बोले, “मेरे प्रिय भक्तों! हमारा विवेक अच्छा व बुरा, सही व गलत, सकारात्मक व नकारात्मक में भेद करने की क्षमता रखता है. जब हम हर चीज़ में अच्छाई की चिंगारी देखते हैं तब हमारे विवेक का और अधिक विकास होता है. इसके विपरीत दूसरों में खोट देखने पर हमारा विवेक मुरझा जाता है. 

     सीख: 

   यह संसार खुशी व दुःख का मिश्रण है. जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारे विवेक पर निर्भर करता है. जीवन में सकारात्मक प्रवृत्ति रखने वाले लोग शीघ्र प्रगति करते हैं और नकारात्मक प्रवृत्ति रखने वाले, यदि अग्रसर होते हैं तो, बहुत ही धीमी गति से होते हैं. गुरु के लिए सभी निकट व प्रिय हैं. यदि शिष्य स्वयं को गुरु से दूर पाता है तो उसमें दोष शिष्य का ही है. 

   “तुम जितना स्वयं को और मुझे एक समझोगे, तुम्हारा विकास भी उतना ही होगा. तुम्हारे सारे कर्म इसी मूलभूत समझ के अनुरूप होने चाहिए.”

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     अनुवादक- अर्चना   

    हमारे बनाए खाने पर हमारे विचार प्रभाव डालते हैं

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   आदर्श: धार्मिकता 

  उप आदर्श: विचारों में शुद्धता 

   मैसूर राज्य में मलूर नामक स्थान पर एक धार्मिक ब्राह्मण रहता था जो एक महान विद्वान् था. उसकी पत्नी भी उसी के समान धार्मिक थी. वह सदा पूजा और जप-ध्यान के लिए तत्पर रहता था और अपने सच्चरित्र के लिए दूर-दूर तक प्रख्यात था. एक दिन नित्यानंद नामक संयासी उसके दरवाज़े पर भिक्षा माँगने आए.

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संयासी को अपने घर देखकर ब्राह्मण अत्यंत खुश हुआ. उसने संयासी को अपने घर अगले दिन भोजन करने का आमंत्रण दिया ताकि वह अपने अतिथि-सत्कार से उसका सम्मान कर सके. संयासी के स्वागत के लिए ब्राह्मण ने अपने घर के दरवाज़ों पर हरे रंग की तोरण लगाई और अन्य विस्तृत व्यवस्था की. परन्तु आखिरी समय में किसी कारणवश उसकी पत्नी अपने माननीय अतिथि के लिए खाना बनाने में समर्थ थी. एक पड़ोसी महिला ने स्वेच्छा से ब्राह्मण के घर खाना बनाने में अपनी मदद पेश की. ब्राह्मण की पत्नी ख़ुशी-ख़ुशी पड़ोसी को अपने घर लेकर आई और रसोईघर से परिचित कराया.

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    अगले दिन सब कुछ भली भाँती निबट गया और सभी भोजन की व्यवस्थाओं से प्रसन्न और संतुष्ट थे. केवल, किसी कारणवश भोजन के दौरान संयासी अपनी प्लेट के पास रखे चांदी के कटोरे को चुराने की अत्यधिक तीव्र इच्छा के शिकार हो गए. अपनी सर्वश्रेष्ठ सचेत कोशिशों के बावजूद वह बुरा भाव नित्यानंदजी पर हावी हो गया और कटोरे को अपनी पोशाक में छुपाकर वह झटपट घर लौट आए. अपनी इस हरकत के बाद संयासी रात भर सो नहीं पाए क्योंकि उनकी अंतरात्मा उन्हें लगातार कोस रही थी. संयासी को लगा कि उन्होंने अपने गुरु का अपमान किया है और उन सभी ऋषिओं का निरादर किया है जिनका उन्होंने, मन्त्र उच्चारण करते समय, आह्वान किया था. वह तब तक बेचैन रहे जब तक कि उन्होंने ब्राह्मण के घर वापस जाकर, उसके पैरों में गिरकर और आँखों में पश्चाताप के आँसू लेकर चांदी का कटोरा वापस नहीं कर दिया. 

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   सभी हैरान थे कि नित्यानंद जैसा महात्मा इतना नीचे कैसे गिर सकता था. किसी ने सुझाव दिया कि संभवतः यह दोष खाना बनाने वाले व्यक्ति के माध्यम से भोजन में संचारित हुआ होगा. तत्पश्चात खाना बनाने वाली पड़ोसी की जीवनी का विवरण किया गया और लोगों ने पाया कि वह एक अदम्य चोर थी. अतिसूक्ष्म संपर्क द्वारा उस महिला की चोरी करने की प्रवृत्ति ने उसके पकाये खाने को प्रभावित किया था. इसी कारण साधकों को उपदेश दिया जाता है कि एक निश्चित अवस्था पर पहुँचने तक उन्हें फल व कंद पर ही जीवन निर्वाह करना चाहिए.

     सीख:

   ऐसा कहा जाता है कि जब भोजन प्रेम व अनुकूल विचारों से बनाया जाता है तब वह गुणकारी होता है और स्वाद में सर्वश्रेष्ठ होता है.

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     अनुवादक- अर्चना