जीवन नाशवान है 

     

      एक अमेरिकन पर्यटक एक बार मिस्त्र के काहिरा नामक शहर में एक विख्यात विद्वान से मिलने गया. उस विद्वान के निवास-स्थान पर पहुँचने पर पर्यटक ने पाया कि उसका घर बहुत ही साधारण था और घर में नाम मात्र का फर्नीचर था. कमरे में सिर्फ एक पलंग, एक मेज़ और एक तख़्त था. lotus

     पर्यटक बहुत चकित था और उसने ज्ञानी पुरुष से पूछा, “आपका और दूसरा फर्नीचर कहाँ है? ” पर्यटक को उत्तर देने के बजाय ज्ञानी व्यक्ति ने उससे पूछा, “और तुम्हारा कहाँ है?”

     ‘मेरा? ”   विस्मित पर्यटक ने जवाब दिया. “मैं एक पर्यटक हूँ और मैं केवल देखने आया हूँ; पास से निकलते हुए.”

      तब ज्ञानी पुरुष बोले, “पृथ्वी पर जीवन केवल कुछ समय का ही है…..फिर भी कुछ लोग इस प्रकार जीते हैं जैसे कि वह यहाँ सदा के लिए रहने आए हैं- वह खुश रहना भूल जाते हैं.” “मैं भी केवल गुज़र ही रहा हूँ.”

   सार:

    आदि शंकर बतलाते हैं कि कमल पर पड़ी ओस की बूँद की तरह जीवन नाशवान है. कमल कीचड़दार जल में उगता है परन्तु अपने पास-पड़ोस से अनभिज्ञ रहता है. 

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    पानी की बूँद कमल के पत्ते पर रहते हुए भी उससे असम्बद्ध रहती है. इसी प्रकार हमारा नश्वर जीवन भी बीमारी, शोक, अभिमान व अहंकार से घिरा हुआ है. हमें कमल से सीखना है कि स्वयं को अस्थायी से जोड़े बिना जीवन कैसे बिताना है और वह जो शाश्वत है, उसे तलाशना है. हमें जीवन के अस्थायी रूप को समझकर जीवन का निर्वाह अर्थपूर्ण ढंग से करना चाहिए. केवल नामस्मरण से हम सच्चा प्रेम व ख़ुशी प्राप्त कर सकते हैं और चिरस्थायी सत्य का पता लगा सकते हैं.

  source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com/bal govindam   

अनुवादक- अर्चना 

      

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      बन्दर और मूँगफली

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    यह कहानी बन्दर पकड़ने वालों के बन्दर पकड़ने के बारे में है. एक बन्दर पकड़ने वाले ने किसी पेड़ पर बहुत सारे बन्दर देखे और उन्हें पकड़ने के लिए उसे एक योजना सूझी. 

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    उसने ढेर सारी मूँगफलियाँ लीं और उन्हें एक लम्बे मगर संकीर्ण गर्दन वाले मटके में डालकर उसे पेड़ के नीचे छोड़ दिया. बन्दर यह ध्यान से देख रहे थे. बंदरों को मूँगफलियाँ अत्यंत प्रिय होती हैं अतः वह सब, बन्दर पकड़ने वाले के जाने का इंतज़ार करने लगे. 

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    उसके जाते ही एक बन्दर कूदकर  झटपट नीचे आया और मूँगफलियाँ लेने के लिए उसने अपना हाथ मटके के अंदर डाला. अपने monkey3हाथ में खूब सारी मूँगफलियाँ देखकर वह बेहद खुश था और मूँगफली खाने के लिए झटपट हाथ बाहर निकालने की कोशिश करने लगा. परन्तु वह कितनी भी कोशिश करता, वह अपना हाथ बाहर निकाल नहीं पा रहा था. उसका हाथ मटके की संकरी गर्दन में फँस गया था. बन्दर को मूँगफली इतनी प्रिय थी कि एक बार मुठ्ठी भर लेने के बाद, वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था. इसके परिणामस्वरूप वह हाथ बाहर नहीं निकाल पा रहा था. बन्दर का हाथ फंसा देखकर बन्दर पकड़ने वाला ख़ुशी-ख़ुशी आया और बन्दर को ले गया.

   यदि बन्दर ने मूँगफलियों को छोड़ दिया होता तो वह बच गया होता. परन्तु मूँगफलियों के प्रति लालच व अनुराग ने उसे ऐसा करने नहीं दिया जिसके कारण वह फँस गया और अंततः बन्दर पकड़ने वाले द्वारा पकड़े जाने पर अत्यंत दुखी हुआ.

    सारांश :

    आदि शंकर हमसे हमारे जीवन में समझ व जागरूकता लाने को कहते हैं; प्रेम व अनासक्ति विकसित करने को कहते हैं. धन कमाना निस्संदेह ही आवश्यक है परन्तु उसे उचित ढ़ंग से कमाना चाहिए और इस प्रकार कमाए धन से हमें संतुष्ट रहना चाहिए. मनुष्य को भ्रान्ति, माया व धन के प्रति मोह का त्याग करना चाहिए. मनुष्य जितना ज्यादा आसक्त रहेगा और वस्तुओं पर अपनी पकड़ ढीली करने से इंकार करता रहेगा; उतना ही वह बन्दर की तरह जाल में फंसा रहेगा.

   कहा जाता है, “सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त साधन हैं परन्तु सभी की लालसा के लिए नहीं.” लालच मनुष्य को अनुचित माध्यम से उपार्जन करने के लिए विवश करती है और ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए धन से अलग नहीं होने देती है. जब धन प्रेम, ईमानदारी व सच्चाई से कमाया जाता है तब वह अधिक संतोषप्रद होता है. इसलिए शंकर नसीहत देते हैं; अरे मूर्ख मन! अनासक्ति की भावना का विकास करो, उचित रूप से जीवन व्यतीत करो और गोविन्द की तलाश करो.

   ऐसा केवल धन के लिए ही नहीं बल्कि रिश्तेदारी के लिए भी सत्य है. कई माता-पिता अपने बच्चों से इतने सम्बद्ध रहते हैं कि वह अपने ही बच्चों, जिन्हें वह प्रेम करते हैं, की प्रगति और संवृद्धि का गला घोंट देते हैं. आसक्ति उन्हें अँधा कर देती है. एक बार बच्चे के बड़ा हो जाने पर माता-पिता को उन्हें छोड़ देना चाहिए. माता-पिता को बच्चों से हमेशा प्रेम अवश्य करना चाहिए लेकिन  मददगार रहते हुए ज़रुरत पड़ने पर बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए. ऐसा होने से बच्चों व माता-पिता का रिश्ता ख़ूबसूरत बनता है. दोनों में पारस्परिक सम्मान व प्रेम की भावना क़ायम रहती है और रिश्ते अत्यधिक प्रेम व अधिपत्य के बोझ तले दबते नहीं हैं.  

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक-अर्चना 

  एक टैक्सी-चालक की ईमानदारी 

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    आदर्श: सत्य 

   उप आदर्श: ईमानदारी 

     शिव खेरा, एक सुप्रसिद्ध लेखक और प्रबंधन प्रशिक्षक, अपने सिंगापुर के अनुभव के बारे में लिखते हैं –

          ६ वर्ष पहले, सिंगापुर में एक विशेष ठिकाने पर जाने के लिए मैंने टैक्सी-चालक को एक परिचय कार्ड दिया. जल्द ही हम कार्ड पर उल्लेखित ठिकाने पर पहुँच गए; चालक ने इमारत का एक चक्कर लगाने के बाद गाड़ी रोकी. यद्यपि उसकी गाड़ी का मीटर $११ का भाड़ा दिखा रहा था पर चालक ने केवल $१० ही लिए.   

        मैंने चालक से कहा, “हेनरी, तुम्हारे मीटर के अनुसार भाड़ा तो $११ का है पर तुम केवल $१० ही क्यों ले रहे हो?”

         चालक बोला, “महाशय, मैं एक टैक्सी-चालक हूँ. मुझे आपको सीधे आपके गंतव्य स्थान पर लाना चाहिए था. चूँकि मुझे आपको छोड़ने का सही स्थान नहीं पता था, मुझे इस इमारत का एक चक्कर लगाना पड़ा. यदि मैं आपको सीधे यहाँ लेकर आता तो आपका भाड़ा $१० ही आता. मेरी अज्ञानता की कीमत आप क्यों चुकायेंगें?”

         चालक आगे बोला, “महाशय, वैधरूप से मैं $११ का दावा कर सकता हूँ परन्तु ईमानदारी व नैतिक रूप से मैं केवल $१० का ही हकदार हूँ. इसके अलावा सिंगापुर पर्यटक स्थान है. अधिकतर लोग यहाँ ३-४ दिनों के लिए आते हैं. सीमा-शुल्क पार करने के बाद पर्यटक जब हवाई-अड्डे से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला अनुभव हमेशा टैक्सी-चालकों के साथ ही होता है और यदि वह अच्छा न हो तो उनके बाकी के दिन भी सुखद नहीं बीतते हैं.”

       चालक बोला, “महाशय, मैं मात्र एक टैक्सी-चालक नहीं हूँ. मेरे पास राजनयिक पासपोर्ट नहीं होते हुए भी, मैं सिंगापुर का राजदूत हूँ.”

       मेरे अनुमान से उसकी शिक्षा शायद आठवीं कक्षा तक की ही होगी पर मेरे लिए वह एक व्यवसायी था. मेरे लिए उसका व्यवहार उपलब्धि व व्यक्तित्व में गर्व दर्शा रहा था.

      उस दिन मैंने सीखा कि व्यवसायी बनने के लिए मनुष्य को सिर्फ व्यावसायिक योग्यता ही नहीं चाहिए होती है. 

 सीख:

      सारांश में ……”मानवीयता व आदर्शों से परितृप्त व्यवसायी बनो”……. इससे गुणवत्ता में बहुत अधिक अंतर पड़ता है. ज्ञान, योग्यता, धन, शिक्षा सब दूसरे दरजे के हैं. पहला स्थान मानवीय आदर्शों, ईमानदारी व समग्रता का है जैसा कि टैक्सी-चालक ने प्रदर्शित किया. एक सभ्य व्यक्ति वह होता है जिसके विचार व आचरण अच्छे होते हैं. मनुष्य ने निस्संदेह धन संचय व संपत्ति समेटने के कई तरीके सीख लिए हैं पर फिर भी वह खुश नहीं हैं. क्यों? क्योंकि उसका व्यवहार उचित नहीं हैं. एक अच्छे आचरण के लिए सदगुण का होने सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. एक सदाचारी व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकता हैं. सदगुणों के अभाव में जीवन अर्थहीन हो जाता हैं.  अच्छा आचरण जीवन का मूल आधार होना चाहिए.

     शिक्षा जीवन को समृद्ध बनाने के लिए होनी चाहिए न कि केवल जीवन निर्वाह के लिए. इन दोनों में क्या अंतर हैं? वास्तव में इन दोनों उक्तियों में बहुत अधिक अंतर हैं. औपचारिक व सांसारिक शिक्षा मनुष्य को बुद्धिमान, विवेकी और ज्ञानपूर्ण बनाती है; पर क्या केवल इस ज्ञान का होना पर्याप्त है? ऐसी शिक्षा मनुष्य को इस सांसारिक जीवन में अवश्य मदद करती है पर हमारे भीतर के आतंरिक संसार का क्या?

     इसलिए बच्चों; इस सांसारिक शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी एकत्रित करो. इससे आपको अपनी भीतरी शक्ति विकसित करने में मदद होगी और आप अपनी वास्तविक ताकत व सामर्थ्य को पहचान पाओगे. इसके अतिरिक्त यह ज्ञान आपको इस सांसारिक जीवन में मदद करने के साथ-साथ जीवन के हर कदम में आपका मार्गदर्शन करेगा और आख़िरकार आपको अपनी सही पहचान का अहसास कराएगा.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना         

    अकबर और सूफी संत 

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       एक महान सूफी फ़क़ीर (एक मुस्लिम सन्यासी जो पूरी तरह से भिक्षा पर जीता है) ने एक बार सम्राट अकबर से कुछ सहायता की इच्छा रखी. अकबर मुग़ल साम्राज्य के तीसरे सम्राट थे और उन्होंने भारत पर १५५६ से १६०५ तक शासन किया था. 

       वह संत अकबर से मिलने राजमहल गया. जब वह राजभवन पहुँचा, उस समय अकबर पूजा कर रहे थे. अतः फ़क़ीर धैर्यपूर्वक राजा की पूजा समाप्त होने का इंतज़ार करने लगा. फ़क़ीर ने देखा कि अकबर अपने हाथ आसमान की तरफ उठाकर प्रार्थना कर रहे थे तथा ईश्वर से और अधिक दौलत व राजकीय सत्ता के लिए निवेदन कर रहे थे. पूजा समाप्त होने के बाद जब अकबर खड़े हुए तब उन्होंने फ़क़ीर को कमरे से बाहर जाते देखा. अकबर तेज़ी से दौड़े और फ़क़ीर के चरणों में गिरकर उसके वहाँ आने का उद्देश्य पूछा. 

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       फ़क़ीर बोला, “मैं आपसे कुछ माँगने आया था परन्तु जब मैंने आपको ईश्वर से माँगते देखा तो मैं अचरज में पड़ गया कि एक याचक दूसरे भिखारी को भला क्या दे सकता है. मैं एक भिक्षु हूँ, एक फ़क़ीर, पर आप तो मुझ से भी बड़े भिखारी हैं. मैं केवल भोजन व सांसारिक वस्तुओं के लिए भीख माँगता हूँ. परन्तु आप तो विशालतर चीज़ें जैसे दौलत व कीर्ति के लिए भीख माँगते हैं. आखिरकार हम दोनों ही भिक्षुक हैं. आपसे मदद माँगने के बजाय मैं सीधे ईश्वर से सहायता की याचना करूँगा.”

  अकबर समझ गए और उन्हें अहसास हुआ कि सम्राट होने के बावजूद वह कितने गरीब व असुरक्षित थे.

     सारांश:

   आदि शंकर हमसे प्रश्न करते हैं: हम किस चीज़ की भीख माँगते हैं? हमारी याचना मूर्खतापूर्ण हो सकती है.

     शंकर कहते हैं- मूर्ख- मूढ़मते; अगर भक्ति की गहराई में हम संतृप्ति नहीं ढूँढ़ सकते तो ऐसी भक्ति अर्थहीन है. क्या हमारी भक्ति प्रभु से आदान-प्रदान व्यवस्था का प्रसारण है?

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    आदि शंकर चाहते हैं कि हम अपेक्षा रहित भक्ति विकसित करें. भक्ति वह प्रेम है जो सत्य का मार्ग दिखाती है. एक सच्चा भक्त यह जानता है और ऐसा अनुभव भी करता है कि मूर्खतापूर्ण मनोकामना से रहित भक्ति अपने आप में निर्भयता है. संसार की बाहरी वस्तुएँ हमारी सुरक्षा नहीं करती हैं; केवल सच्ची भक्ति ही हमारा संरक्षण करती है. 

    यद्यपि संसार में रहकर भौतिक ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता है; परन्तु इसके साथ-साथ ज़रुरत व लालच में अंतर जानने के लिए सच्ची भक्ति बहुत आवश्यक है वरना जीवनभर और अपने अंतिम क्षणों में भी यह हमारी असुरक्षा और अप्रसन्नता का कारण बन जाती है.  

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  अनुवादक- अर्चना 

प्राण का महत्व- जीवनशक्ति 

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      आदर्श: शाश्वत सत्य 

    उप आदर्श: ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण 

    एक समय ६ जिज्ञासु थे जो सत्य व बुद्धिमत्ता की तलाश में दूर-दूर विभिन्न जगहों की यात्रा कर रहे थे. कई लम्बी यात्राओं के बाद उन्होंने एक ऋषि के बारे में सुना जो उन्हें उनकी खोज में मदद करने के योग्य था. ऋषि से मिलने सभी जिज्ञासु घने जंगल में एक कुटिया में पहुँचे. ऋषि ने उनसे कहा कि उसके साथ १ वर्ष रहने के बाद वह उससे अपनी इच्छानुसार प्रश्न पूछ सकते हैं. जिज्ञासु सहमत हो गए और उस ऋषि के शिष्य बन गए. 

   एक साल के बाद १ जिज्ञासु ने ऋषि से पूछा, “शरीर का पोषण करने के लिए किस ज्ञानेन्द्रिय की सबसे अधिक महत्ता है?”

    प्रश्न के उत्तर में ऋषि ने उन्हें एक कहानी सुनाई:

     एक समय पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ थीं: श्रवण, दृष्टि, गंध, स्वाद और स्पर्श. एक दिन पाँचों बैठकर अपनी-अपनी क्षमताओं के बारे में बात करने लगीं. अपनी अहमियत व योग्यता के विषय में ज्ञानेन्द्रियों को थोड़ा घमंड था और वह शरीर की शासक होने का दावा कर रहीं थीं. उन्होंने ज़ोर देकर दृढ़तापूर्वक कहा, “हमें देखो, हम असामान्य रूप से विशिष्ट हैं.” वह डींग मारते हुए बोलीं, “हमारे बिना शरीर किसी भी तरह जीवित नहीं रह सकता है.”

  प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया. श्रवण ने हर तरफ ऐसा मनमोहक संगीत फैलाया जो भावनाओं व वासनाओं को अभिव्यक्त करने वाला था. संगीत की बराबरी करते हुए, दृष्टि ने उत्कृष्ट रंगों के उतार-चढ़ाव में दिलकश मुद्राओं की अद्भुत भव्यता प्रदर्शित की. गंध ने क्षणभर में चारों ओर दिव्य व उत्तम सुगंध फैला दी. अन्य ज्ञानेन्द्रियों से बेहतर परिणाम दिखाने के लिए, स्वाद ने भरपूर मात्रा में मुँह में पानी लाने वाले विशिष्ट स्वाद की श्वास छोड़ी. प्रत्येक श्वास में सौम्य उत्साह व मधुर शीतलता के सिहरन से स्पर्श ने सम्पूर्ण शरीर को सजीव कर दिया. सभी आपस में एक-दूसरे के लिए प्रशंसा लुटा रहे थे. अपने आप में यह एक दृश्य था. 

  इस अद्भुत तमाशे को देखते हुए प्राण चुपचाप धीरे-धीरे श्वास अंदर-बाहर कर रहा था. प्राण शरीर में बस, विद्यमान था. श्वास लेते समय वह ज्ञानेन्द्रियों को ग़ौर से देखता था और श्वास छोड़ते समय भी वह ज्ञानेन्द्रियों का अनुपालन कर रहा था. कुछ देर ज्ञानेन्द्रियों को ध्यान से देखने के बाद प्राण बोला, “तुममें से किसी का भी शरीर पर सबसे अधिक आधिपत्य नहीं है.” लेकिन प्राण की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. ज्ञानेन्द्रियों के पास अन्य किसी बात के लिए समय ही नहीं था. वह अपने अतिरिक्त हर चीज़ से बेख़बर थीं और प्राण की ओर उनका ज़रा भी ध्यान नहीं था. प्राण ने पुनः चेष्टा की. परन्तु ज्ञानेन्द्रियाँ स्वयं में इस हद तक तल्लीन थीं कि इस बार भी उन्होंने प्राण को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया. क्रोधित होकर प्राण चला गया.

 प्राण के जाते ही ध्वनि, रंग, खुशबू, स्वाद, शारीरिक अनुभूति और चित्त, सभी फीके पड़ने लगे और धीरे-धीरे लुप्त हो गए. ज्ञानेन्द्रियों का अस्तित्व समाप्त हो गया. जब प्राण वापस आया तब उन्हें अपने अस्तित्व का आभास हुआ. प्राण की अनुपस्थिति में ज्ञानेन्द्रियों की अपनी कोई पहचान नहीं थी और वह कमज़ोर व भयभीत थीं.

    प्राण फिर से वापस आया और एकाएक सभी ज्ञानेन्द्रियाँ प्राण के प्रति सचेत हुईं. बिजली के स्विच के समान, यह प्राणाधार शक्ति उन्हें चालू कर रही थी और बुझा रही थी. उनका इस पर कोई नियंत्रण नहीं था परन्तु उस ऊर्जा का उनपर पूरा प्रभुत्व था. इस जागरूकता के साथ उन्हें तुरंत अहसास हुआ कि उनका अस्तित्व प्राण के कारण था और यह प्राणाधार शक्ति उनसे कहीं अधिक बलवान थी. ज्ञानेन्द्रियों को समझ में आया कि शरीर किसी भी प्रकार से उनके अधीन नहीं था. शरीर पूर्णतया प्राण के वश में था.   

   जब वह सम्मान से प्राण के समक्ष झुकीं तब प्राण बोला, “स्वयं को पाँच भागों में बाँटकर और समस्त शरीर में फैलाकर, मैं अपना रूप बदलता हूँ और स्वतः ज्ञानेन्द्रियों की सृष्टि करता हूँ. इस प्रकार मैं शरीर को जीवन प्रदान करता हूँ.”

    सीख:

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   इस कहानी में प्राण महाप्राण है और अपान, प्राण, समन, उदान व वयान पाँच उप-प्राण हैं. शक्ति के यह पाँच उप-वर्ग शरीर के विभिन्न भागों को दर्शाते हैं. अपान, श्रेणि से नाभि तक होता है; प्राण का बहाव हृदय से कंठ तक होता है; समन, मध्यपट में नाभि से हृदय की ओर संचालित होता है; उदान- सर, बाहों व टांगों में होता है; व्यान, पूरे शरीर भर में होता है. इस कहानी को सुनाने के बाद क्या हमारे भीतर का अचेत अंश किसी स्तर पर सहज-बोध से कहानी का सन्देश समझ सकता है? किसी मलिन गंध का सामना करने पर हम स्वाभाविक रूप से क्या करते हैं?   हम सांस रोक लेते हैं- सांस के अभाव में गंध महसूस नहीं होती है. कुछ बेस्वाद खाने पर भी हम सांस रोक लेते हैं- सांस की अनुपस्थिति में हमें स्वाद का आभास नहीं होता है. ज्ञानेन्द्रियों व चित्त का जन्म प्राण से होता है, वह प्राण के अभिव्यक्ति हैं और वापस प्राण में समाहित हो जाते हैं. वास्तव में, हर रात गूढ़ निद्रा की अवस्था में ज्ञानेन्द्रियाँ व चित्त प्राण में सम्मिलित हो जाते हैं. गूढ़ निद्रा हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. ज्ञानेन्द्रियों व चित्त की निरंतर क्रियाशीलता हमारी जीवन-शक्ति चूसकर हमें कमज़ोर बनाती है. यदि हम रात को बेचैन रहते हैं और बहुत सारे सपनों का अनुभव करते हैं तो हमारी नींद ताज़गी देने वाली नहीं बल्कि थकानेवाली कहलाती है. गूढ़ निद्रा ताज़गी देने वाली व स्फूर्तिदायक होती है. मगर गूढ़ निद्रा के दौरान हम सचेत नहीं होते हैं.

   ध्यान व तपस्या के माध्यम से ज्ञानेन्द्रियों व चित्त की निरंतर चहक से जागरूकता को अलग करना संभव है. ऐसा करने से हम प्राण के प्रति पूर्णतया सचेत रहकर उसी स्थायी विश्रांति का अनुभव कर सकते हैं जैसी हमें गूढ़ नींद में होती है. अगर हम ध्यान देकर सुनेंगे तो हम जीवन के श्वास, प्राण, के संगीत की ध्वनि सुन पाएंगे.

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  अनुवादक- अर्चना 

       आनंद का रहस्य – हर्षित किसान 

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     आदर्श: उचित आचरण 

     उप आदर्श : प्रेम से अपने कर्तव्य का पालन करना, आनंद का रहस्य 

    एक राजा एक बार रूप बदलकर अपने साम्राज्य के सबसे अधिक प्रसन्न व्यक्ति का पता लगाने निकला. 

    सैकड़ों लोगों को मिलने के बाद आखिरकार उसे एक गरीब किसान दिखा जो खेत में हल चलाते हुए आनंदपूर्वक गाना गा रहा था. किसान के चेहरे पर इतनी दीप्तिमान ख़ुशी थी कि राजा का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हुआ.

    राजा किसान से बोला, “प्रिय मित्र, मुझे अपनी ख़ुशी का रहस्य बताओ.”

     किसान बोला, “यह तो बहुत ही सरल है. अपनी कमाई के चौथाई भाग से मैं अपने ऋण का भुगतान करता हूँ; चौथाई भविष्य में निवेश करता हूँ; चौथाई दान-पुण्य में देता हूँ और चौथाई अपने कर्तव्य पर खर्च करता हूँ.”

    किसान की बात सुनकर राजा बिल्कुल चकित था. उसने किसान से और अधिक विवरण देने का अनुरोध किया. 

     “मेरे माता-पिता ने मुझे जीवन रुपी उत्कृष्ट उपहार दिया है और मैं उनके प्रति अथाह कृतज्ञता का ऋणी हूँ. अब मैं उनका पोषण करता हूँ और वृद्धावस्था में उनका ध्यान रखता हूँ. मेरी कमाई का चौथाई हिस्सा इस ऋण के भुगतान पर खर्च होता है.”

      “मेरे बच्चे भविष्य का प्रतीक हैं. अपनी आमदनी का चौथाई मैं उनके भोजन, कपड़े व शिक्षा पर खर्च करता हूँ. यह मेरा भविष्य में निवेश है.”

      “यद्यपि मैं गरीब हूँ परन्तु ऐसे भी लोग हैं जो मुझ से भी अधिक दरिद्र हैं. अपनी क्षमता के अनुसार मैं उनकी सहायता करता हूँ. इस कारण मेरी कमाई का चौथाई दान पर खर्च होता है.” 

“मेरी पत्नी मुझपर भरोसा करती है. मेरा कर्तव्य है कि मैं जीवनभर उससे प्रेम करूँ और उसकी रक्षा करूँ. मेरी आमदनी का चौथाई हिस्सा उसे एक अच्छा घर देने में खर्च होता है.”

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      सीख:

     वास्तविक ख़ुशी भगवान्, परिवार व दूसरों के प्रति हमारे दायित्व निभाने से मिलती है न कि धन, नाम व कीर्ति के पीछे भागने से.

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      अनुवादक- अर्चना 

  नन्हे मार्ग पर चलना

       

     आदर्श: प्रेम

    उप आदर्श: सहानुभूति, अनुकम्पा, शुद्ध इरादा 

     एक व्यक्ति ने एक बार स्वप्न में देखा कि वह स्वर्गलोक के द्वार पर खड़ा है. अपने सपने में उसने विविध जीवात्माएं देखीं जो सुनहरे द्वार की ओर जा रही थीं और स्वर्गलोक में प्रवेश होने की अनुमति माँग रही थीं.

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      सुनहरे द्वार पर खटखटाने वाली पहली जीवात्मा एक ज्ञानी पंडित की थी. “मुझे अंदर आने दो” ,पंडित ने स्वर्गलोक के प्रवेशद्वार पर पहरा दे रहे देवदूत से कहा. “दिन-रात पावन शास्त्रों का अध्ययन करने के फलस्वरूप मैंने स्वर्गलोक में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त किया है.”   

      देवदूत बोला, “रूको! हम अपने भौतिक अभिलेखों को देखकर इस बात की जाँच करेंगे कि तुमने शास्त्रों का अध्ययन प्रभु की भक्ति में किया है या सामाजिक सराहना व प्रशंसा के लिए.”

     द्वार पर अगली आत्मा एक धार्मिक पुरुष की थी. “मुझे अंदर आने दो, “उसने देवदूत से कहा. “मैंने कई निराहार व्रत किए हैं.”

     देवदूत बोला, “रूको! हम पहले छानबीन करेंगे कि तुम्हारी मंशा कितनी पवित्र थी.”

    फिर एक बहुत ही साधारण सा व्यक्ति आया और विनम्रता से बोला, “क्या मुझे अंदर आने की अनुमति मिल सकती है?”

    देवदूत ने उससे पूछा, “बताओ तुमने अपनी ज़िन्दगी के साथ क्या किया है.”

    हिचकिचाते हुए वह व्यक्ति बोला, “मैंने अपनी रोटी के कुछ टुकड़े प्रतिदिन एक भ्राता के साथ बाँटे हैं, जो लंगड़ा था और अपनी जीविका कमाने में असमर्थ था. मैं उसका घर साफ़ करता था और हर रोज़ उसके पानी का जग भरता था. मैं भगवान् से प्रार्थना करता था, “प्रिय प्रभु, मुझे उन लोगों का सेवक बनाइए जो पीड़ित व दुखी हैं.”

    देवदूत उस व्यक्ति से बोला, “नश्वर जीवों में तुम सबसे भाग्यवान हो. अपने नन्हे मार्ग पर चलकर तुमने अमरत्व हासिल किया है. स्वर्गलोक के द्वार तुम्हारे लिए खुले हैं.”

      सीख:

     दरिद्र व ज़रूरतमंदों की मदद करना, प्रभु के योग्य अधिकारी होने के समान है. मानव सेवा माधव सेवा है. गरीब व ज़रूरतमंद में प्रभु को देखो.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

      अनुवादक- अर्चना