प्रिय स्वामी के प्रति हार्दिक आभार 

मेरे सर्वप्रिय भगवान बाबा के चरण कमलों में सप्रेम प्रणाम। प्रभु साई का जन्मदिन मानवता के प्रति उनकी अनुकम्पा और उनके प्रेम का स्मरण कराता है। स्वामी के 100वें जन्मदिन पर, उन्हें कोटि कोटि नमन।

स्वामी की मैं अत्यंत आभारी हूँ कि उन्होंने बालसंस्कार के हिंदी ब्लॉग के लिए मेरा चयन किया। स्वामी ने कहा है कि हमें अपनी माता, मातृभूमि व मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए। बालसंस्कार मेरे और मेरी मातृभाषा के बीच वह मजबूत कड़ी है जो हमें जोड़कर रखती है। इस ब्लॉग से जुड़ने के अतिरिक्त लाभ मानवीय आदर्शों का नित्य स्मरण व दूसरों तक उन्हें पहुँचाना है। 

स्वामी के प्रति अपना आभार पुनः प्रकट करते हुए यह छोटा सा प्रयास उनके चरण कमलों में अर्पित करती हूँ।

समस्त लोका: सुखिनो भवंतु!!

सप्रेम नमन – अर्चना

                                     प्रिय भक्त

आदर्श: प्रेम 

उप आदर्श: ईश्वर के लिए तड़पना 

एक दिन काशी में भगवान विश्वनाथ के पवित्र मंदिर में सभी भक्तजन व मंदिर के पुजारी भजन कीर्तन और मंत्रोच्चार में मगन थे। अचानक उन्हें एक धातु की आवाज सुनी। जब उन्होंने उस दिशा में देखा तो उन्हें मंदिर के फ़र्श पर सोने की चमकती हुई थाली दिखी। 

अवश्य ही यह आसमान से महाकक्ष, जो मंदिर के परम पावन स्थान की ओर जाता है, में एक खुली जगह से गिर गई होगी। सभी चकित होकर उसके आस पास एकत्रित हो गए और मंदिर के मुख्य पुजारी थाली की जाँच करने उसके निकट गए।  

पुजारी ने थाली पर निम्न शब्द अंकित पाए, “यह मेरे प्रिय भक्त की है” और उन्होंने अंकित शब्दों को ऊँचे स्वर में पढ़ा। 

जल्द ही, मंदिर के पुजारी थाली को छीनने के लिए बराबर का दावा करने लगे, 

“मुझसे अधिक महान भक्त और कौन होगा। मैं अपना समय, योग्यता और ताक़त केवल काशी के भगवान विश्वनाथ की पूजा-अर्चना में ही बिताता हूँ।“ परंतु वहाँ उपस्थित कोई भी पुजारी जैसे ही थाली को छूता था, वह थाली मिट्टी की बन जाती थी।

सोने की थाली की खबर आग को तरह फैल गई। अनेकों विद्वान, गायक, कवि और प्रचारक अपना भाग्य आजमाने आए लेकिन असफल रहे। दिन, सप्ताह और महीने बीतते गए मगर उस थाली का दावेदार नहीं मिला। 

एक दिन मंदिर में एक अजनबी आया। मंदिर के प्रवेशद्वार पर खड़े होकर जब उसने भिखारियों, अंधे, गूंगे और लंगड़े व्यक्तियों को दयनीयता से भीख माँगते देखा तो उसकी आँखों में पानी आ गया। उनकी भूख व पीड़ा कम कर पाने में अपनी असमर्थता पर वह शर्मिंदा था। वह भगवान से प्रार्थना करना चाहता था और इस कारण उनसे मंदिर में कदम रखा। 

उसने पाया कि वहाँ लोग एकत्रित होकर किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे।  उसने भीड़ में घुसने की कोशिश की यह जानने के लिए कि लोग वहाँ क्यों खड़े थे। उस घेरे के बीच उसने सोने की एक थाली देखी।

उसके पूछने पर उसे सोने की थाली की घटना बताई गई। एक तरफ़ उसे आश्चर्य हुआ और वहीं लोगों और पुजारियों का व्यवहार देखकर उसे दुःख भी हुआ। ब्रह्मांड के स्वामी से प्रार्थना करने और उनकी अनुकम्पा पाने की कोशिश करने के बजाय, वे सभी सोने की थाली पर क़ाबू पाने के लिए उत्सुक थे। 

उसका शांतचित्त मनोभाव देखकर, मुख्य पुजारी ने थाली पर उसे अपना हाथ आजमाने को कहा। अजनबी बोला, “आदरणीय पुजारी जी, मैं सोने या चाँदी की परवाह नहीं करता। मुझे केवल ईश्वर के अनुग्रह की लालसा है।“

उस व्यक्ति के लिए पुजारी का सम्मान बढ़ गया। अतः उन्होंने उससे एक बार पुनः अनुरोध किया, “कम से कम हमारे संतोष के लिए, कृपया अपना हाथ आजमाइए।“ अजनबी ने बिना किसी लगाव व आसक्ति के थाली को छूआ। और उसके छूते ही थाली कई गुना दीप्तिमान हो गई। 

सभी पुरोहित इकट्ठे होकर पूछने लगे, “महाशय, आप कहाँ से आए हैं? आपकी क्या योग्यताएँ हैं? शिक्षा के किन क्षेत्रों में आपकी निपुणता है। आपने कितने वर्ष तपस्या की है?”

अजनबी ने शांत भाव से उत्तर दिया, “मैं किसी विशेष स्थान से नहीं हूँ। मैं अपनी जीविका मेहनत से कमाता हूँ। मैं ‘नामस्मरण’ की एकमात्र साधना करता हूँ। सम्भवतः इस साधना ने मेरा हृदय शुद्ध कर दिया है और उसे प्रेम व करुणा से भर दिया है। इस एक साधना ने मुझे अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने में सक्षम बनाया है।  मैंने न तो कोई किताब पढ़ी है और न ही किसी विज्ञान में महारत हासिल की है। मैं केवल ईश्वर के नाम का जाप करने की कला से परिचित हूँ। मैं सदैव ग़रीबों के प्रति उदार रहता हूँ।“

सीख:

ईश्वर के प्रिय बनने के लिए पहली और एकमात्र आवश्यकता एक करुणामय हृदय और इंद्रिय नियंत्रण पाना है। इन दोनों को पूरे विश्वास, प्रेम और भक्ति से नामस्मरण के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

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अनुवादक- अर्चना 

कृष्ण और कर्ण- ज़िंदगी न्यायपूर्ण है या अन्यायपूर्ण?

आदर्श: धर्म, कर्तव्य 

उप आदर्श: उचित आचरण 

कर्ण कृष्ण से कहता है, “ मेरे साथ बहुत अन्याय हुआ है।  क्या यह मेरी ग़लती है कि मैं नाजायज़ पैदा हुआ? मेरे जन्म लेते ही मेरी माँ ने मुझे त्याग दिया।“

“मैं, जिसका पालन-पोषण एक महल में होना चाहिए था, एक ‘सूद’ के घर में पला बढ़ा। युद्ध विज्ञान में द्रोणाचार्य से मुझे पूरी शिक्षा नहीं मिली क्योंकि मुझे ‘सूद’ समझा जाता था।“

“यद्यपि परशुराम ने मुझे सम्पूर्ण शिक्षा दी, उन्होंने मुझे अभिशाप दिया कि मैं सब कुछ भूल जाऊँ क्योंकि मैं क्षत्रिय था। क्या यह मेरी ग़लती है? मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं क्षत्रिय हूँ।“

“कोई लड़का दौड़ता हुआ आया और मेरे रथ से मारा गया। वह मेरी ग़लती नहीं थी; वह केवल एक दुर्घटना थी। फ़िर भी लड़के के पिता ने मुझे शाप दिया।“

“द्रौपदी के ‘स्वयंवर’ में भी मुझे ‘सूदपुत्र’ होने के कारण अपमानित किया गया जबकि मैं ‘सूर्यपुत्र’ था।“

“कुंती को केवल अपने अन्य बच्चों से प्यार था। उन्होंने कभी मुझे सत्य नहीं बताया और आख़िरकार जब उन्होंने सत्य बताया तो मुझे अपने पुत्रों पर किसी भी शस्त्र का प्रयोग न करने को कहा। भले ही उन्होंने मुझसे कभी माँ की तरह व्यवहार नहीं किया फिर भी, उन्होंने जो भी माँगा मैंने उन्हें दिया।“    

“मुझे ‘कुरूकुल’ का सिंहासन मिलना चाहिए था लेकिन मैं दुर्योधन द्वारा दान में दिए राज्य पर राज कर रहा हूँ।“

“भीष्माचार्य ने एक योग्य व्यक्ति के रूप में मुझे कभी सम्मान नहीं दिया। उन्होंने मेरा अपमान किया और अपने सेनापतित्व में मुझे सेना में लड़ने की अनुमति नहीं दी।“

“मैं जो भी हूँ वह दुर्योधन से मित्रता के कारण हूँ। आप सभी उसे एक खलनायक समझ सकते हैं लेकिन मेरे लिए उसने केवल अच्छा ही किया है। जब देवता भी मेरे साथ नहीं थे, दुर्योधन मेरे साथ खड़ा था। अतः उसके पक्ष में होने में क्या बुराई है?”

कृष्ण उत्तर देते हैं :

“कर्ण, मेरा जन्म कारागार में हुआ था। मेरे जन्म से पहले ही मृत्यु मेरा इंतज़ार कर रही थी।

जिस रात मेरा जन्म हुआ था, मुझे मेरी माँ से अलग कर दिया गया था। तुम्हें कम से कम ‘सूद’ के घर कुछ शिक्षा प्राप्त हुई।

तुम बचपन से तलवारों, रथों, घोड़ों, तीर-कमान का शोर सुनते हुए बड़े हुए।

मुझे केवल गोप-ग्वालों का झोंपड़ा मिला।  कोई तलवार नहीं, कोई रथ नहीं, केवल गाय-बैल, गोबर, गोपिकाएँ और कंस द्वारा जान लेवा हमले।

मैं लोगों को यह कहते हुए सुन सकता था कि उनकी सभी समस्याओं का कारण मैं  हूँ। भागने के लिए मुझे कायर भी कहा जाता था। जब तुम्हारे गुणों के लिए तुम्हारे गुरु द्वारा तुम्हारी सराहना की जाती थी, तब मैंने गुरुकुल शुरु भी नहीं किया था। मैं 16 वर्ष की उम्र में संदीपनी ऋषि के गुरुकुल में गया था। 

कोई सेना या शिक्षा नहीं। छोटी उम्र में ही, मुझ पर अपने चाचा को मारने का आरोप लगाया गया था। जनार्दन के डर से मुझे अपने पूरे समुदाय को यमुना के तट से दूर समुद्र तट पर ले जाना पड़ा था- एक बिलकुल नई जगह पर।“

“तुम्हारे पास राज्य है, लेकिन मेरे बारे में क्या है? जिन लड़कियों को मैं जानता भी नहीं हूँ, चाहती हैं कि मैं उनसे विवाह करके उनकी रक्षा करूँ, तो मुझे सब कुछ छोड़कर झटपट वहाँ जाना पड़ता है। मैंने जिस लड़की से प्रेम किया वह मुझे कभी नहीं मिली, लेकिन जो भी मुझसे प्यार करता है, मुझे पा लेता है।

यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता है तो तुम्हें बहुत श्रेय मिलेगा और तुम और अधिक विख्यात हो जाओगे। मैं मात्र एक सारथी हूँ। यदि धर्मराज युद्ध जीत जाएँगे तो मुझे क्या मिलेगा? पहले से ही मुझे युद्ध और सभी समस्याओं के लिए दोषी ठहराया जा रहा है। धर्मराज युद्ध जीतें या हारें पर मुझ पर लगा यह दोष कभी नहीं जाएगा।“

“एक बात याद रखो, कर्ण: सभी के जीवन में चुनौतियाँ हैं। जीवन किसी के लिए भी न्यायपूर्ण नहीं है। दुर्योधन के जीवन में बहुत सारा अन्याय है और युधिष्ठिर के भी।“

“लेकिन सही क्या है(धर्म) तुम्हारे मन/ चेतना को पता है। हमारे साथ कितना अन्याय हुआ? कितनी बार हम अपमानित हुए? कितनी बार हम वंचित रहे? हम किस चीज़ के हक़दार हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। अहम बात यह है कि किसी परिस्थिति में हमारी प्रतिक्रिया कैसी होती है। वह हमारा व्यक्तित्व निर्धारित करती है। पिनपिनाना बंद करो, कर्ण। चेतना के मार्ग पर चलना सीखो। जीवन में घटित अन्याय तुम्हें ग़लत रास्ते पर चलने का अधिकार नहीं देता।“ 

सीख: 

ज़िंदगी हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होती है। हमें अपनी परिस्थितियों को सही ढंग से सुलझाने की पूर्ण चेष्टा करनी चाहिए। जो परिस्थितियाँ हमारे नियंत्रण से परे होती हैं, उनपर निराश होने, शिकायत करने या ग़लत रास्ते पर चलना उचित नहीं है। इसके बजाय, यदि हम सही और ग़लत में अंतर जानकर, सही मार्ग पर चलें तो हम अपने भीतर शांति का आभास कर पाएँगें।

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अनुवादक- अर्चना 

                         बुद्ध और एक क्रोधित व्यक्ति

आदर्श: शांति 

उप आदर्श: सहनशीलता 

एक दिन बुद्ध एक गाँव से गुज़र रहे थे। एक बहुत ही क्रोधित और अशिष्ट व्यक्ति उसके पास आया और उनका अपमान करने लगा। “आपको दूसरों को शिक्षा देने का कोई अधिकार नहीं है,” उसने चिल्लाकर कहा। “आप अन्य लोगों की तरह मूर्ख व नासमझ हैं। आप केवल ढोंगी हैं।“

अपमान भरे शब्दों से बुद्ध व्याकुल नहीं थे। इसके विपरीत उन्होंने युवक से पूछा, “मुझे बताओ, अगर तुम किसी के लिए उपहार खरीदते हो और वह व्यक्ति उसे स्वीकार नहीं करता तब वह उपहार किसका कहलाता है?”

ऐसा विचित्र प्रश्न पूछे जाने पर वह व्यक्ति आश्चर्य चकित था। उसने उत्तर दिया, “वह मेरा होगा क्योंकि उपहार मैंने खरीदा था।“

बुद्ध मुस्कुराए और बोले, “बिलकुल सही कहा। और ठीक ऐसा ही तुम्हारे क्रोध के साथ भी है। यदि तुम मुझसे नाराज़ हो जाते हो और मैं अपमानित नहीं होता हूँ तब तुम्हारा ग़ुस्सा वापस तुम्हारे पास आ जाता है।“

सीख:

हमें अपने क्रोध पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। हमारे शब्द और हरकतें दूसरों पर प्रभाव डालती हैं। अतः हमें सोच-समझकर बोलना चाहिए। क्रोध में आचरण करने वाले व्यक्ति के प्रति हमें धैर्य व सहनशीलता विकसित करनी चाहिए।

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अनुवादक- अर्चना 

                   भगवान राम- अवतार से सीखना

आदर्श- सत्य 

उप आदर्श- सही आचरण 

भगवान राम, विष्णु के सातवें अवतार हैं। जब धर्म और नीतिपरायणता का पतन होता है, भगवान मनुष्य के रूप में प्रकट होते हैं। वह किसी भी रूप में आते हैं; अधिकतर मनुष्य रूप में आते हैं और मनुष्य की सीमाओं में बँधे रहते हैं। मानव रूप में रहते हुए वह एक सदाचारी जीवन व्यतीत करते हैं और जीवन की विविधताओं का सामना करके अपने उदाहरण से मानव जाति को शिक्षा देते हैं। 

भगवान राम का जन्म एक साधारण व्यक्ति के रूप में नहीं हुआ था। इसके विपरीत, वह माता कौशल्या के सामने चार भुजाओं वाले भगवान विष्णु के रूप  में प्रकट हुए थे। माता के अनुरोध पर, उन्होंने एक सामान्य शिशु का रूप लिया था। 

किशोरावस्था में ज्ञान अर्जित करने वह वशिष्ठ के गुरुकुल में गए थे। उन्होंने एक आदर्श पुत्र, भाई व शिष्य का जीवन बिताया। उन्होंने सदैव अपने माता-पिता और गुरु का सम्मान किया और उनकी आज्ञा का पालन किया। उन्होंने विभिन्न ऋषिओं का आशीर्वाद लिया और उनके आश्रमों में गए। यह वह ऋषि थे जो भगवान विष्णु के धरती पर अवतरण के लिए प्रार्थना कर रहे थे और जब प्रभु आए तो उन्होंने अपने चमत्कारी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं किया; बल्कि ऋषिओं सम्मान किया और उनसे शिक्षा ली।

भगवान राम एक आदर्श पुत्र का उदाहरण थे जिन्होंने ऋषि विश्वामित्र के साथ जंगल में जाने के लिए और मिथिला में सीता के स्वयंबर में भाग लेने के लिए अपने पिता की अनुमति ली थी। अपने पिता के वचन का मान रखने के लिए वह अपनी पत्नी के साथ वनवास गए। सीता और लक्ष्मण सहित, जंगल में उन्हें बहुत सारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी उन्होंने अपने पिता या कैकेयी के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा। उन्होंने स्वर्ण हिरण का पीछा किया क्योंकि सीता की तीव्र इच्छा थी और सीता का अपहरण होने पर वह हताश थे। उन्होंने बंदरों से मित्रता और अन्य हर सम्भव प्रयास किया ताकि वह  रावण को मार कर सीता को वापस पा सकें।

यद्यपि राम भगवान विष्णु का रूप थे और उनके पास समस्त श्रेष्ठ महाशक्तियाँ थीं परंतु अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्होंने उनका प्रयोग नहीं किया। प्रभु राम ने परिस्थितियों का सामना किया और उनका उचित ढंग से संचलन किया। उन्होंने अपने उचित आचरण की दिव्य प्रकृति का प्रदर्शन अपने माता-पिता और गुरु के प्रति अपने कर्तव्य के द्वारा किया, बुराई का विनाश और अच्छाई की संरक्षा करके किया, शबरी जैसे भक्तों को वरदान देकर और उन्हें मुक्त करके किया, पशुओं के प्रति समान प्रेम दर्शाकर किया जिन्होंने बदले में भगवान राम के कार्य में उनकी सहायता की।   

सीख: 

धर्म के उत्थान के लिए भगवान मनुष्य रूप धारण करते हैं और इसके लिए वह अन्य जीवों की भाँति जीवन के उतार-चढ़ाव का सामना करते हैं। प्रभु नीति परायणता का जीवन व्यतीत करते हैं ताकि मानवजाति के अनुसरण के लिए वह उदाहरण बन सके। 

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अनुवादक- अर्चना 

                            धर्म को व्यवहार में लाना

आदर्श: नीति परायणता 

उप आदर्श: कर्तव्य 

एक बार प्रह्लाद की परीक्षा लेने के इरादे से इंद्र एक ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए। प्रह्लाद ने उनका सत्कार किया और पूछा, “आप मुझसे क्या चाहते हैं? मैं आपको कैसे खुश कर सकता हूँ?”

 ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “हे राजन! मैं चाहता हूँ कि आप अपना सदाचरण(शील) मुझे उपहार में दें।“

 प्रह्लाद बोला, “ऐसा ही होगा। आपकी इच्छा पूरी हुई। मैं आपको अपना शील उपहार में दे रहा हूँ।“

ब्राह्मण दरबार से चला गए। जैसे ही ब्राह्मण गए, एक मनमोहक युवक राजवंशी दरबार से जाता हुआ देखा गया।  प्रह्लाद ने पूछा, “महाशय! तुम कौन हो?”

युवक ने उत्तर दिया, “मैं यश हूँ। मैं अब आपके साथ नहीं रह सकता क्योंकि शील ने आपको छोड़ दिया है।“

प्रह्लाद ने उसे जाने की अनुमति दे दी।

कुछ क्षणों बाद, एक और आकर्षक युवक दरबार से जाता हुआ देखा गया। प्रह्लाद ने पूछा,”क्या मैं जान सकता हूँ कि तुम कौन हो?” युवक बोला, “मैं पराक्रम हूँ। शील और यश के बिना मैं आपके साथ कैसे रह सकता हूँ? इसलिए मैं जा रहा हूँ।“ प्रह्लाद ने उसे जाने की अनुमति दे दी।

जल्द ही, एक सुंदर महिला जल्दबाज़ी में दरबार से जा रही थी। प्रह्लाद ने पूछा,” माँ, क्या मैं जान सकता हूँ कि आप कौन हैं?”

“मैं राजलक्ष्मी हूँ, इस साम्राज्य की प्रमुख देवी,“ उसने जवाब दिया और बोली, “शील, यश और पराक्रम के बिना मैं यहाँ नहीं रह सकती हूँ।“ 

तभी अश्रुपूर्ण आँखों वाली एक अन्य महिला राजदरबार से जाती दिखाई दी। प्रह्लाद भागकर उसकी ओर गया और पूछा, “माँ, आप कौन हो?”

वह बोली, “पुत्र, मैं धर्म की देवी हूँ। जहाँ शील, यश और पराक्रम नहीं है, वहाँ मेरी कोई जगह नहीं है। राजलक्ष्मी भी तुम्हें छोड़कर चली गई है।“

प्रह्लाद उसके चरणों में गिर पड़ा और बोला, “माँ, मैं शील, यश, पराक्रम और राजलक्ष्मी के बिना रह सकता हूँ लेकिन मैं आपके बिना नहीं रह सकता हूँ। मैं आपको कैसे कहीं भेज सकता हूँ? धर्म की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है। केवल धर्म ही समस्त विश्व का आधार है। आप कृपया मेरे साथ रहें। मुझे छोड़कर मत जाऐं ।“

धर्म की देवी ठहरने के लिए सहमत हो गईं। जब धर्म की देवी रूकने के लिए सहमत हुईं, अन्य सभी भी राजदरबार में लौट आए और बोले, “हम धर्म की देवी के बिना नहीं रह सकते। कृपया हमें भी अपने साथ रहने दो।“

भगवान इन्द्र ने प्रह्लाद की परीक्षा संसार को केवल उसकी महानता का चित्रण करने के लिए ली थी। प्रह्लाद की महानता धर्म के अनुशीलन पर आधारित थी। 

सीख:

महान ऋषियों, संतों और प्रह्लाद जैसे राजाओं को धर्म-निष्ठा, विश्वास और भक्ति के अनुपालन के लिए याद किया जाता है। जब हम सच्चाई, प्रेम और श्रद्धा पूर्वक अपने कर्तव्यों को निभाते हैं, तब हम न केवल भौतिक जीवन बल्कि आध्यात्मिक जीवन में भी अग्रसर होते हैं।

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अनुवादक- अर्चना    

  किसी के आस्तिक या नास्तिक होने पर राय बनाना 

आदर्श: सत्य 

उप आदर्श: समझना, अनिर्णायक 

किसी समय एक रानी थी जो प्रभु राम की बहुत बड़ी भक्त थी; उसे बहुत दुःख होता था कि उसके पति, राजा, प्रभु राम के नाम का कभी भी जाप नहीं करते थे और उनमें प्रभु के प्रति भक्ति नहीं थी। 

उसने प्रण लिया कि जिस क्षण उसे राजा की भक्ति या ‘राम नाम’ के प्रति श्रद्धा का सबूत मिलेगा, वह सारे मदिरों में पूजा करेगी और ग़रीबों को भव्य पैमाने पर खाना खिलाएगी। 

कुछ दिनों बाद, एक रात जब राजा गहरी नींद में सो रहा था, राजा ने  प्रार्थनापूर्वक तीन बार राम के नाम का जाप किया। रानी ने नामस्मरण सुना और राम के प्रति अपने पति की भक्ति जानकर प्रसन्न हुई। उसने सम्पूर्ण राज्य में सार्वजनिक ख़ुशी मनाने और ग़रीबों को खाना खिलाने का आदेश दिया।  

राजा को इस उत्सव का कारण नहीं पता था क्योंकि उन्हें केवल इतना बताया गया था कि यह रानी का आदेश था, जिसका अधिकारी पालन कर रहे थे। 

राजा को जब यह पता चला कि उन्होंने नींद में राम नाम का जाप किया था, उन्हें बहुत दुःख हुआ कि उनके मुख से राम का नाम निकल गया। उनका मानना था कि राम के प्रति उनके प्रेम का किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए। 

ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो अपने गुरु या अपने मनभावन नाम व रूप के बारे में शोर नहीं मचाते हैं लेकिन वह उन्हें सदैव अपनी चेतना में रखते हैं। राम नाम या कोई भी अन्य नाम, हमारी श्वास की तरह नित्य रहना चाहिए। इसके लिए अभ्यास अत्यावश्यक है। 

एक व्यक्ति ने एक अंग्रेज़ी चिंतक, डॉ. जॉनसन से कहा कि सुबह से रात तक वह विभिन्न कार्यों में इतना व्यस्त रहता है कि उसे नामस्मरण का समय कभी कभार ही मिलता है। डॉ. जॉनसन ने एक अन्य प्रश्न से इसका उत्तर दिया।

उन्होंने पूछा कि यद्यपि पृथ्वी का दो-तिहाई भाग पानी है और बाकी का हिस्सा पहाड़ों, रेगिस्तानों, जंगलों, बर्फीले क्षेत्रों, नदी के किनारों, कच्छ भूमि और इस प्रकार के असंभव क्षेत्रों से भरा हुआ है, फिर भी लाखों करोड़ों लोग पृथ्वी पर रहने की जगह कैसे ढूँढ लेते हैं? प्रश्नकर्ता के कहा कि मनुष्य किसी तरह से संघर्ष करके रहने की जगह ढूँढ लेता है।  डॉ. जॉनसन ने कहा कि इसी प्रकार मनुष्य को भी ईश्वर की पूजा के लिए दिन में कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए।

सीख:

आध्यात्मिकता में किसी को भी दूसरों को आँकने का अधिकार नहीं है। हर एक का प्रार्थना या उपासना करने का तरीक़ा या उनका विश्वास भिन्न हो सकता है।

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अनुवादक-

अर्चना  

एक भक्त का अटल विश्वास 

आदर्श: निष्ठा 

उप आदर्श: विश्वास, दृढ़ता 

रवि आध्यात्मिक मार्ग पर नया था। वह जिस भी गुरु से मिलता था, उससे प्रभावित हो जाता था। 

एक गुरु के अनुयायियों को देखकर, वह उस मार्ग का अनुसरण करने लगा और उनकी नियमित गतिविधियों में भाग लेने लगा। कुछ समय बाद, वह मायूस हो गया। वह उस मार्ग से ज़्यादा खुश नहीं था। बाद में, उसने अपने कुछ दोस्तों को एक दूसरे मार्ग पर चलते देखा और तुरंत उनसे जुड़ गया। कुछ समय बाद, वह पुनः खुश नहीं था। यह सिलसिला कुछ समय तक चलता रहा। 

रवि से देखा कि उसका एक अच्छा मित्र, अशोक, साधना और भक्ति के एक विशिष्ट मार्ग का अनुसरण करता था। उसे आश्चर्य हुआ कि अशोक इतना समर्पित व खुश कैसे था। रवि ने देखा कि उसका मित्र बहुत सकरात्मक था और सदैव दूसरों का भला करने में जुटा रहता था। उसे ईश्वर व अपने गुरु के प्रति गहरी आस्था और विश्वास था। 

रवि ने देखा कि अशोक के गुरु हमेशा उसका मार्गदर्शन करते थे और उसकी सुरक्षा करते थे। तब उसे समझ में आया कि अपने गुरु के अनुसरण व उनपर पूर्ण विश्वास के कारण अशोक ने जीवन के उतार-चढ़ाव का सामना समभाव से किया था। 

जल्द ही रवि को अहसास हुआ कि उसका अपना मन एक ‘मर्कट’(बंदर) के जैसे था जो अस्थिर था और बिना किसी उद्देश्य के डोलता रहता था। इसके बजाय उसकी साधना ‘मर्कट किशोर’ के जैसी होनी चाहिए, अर्थात् बंदर के बच्चे की जैसी जो सदैव अपनी माँ से चिपका रहता है। 

बंदर का बच्चा अपनी माँ को पकड़कर रखता है जब वह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाती है। वह माँ को केवल इस लिए पकड़कर रखता है क्योंकि वह जानता है कि वह उसे गिरने नहीं देगी। इसी प्रकार, यदि हम पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ अपने गुरु के चरणों को पकड़कर रखते हैं, तो वह हमें लक्ष्य तक अवश्य ले जाएँगे। जब रवि को यह अहसास हुआ, उसे जल्द ही अपने गुरु मिल गए; बल्कि गुरु ने उसे ढूँढ लिया और अपने गुरु का अनुसरण कर के वह परमानंद में था।

सीख: 

एक सच्चा सिद्ध गुरु मिलने पर हमें उनके चरण पकड़कर रखने चाहिए। वह हमें हमारे निश्चित लक्ष्य तक अवश्य ले जाएँगे।

अनुवादक- अर्चना 

                                 तत्काल प्रबोधन

आदर्श: वैराग्य भक्ति 

उप आदर्श: सहनशीलता, अटलता 

एक भक्त, जब एक महान गुरु के आश्रम में था तब उसे अपने इसी जीवनकाल में प्रबुद्ध होने की तीव्र इच्छा हुई। स्वभाव से बेसब्र होने के कारण, वह तुरंत प्रबुद्ध होना चाहता था। अतः उसने सोचा कि ऐसा करने का सबसे शीघ्र तरीक़ा यह था कि वह एक पूर्ण त्यागी बन जाए। 

उसने प्रभु से प्रार्थना की कि वह उसे सभी सांसारिक बंधनों व अनुरक्ति से मुक्त करें। 

जब वह घर वापस लौटा तो उसने पाया कि एक सम्पति अभिकर्ता उसके घर के बाहर “बिक्री के लिए” का विज्ञापन-पट लगा रहा था। उसकी अनुपस्थिति में, उसकी पत्नी ने विवाह-विच्छेद की कार्यवाही शुरु कर दी थी, उनके घर व साज-सामान पर आधिपत्य जमा लिया था और उनके संयुक्त बैंक के खातों व अन्य वित्तीय साधनों से सारा धन निकाल लिया था। 

जब उसने अपनी डाक देखी तो उसे पता चला कि कर विभाग के कर्मचारी उसका अंकेक्षण(ऑडिट) कर रहे थे क्योंकि उसने उनकी पूछताछ का समय पर जवाब नहीं दिया था। उसे यह भी पता चला कि लखांकन अनियमितताओं  के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया था। उसने अपनी सारी जायदाद खो दी क्योंकि उन्हें ऋण पर ख़रीदा गया था। उसके बैंक खातों को सील कर दिया गया था। 

वह गंभीर मुसीबत में था। 

अंततः उसने पूरे परिदृश्य पर ग़ौर से विचार किया। उसने तुरंत अपने मित्र से पैसे उधार लिए, झटपट अपने गुरु से मिलने वापस आश्रम गया और उनसे उत्कटता पूर्वक प्रार्थना की। उसने गुरु को स्पष्ट किया कि यद्यपि वह प्रबुद्ध बनना चाहता था, वह पूर्ण त्यागी का मार्ग नहीं अपनाना चाहता था। 

जब वह अपने घर वापस लौटा, उसने पाया कि “बिक्री के लिए” का विज्ञापन-पट हटा दिया गया था, उसकी पत्नी ने विवाह-विच्छेद के बारे में अपना मन बदल लिया था, उसके नियोक्ता को अहसास हुआ कि आंतरिक अंकेक्षण(ऑडिट) विभाग से गम्भीर ग़लती हुई थी और मालिक ने उसे दुबारा काम पर रख लिया और कर विभाग के अधिकारियों ने अपने अंकेक्षण(ऑडिट) की कार्यवाही छोड़ दी जब उसने अपनी दुःखद कहानी सुनाई।

सीख:

जीवन के किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए, धीरज अतिआवश्यक है। जीवन में कुछ भी आसानी से नहीं मिलता है; विशेष रूप से आध्यात्मिक मार्ग पर धैर्य, अटलता और विश्वास का होना अनिवार्य है।

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अनुवादक- अर्चना 

                                  ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति 

आदर्श: सही आचरण 

उप आदर्श: आत्म-नियंत्रण 

एक शिष्य किसी गुरु के पास गया और उनसे अनुरोध किया कि वह उसे ब्रह्म तत्त्व का सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करें। गुरु ने उसे एक मंत्र दिया और कहा कि किसी भी स्वार्थी इच्छा के बिना, वह उस मंत्र का निरंतर जाप करे। 

गुरु ने शिष्य से कहा कि इस साधना को एक वर्ष तक करने के बाद, वह ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने आ सकता है। 

एक वर्ष के बाद शिष्य अपने गुरु के पास गया और बोला, “आदरणीय गुरु! मैंने पूरे एक वर्ष तक मंत्र का जाप किया है।“ वह गुरु के उत्तर का व्यग्रता से इंतज़ार कर रहा था। 

उसने सोचा कि उसके गुरु ब्रह्म तत्त्व का ज्ञान उसे अवश्य देंगे। उसी समय, शिष्य की उपस्थिति से अनजान, एक सेविका आश्रम के परिसर में झाड़ू लगा रही थी और ज़मीन की धूल उस युवक पर गिर गई।

अपने शरीर पर धूल देखकर शिष्य आग बबूला हो गया क्योंकि वह पवित्र स्नान लेकर आश्रम आया था और धूल से उसका शरीर दूषित हो गया था। उसने सेविका को ग़ुस्से से घूरा और वह डर गई। गुरु इस पूरे दृश्य को देख रहे थे। 

गुरु बोले, “तुम ज्ञान प्राप्त करने के योग्य नहीं हो। तुम सेविका पर क्रोधित हो गए जिसने अनजाने में तुम पर धूल गिराई थी। ऐसे व्यक्ति को ‘ब्रह्म तत्त्व का ज्ञान’ कैसे दिया जा सकता है जिसमें इतना भी धैर्य नहीं है। वापस जाओ और एक और वर्ष तक साधना का अभ्यास करो।“

दूसरे वर्ष के अंत में, शिष्य आश्रम में प्रवेश करने ही वाला था कि गुरु के निर्देशानुसार, सेविका ने एक बार पुनः शिष्य पर ढेर सारी धूल गिराई। शिष्य अत्यधिक क्रुद्ध हुआ और सेविका को मारना चाहता था, लेकिन उसने किसी तरह स्वयं को संभाला।

शिष्य गुरु के पास गया और उन्हें प्रणाम किया। गुरु बोले, “तुम अभी भी ‘ब्रह्म तत्त्व का ज्ञान’ प्राप्त करने के योग्य नहीं हो। पिछले वर्ष, तुमने एक साँप के गुणों का प्रदर्शन किया था और अब एक कुत्ते के गुणों का। ऐसे पाश्विक गुणों से छुटकारा पाकर वापस आना।“

तीसरे वर्ष के अंत में, शिष्य ने पवित्र स्नान करने के बाद आश्रम के परिसर में प्रवेश किया। 

 गुरु के निर्देशानुसार, सेविका ने शिष्य पर गंदा पानी गिराया। शिष्य ने धीरता से सेविका को प्रणाम किया और बोला, “माँ! मैं आपको नमन करता हूँ। आपने मुझे धैर्य व संयम जैसे बृहत्तम सद्गुण प्राप्त करने में मदद की है। अब मैं अपने गुरु की कृपा पाने के योग्य हूँ। मैं सदैव आपका आभारी रहूँगा।“

शिष्य ने जैसे ही गुरु के सामने प्रणाम किया, गुरु सप्रेम बोले, “पुत्र! अब तुम ‘ब्रह्म तत्त्व का ज्ञान’ प्राप्त करने के सुयोग्य हो।“

सीख:

भगवान के नाम का जप करने, निस्स्वार्थ सेवा करने, शास्त्रों का अध्ययन करने और एक भद्र जीवन व्यतीत करने जैसी आध्यात्मिक साधना, आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्राथमिक क्रियाएँ हैं। अहम भाव को विलुप्त करने के लिए आत्म-नियंत्रण का विकास व स्वयं पर कार्य करना आवश्यक है। 

प्राथमिक साधना में परिपक्वता के बाद आत्म बोध की तलाश शुरू करने से, हम सही समय पर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। एक कच्चा फल तीव्र हवा के झोंके के बावजूद पेड़ से नहीं गिरता है लेकिन पूरी तरह पका हुआ फल, रात के सन्नाटे में भी गिर जाता है।

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना