अच्छी संगत के लाभ

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    एक गुरु ने अपने शिष्य को वह सब सिखाया जितना उन्हें ज्ञात था. सभी धर्मग्रन्थ सिखाने के बाद उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि आखिरी सीख के लिए उसे पास के आश्रम में जाना होगा. अंतिम शिक्षा के लिए उन्होंने शिष्य से एक अन्य गुरु के पास जाने को कहा. शिष्य चकित था कि उसके गुरु दूसरे गुरु से अधिक सुशिक्षित होने के बावजूद उसे किसी अन्य गुरु के पास क्यों भेज रहे थे. 

    यद्यपि वह असमंजस में था पर फिर भी उसने अपने गुरु की आज्ञापालन करने का निश्चय किया और दूसरे गुरु को मिलने पास के आश्रम में गया. उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि दूसरे गुरु ने शिक्षा देना बंद कर दिया था. वह अपने शिष्यों को प्रेम से भोजन परोसने, उनका अवशिष्ट भोजन साफ़ करने व बर्तन धोने में मगन थे. 

    दूसरे गुरु का व्यवहार देखकर शिष्य को समझ में आया कि प्रेमपूर्वक सेवा करने का अर्थ क्या होता है. इसके बाद उसने कुछ और अति गंभीर चीज़ देखी. रात में सोने से पहले गुरु ने स्वयं बर्तन धोकर उन्हें सही क्रम में रखा. 

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    अगली सुबह वह बर्तनों को निकालकर, उन्हें पुनः धोकर खाना बनाना शुरू करते थे. शिष्य चकित था कि गुरु को सुबह फिर से बर्तन धोने की क्या ज़रुरत थी जब वह पहले ही रात को उन्हें अच्छी तरह से धो चुके थे और बर्तन गंदे भी नहीं थे. शिष्य ने इस प्रकार सारे विवरणों को ध्यान से देखा और अपने पहले गुरु को उनका बयान देने वापस गया. 

      उसने कहा, “गुरूजी, मैं यह विचित्र बात समझ नहीं पा रहा हूँ कि आश्रम में गुरु पहले से ही धुले बर्तनों को सुबह पुनः क्यों धोते हैं? ऐसा करने का क्या कारण हो सकता है? “   

   गुरु ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं चाहता था कि तुम इसी समझ को ग़ौर से देखो और पूरी तरह से समझो.”

    तुम अपने मनस को नियमित रूप से शुद्ध करते हो परन्तु राह चलते कोलाहल, अस्पष्ट व धूलित बूझ के रूप में तुम्हारा मनस धूल एकत्रित करने लगता है. अब यह मत कहना कि एक बार ध्यान लगाने के बाद तुम रूक जाते हो. जब तक तुम्हारा मनस धूल बटोरता है तब तक उसे लगातार साफ़ करना पड़ता है. यह हमारे मनस को स्वच्छ और शुद्ध करने की निरंतर प्रक्रिया है. 

     सारांश:

    प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य अपने वास्तविक आत्म का बोध करना है और अंत में उस स्त्रोत में विलीन होना है. जब तक हम अपने दैनिक कर्तव्यों, रिश्तेदारियों व अन्य सांसारिक गतिविधियों में बहुत अधिक उलझे रहते हैं; तब तक अपने वास्तविक आत्म के बारे में जानने का न हमारे पास समय होता है और न ही हम मनन करने का कष्ट करते हैं.

   हम स्वयं को हमेशा अपने शरीर और अपने आसपास बनाए संबंधों से जोड़ते हैं. बाद में शरीर के पीड़ित होने पर या फिर इन रिश्तों के छूट जाने पर हम दुखी होते हैं. इसका कारण यह है कि हम जिसके पीछे भागते हैं वह अनस्थिर व नश्वर है. इस तथ्य को समझना सहज नहीं है और इसे कहना आसान है पर करना मुश्किल है. 

  परन्तु सत्संग या अच्छे लोगों की संगत में, विवेकी व्यक्ति हमें कम से कम यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कौन हैं और हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है. एक गुरु या अच्छी संगत के बिना आत्म-बोध के पथ पर आगे बढ़ना आसान नहीं है. अतः आत्म-प्राप्ति के मार्ग पर अच्छी संगत पहला कदम है. यह हम अभी शुरू करेंगे तो पता नहीं कब या कितने जन्मों में अपना लक्ष्य सिद्ध कर पाएंगे. पर कम से कम इस पथ पर हमने यात्रा अवश्य आरम्भ कर दी होगी.

Source: saibalsanskaarhindi.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना 

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      सड़े हुए केले 

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        आदर्श: उचित आचरण 

    उप आदर्श: विलम्ब मत करो 

     नरीमन एक भला इंसान था. वह पूजा में बैठकर भगवान् से संपर्क बनाकर शक्ति व उत्प्रेरणा प्राप्त करता था. वह अपने समय और धन का काफ़ी बड़ा हिस्सा गरीबों की सेवा में लगाता था. जब भी अस्पताल में निःशुल्क चिकित्सा शिविर लगते थे, वह अपनी सेवा अवश्य प्रस्तुत करता था. वह ताज़े फल खरीदकर अस्पताल के गरीब मरीज़ों में बाँटता था और कभी-कभी मज़दूर वर्ग के बस्ती के बच्चों को सिनेमा या आइसक्रीम की दावत देता था. वह सेवा का हर कार्य इस प्रकार करता था मानो वह ईश्वर की सेवा हो. 

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    एक दिन उसने अपने पुत्र से कहा, “बेटा, आज मैं भगवान् को केला चढ़ाने मंदिर जा रहा हूँ. बाद में यह केले मैं भिखारियों में बाँट दूँगा जो मंदिर के बाहर बैठे होते हैं. तुम भी मेरे साथ क्यों नहीं आते? ”

    बालक ने आलस भाव से कहा, “अरे बाबा! यह मंदिर जाना और पूजा करना; यह सेवा का कार्यकलाप …..यह सब मेरे बस का नहीं है. आप बूढ़े हैं, बाबा. यह सब बूढ़े लोगों के लिए होता है. मैं अभी जवान हूँ और मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है. शायद आपकी तरह बूढ़े होने पर मैं इस बारे में सोचूँगा… पर अभी नहीं !”

  

  लड़के ने अपने वॉकमेन को पुनः ठीक किया और रैप संगीत की धुन पर झूमने लगा. नरीमन ने अपने पुत्र का कथन सुना पर पलटकर कोई उत्तर नहीं दिया. उसने जाकर अपने वितरण का काम संपन्न किया.

     कुछ दिनों के बाद नरीमन ने अतिपक्व केलों की टोकरी खरीदी और उसे घर के बाहर रखकर नहाने चला गया. 

    नरीमन के पुत्र की नज़र काले केलों पर पड़ी और उसने देखा की केलों पर कीड़े-मकोड़े मंडरा रहे थे. कुछ केले सड़ गए थे और कुछ काफ़ी भद्दे दिख रहे थे. नरीमन स्वच्छ व सफ़ेद कुरता-पैजामा पहनकर आया और केलों को गाड़ी में रखने लगा. पुत्र ने पूछा, ” बाबा, इन केलों को कहाँ ले जा रहे हो?”    

    “मंदिर, “ पिता ने बहुत ही सहजता से उत्तर दिया.

    “लेकिन बाबा, यह केले तो सड़े हुए हैं. मेरा मतलब यदि आपको इन्हें ईश्वर तो अर्पण करना ही था तो कम से कम ध्यान देते कि केले ताज़े हों. यह सब चिपचिपे व नरम हो चुके हैं. इन सब पर कीड़े भी फैल चुके हैं. इन्हें मंदिर में अर्पण करना लज्जाजनक होगा.”

    पिता बोले, “अगर तुम स्वयं को प्रभु को अर्पण करने के लिए अपने वृद्ध होने का इंतज़ार कर सकते हो; अगर तुम्हें लगता है कि वृद्धावस्था में तुम आकर्षक या प्रभु के भोग योग्य रहोगे तो यह पुराने और सड़े हुए केले ईश्वर को अवश्य ही अर्पण किये जा सकते हैं.”

    पुत्र अवाक रह गया. वह बहुत लज्जित था और पिता से आँख नहीं मिला पा रहा था. पिता को मालूम था कि उसका निशाना बिलकुल सही लगा था. नरीमन बोले, “जब तुम जवान व हृष्ट-पुष्ट होते हो, तुम ईश्वर के लिए काम कर सकते हो. तुम अपनी सेवा प्रस्तुत कर सकते हो. तुम ज़रूरतमंद लोगों के लिए समय व धन बचा सकते हो. 

    बूढ़े हो जाने पर तुम्हारे शरीर की अपनी समस्याएँ होंगी. तुम सेवा करने के लिए शायद शारीरिक रूप से स्वस्थ न हो. तुम्हारी आमदानी नहीं होगी, खर्चे कई होंगे और इस कारण आर्थिक रूप से मजबूर होगे. 

     बुढ़ापे में जब तुम गठिया या जोड़ों के सूजन के कारण पूजा में बैठने में असमर्थ होगे तब तुम प्रभु को क्या दे सकते हो? उस समय प्रभु के अनुग्रह की ज़रुरत तुम्हें पहले से कहीं अधिक होगी! ”

     ऐसा कहकर पिता ने सड़े हुए केलों का आखिरी गुच्छा गाड़ी में रखा और चले गए. उसने अपना पक्ष रख दया था और पता है वह कहाँ गया? नरीमन मंदिर नहीं गया क्योंकि उसे मालूम था कि वह केले ईश्वर को अर्पण करने योग्य नहीं थे. वास्तव में वह गोशाला गया जहाँ गुमराह गायें थीं और उसने उन्हें केले खिलाए. सड़े हुए केलों ने अपना काम सिद्ध कर लिया था. 

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   सीख:

   जब हम दूसरों कि मदद करने की अवस्था में होते हैं तब हमें मदद अवश्य करनी चाहिए. हमारी सहायता दूसरों के लिए उपकारी व सार्थक होनी चाहिए. हमें सही समय पर काम करना चाहिए ताकि हमारा काम अर्थपूर्ण हो. हमें अपने कार्य बाद के लिए टालने नहीं चाहिए.

    हमारे समय के एक बहुत ही महान गुरु; श्री सत्य साई बाबा कहते हैं कि, “एक पौधे को सांचे में ढाल सकते हैं परन्तु यदि हम   एक पेड़ को बदलने की कोशिश करेंगे तो वह टूट जाएगा.” साधारणतः जब बच्चे युवावस्था में आते हैं तब वह संसार, व्यवसाय, परिवार इत्यादि में फँस जाते हैं. परन्तु जिन बच्चों को अच्छे जीवन-मूल्य दिए गए होते हैं व ईश्वर से प्रेम करना सिखाया होता है वह कुछ समय के लिए उन्मत्त होने के बावजूद अपने मूल पर वापस अवश्य पहुँचते हैं. अतः हमें प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करके उनका धन्यवाद अदा करना चाहिए. बचपन से ही इस प्रकार का स्वभाव विकसित करने वाले बच्चे ज़्यादा संतुलित और शांत होते हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना भली-भाँति कर सकते हैं. वह आर्थिक व आध्यात्मिक रूप से भी अधिक सफल होते हैं.

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   अनुवादक- अर्चना 

  सूअर के रूप में इन्द्र

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   सभी देवताओं के राजा, इंद्र, एक बार आनंद के उपभोग की इच्छा से पृथ्वी पर आए. इंद्र ने सूअर का रूप धारण किया क्योंकि साधारणतः शारीरिक आनंद की दृष्टि से सूअर का रूप सर्वोत्तम माना जाता है. इंद्र ने अपने लिए एक ख़ूबसूरत सुअरिया देखी और उससे शादी करके कई दर्ज़न शिशु पैदा किए. समय के साथ वह उनसे बेहद सम्बद्ध व अनुरक्त हो गए.

    देवताओं ने इसे एक लघु आमोद यात्रा समझकर इंद्र का स्वर्ग में धीरता से इंतज़ार किया. परन्तु जब इंद्र काफ़ी समय तक नहीं लौटे तब देवतागण धरती पर आए और इंद्र की जीवन-शैली देखी. उन्होंने इंद्र से तर्क-वितर्क करने की कोशिश की ताकि वह सूअर का जीवन छोड़कर स्वर्ग वापस लौट जाएं. परन्तु इंद्र अपने जीवन में इतने अधिक संयुक्त व आसक्त थे कि वह घुरघुराकर वहाँ से चले गए.

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    देवताओं ने तब इंद्र के एक शिशु को मारने का निश्चय किया. उन्हें उम्मीद थी कि इस दुखद घटना से इंद्र को अपने वास्तविक स्वरुप का अहसास होगा और वह वापस लौट जाएँगे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ. हर एक शिशु के मरने पर इंद्र बाकी के शिशुओं को और अधिक कसकर जकड़ लेते थे. आखिरकार देवताओं ने इंद्र के सभी शिशुओं को मार दिया.

   जल्द ही इंद्र और अधिक शिशु पैदा करने में लग गए.  तब देवताओं को लगा कि इंद्र के मोह का वास्तविक कारण उनकी पत्नी है और इस कारण उन्होंने उसे मार दिया. पत्नी की मौत ने इंद्र को अत्यंत व्याकुल कर दिया. इंद्र का यह हाल देखकर उनके अन्य सूअर दोस्तों व रिश्तेदारों ने उन्हें पुनर्विवाह का सुझाव दिया. और सूअर का समस्त कार्यकलाप पुनः शुरू हो गया. 

   इंद्र की हालत देखकर देवतागण उलझन में पड़ गए. तभी बुद्धिमान ऋषि, नारद, वहाँ से गुज़रे और सारी परिस्थिति देखकर बोले, “आपने उनकी पत्नी और बच्चों को क्यों मारा? उनकी आसक्ति उनके शरीर से है. शरीर का विनाश करो.” अतः देवताओं ने सूअर रुपी इंद्र के शरीर को २ हिस्सों में काट दिया. तब इंद्र शरीर से बाहर आकर बोले, “मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?” और फिर इंद्र स्वर्ग वापस लौट गए.

   शरीर से बंधन बहुत गहरा होता है. यही समस्त मोह का मूल कारण है.

    सारांश: 

   यह जानते हुए कि हमारा शरीर अल्पकालिक है, हमें अपने शरीर से लगाव हो जाता है. यह शरीर, जिसकी आवश्यकताओं का हम इतना ध्यान रखते हैं, सिर्फ तब तक महत्वपूर्ण है जब तक कि उसमें श्वास है. एक बार प्राणशक्ति जब हमारा साथ छोड़ देती है, शरीर मुरझाने लगता है. वही शरीर जिसका इतने अच्छे से ध्यान रखा गया था और जिसे रिश्तेदारों व दोस्तों से इतना प्यार मिला था; प्राणशक्ति के बिना यकायक सबके लिए अनावश्यक बन जाता है. 

   जब शरीर में प्राण थे; वह शिव (ईश्वरत्व की उपस्थिति) था परन्तु शरीर से प्राण निकल जाने पर वही शरीर शव (मृत शरीर) बन जाता है. हमें यह सदैव याद रखना चाहिए और शरीर से बहुत ज़्यादा आसक्त नहीं होना चाहिए.

    इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि शरीर को तुच्छ समझकर हम उसका ध्यान न रखें. एक सार्थक जीवन व्यतीत करने के लिए हमें अपने शरीर रुपी ‘वाहन’ की देखभाल अवश्य करनी चाहिए. शरीर को एक माध्यम की तरह प्रयोग करके सत्य को समझना चाहिए मगर उससे अनावश्यक रूप से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए.

हम जितना अधिक मोह में रहते हैं, उतना ही ज़्यादा सम्बद्ध हो जाते हैं और छोड़ने से डरते हैं. इसके परिणामस्वरूप हमें उतना ही अधिक कष्ट होता है. यह ठीक नहीं है. हमें सशक्त मन का विकास करना चाहिए ताकि हम अनुकूल दोस्ती व रिश्ते बरकरार रख सकें. ऐसा करने से हम ज़रुरत से ज़्यादा सम्बद्ध व पराश्रित नहीं होंगे और स्वयं को पीड़ित होने से बचा पाएंगे. यदि हम हर रोज़ एकांत में बैठकर स्वयं पर प्रभु द्वारा दिए गए समस्त अनुग्रहों का ध्यान करके, उनका आभार प्रकट करेंगे तो हम एक सशक्त मन का विकास कर सकते हैं.

    निरंतर अभ्यास से हम अपने मन को सुदृढ़ कर सकते हैं.

     अनुवादक- अर्चना  

राजा और आध्यात्मिक सूफ़ी

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     एक राजा ने एक आध्यात्मिक सूफ़ी को राजमहल में भोजन के लिए आमंत्रित किया. सभी आमंत्रित मेहमान उत्कृष्ट विद्वान थे. निर्धारित दिन राजा आमंत्रितगणों के साथ भोजन की मेज़ पर सूफ़ी का इंतज़ार कर रहा था.  सूफ़ी साधारण से कपड़े पहनकर आया. सूफ़ी को साधारण कपड़ों में देखकर राजमहल के संतरी उसे पहचान नहीं पाए और सूफ़ी को अंदर नहीं जाने दिया. फिर सूफ़ी जब उपयुक्त कपड़े पहनकर राजमहल गया तो उसका सही स्वागत किया गया. भोजन की मेज़ पर बैठने के बाद सूफ़ी ने अपना अँगरखा उतारा और उसे अपनी साथ की कुर्सी पर रख दिया.  जब खाना परोसा गया तब उसने भोजन अँगरखा को अर्पण किया. सभी उपस्थित मेहमानों को यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण व हास्यास्पद लगा. 

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    इस प्रकार का व्यवहार सूफ़ी जैसे विवेकी को शोभा नहीं देता था और सभी मेहमान आश्चर्यचकित थे. राजा ने सूफ़ी से पूछा कि वह एक अँगरखा जैसी निर्जीव वस्तु को खाना खिलने का मूर्खतापूर्ण व्यवहार क्यों कर रहा था? बुद्धिमान सूफ़ी ने तब जवाब दिया, “मुझे मेरी पोशाक, जो कि यह अँगरखा है, के कारण अंदर आने की अनुमति दी गई थी.  अतः इस अँगरखा का मुझसे अधिक मूल्य व सम्मान है. लोग पोशाक को अधिक मान्यता देते हैं, इस कारण मैं स्वयं को खाना खिलाने के बजाय इस पोशाक को खाना खिला रहा हूँ.”

    सारांश:

   मनुष्य अपने परिवार व भौतिक संपत्ति सहित आर्थिक संसार से जुड़ जाता है. उसे लगता है कि उसका परिवार व मित्र उससे प्रेम करते हैं.

      वह उनके लिए कठिन परिश्रम करता है और हर संभव सर्वश्रेष्ठ प्रयास करता है. जैसे वह वृद्ध होने लगता है और उसका शरीर निर्बल हो जाता है; उसे अहसास होता है कि लोग उससे उसकी संपत्ति के लिए प्रेम करते थे; कि वह उन्हें क्या दे सकता था. वह वास्तविकता में जो है, उसके लिए उसे कोई नहीं प्रेम करता है. तब मनुष्य भ्रान्ति से मुक्त होता है. मनुष्य को समझ में आता है कि जिन लोगों से उसे अपेक्षा थी कि वह उससे प्रेम करेंगे और उसकी भावनाओं का प्रत्युत्तर देंगे; वह ऐसा नहीं करते हैं. जीवन में उसे इस बात का अहसास बहुत देर से होता है. 

   अतः आदि शंकर  हमसे आग्रह करते हैं कि हमें इस सत्य का अहसास जीवन में पहले ही कर लेना चाहिए और दूसरों के प्रति अपना कर्तव्य प्रेम से निभाना चाहिए परन्तु उनमें आसक्त नहीं होना चाहिए. 

   इसके बदले प्रभु के नाम का गुणगान करने की आदत का विकास करना चाहिए. ईश्वर सदा हमारे साथ रहते हैं और कभी भी हमारा परित्याग नहीं करते हैं.

 Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com     

अनुवादक- अर्चना 

        जीवन नाशवान है 

     

      एक अमेरिकन पर्यटक एक बार मिस्त्र के काहिरा नामक शहर में एक विख्यात विद्वान से मिलने गया. उस विद्वान के निवास-स्थान पर पहुँचने पर पर्यटक ने पाया कि उसका घर बहुत ही साधारण था और घर में नाम मात्र का फर्नीचर था. कमरे में सिर्फ एक पलंग, एक मेज़ और एक तख़्त था. lotus

     पर्यटक बहुत चकित था और उसने ज्ञानी पुरुष से पूछा, “आपका और दूसरा फर्नीचर कहाँ है? ” पर्यटक को उत्तर देने के बजाय ज्ञानी व्यक्ति ने उससे पूछा, “और तुम्हारा कहाँ है?”

     ‘मेरा? ”   विस्मित पर्यटक ने जवाब दिया. “मैं एक पर्यटक हूँ और मैं केवल देखने आया हूँ; पास से निकलते हुए.”

      तब ज्ञानी पुरुष बोले, “पृथ्वी पर जीवन केवल कुछ समय का ही है…..फिर भी कुछ लोग इस प्रकार जीते हैं जैसे कि वह यहाँ सदा के लिए रहने आए हैं- वह खुश रहना भूल जाते हैं.” “मैं भी केवल गुज़र ही रहा हूँ.”

   सार:

    आदि शंकर बतलाते हैं कि कमल पर पड़ी ओस की बूँद की तरह जीवन नाशवान है. कमल कीचड़दार जल में उगता है परन्तु अपने पास-पड़ोस से अनभिज्ञ रहता है. 

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    पानी की बूँद कमल के पत्ते पर रहते हुए भी उससे असम्बद्ध रहती है. इसी प्रकार हमारा नश्वर जीवन भी बीमारी, शोक, अभिमान व अहंकार से घिरा हुआ है. हमें कमल से सीखना है कि स्वयं को अस्थायी से जोड़े बिना जीवन कैसे बिताना है और वह जो शाश्वत है, उसे तलाशना है. हमें जीवन के अस्थायी रूप को समझकर जीवन का निर्वाह अर्थपूर्ण ढंग से करना चाहिए. केवल नामस्मरण से हम सच्चा प्रेम व ख़ुशी प्राप्त कर सकते हैं और चिरस्थायी सत्य का पता लगा सकते हैं.

  source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com/bal govindam   

अनुवादक- अर्चना 

      

      बन्दर और मूँगफली

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    यह कहानी बन्दर पकड़ने वालों के बन्दर पकड़ने के बारे में है. एक बन्दर पकड़ने वाले ने किसी पेड़ पर बहुत सारे बन्दर देखे और उन्हें पकड़ने के लिए उसे एक योजना सूझी. 

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    उसने ढेर सारी मूँगफलियाँ लीं और उन्हें एक लम्बे मगर संकीर्ण गर्दन वाले मटके में डालकर उसे पेड़ के नीचे छोड़ दिया. बन्दर यह ध्यान से देख रहे थे. बंदरों को मूँगफलियाँ अत्यंत प्रिय होती हैं अतः वह सब, बन्दर पकड़ने वाले के जाने का इंतज़ार करने लगे. 

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    उसके जाते ही एक बन्दर कूदकर  झटपट नीचे आया और मूँगफलियाँ लेने के लिए उसने अपना हाथ मटके के अंदर डाला. अपने monkey3हाथ में खूब सारी मूँगफलियाँ देखकर वह बेहद खुश था और मूँगफली खाने के लिए झटपट हाथ बाहर निकालने की कोशिश करने लगा. परन्तु वह कितनी भी कोशिश करता, वह अपना हाथ बाहर निकाल नहीं पा रहा था. उसका हाथ मटके की संकरी गर्दन में फँस गया था. बन्दर को मूँगफली इतनी प्रिय थी कि एक बार मुठ्ठी भर लेने के बाद, वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था. इसके परिणामस्वरूप वह हाथ बाहर नहीं निकाल पा रहा था. बन्दर का हाथ फंसा देखकर बन्दर पकड़ने वाला ख़ुशी-ख़ुशी आया और बन्दर को ले गया.

   यदि बन्दर ने मूँगफलियों को छोड़ दिया होता तो वह बच गया होता. परन्तु मूँगफलियों के प्रति लालच व अनुराग ने उसे ऐसा करने नहीं दिया जिसके कारण वह फँस गया और अंततः बन्दर पकड़ने वाले द्वारा पकड़े जाने पर अत्यंत दुखी हुआ.

    सारांश :

    आदि शंकर हमसे हमारे जीवन में समझ व जागरूकता लाने को कहते हैं; प्रेम व अनासक्ति विकसित करने को कहते हैं. धन कमाना निस्संदेह ही आवश्यक है परन्तु उसे उचित ढ़ंग से कमाना चाहिए और इस प्रकार कमाए धन से हमें संतुष्ट रहना चाहिए. मनुष्य को भ्रान्ति, माया व धन के प्रति मोह का त्याग करना चाहिए. मनुष्य जितना ज्यादा आसक्त रहेगा और वस्तुओं पर अपनी पकड़ ढीली करने से इंकार करता रहेगा; उतना ही वह बन्दर की तरह जाल में फंसा रहेगा.

   कहा जाता है, “सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त साधन हैं परन्तु सभी की लालसा के लिए नहीं.” लालच मनुष्य को अनुचित माध्यम से उपार्जन करने के लिए विवश करती है और ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए धन से अलग नहीं होने देती है. जब धन प्रेम, ईमानदारी व सच्चाई से कमाया जाता है तब वह अधिक संतोषप्रद होता है. इसलिए शंकर नसीहत देते हैं; अरे मूर्ख मन! अनासक्ति की भावना का विकास करो, उचित रूप से जीवन व्यतीत करो और गोविन्द की तलाश करो.

   ऐसा केवल धन के लिए ही नहीं बल्कि रिश्तेदारी के लिए भी सत्य है. कई माता-पिता अपने बच्चों से इतने सम्बद्ध रहते हैं कि वह अपने ही बच्चों, जिन्हें वह प्रेम करते हैं, की प्रगति और संवृद्धि का गला घोंट देते हैं. आसक्ति उन्हें अँधा कर देती है. एक बार बच्चे के बड़ा हो जाने पर माता-पिता को उन्हें छोड़ देना चाहिए. माता-पिता को बच्चों से हमेशा प्रेम अवश्य करना चाहिए लेकिन  मददगार रहते हुए ज़रुरत पड़ने पर बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए. ऐसा होने से बच्चों व माता-पिता का रिश्ता ख़ूबसूरत बनता है. दोनों में पारस्परिक सम्मान व प्रेम की भावना क़ायम रहती है और रिश्ते अत्यधिक प्रेम व अधिपत्य के बोझ तले दबते नहीं हैं.  

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक-अर्चना 

  एक टैक्सी-चालक की ईमानदारी 

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    आदर्श: सत्य 

   उप आदर्श: ईमानदारी 

     शिव खेरा, एक सुप्रसिद्ध लेखक और प्रबंधन प्रशिक्षक, अपने सिंगापुर के अनुभव के बारे में लिखते हैं –

          ६ वर्ष पहले, सिंगापुर में एक विशेष ठिकाने पर जाने के लिए मैंने टैक्सी-चालक को एक परिचय कार्ड दिया. जल्द ही हम कार्ड पर उल्लेखित ठिकाने पर पहुँच गए; चालक ने इमारत का एक चक्कर लगाने के बाद गाड़ी रोकी. यद्यपि उसकी गाड़ी का मीटर $११ का भाड़ा दिखा रहा था पर चालक ने केवल $१० ही लिए.   

        मैंने चालक से कहा, “हेनरी, तुम्हारे मीटर के अनुसार भाड़ा तो $११ का है पर तुम केवल $१० ही क्यों ले रहे हो?”

         चालक बोला, “महाशय, मैं एक टैक्सी-चालक हूँ. मुझे आपको सीधे आपके गंतव्य स्थान पर लाना चाहिए था. चूँकि मुझे आपको छोड़ने का सही स्थान नहीं पता था, मुझे इस इमारत का एक चक्कर लगाना पड़ा. यदि मैं आपको सीधे यहाँ लेकर आता तो आपका भाड़ा $१० ही आता. मेरी अज्ञानता की कीमत आप क्यों चुकायेंगें?”

         चालक आगे बोला, “महाशय, वैधरूप से मैं $११ का दावा कर सकता हूँ परन्तु ईमानदारी व नैतिक रूप से मैं केवल $१० का ही हकदार हूँ. इसके अलावा सिंगापुर पर्यटक स्थान है. अधिकतर लोग यहाँ ३-४ दिनों के लिए आते हैं. सीमा-शुल्क पार करने के बाद पर्यटक जब हवाई-अड्डे से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला अनुभव हमेशा टैक्सी-चालकों के साथ ही होता है और यदि वह अच्छा न हो तो उनके बाकी के दिन भी सुखद नहीं बीतते हैं.”

       चालक बोला, “महाशय, मैं मात्र एक टैक्सी-चालक नहीं हूँ. मेरे पास राजनयिक पासपोर्ट नहीं होते हुए भी, मैं सिंगापुर का राजदूत हूँ.”

       मेरे अनुमान से उसकी शिक्षा शायद आठवीं कक्षा तक की ही होगी पर मेरे लिए वह एक व्यवसायी था. मेरे लिए उसका व्यवहार उपलब्धि व व्यक्तित्व में गर्व दर्शा रहा था.

      उस दिन मैंने सीखा कि व्यवसायी बनने के लिए मनुष्य को सिर्फ व्यावसायिक योग्यता ही नहीं चाहिए होती है. 

 सीख:

      सारांश में ……”मानवीयता व आदर्शों से परितृप्त व्यवसायी बनो”……. इससे गुणवत्ता में बहुत अधिक अंतर पड़ता है. ज्ञान, योग्यता, धन, शिक्षा सब दूसरे दरजे के हैं. पहला स्थान मानवीय आदर्शों, ईमानदारी व समग्रता का है जैसा कि टैक्सी-चालक ने प्रदर्शित किया. एक सभ्य व्यक्ति वह होता है जिसके विचार व आचरण अच्छे होते हैं. मनुष्य ने निस्संदेह धन संचय व संपत्ति समेटने के कई तरीके सीख लिए हैं पर फिर भी वह खुश नहीं हैं. क्यों? क्योंकि उसका व्यवहार उचित नहीं हैं. एक अच्छे आचरण के लिए सदगुण का होने सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. एक सदाचारी व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकता हैं. सदगुणों के अभाव में जीवन अर्थहीन हो जाता हैं.  अच्छा आचरण जीवन का मूल आधार होना चाहिए.

     शिक्षा जीवन को समृद्ध बनाने के लिए होनी चाहिए न कि केवल जीवन निर्वाह के लिए. इन दोनों में क्या अंतर हैं? वास्तव में इन दोनों उक्तियों में बहुत अधिक अंतर हैं. औपचारिक व सांसारिक शिक्षा मनुष्य को बुद्धिमान, विवेकी और ज्ञानपूर्ण बनाती है; पर क्या केवल इस ज्ञान का होना पर्याप्त है? ऐसी शिक्षा मनुष्य को इस सांसारिक जीवन में अवश्य मदद करती है पर हमारे भीतर के आतंरिक संसार का क्या?

     इसलिए बच्चों; इस सांसारिक शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी एकत्रित करो. इससे आपको अपनी भीतरी शक्ति विकसित करने में मदद होगी और आप अपनी वास्तविक ताकत व सामर्थ्य को पहचान पाओगे. इसके अतिरिक्त यह ज्ञान आपको इस सांसारिक जीवन में मदद करने के साथ-साथ जीवन के हर कदम में आपका मार्गदर्शन करेगा और आख़िरकार आपको अपनी सही पहचान का अहसास कराएगा.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना