प्राण का महत्व- जीवनशक्ति 

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      आदर्श: शाश्वत सत्य 

    उप आदर्श: ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण 

    एक समय ६ जिज्ञासु थे जो सत्य व बुद्धिमत्ता की तलाश में दूर-दूर विभिन्न जगहों की यात्रा कर रहे थे. कई लम्बी यात्राओं के बाद उन्होंने एक ऋषि के बारे में सुना जो उन्हें उनकी खोज में मदद करने के योग्य था. ऋषि से मिलने सभी जिज्ञासु घने जंगल में एक कुटिया में पहुँचे. ऋषि ने उनसे कहा कि उसके साथ १ वर्ष रहने के बाद वह उससे अपनी इच्छानुसार प्रश्न पूछ सकते हैं. जिज्ञासु सहमत हो गए और उस ऋषि के शिष्य बन गए. 

   एक साल के बाद १ जिज्ञासु ने ऋषि से पूछा, “शरीर का पोषण करने के लिए किस ज्ञानेन्द्रिय की सबसे अधिक महत्ता है?”

    प्रश्न के उत्तर में ऋषि ने उन्हें एक कहानी सुनाई:

     एक समय पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ थीं: श्रवण, दृष्टि, गंध, स्वाद और स्पर्श. एक दिन पाँचों बैठकर अपनी-अपनी क्षमताओं के बारे में बात करने लगीं. अपनी अहमियत व योग्यता के विषय में ज्ञानेन्द्रियों को थोड़ा घमंड था और वह शरीर की शासक होने का दावा कर रहीं थीं. उन्होंने ज़ोर देकर दृढ़तापूर्वक कहा, “हमें देखो, हम असामान्य रूप से विशिष्ट हैं.” वह डींग मारते हुए बोलीं, “हमारे बिना शरीर किसी भी तरह जीवित नहीं रह सकता है.”

  प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया. श्रवण ने हर तरफ ऐसा मनमोहक संगीत फैलाया जो भावनाओं व वासनाओं को अभिव्यक्त करने वाला था. संगीत की बराबरी करते हुए, दृष्टि ने उत्कृष्ट रंगों के उतार-चढ़ाव में दिलकश मुद्राओं की अद्भुत भव्यता प्रदर्शित की. गंध ने क्षणभर में चारों ओर दिव्य व उत्तम सुगंध फैला दी. अन्य ज्ञानेन्द्रियों से बेहतर परिणाम दिखाने के लिए, स्वाद ने भरपूर मात्रा में मुँह में पानी लाने वाले विशिष्ट स्वाद की श्वास छोड़ी. प्रत्येक श्वास में सौम्य उत्साह व मधुर शीतलता के सिहरन से स्पर्श ने सम्पूर्ण शरीर को सजीव कर दिया. सभी आपस में एक-दूसरे के लिए प्रशंसा लुटा रहे थे. अपने आप में यह एक दृश्य था. 

  इस अद्भुत तमाशे को देखते हुए प्राण चुपचाप धीरे-धीरे श्वास अंदर-बाहर कर रहा था. प्राण शरीर में बस, विद्यमान था. श्वास लेते समय वह ज्ञानेन्द्रियों को ग़ौर से देखता था और श्वास छोड़ते समय भी वह ज्ञानेन्द्रियों का अनुपालन कर रहा था. कुछ देर ज्ञानेन्द्रियों को ध्यान से देखने के बाद प्राण बोला, “तुममें से किसी का भी शरीर पर सबसे अधिक आधिपत्य नहीं है.” लेकिन प्राण की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. ज्ञानेन्द्रियों के पास अन्य किसी बात के लिए समय ही नहीं था. वह अपने अतिरिक्त हर चीज़ से बेख़बर थीं और प्राण की ओर उनका ज़रा भी ध्यान नहीं था. प्राण ने पुनः चेष्टा की. परन्तु ज्ञानेन्द्रियाँ स्वयं में इस हद तक तल्लीन थीं कि इस बार भी उन्होंने प्राण को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया. क्रोधित होकर प्राण चला गया.

