आत्म-स्मरण का मार्ग 

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    एक प्रमुख गुरु का एक विशाल मठ था जिसमें ५०० भिक्षुक रहते थे और सभी आत्म-स्मरण के मार्ग का अभ्यास करते थे. आत्म-स्मरण बुद्ध के द्वारा बताए मार्गों में से एक है. 

    एक समय एक व्यक्ति मठ में आया क्योंकि वह शिष्य बनना चाहता था. गुरु ने उसे स्वीकार कर लिया. चूँकि वह व्यक्ति एक बहुत ही सीधा-साधा व अशिक्षित ग्रामीण था, गुरु ने उससे कहा, “तुम्हारा काम रसोईघर में चावल साफ़ करने का होगा.” रसोई काफ़ी बड़ी थी क्योंकि उसमें ५०० भिक्षुओं का खाना बनता था. बेचारा आदमी सूर्यास्त से लेकर देर रात तक चावल साफ़ करता रहता था. 

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    मठ में रहने वाले सभी ५०० भिक्षु विख्यात विद्वान् थे और वह मठ देशभर में प्रसिद्ध था. पर इस व्यक्ति के पास न ही धर्मोपदेश या पूजा में जाने का समय था और ना ही धर्मग्रन्थ पढ़ने या नीतिवचन सुनने का.  २० वर्ष गुज़र गए और वह व्यक्ति सिर्फ़ चावल साफ़ करता रहा. उसे वर्षों की गिनती भूल चुकी थी. उसे दिनों और तिथियों का भी ध्यान नहीं था और धीरे-धीरे उसे अपने नाम के बारे में भी संदेह होने लगा. २० साल से किसी ने प्रयोग नहीं किया था; किसी ने उसे उसके नाम से नहीं बुलाया था- कदाचित वह उसका नाम ही नहीं था. २० साल से सुबह उठने से रात को सोने तक वह लगातार एक ही लघु काम कर रहा था: चावल साफ़ करना. 

   गुरु ने घोषणा की कि उनका शरीर त्यागने का समय आ गया था. वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करना चाहते थे और उन्होंने यह कार्य कुछ इस प्रकार किया. गुरु ने उद्घोषणा की, “जिस किसी व्यक्ति को यह लगता है कि वह आत्म-स्मरण में सफल हो गया है, वह मेरी कुटिया की दीवार पर कुछ ऐसा परिज्ञान लिखे जो प्रमाणित कर सके कि उसने सत्य को देखा है.”

   एक भिक्षु, जिसे समुदाय का महानतम विद्वान् समझा जाता था, ने प्रयास किया. लेकिन वह उस वाक्य को लिखने से बहुत डर रहा था क्योंकि वह उसकी अंतर्दृष्टि नहीं थी. उसे ज्ञात था कि वह उसका परिज्ञान नहीं था, उसने शास्त्रों से उधार लिया था. वह उसका अपना अनुभव नहीं था और उस वृद्ध व्यक्ति को धोखा देना आसान नहीं था. अगली सुबह वृद्ध गुरु बाहर आये और नौकर से दीवार पर से सब कुछ मिटाने को कहा. गुरु नौकर से बोले, “पता लगाओ कि यह मूर्ख कौन है जिसने मेरी दीवार खराब की है.”   

  उस महान भिक्षु ने पकड़े जाने के डर से अपने हस्ताक्षर नहीं किये थे. उसकी योजना के अनुसार, यदि गुरु लेखन की प्रशंसा करते और कहते कि वह वास्तव में एक सर्वोत्कृष्ट अंतर्दृष्टि है तो वह बाहर आकर कहेगा, “यह मैंने लिखा है.” वरना वह ख़ामोश रहेगा….. किसे पता चलेगा? ५०० लोगों में वह किसी का भी काम हो सकता था.  

  लगभग १ दर्ज़न महान विद्वानों ने कोशिश की पर किसी को भी अपने हस्ताक्षर करने की हिम्मत नहीं हुई. हर बार गुरु की प्रतिक्रिया एक सी होती थी; वह पंक्ति को मिटवाकर कहते थे, “तुम में से किसी ने भी आत्म-स्मरण को हासिल नहीं किया है. तुम सब स्वयं के नाम पर अहंकार को बढ़ावा दे रहे हो. मैंने तुम सब को बार-बार याद कराया था परन्तु एक विशाल अहम् बहुत ख़ुशी देता है. आध्यात्मिक अहंकार, सांसारिक अहंकार, दैवी अहंकार और भी अधिक सुखद लगते हैं. अब मुझे स्वयं ही उस व्यक्ति को ढूँढना पड़ेगा.”

   बीच रात में गुरु उस व्यक्ति के पास गए जो २० वर्ष पहले आया था. वह व्यक्ति २० साल से केवल चावल साफ़ कर रहा था और गुरु ने उसे २० साल से नहीं देखा था. वह नींद से उठा और गुरु को पास खड़े देखकर बोला, “कौन हो तुम?” क्योंकि २० साल पहले….. दीक्षा संस्कार के समय उसने उन्हें कुछ पलों के लिए ही देखा था- “और मेरी नींद खराब करने का क्या कारण है?”

    गुरु बोले, “मैं तुम्हारा गुरु हूँ. तुम भूल गए……..? क्या तुम्हें अपना नाम याद है?”

    वह व्यक्ति बोला, ” यही मेरी समस्या है. आपने मुझे जो काम दिया है उसमें किसी नाम, प्रसिद्धि, पांडित्य या तपस्या की आवश्यकता नहीं है. मेरा कार्य इतना सहज है कि मैं सब कुछ भूल चुका हूँ. मुझे अपने नाम पर भी पक्का विश्वास नहीं है. मेरे ध्यान में कुछ नाम आते हैं पर मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि इनमें से कौन सा मेरा नाम है. पर मैं आपका आभारी हूँ.” उसने गुरु के चरण स्पर्श किए और बोला, “कृपया मेरा काम मत बदलिए. सब कुछ भूल जाने के बावजूद मैंने सब कुछ हासिल कर लिया है.”

   “मैंने ऐसे सुकून का अनुभव किया है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी- ऐसी शान्ति जिसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते. मैंने परमानन्द के ऐसे क्षणों का अनुभव किया है कि अगर मैं मर भी जाऊँ तो मुझे यह शिकायत नहीं होगी कि ज़िन्दगी ने मेरे साथ इन्साफ नहीं किया. मेरे इस काम ने मुझे मेरी योग्यता से कहीं अधिक दिया है. आप बस मेरी नौकरी मत बदलिए. मैं इसे बखूबी निभा रहा हूँ. वैसे क्या किसी ने मेरे काम के बारे में शिकायत की है? ”

    गुरु बोले, “नहीं, किसी ने तुम्हारी शिकायत नहीं की है. पर तुम्हारी नौकरी बदलनी पड़ेगी क्योंकि मैं तुम्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर रहा हूँ.”

     व्यक्ति बोला, “मैं मात्र एक चावल साफ़ करने वाला हूँ. मुझे गुरु या शिष्य होने के बारे में कुछ नहीं पता है. मैं कुछ नहीं जानता हूँ. कृपया मुझे माफ़ कीजिए- मैं आपका उत्तराधिकारी नहीं बनना चाहता क्योंकि मैं इतना बड़ा काम संभाल नहीं सकता हूँ, मैं केवल इस चावल की सफाई कर सकता हूँ.”  

 उस व्यक्ति को प्रेमपूर्वक समझाते हुए गुरु बोले, “तुमने वह हासिल किया है जो अन्य हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. तुमने हासिल कर लिया क्योंकि तुम प्रयास नहीं कर रहे थे. तुम बस अपना छोटा सा काम कर रहे थे. तुम्हारा काम करने के लिए सोच-विचार, भावनाओं, क्रोध, मतभेद, तुलना और आकांक्षा का होना आवश्यक नहीं था और इस कारण धीरे-धीरे तुम्हारा अहंकार ख़त्म हो गया. मनुष्य का जन्म नाम के साथ नहीं होता है. वह अहंकार है जिसे नाम दिया जाता है- यह अहम् की शुरूआत है. तुम्हारा अहम् ख़त्म होने पर तुम अपने गुरु को भी भूल गए क्योंकि वह तुम्हारा अहम् था जो तुम्हें मेरे पास लाया था. उस पल तक तुम आध्यात्मिक रूप से महत्वाकांक्षी यात्रा पर थे. तुम बिलकुल सही व्यक्ति हो इसलिए मेरा चोला, मेरी टोपी और मेरी तलवार लो जो एक गुरु हमेशा से अपने उत्तराधिकारी को देता आया है.”

    गुरु आगे बोले, “पर एक बात का ध्यान रहे: इन्हें लेकर तुम मठ से जितनी दूर भाग सकते हो उतनी दूर भाग जाओ क्योंकि तुम्हारे जीवन को खतरा होगा. यह सब ५०० अहंकारी तुम्हें मार देंगे. तुम इतने सरल हो और इतने मासूम बन गए हो कि अगर यह सभी तुम्हें rice2चोले, टोपी और तलवार के लिए पूछेंगे तो तुम सहज ही दे दोगे. तुम इन्हें लेकर जितनी दूर हो सके पहाड़ों में निकल जाओ. जल्द ही लोग तुम्हारे पास आने लगेंगे जिस प्रकार फूलों के खिलने पर मधुमक्खियाँ फूलों की तरफ रास्ता खोज लेती हैं. तुम अब खिल चुके हो. तुम्हें शिष्यों के बारे में चिंता करने की ज़रुरत नहीं है. एक दूरवर्ती जगह पर जाकर तुम केवल शांत रहो. लोग तुम्हारे पास आएंगे; तुम जो भी करते रहे हो बस वही लोगों को सिखाओ.”

 

 वह व्यक्ति बोला, “लेकिन मैंने कोई विशेष शिक्षा ग्रहण नहीं की है और मुझे नहीं पता कि मैं उन्हें क्या सिखाऊँगा.”

 गुरु बोले, “तुम उन्हें शान्ति व नीरवता से केवल छोटी-छोटी चीज़ें करना सिखाओ, उन्हें सिखाओ कि वह यह कार्य इस संसार या दूसरी दुनिया में कुछ हासिल करने की लालसा से न करें ताकि वह एक बच्चे के समान मासूम बन सकें. यह सादगी ही वास्तविक धार्मिकता है.” 

     सारांश:

   हमें जीवन के हर पल को संजोकर रखना चाहिए और उसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. अपने लक्ष्य की ओर सतर्कता और जागरूकता होनी चाहिए. यह हमें परम सत्य पर केंद्रित रखती है. मनुष्य को अभिमानी नहीं होना चाहिए और दौलत, रिश्तों, सामर्थ्य व सौंदर्य से आसक्त व उनमें लीन नहीं होना चाहिए. यह सब अस्थायी है. यह हर रोज़ बदलते रहते हैं. समस्त संसार भ्रम से परिपूर्ण है. इसलिए स्थायी की तलाश करने के बजाए अस्थायी में स्वयं को उलझाना मूर्खता है. अतः हमें उस अनंत की तलाश करनी चाहिए जो परम सत्य है और इसके लिए अहंकार का उन्मूलन अति आवश्यक है.   

अनुवादक- अर्चना 

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“मैं ना होता तो क्या होता” – एक कथा 

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  एक बार हनुमानजी प्रभु श्रीराम से बोले, “प्रभु, अशोक वाटिका में जिस समय क्रोधित रावण तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा था, उस समय मुझे ऐसा लगा था कि उसकी तलवार छीनकर उसका सर काट दूँ. परन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़कर उसे रोक लिया. यह देखकर मैं अति प्रसन्न था क्योंकि अगर मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं ना होता तो क्या होता? ”

    “बहुधा हमें ऐसा ही भ्रम हो जाता है. मुझे भी लगता कि यदि मैं नहीं होता तो सीताजी को कौन बचाता? परन्तु आज आपने न केवल उन्हें बचाया बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया. तब मुझे समझ में आया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं. इस में हमारा किसी का कोई महत्व नहीं है.”

  “कुछ समय बाद जब त्रिजटा ने लंकापति से कहा कि लंका में एक बन्दर आया हुआ है और वह लंका जलाएगा तब मैं गहरी सोच में पड़ गया. मैं सोचने लगा कि प्रभु ने तो मुझे लंका जलाने का आदेश नहीं दिया है तो फिर यह त्रिजटा ऐसा क्यों कह रही है. त्रिजटा की बात से उत्तेजित होकर रावण ने मुझे मारने के लिए अपने सैनिक भेजे. स्वयं को बचाने के लिए मैंने तनिक भी चेष्टा नहीं की. तभी विभीषण ने वहाँ आकर रावण को सलाह दी कि एक दूत को मारना अनीति है . तब मैं समझ गया कि मेरी रक्षा के लिए मेरे प्रभु ने यह उपाय किया था.” 

  “मुझे सबसे अधिक आश्चर्य तब हुआ जब रावण ने कहा कि बन्दर को मारा नहीं जाएगा. उसके बदले घी से भीगे कपड़े से उसकी पूंछ को बाँधकर उसमें आग लगाई जाएगी. रावण का कथन सुनकर मैं चकित था क्योंकि संत त्रिजटा की भविष्यवाणी सच साबित हो रही थी. वरना लंका को जलाने के लिए मैं घी, कपड़ा और आग का प्रबंध कहाँ से करता? परन्तु आपने सारी व्यवस्था रावण के द्वारा करवा दी. जब आप रावण से भी काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में क्या आश्चर्य की बात है.”

   इसलिए हमें सदा याद रखना चाहिए कि संसार में जी कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है. हम और आप केवल निमित्त मात्र हैं. अतः कभी भी यह भ्रम न पालें कि …..

     मैं ना होता तो क्या होता!

   

  कुत्ता नहीं शेर बनो 

           

   दक्षिण भारत के एक गाँव में एक व्यापारी रहता था. उसके विवाह के बहुत वर्षों बाद उसके घर में पुत्र का जन्म हुआ. व्यापारी इतना ज़्यादा दौलतमंद था कि उसके पुत्र का लालन-पालन बहुत लाड़ प्यार और हर प्रकार की विलासता में हुआ. उसकी हर इच्छा व आवश्यकता का ध्यान रखा जाता था और उसके पास हर वह वस्तु थी जो दौलत खरीद सकती थी. व्यापारी भी अपने पुत्र से अत्यधिक प्रेम करता था. समय के साथ जब वह बालक बड़ा हुआ तब उसके इर्द-गिर्द ऐसे बहुत सारे मित्र थे जो उसके द्वारा दिए गए उपहार व दावत का आनंद लेते थे.

   विवाह योग्य होने पर उसके लिए अत्यधिक खूबसूरत व धनवान वधुओं के प्रस्ताव आये; उसके जीवन में सब कुछ बहुत ही अच्छा चल रहा था. वह अपने पिता की संपत्ति खर्च करता चला गया और एक दिन उसका दिवालिया निकल गया. उसने अपने दोस्तों से मदद माँगने की कोशिश की परन्तु उसके सभी मित्र उसे टालने लगे.     

  धन नहीं रहने पर, दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया. उसकी पत्नी और बच्चे भी ऐसे इंसान के साथ नहीं रहना चाहते थे जिसके पास कुछ भी न हो. अपनी बुरी आदतों व अवगुणों के साथ अस्वस्थ हालत में उसे अकेला छोड़ दिया गया था. उसके शरीर ने भी ज़्यादा देर साथ नहीं दिया और बीमारी के कारण वह बिस्तर पर पड़ गया. वह मन ही मन सोचने लगा कि किस प्रकार भौतिक वस्तुओं से सम्बद्ध होकर उसने अपना जीवन नष्ट कर लिया था. उसे अहसास हुआ कि उसने स्वयं के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया था और वास्तव में आर्थिक व आध्यात्मिक जीवन में वह बिलकुल विफल था.  

   वह बहुत उदास रहने लगा परन्तु सौभाग्यवश एक घुमंतू संत उसके पास आया. हमारे जीवन में संत प्रभु के अनुग्रह से ही आते हैं.कृपालु संत ने इस व्यक्ति की दयनीय अवस्था देखी और उसे अपने आश्रम ले गए. उनके शिष्यों ने इस व्यक्ति का भली-भाँती ध्यान रखा. जब उसकी तबियत में सुधार हुआ तब उसने आश्रम में रहकर संत की सेवा करने के लिए उनकी अनुमति माँगी.

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  वह चाहता था कि गुरु उसे कुछ ज्ञान भी प्रदान करें. गुरु कृपालु थे और उन्होंने उसे समझाया, “मेरे बच्चे, “शेर बनो, कुत्ता नहीं.” उस व्यक्ति को समझ नहीं आया कि इस कथन से गुरु का क्या अभिप्राय था. तब गुरु ने समझाया, “जब तुम एक कुत्ते के सामने गेंद फेंकोगे तो वह गेंद के पीछे भागेगा. जब तुम शेर के सामने कुछ फेंकोगे तो उसका ध्यान फेंकी गई वस्तु पर नहीं बल्कि तुम्हारे ऊपर ही रहेगा. वह तुम्हारे ऊपर झपटने के इंतज़ार में रहेगा. इन सभी वर्षों में तुम एक कुत्ते की तरह अपनी संपत्ति, यौवन, पत्नी व बच्चों जैसे अल्पकालिक सुखों के पीछे भागते रहे हो. जीवन के वास्तविक व स्थाई सत्य पर ध्यान केंद्रित करने की तुमने कभी भी कोशिश नहीं की. कम से कम इस का अहसास करो, वह जो शाश्वत है उस पर ध्यान केंद्रित करके उसकी तलाश करो. तुम ज़्यादा खुश रहोगे.”

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   वह व्यक्ति गुरु का आभारी था. आश्रम में रहकर सेवा करने और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने से वह पुनः स्वस्थ, खुशहाल व संतुष्ट बन गया. जल्द ही उसे अहसास हो गया कि यह संसार नश्वर है और उसे कुछ उच्चतर की तलाश करनी है जोकि सर्वश्रेष्ठ है.

  वह एक मेहनती व निष्ठावान शिष्य था. उस व्यक्ति में बदलाव देखकर गुरु ने आश्रम के लिए उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. गुरु ने फिर उसे योगीत्व की दीक्षा दी. उस व्यक्ति ने आश्रम का कार्यभार संभाला और अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए अपने सभी शिष्यों को सत्य व विवेक का ज्ञान प्रदान किया. 

  सारांश:

  सांसारिक वस्तुएँ अल्पकालिक होती हैं. यह सत्य नहीं है. हम जो रोज़ अनुभव करते हैं वह सापेक्ष सत्य है. यही हमारे उतार-चढ़ाव और सुख-दुःख का कारण है. इसकी वजह यह है कि यह शाश्वत नहीं है. जब एक बार हमें स्थायी सत्य का अहसास होगा कि हम सब ब्रह्मन हैं; तब संसार हमें प्रभावित नहीं करेगा. हम ऐसा तभी हासिल कर सकते हैं जब हम मनन करेंगे, अपने भीतर देखेंगे और अपने वास्तविक आत्म द्वारा निर्देशित किए जाएंगे.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक- अर्चना    

       राजहंस और कौआ 

    आदर्श: उचित आचरण (सही व गलत में भेद करने की क्षमता)

    उप आदर्श: अच्छी संगत रखना 

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    एक कौवे और एक राजहंस में मित्रता हो गई. एक दिन कौआ राजहंस को अपने घर ले गया और उसे एक सूखे और मुरझाए हुए पेड़ पर बैठा दिया. वह स्थान चारों तरफ बिखरे गोबर, मांस व अस्थियों के गंध से महक रहा था.

    राजहंस बोला, “भाई! इतनी गन्दी जगह पर मैं एक पल भी नहीं रह सकता हूँ. यदि तुम्हारे ध्यान में कोई पवित्र जगह हो, तो मुझे वहाँ ले चलो.”

    अतः कौआ राजहंस को एक एकांत बाग़ में ले गया जो राजा की संपत्ति थी. राजहंस को एक पेड़ पर बैठाकर वह स्वयं भी उसके पास बैठ गया. राजहंस ने जब नीचे देखा तो पाया कि सूरज की रोशनी लगाने के लिए राजा अपना सिर खुला छोड़कर पेड़ के नीचे बैठा हुआ था. 

    राजहंस स्वभाव से उदार होता है. अतः राजा को सूरज की तेज़ व तीखी किरणों से राहत देने के लिए राजहंस ने सहानुभूतिपूर्वक अपने पंख फैलाकर राजा को छाया प्रदान की. लेकिन कौवे ने, स्वभाव से लापरवाह होने के कारण, राजा के सिर पर मलमूत्र गिराया. 

    राजा ने ऊपर की ओर तीर चलाया जिसके प्रहार से राजहंस नीचे गिर गया जबकि कौआ झटपट उड़ गया. 

    मरते हुए राजहंस ने राजा से कहा, “ओ राजा! मैं वह कौआ नहीं हूँ जो मलमूत्र गिराता है. मैं वह राजहंस हूँ जो पवित्र पानी में रहता है परन्तु एक घटिया कौए की संगत ने मेरा जीवन नष्ट कर दिया.”  

    सीख:

     जिस प्रकार सकारात्मकता लोगों को प्रभावित करती है उसी प्रकार नकारात्मकता भी अपना असर डालती है. हमें जीवन में सदा सही व उचित दोस्तों का चयन करना चाहिए. सत्संग व अच्छे लोगों की संगत हमें सकारात्मक ढ़ंग से प्रभावित कर सकती है. संभव है कि नकारात्मक वातावरण में एक भले व्यक्ति की अच्छाई सम्मानित न हो और उसे गलत व्यक्ति की संगत का हर्जाना चुकाना पड़े.

   कहा जाता है, “मुझे अपनी संगत बताओ और मैं बताऊँगा तुम कौन हो.” बचपन से ही अच्छी संगत और उचित व योग्य मित्रों का  होना बहुत आवश्यक है. एक सड़ा हुआ फल, फलों की समस्त टोकरी को नष्ट कर देता है. अतः दोस्तों के चयन में हमें सावधान रहना चाहिए. जो आदर्श बच्चे छोटी उम्र में विकसित करते हैं, वह उनके साथ जीवनभर रहते हैं. अतः बचपन से ही अच्छे दोस्तों की संगत व मूल्य आधारित शिक्षा का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है. 

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना   

अच्छी संगत के लाभ

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    एक गुरु ने अपने शिष्य को वह सब सिखाया जितना उन्हें ज्ञात था. सभी धर्मग्रन्थ सिखाने के बाद उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि आखिरी सीख के लिए उसे पास के आश्रम में जाना होगा. अंतिम शिक्षा के लिए उन्होंने शिष्य से एक अन्य गुरु के पास जाने को कहा. शिष्य चकित था कि उसके गुरु दूसरे गुरु से अधिक सुशिक्षित होने के बावजूद उसे किसी अन्य गुरु के पास क्यों भेज रहे थे. 

    यद्यपि वह असमंजस में था पर फिर भी उसने अपने गुरु की आज्ञापालन करने का निश्चय किया और दूसरे गुरु को मिलने पास के आश्रम में गया. उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि दूसरे गुरु ने शिक्षा देना बंद कर दिया था. वह अपने शिष्यों को प्रेम से भोजन परोसने, उनका अवशिष्ट भोजन साफ़ करने व बर्तन धोने में मगन थे. 

    दूसरे गुरु का व्यवहार देखकर शिष्य को समझ में आया कि प्रेमपूर्वक सेवा करने का अर्थ क्या होता है. इसके बाद उसने कुछ और अति गंभीर चीज़ देखी. रात में सोने से पहले गुरु ने स्वयं बर्तन धोकर उन्हें सही क्रम में रखा. 

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    अगली सुबह वह बर्तनों को निकालकर, उन्हें पुनः धोकर खाना बनाना शुरू करते थे. शिष्य चकित था कि गुरु को सुबह फिर से बर्तन धोने की क्या ज़रुरत थी जब वह पहले ही रात को उन्हें अच्छी तरह से धो चुके थे और बर्तन गंदे भी नहीं थे. शिष्य ने इस प्रकार सारे विवरणों को ध्यान से देखा और अपने पहले गुरु को उनका बयान देने वापस गया. 

      उसने कहा, “गुरूजी, मैं यह विचित्र बात समझ नहीं पा रहा हूँ कि आश्रम में गुरु पहले से ही धुले बर्तनों को सुबह पुनः क्यों धोते हैं? ऐसा करने का क्या कारण हो सकता है? “   

   गुरु ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं चाहता था कि तुम इसी समझ को ग़ौर से देखो और पूरी तरह से समझो.”

    तुम अपने मनस को नियमित रूप से शुद्ध करते हो परन्तु राह चलते कोलाहल, अस्पष्ट व धूलित बूझ के रूप में तुम्हारा मनस धूल एकत्रित करने लगता है. अब यह मत कहना कि एक बार ध्यान लगाने के बाद तुम रूक जाते हो. जब तक तुम्हारा मनस धूल बटोरता है तब तक उसे लगातार साफ़ करना पड़ता है. यह हमारे मनस को स्वच्छ और शुद्ध करने की निरंतर प्रक्रिया है. 

     सारांश:

    प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य अपने वास्तविक आत्म का बोध करना है और अंत में उस स्त्रोत में विलीन होना है. जब तक हम अपने दैनिक कर्तव्यों, रिश्तेदारियों व अन्य सांसारिक गतिविधियों में बहुत अधिक उलझे रहते हैं; तब तक अपने वास्तविक आत्म के बारे में जानने का न हमारे पास समय होता है और न ही हम मनन करने का कष्ट करते हैं.

   हम स्वयं को हमेशा अपने शरीर और अपने आसपास बनाए संबंधों से जोड़ते हैं. बाद में शरीर के पीड़ित होने पर या फिर इन रिश्तों के छूट जाने पर हम दुखी होते हैं. इसका कारण यह है कि हम जिसके पीछे भागते हैं वह अनस्थिर व नश्वर है. इस तथ्य को समझना सहज नहीं है और इसे कहना आसान है पर करना मुश्किल है. 

  परन्तु सत्संग या अच्छे लोगों की संगत में, विवेकी व्यक्ति हमें कम से कम यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कौन हैं और हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है. एक गुरु या अच्छी संगत के बिना आत्म-बोध के पथ पर आगे बढ़ना आसान नहीं है. अतः आत्म-प्राप्ति के मार्ग पर अच्छी संगत पहला कदम है. यह हम अभी शुरू करेंगे तो पता नहीं कब या कितने जन्मों में अपना लक्ष्य सिद्ध कर पाएंगे. पर कम से कम इस पथ पर हमने यात्रा अवश्य आरम्भ कर दी होगी.

Source: saibalsanskaarhindi.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना 

      सड़े हुए केले 

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        आदर्श: उचित आचरण 

    उप आदर्श: विलम्ब मत करो 

     नरीमन एक भला इंसान था. वह पूजा में बैठकर भगवान् से संपर्क बनाकर शक्ति व उत्प्रेरणा प्राप्त करता था. वह अपने समय और धन का काफ़ी बड़ा हिस्सा गरीबों की सेवा में लगाता था. जब भी अस्पताल में निःशुल्क चिकित्सा शिविर लगते थे, वह अपनी सेवा अवश्य प्रस्तुत करता था. वह ताज़े फल खरीदकर अस्पताल के गरीब मरीज़ों में बाँटता था और कभी-कभी मज़दूर वर्ग के बस्ती के बच्चों को सिनेमा या आइसक्रीम की दावत देता था. वह सेवा का हर कार्य इस प्रकार करता था मानो वह ईश्वर की सेवा हो. 

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    एक दिन उसने अपने पुत्र से कहा, “बेटा, आज मैं भगवान् को केला चढ़ाने मंदिर जा रहा हूँ. बाद में यह केले मैं भिखारियों में बाँट दूँगा जो मंदिर के बाहर बैठे होते हैं. तुम भी मेरे साथ क्यों नहीं आते? ”

    बालक ने आलस भाव से कहा, “अरे बाबा! यह मंदिर जाना और पूजा करना; यह सेवा का कार्यकलाप …..यह सब मेरे बस का नहीं है. आप बूढ़े हैं, बाबा. यह सब बूढ़े लोगों के लिए होता है. मैं अभी जवान हूँ और मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है. शायद आपकी तरह बूढ़े होने पर मैं इस बारे में सोचूँगा… पर अभी नहीं !”

  

  लड़के ने अपने वॉकमेन को पुनः ठीक किया और रैप संगीत की धुन पर झूमने लगा. नरीमन ने अपने पुत्र का कथन सुना पर पलटकर कोई उत्तर नहीं दिया. उसने जाकर अपने वितरण का काम संपन्न किया.

     कुछ दिनों के बाद नरीमन ने अतिपक्व केलों की टोकरी खरीदी और उसे घर के बाहर रखकर नहाने चला गया. 

    नरीमन के पुत्र की नज़र काले केलों पर पड़ी और उसने देखा की केलों पर कीड़े-मकोड़े मंडरा रहे थे. कुछ केले सड़ गए थे और कुछ काफ़ी भद्दे दिख रहे थे. नरीमन स्वच्छ व सफ़ेद कुरता-पैजामा पहनकर आया और केलों को गाड़ी में रखने लगा. पुत्र ने पूछा, ” बाबा, इन केलों को कहाँ ले जा रहे हो?”    

    “मंदिर, “ पिता ने बहुत ही सहजता से उत्तर दिया.

    “लेकिन बाबा, यह केले तो सड़े हुए हैं. मेरा मतलब यदि आपको इन्हें ईश्वर तो अर्पण करना ही था तो कम से कम ध्यान देते कि केले ताज़े हों. यह सब चिपचिपे व नरम हो चुके हैं. इन सब पर कीड़े भी फैल चुके हैं. इन्हें मंदिर में अर्पण करना लज्जाजनक होगा.”

    पिता बोले, “अगर तुम स्वयं को प्रभु को अर्पण करने के लिए अपने वृद्ध होने का इंतज़ार कर सकते हो; अगर तुम्हें लगता है कि वृद्धावस्था में तुम आकर्षक या प्रभु के भोग योग्य रहोगे तो यह पुराने और सड़े हुए केले ईश्वर को अवश्य ही अर्पण किये जा सकते हैं.”

    पुत्र अवाक रह गया. वह बहुत लज्जित था और पिता से आँख नहीं मिला पा रहा था. पिता को मालूम था कि उसका निशाना बिलकुल सही लगा था. नरीमन बोले, “जब तुम जवान व हृष्ट-पुष्ट होते हो, तुम ईश्वर के लिए काम कर सकते हो. तुम अपनी सेवा प्रस्तुत कर सकते हो. तुम ज़रूरतमंद लोगों के लिए समय व धन बचा सकते हो. 

    बूढ़े हो जाने पर तुम्हारे शरीर की अपनी समस्याएँ होंगी. तुम सेवा करने के लिए शायद शारीरिक रूप से स्वस्थ न हो. तुम्हारी आमदानी नहीं होगी, खर्चे कई होंगे और इस कारण आर्थिक रूप से मजबूर होगे. 

     बुढ़ापे में जब तुम गठिया या जोड़ों के सूजन के कारण पूजा में बैठने में असमर्थ होगे तब तुम प्रभु को क्या दे सकते हो? उस समय प्रभु के अनुग्रह की ज़रुरत तुम्हें पहले से कहीं अधिक होगी! ”

     ऐसा कहकर पिता ने सड़े हुए केलों का आखिरी गुच्छा गाड़ी में रखा और चले गए. उसने अपना पक्ष रख दया था और पता है वह कहाँ गया? नरीमन मंदिर नहीं गया क्योंकि उसे मालूम था कि वह केले ईश्वर को अर्पण करने योग्य नहीं थे. वास्तव में वह गोशाला गया जहाँ गुमराह गायें थीं और उसने उन्हें केले खिलाए. सड़े हुए केलों ने अपना काम सिद्ध कर लिया था. 

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   सीख:

   जब हम दूसरों कि मदद करने की अवस्था में होते हैं तब हमें मदद अवश्य करनी चाहिए. हमारी सहायता दूसरों के लिए उपकारी व सार्थक होनी चाहिए. हमें सही समय पर काम करना चाहिए ताकि हमारा काम अर्थपूर्ण हो. हमें अपने कार्य बाद के लिए टालने नहीं चाहिए.

    हमारे समय के एक बहुत ही महान गुरु; श्री सत्य साई बाबा कहते हैं कि, “एक पौधे को सांचे में ढाल सकते हैं परन्तु यदि हम   एक पेड़ को बदलने की कोशिश करेंगे तो वह टूट जाएगा.” साधारणतः जब बच्चे युवावस्था में आते हैं तब वह संसार, व्यवसाय, परिवार इत्यादि में फँस जाते हैं. परन्तु जिन बच्चों को अच्छे जीवन-मूल्य दिए गए होते हैं व ईश्वर से प्रेम करना सिखाया होता है वह कुछ समय के लिए उन्मत्त होने के बावजूद अपने मूल पर वापस अवश्य पहुँचते हैं. अतः हमें प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करके उनका धन्यवाद अदा करना चाहिए. बचपन से ही इस प्रकार का स्वभाव विकसित करने वाले बच्चे ज़्यादा संतुलित और शांत होते हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना भली-भाँति कर सकते हैं. वह आर्थिक व आध्यात्मिक रूप से भी अधिक सफल होते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक- अर्चना 

  सूअर के रूप में इन्द्र

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   सभी देवताओं के राजा, इंद्र, एक बार आनंद के उपभोग की इच्छा से पृथ्वी पर आए. इंद्र ने सूअर का रूप धारण किया क्योंकि साधारणतः शारीरिक आनंद की दृष्टि से सूअर का रूप सर्वोत्तम माना जाता है. इंद्र ने अपने लिए एक ख़ूबसूरत सुअरिया देखी और उससे शादी करके कई दर्ज़न शिशु पैदा किए. समय के साथ वह उनसे बेहद सम्बद्ध व अनुरक्त हो गए.

    देवताओं ने इसे एक लघु आमोद यात्रा समझकर इंद्र का स्वर्ग में धीरता से इंतज़ार किया. परन्तु जब इंद्र काफ़ी समय तक नहीं लौटे तब देवतागण धरती पर आए और इंद्र की जीवन-शैली देखी. उन्होंने इंद्र से तर्क-वितर्क करने की कोशिश की ताकि वह सूअर का जीवन छोड़कर स्वर्ग वापस लौट जाएं. परन्तु इंद्र अपने जीवन में इतने अधिक संयुक्त व आसक्त थे कि वह घुरघुराकर वहाँ से चले गए.

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    देवताओं ने तब इंद्र के एक शिशु को मारने का निश्चय किया. उन्हें उम्मीद थी कि इस दुखद घटना से इंद्र को अपने वास्तविक स्वरुप का अहसास होगा और वह वापस लौट जाएँगे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ. हर एक शिशु के मरने पर इंद्र बाकी के शिशुओं को और अधिक कसकर जकड़ लेते थे. आखिरकार देवताओं ने इंद्र के सभी शिशुओं को मार दिया.

   जल्द ही इंद्र और अधिक शिशु पैदा करने में लग गए.  तब देवताओं को लगा कि इंद्र के मोह का वास्तविक कारण उनकी पत्नी है और इस कारण उन्होंने उसे मार दिया. पत्नी की मौत ने इंद्र को अत्यंत व्याकुल कर दिया. इंद्र का यह हाल देखकर उनके अन्य सूअर दोस्तों व रिश्तेदारों ने उन्हें पुनर्विवाह का सुझाव दिया. और सूअर का समस्त कार्यकलाप पुनः शुरू हो गया. 

   इंद्र की हालत देखकर देवतागण उलझन में पड़ गए. तभी बुद्धिमान ऋषि, नारद, वहाँ से गुज़रे और सारी परिस्थिति देखकर बोले, “आपने उनकी पत्नी और बच्चों को क्यों मारा? उनकी आसक्ति उनके शरीर से है. शरीर का विनाश करो.” अतः देवताओं ने सूअर रुपी इंद्र के शरीर को २ हिस्सों में काट दिया. तब इंद्र शरीर से बाहर आकर बोले, “मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?” और फिर इंद्र स्वर्ग वापस लौट गए.

   शरीर से बंधन बहुत गहरा होता है. यही समस्त मोह का मूल कारण है.

    सारांश: 

   यह जानते हुए कि हमारा शरीर अल्पकालिक है, हमें अपने शरीर से लगाव हो जाता है. यह शरीर, जिसकी आवश्यकताओं का हम इतना ध्यान रखते हैं, सिर्फ तब तक महत्वपूर्ण है जब तक कि उसमें श्वास है. एक बार प्राणशक्ति जब हमारा साथ छोड़ देती है, शरीर मुरझाने लगता है. वही शरीर जिसका इतने अच्छे से ध्यान रखा गया था और जिसे रिश्तेदारों व दोस्तों से इतना प्यार मिला था; प्राणशक्ति के बिना यकायक सबके लिए अनावश्यक बन जाता है. 

   जब शरीर में प्राण थे; वह शिव (ईश्वरत्व की उपस्थिति) था परन्तु शरीर से प्राण निकल जाने पर वही शरीर शव (मृत शरीर) बन जाता है. हमें यह सदैव याद रखना चाहिए और शरीर से बहुत ज़्यादा आसक्त नहीं होना चाहिए.

    इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि शरीर को तुच्छ समझकर हम उसका ध्यान न रखें. एक सार्थक जीवन व्यतीत करने के लिए हमें अपने शरीर रुपी ‘वाहन’ की देखभाल अवश्य करनी चाहिए. शरीर को एक माध्यम की तरह प्रयोग करके सत्य को समझना चाहिए मगर उससे अनावश्यक रूप से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए.

हम जितना अधिक मोह में रहते हैं, उतना ही ज़्यादा सम्बद्ध हो जाते हैं और छोड़ने से डरते हैं. इसके परिणामस्वरूप हमें उतना ही अधिक कष्ट होता है. यह ठीक नहीं है. हमें सशक्त मन का विकास करना चाहिए ताकि हम अनुकूल दोस्ती व रिश्ते बरकरार रख सकें. ऐसा करने से हम ज़रुरत से ज़्यादा सम्बद्ध व पराश्रित नहीं होंगे और स्वयं को पीड़ित होने से बचा पाएंगे. यदि हम हर रोज़ एकांत में बैठकर स्वयं पर प्रभु द्वारा दिए गए समस्त अनुग्रहों का ध्यान करके, उनका आभार प्रकट करेंगे तो हम एक सशक्त मन का विकास कर सकते हैं.

    निरंतर अभ्यास से हम अपने मन को सुदृढ़ कर सकते हैं.

     अनुवादक- अर्चना