 प्राण के जाते ही ध्वनि, रंग, खुशबू, स्वाद, शारीरिक अनुभूति और चित्त, सभी फीके पड़ने लगे और धीरे-धीरे लुप्त हो गए. ज्ञानेन्द्रियों का अस्तित्व समाप्त हो गया. जब प्राण वापस आया तब उन्हें अपने अस्तित्व का आभास हुआ. प्राण की अनुपस्थिति में ज्ञानेन्द्रियों की अपनी कोई पहचान नहीं थी और वह कमज़ोर व भयभीत थीं.

    प्राण फिर से वापस आया और एकाएक सभी ज्ञानेन्द्रियाँ प्राण के प्रति सचेत हुईं. बिजली के स्विच के समान, यह प्राणाधार शक्ति उन्हें चालू कर रही थी और बुझा रही थी. उनका इस पर कोई नियंत्रण नहीं था परन्तु उस ऊर्जा का उनपर पूरा प्रभुत्व था. इस जागरूकता के साथ उन्हें तुरंत अहसास हुआ कि उनका अस्तित्व प्राण के कारण था और यह प्राणाधार शक्ति उनसे कहीं अधिक बलवान थी. ज्ञानेन्द्रियों को समझ में आया कि शरीर किसी भी प्रकार से उनके अधीन नहीं था. शरीर पूर्णतया प्राण के वश में था.   

   जब वह सम्मान से प्राण के समक्ष झुकीं तब प्राण बोला, “स्वयं को पाँच भागों में बाँटकर और समस्त शरीर में फैलाकर, मैं अपना रूप बदलता हूँ और स्वतः ज्ञानेन्द्रियों की सृष्टि करता हूँ. इस प्रकार मैं शरीर को जीवन प्रदान करता हूँ.”

    सीख:

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   इस कहानी में प्राण महाप्राण है और अपान, प्राण, समन, उदान व वयान पाँच उप-प्राण हैं. शक्ति के यह पाँच उप-वर्ग शरीर के विभिन्न भागों को दर्शाते हैं. अपान, श्रेणि से नाभि तक होता है; प्राण का बहाव हृदय से कंठ तक होता है; समन, मध्यपट में नाभि से हृदय की ओर संचालित होता है; उदान- सर, बाहों व टांगों में होता है; व्यान, पूरे शरीर भर में होता है. इस कहानी को सुनाने के बाद क्या हमारे भीतर का अचेत अंश किसी स्तर पर सहज-बोध से कहानी का सन्देश समझ सकता है? किसी मलिन गंध का सामना करने पर हम स्वाभाविक रूप से क्या करते हैं?   हम सांस रोक लेते हैं- सांस के अभाव में गंध महसूस नहीं होती है. कुछ बेस्वाद खाने पर भी हम सांस रोक लेते हैं- सांस की अनुपस्थिति में हमें स्वाद का आभास नहीं होता है. ज्ञानेन्द्रियों व चित्त का जन्म प्राण से होता है, वह प्राण के अभिव्यक्ति हैं और वापस प्राण में समाहित हो जाते हैं. वास्तव में, हर रात गूढ़ निद्रा की अवस्था में ज्ञानेन्द्रियाँ व चित्त प्राण में सम्मिलित हो जाते हैं. गूढ़ निद्रा हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. ज्ञानेन्द्रियों व चित्त की निरंतर क्रियाशीलता हमारी जीवन-शक्ति चूसकर हमें कमज़ोर बनाती है. यदि हम रात को बेचैन रहते हैं और बहुत सारे सपनों का अनुभव करते हैं तो हमारी नींद ताज़गी देने वाली नहीं बल्कि थकानेवाली कहलाती है. गूढ़ निद्रा ताज़गी देने वाली व स्फूर्तिदायक होती है. मगर गूढ़ निद्रा के दौरान हम सचेत नहीं होते हैं.

   ध्यान व तपस्या के माध्यम से ज्ञानेन्द्रियों व चित्त की निरंतर चहक से जागरूकता को अलग करना संभव है. ऐसा करने से हम प्राण के प्रति पूर्णतया सचेत रहकर उसी स्थायी विश्रांति का अनुभव कर सकते हैं जैसी हमें गूढ़ नींद में होती है. अगर हम ध्यान देकर सुनेंगे तो हम जीवन के श्वास, प्राण, के संगीत की ध्वनि सुन पाएंगे.

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  अनुवादक- अर्चना 

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       आनंद का रहस्य – हर्षित किसान 

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     आदर्श: उचित आचरण 

     उप आदर्श : प्रेम से अपने कर्तव्य का पालन करना, आनंद का रहस्य 

    एक राजा एक बार रूप बदलकर अपने साम्राज्य के सबसे अधिक प्रसन्न व्यक्ति का पता लगाने निकला. 

    सैकड़ों लोगों को मिलने के बाद आखिरकार उसे एक गरीब किसान दिखा जो खेत में हल चलाते हुए आनंदपूर्वक गाना गा रहा था. किसान के चेहरे पर इतनी दीप्तिमान ख़ुशी थी कि राजा का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हुआ.

    राजा किसान से बोला, “प्रिय मित्र, मुझे अपनी ख़ुशी का रहस्य बताओ.”

     किसान बोला, “यह तो बहुत ही सरल है. अपनी कमाई के चौथाई भाग से मैं अपने ऋण का भुगतान करता हूँ; चौथाई भविष्य में निवेश करता हूँ; चौथाई दान-पुण्य में देता हूँ और चौथाई अपने कर्तव्य पर खर्च करता हूँ.”

    किसान की बात सुनकर राजा बिल्कुल चकित था. उसने किसान से और अधिक विवरण देने का अनुरोध किया. 

     “मेरे माता-पिता ने मुझे जीवन रुपी उत्कृष्ट उपहार दिया है और मैं उनके प्रति अथाह कृतज्ञता का ऋणी हूँ. अब मैं उनका पोषण करता हूँ और वृद्धावस्था में उनका ध्यान रखता हूँ. मेरी कमाई का चौथाई हिस्सा इस ऋण के भुगतान पर खर्च होता है.”

      “मेरे बच्चे भविष्य का प्रतीक हैं. अपनी आमदनी का चौथाई मैं उनके भोजन, कपड़े व शिक्षा पर खर्च करता हूँ. यह मेरा भविष्य में निवेश है.”

      “यद्यपि मैं गरीब हूँ परन्तु ऐसे भी लोग हैं जो मुझ से भी अधिक दरिद्र हैं. अपनी क्षमता के अनुसार मैं उनकी सहायता करता हूँ. इस कारण मेरी कमाई का चौथाई दान पर खर्च होता है.” 

“मेरी पत्नी मुझपर भरोसा करती है. मेरा कर्तव्य है कि मैं जीवनभर उससे प्रेम करूँ और उसकी रक्षा करूँ. मेरी आमदनी का चौथाई हिस्सा उसे एक अच्छा घर देने में खर्च होता है.”

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      सीख:

     वास्तविक ख़ुशी भगवान्, परिवार व दूसरों के प्रति हमारे दायित्व निभाने से मिलती है न कि धन, नाम व कीर्ति के पीछे भागने से.

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      अनुवादक- अर्चना 

  नन्हे मार्ग पर चलना

       

     आदर्श: प्रेम

    उप आदर्श: सहानुभूति, अनुकम्पा, शुद्ध इरादा 

     एक व्यक्ति ने एक बार स्वप्न में देखा कि वह स्वर्गलोक के द्वार पर खड़ा है. अपने सपने में उसने विविध जीवात्माएं देखीं जो सुनहरे द्वार की ओर जा रही थीं और स्वर्गलोक में प्रवेश होने की अनुमति माँग रही थीं.

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      सुनहरे द्वार पर खटखटाने वाली पहली जीवात्मा एक ज्ञानी पंडित की थी. “मुझे अंदर आने दो” ,पंडित ने स्वर्गलोक के प्रवेशद्वार पर पहरा दे रहे देवदूत से कहा. “दिन-रात पावन शास्त्रों का अध्ययन करने के फलस्वरूप मैंने स्वर्गलोक में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त किया है.”   

      देवदूत बोला, “रूको! हम अपने भौतिक अभिलेखों को देखकर इस बात की जाँच करेंगे कि तुमने शास्त्रों का अध्ययन प्रभु की भक्ति में किया है या सामाजिक सराहना व प्रशंसा के लिए.”

     द्वार पर अगली आत्मा एक धार्मिक पुरुष की थी. “मुझे अंदर आने दो, “उसने देवदूत से कहा. “मैंने कई निराहार व्रत किए हैं.”

     देवदूत बोला, “रूको! हम पहले छानबीन करेंगे कि तुम्हारी मंशा कितनी पवित्र थी.”

    फिर एक बहुत ही साधारण सा व्यक्ति आया और विनम्रता से बोला, “क्या मुझे अंदर आने की अनुमति मिल सकती है?”

    देवदूत ने उससे पूछा, “बताओ तुमने अपनी ज़िन्दगी के साथ क्या किया है.”

    हिचकिचाते हुए वह व्यक्ति बोला, “मैंने अपनी रोटी के कुछ टुकड़े प्रतिदिन एक भ्राता के साथ बाँटे हैं, जो लंगड़ा था और अपनी जीविका कमाने में असमर्थ था. मैं उसका घर साफ़ करता था और हर रोज़ उसके पानी का जग भरता था. मैं भगवान् से प्रार्थना करता था, “प्रिय प्रभु, मुझे उन लोगों का सेवक बनाइए जो पीड़ित व दुखी हैं.”

    देवदूत उस व्यक्ति से बोला, “नश्वर जीवों में तुम सबसे भाग्यवान हो. अपने नन्हे मार्ग पर चलकर तुमने अमरत्व हासिल किया है. स्वर्गलोक के द्वार तुम्हारे लिए खुले हैं.”

      सीख:

     दरिद्र व ज़रूरतमंदों की मदद करना, प्रभु के योग्य अधिकारी होने के समान है. मानव सेवा माधव सेवा है. गरीब व ज़रूरतमंद में प्रभु को देखो.

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      अनुवादक- अर्चना 

संत ज्ञानेश्वर का नामदेव से मिलने जाना 

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नामदेव

  आदर्श: शाश्वत सत्य 

  उप आदर्श: सब एक हैं

   नामदेव एक भक्तिपरक व्यक्ति थे और सदैव प्रभु के गुणगान में मग्न रहते थे. इस कारण वह अपने पारिवारिक कर्त्तव्यों की ओर ध्यान नहीं देते थे. उनकी बहन जनाबाई ने उन्हें सलाह दी कि वह किसी धनवान व्यक्ति से पैसे उधार लेकर कपड़े बेचने का व्यापार करें और उससे जीविका कमाएं. 

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   नामदेव सहमत हो गए और कपड़े बेचने एक गाँव से दूसरे गाँव जाने लगे. अपने सफ़र के दौरान एक गाँव में सभी ग्रामवासियों को रोते देखकर वह उनसे उनकी वेदना का कारण पूछने लगे. गाँववालों ने नामदेव को बतलाया कि डाकुओं ने उनके गाँव को लूट लिया था और वह सब अन्न, धन व कपड़ों से वंचित थे.

  ग्रामवासियों की दयनीय अवस्था देखकर नामदेव सारे कपड़े मुफ़्त में वितरित कर देते हैं. नामदेव को खाली हाथ घर लौटते देखकर उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर अपने मायके चली जाती है. नामदेव को अपनी पत्नी व बच्चों से अलग देखकर जनाबाई पीड़ायुक्त होकर विलाप करती है और कृष्ण से प्रार्थना करती है. 

   नामदेव को अपने साथ उत्तरी भारत की तीर्थयात्रा कराने के इरादे से संत ज्ञानेश्वर नामदेव से मिलने आए हुए थे. जनाबाई को रोते देखकर उन्होंने पूछा, “क्या बात है, जनाबाई? “naam1

   जनाबाई बोली, “भइया, अपने बच्चों को दुखी देखकर क्या भगवान् को ख़ुशी मिलती है?”

   ज्ञानेश्वर पूछते हैं, “क्या यह तुम बोल रही हो?”

   जनाबाई बोली, “आपने देखा नहीं नामदेव के साथ प्रभु कितनी बेरहमी से पेश आए हैं?”

“बहन, तुम भूल रही हो कि यह सब मात्र एक स्वप्न है. एक केवल ईश्वर ही है जो देता है. जना, यह सब विट्ठल की माया है- जिसने लूटा है वह विट्ठल है; जिसको लूटा है वह विट्ठल है; नामदेव, जिसने मदद की है वह भी विट्ठल है; तुम, जो रो रही हो वह भी विट्ठल है; समस्त संसार विट्ठल है. जब तुम्हें इसका अहसास हो जाएगा तब तुम कभी परेशान नहीं होगी.”

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   सीख:

   शाश्वत सत्य यह है कि ईश्वर सर्वव्यापी है और समस्त संसार ही ईश्वर है. कहीं भी द्वैतवाद नहीं है. हम जो भी देखते या अनुभव करते हैं, सब एक ही है.

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    अनुवादक- अर्चना 

    बरसाती दिन, सूर्यवत दिन 

    आदर्श: आशावाद 

    उप आदर्श: दृष्टिकोण 

    एक समय एक वृद्ध महिला थी जो हर समय रोती रहती थी. महिला की ज्येष्ठ बेटी छाते के व्यापारी से विवाहित थी जबकि उसकी कनिष्ठ बेटी की शादी सेवईं बेचने वाले से हुई थी.

     सूर्यवत दिनों में चिंताग्रस्त होकर वह महिला शोक प्रकट करती, “हे भगवान! आज तो मौसम बहुत ही अच्छा व गरम है. ऐसे day3मौसम में कोई भी छाता नहीं खरीदेगा. क्या होगा अगर मेरी बेटी को दुकान बंद करनी पड़ जाएगी? ” इस प्रकार के विचार उसे दुखी व उदासीन कर देते थे और वह रोए बिना रह नहीं पाती थी. 

   

जब बारिश होती थी तब वह अपनी छोटी बेटी के लिए रोती थी. “मेरी छोटी बेटी की शादी तो एक सेवईं बेचने वाले से हुई है. बारिश के इस मौसम में सूरज के बिना वह सेवईं सूखा नहीं पाएगी. उनके पास बेचने के लिए सेवईं ही नहीं होगी. अब क्या होगा?”

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     इस प्रकार लगातार चिंता करने के कारण वह महिला प्रतिदिन दुखी रहती थी. मौसम चाहे कैसा भी हो वह अपनी किसी एक बेटी के लिए शोक मना रही होती थी. उसके पड़ोसी उसे सांत्वना देने में असमर्थ थे और मज़ाक में उसे “रोंदू’ बुलाते थे.  

     एक दिन महिला की मुलाक़ात एक साधु से हुई. वह यह जानने के लिए बहुत उत्सुक थे कि वह महिला हमेशा रोती क्यों रहती थी. महिला ने साधु से अपनी समस्या बतलाई. साधु धीरे से मुस्कुराए और बोले, “महोदया! आप चिंता न करें. मैं आपको खुश रहने का रास्ता दिखाऊँगा. आपको दुखित होने की कोई आवश्यकता नहीं है.”

    सन्यासी की बात सुनकर रोंदू महिला बहुत खुश हुई. उसने तुरंत सन्यासी से पूछा कि उसे क्या करना चाहिए. साधु बोले, “यह बहुत ही सहज है. आपको केवल अपना दृष्टिकोण बदलने की ज़रुरत है. सूर्यवत दिनों में अपनी जयेष्ठ बेटी के छाते बेचने की असमर्थता के विषय में मत सोचो. इसके बदले अपनी छोटी बेटी के सेवईं सूखाने की समर्थता के बारे में सोचो. इतनी अच्छी व तेज़ धूप में वह ढेर सारी सेवईं बना सकती है और इससे उसके कारोबार में बढ़ोतरी होगी. बारिश होने पर अपनी जयेष्ठ पुत्री की छाते की दुकान के बारे में सोचो. बारिश के मौसम में हर कोई छाता खरीद रहा होगा. वह बहुत सारे छाते बेच पाएगी और उसकी दुकान खूब फले-फूलेगी.” 

   महिला को ज्ञान का बोध हुआ. उसने साधु की हिदायत का अनुसरण किया. कुछ समय के बाद उसका रोना बंद हो गया और अब वह सदा मुस्कुराती रहती थी. उस दिन के बाद से उसका नाम “हँसमुख महिला” पड़ गया.

     सीख:

    जब हम किसी परिस्थिति का सामना सकारात्मक दृष्टिकोण से करते हैं, हम उसे बेहतर संभाल सकते हैं और हमेशा ख़ुशी का अहसास करते हैं.

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     अनुवादक- अर्चना 

  पदचिन्हों की प्रार्थना 

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       आदर्श: प्रेम

   उप आदर्श: विश्वास, प्रभु की इनायत 

    एक रात मैंने एक सपना देखा…….मैंने देखा कि समुद्रतट के किनारे मैं प्रभु के साथ टहल रहा था और आसमान में हर तरफ मेरे जीवनकाल की विभिन्न घटनाएँ प्रदर्शित हो रही थीं. प्रत्येक घटना के दौरान मैंने रेत पर पदचिन्हों के दो जोड़े देखे : जिसमें से एक मेरा था और दूसरा प्रभु का. foot4जब मेरे जीवन की अंतिम घटना प्रसारित हो रही थी, मैंने मुड़कर रेत पर पड़े पदचिन्हों को देखा. मैंने पाया कि मेरे जीवन की राह में कई बार पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा था. पदचिन्हों के एक जोड़ों को गौर से देखने पर मुझे अहसास हुआ कि ऐसा मेरे जीवन के सबसे अधिक दुखद व उदासीन समय में था. पदचिन्हों का एक जोड़ा देखकर मैं बहुत परेशान था और मैंने इस विषय में प्रभु से प्रश्न किया. 

 “प्रभु, आपने कहा था कि एक बार जब मैं आपका अनुसरण करने का निश्चय करूँगा तब आप सदा मेरे साथ रहेंगें;  परन्तु मेरे जीवन की सबसे अधिक कष्टप्रद परिस्थितियों में मैंने पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा देखा है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जब मुझे आपकी सबसे अधिक ज़रुरत थी, आपने मेरा साथ क्यों छोड़ दिया.”

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   प्रभु ने उत्तर दिया, “मेरे प्रियतम व अनमोल बच्चे. मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे मुसीबत व आपत्ति के समय में मैं कभी भी तुम्हारा साथ नहीं छोडूँगा. तुमने जब-जब पदचिन्हों का एक जोड़ा देखा है तभी वह समय था जब मैंने तुम्हें अपने पास उठाया हुआ था.”

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     सीख:

    भगवान् के प्रति आस्था, प्रेम व निष्ठा रखने से वह कभी भी हमारा त्याग नहीं करते हैं. वह हमारी परेशानियाँ पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं करते परन्तु कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त साहस व सहारा अवश्य देते हैं. वह हमारा मार्गदर्शन करते हैं और दुःख व आपत्ति के समय में हमें सँभालते हैं.

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    अनुवादक- अर्चना    

      गाँव वाला और एक सुखी व्यक्ति 

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     आदर्श: शांति 

    उप आदर्श: मन को शांत करना

     एक घाटी के छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था जो सदा खुश रहता था और सब के प्रति दयालु व सहानुभूतिशील रहता था. वह हमेशा मुस्कुराता रहता था और जब भी ज़रुरत होती थी सदा विनम्र व उत्साहपूर्वक शब्द बोलता था. उससे मिलने के बाद सभी खुश हो जाते थे. लोगों को उस पर भरोसा था और सभी उसे अपना विशेष मित्र समझते थे. 

    एक ग्राम वासी इस व्यक्ति के हमेशा खुश रहने के रहस्य को जानना चाहता था. वह हैरान था कि कैसे इस व्यक्ति के मन में किसी के भी प्रति द्वेष नहीं था और वह सदा प्रसन्नचित्त रहता था.

    एक बार यह जिज्ञासु व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को राह चलते मिल गया और उससे पूछा, “हमारे आसपास अधिकतर लोग स्वार्थी व असंतुष्ट हैं. तुम्हारी तरह वह हर समय मुस्कुराते नहीं हैं; और न ही तुम्हारी तरह वह मेहरबान व मददगार हैं. इसका क्या कारण है?”   

   उसने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जब तुम अपने अंदर शांति स्थापित करते हो, तुम समस्त विश्व के साथ शान्ति कायम कर सकते हो. अगर तुम अपनी अंतरात्मा को पहचान सकते हो, तुम सबके भीतर की आत्मा को भी पहचान लोगे और तब सबके प्रति दयालु व विनम्र होना तुम्हें स्वाभाविक प्रतीत होगा. यदि तुम्हारे विचार तुम्हारे नियंत्रण में हैं तो तुम प्रबल व सुदृढ़ बनोगे. तुम्हारा व्यक्तित्व एक रोबोट के समान है जो कुछ नियत कार्य करने के लिए योजनाबद्ध होता है. तुम्हारे विचार व स्वभाव साधन हैं जो तुम्हारे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. इनसे स्वयं को स्वाधीन करने पर तुम्हारे भीतर की अच्छाई व ख़ुशी प्रकट होगी.”

    अपने साथी की बात सुनकर ग्रामवासी शोक प्रकट करते हुए बोला, “पर उसके लिए बहुत सारा कार्य करना पड़ेगा. हमें अच्छी व अनुकूल आदतें विकसित करनी पड़ेंगी. ध्यान केंद्रित करने तथा विचारों को नियंत्रित करने की क्षमता सुदृढ़ करनी होगी. सफल होने के लिए कार्य कठिन व अनंत हैं. बहुत सारी बाधाएं पार करनी पड़ेंगी. यह कोई सरल कार्य नहीं है.”  

    “कठिनाइयों के बारे में मत सोचो वरना तुम सब कुछ वैसा ही देखोगे और उसी प्रकार से अनुभव करोगे. अपनी भावनाओं व विचारों को शांत करो और इसी शान्ति की अवस्था में स्थिर रहने की चेष्टा करो. तुम केवल निश्चल रहो और अपने विचारों को स्वयं पर हावी मत होने दो.”

   “मुझे बस इतना ही करना है? ” ग्रामीण ने पूछा. 

   “अपने विचारों पर विशेष निगरानी रखो और ध्यान दो कि वह कैसे आते और जाते हैं. इससे उत्पन्न शांति में स्थिर रहो. शुरूआत में शांति के पल संक्षिप्त होंगे पर समय के साथ यह पल लम्बे समय तक बरकरार रहेंगे. यह शान्ति शक्ति, सामर्थ्य, करुणा और प्रेम है. समय के साथ तुम्हें अपनी और सर्वव्यापी शक्ति में एकता का अहसास होगा और यह तुम्हें एक अलग ही दृष्टिकोण से काम करने का रास्ता दिखाएगा. यह नया पहलू स्वार्थी व संकुचित अहम् का नहीं होगा बल्कि चेतना का होगा. ”

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   ग्रामवासी बोला, “मैं तुम्हारा कथन याद रखने की कोशिश करूँगा. पर मैं एक और बात को लेकर उत्सुक हूँ. ऐसा प्रतीत होता है कि तुम परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते हो. तुम्हारे पास सबके लिए विनम्र वचन हैं और तुम सदा सहायक रहते हो. लोग तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और तुम्हारी अच्छाई का कभी शोषण नहीं करते हैं.”  

     “ज़रूरी नहीं है कि अच्छा व हितैषी होना कमज़ोरी का संकेत है. एक अच्छे व्यक्ति होने के साथ तुम सशक्त भी बन सकते हो. लोग तुम्हारी भीतरी शक्ति महसूस कर लेते हैं और इस कारण तुम पर हावी नहीं होते हैं. जब तुम सशक्त व भीतर से शांत होते हो, तुम दूसरों की मदद करते हो क्योंकि तुम सहायता करना चाहते हो और मदद करने की सक्षमता रखते हो. तुम निर्बलता से नहीं बल्कि शक्ति के फलस्वरूप काम करते हो. अच्छाई दुर्बलता का प्रतीक नहीं है जैसा कि कुछ लोगों की ग़लतफहमी है. ताकत व क्षमता से साथ भी अच्छाई  ज़ाहिर की जा सकती है.”

  “तुम्हारे उपदेश व स्पष्टीकरण के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद” , ग्रामीण बोला और खुश व संतोष होकर घर लौट गया.

   सीख:

    हमें स्वयं में विश्वास रखना चाहिए और सही कार्य काने के लिए भीतरी शक्ति व आस्था विकसित करनी चाहिए. मन की शान्ति के फलस्वरूप अन्य आदर्श जैसे प्रेम व धार्मिकता भी प्रदर्शित होते हैं.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना