Archive | July 2019

          ९९ संघ 

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एक राजा था जो अपनी शानदार जीवनचर्या के बावजूद बहुत अप्रसन्न रहता था. एक दिन वह अपने एक नौकर से मिला जो खुश था और काम करते हुए ख़ुशी से गा रहा था. नौकर की खुशहाल प्रवृत्ति ने राजा का ध्यान आकर्षित किया और वह आश्चर्य में पड़ गया, “ऐसा क्यों कि वह, राष्ट्र का सर्वोच्च शासक, अप्रसन्न व उदास था जबकि एक अधीन नौकर इतने आनंद में था?” 

   राजा ने नौकर से पूछा, “तुम इतने खुश क्यों हो?”

   नौकर ने जवाब दिया, “महाराज, मैं मात्र एक नौकर हूँ और मेरे परिवार और मुझे बहुत सारी चीज़ों की ज़रुरत नहीं है- केवल सिर छुपाने के लिए एक छत और पेट भरने के लिए गरम भोजन.”

   नौकर की बात सुनकर राजा ने अपने सबसे अधिक विश्वसनीय सलाहकार की सलाह माँगी. नौकर की कहानी सुनने के बाद सलाहकार बोला, “महाराज, नौकर अभी तक ‘९९ संघ’ में शामिल नहीं हुआ है.”

   “९९ संघ? वह क्या है? ” राजा ने पूछा.

   सलाहकार ने उत्तर दिया, “९९ संघ को सही में जानने के लिए आप एक बटुए में ९९ सिक्के डालकर इस नौकर की दहलीज़ पर छोड़ दीजिये. ”

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    अगले दिन अपने घर के बाहर बटुआ देखकर नौकर ख़ुशी से खूब ज़ोर से चिल्लाया….इतने सारे सोने के सिक्के!! और वह उन्हें गिनने लगा. कई बार गिनने के बाद उसे आखिरकार विश्वास हुआ कि बटुए में केवल ९९ सिक्के ही थे. 99 club3

    वह अचम्भे में पड़ गया, “सोने के उस आखिरी सिक्के का क्या हुआ होगा? यक़ीनन ९९ सिक्के कोई नहीं छोड़ेगा! ”

 

   वह काफ़ी समय तक ढूँढ़ता रहा पर आखिरी सिक्का लापता था. अंततः उसने निश्चय किया कि सोने के उस १००वें सिक्के को हासिल करने के लिए वह पहले से भी अधिक मेहनत करेगा.

   उस दिन के बाद से वह नौकर एक परिवर्तित व्यक्ति था. वह अत्यधिक थका हुआ, चिड़चिड़ा रहता था और उस १००वें  सिक्के को कमाने में मदद न करने के लिए अपने परिवार को दोषी ठहराने लगा. उसने काम करते समय गाना भी बंद कर दिया. 

    नौकर में ऐसा मौलिक परिवर्तन देखकर राजा अचंभित था. 

    सलाहकार बोला, “महाराज, यह नौकर अब आधिकारिक रूप से ‘९९ संघ’ में शामिल हो गया है.” वह बोला, “९९ संघ का नाम उन लोगों को दिया जाता है जिनके पास खुश रहने के लिए पर्याप्त है लेकिन वह कभी संतुष्ट नहीं होते क्योंकि वह सदा उस अतिरिक्त १ की अभिलाषा करते रहते हैं. वह स्वयं से कहते हैं: मुझे बस वह अंतिम वस्तु मिल जाए और फिर मैं जीवनभर खुश रहूँगा. “ 

       सीख:

    जीवन में हम बहुत कम में भी खुश रह सकते हैं परन्तु जैसे ही हमें कुछ और अधिक बड़ा और बेहतर दिया जाता है, हम और अधिक की इच्छा करने लगते हैं. अपनी बढ़ती हुई ज़रूरतों व इच्छाओं की कीमत हम अपनी नींद और ख़ुशी गवांकर चुकाते हैं. सभी की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त साधन हैं पर हमारी लालच के लिए यथेष्ट नहीं है.

    बच्चों को उदाहरणों, कहानियों व खेल के द्वारा इच्छाओं को सीमित रखने की आवश्यकता सिखाई जा सकती है. बच्चों को खुश रखने के लिए उन्हें हर प्रकार के यंत्र व कीमती सामान दिलाकर बिगाड़ने में माता-पिता भी आजकल बराबर के जिम्मेदार हैं. बाहरी दुनिआ भौतिकवाद से भरी हुई है और संचार माध्यम इसे और अधिक प्रोत्साहित करता है. अधिकतर बच्चे अपने दोस्तों से तुलना करते हैं और अपने माता-पिता से लगातार माँग करते रहते हैं और उन वस्तुओं के न मिलने पर गुस्से के आवेश में आ जाते हैं. यदि माता-पिता बच्चों को उनकी वांछित वस्तु दिलवाने में असमर्थ रहते हैं तो कुछ बच्चे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए गलत तरीकों का शिकार हो जाते हैं. इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती है. जितनी अधिक इच्छाएँ तृप्त होती हैं, हम उतना ही अधिक की लालसा करते हैं. समझदारी इसमें है कि निरंतर असंतुष्ट रहने के बजाए हमारे पास उतना ही होना चाहिए जितना सुविधापूर्वक रहने के लिए पर्याप्त है.

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   source: saibalsanskaar.wordpress.com  

अनुवादक-अर्चना  

    

   

    

धनवान व्यक्ति और उसके पुत्र 

                

     एक समय एक अमीर व्यापारी था जिसे केवल धन कमाने व विलासमय जीवन का उपभोग करने में रुचि थी. उसे अपने परिवार और अपनी समस्त सम्पत्ति से बहुत लगाव था. वह अपने कारोबार में इतना तल्लीन था कि उसके पास किसी भी आध्यात्मिक गतिविधियों या प्रार्थनाओं के लिए समय नहीं था. उसका एक परिचित एक दिन उससे मिलने आया और उसने व्यापारी को संकेत दिया कि वह पैसा कमाने में इतना अधिक मगन था कि उसके पास उस ईश्वर को स्मरण करने का समय नहीं था जिसने उसे जीवन में ढेर सारी अच्छी चीज़ें प्रदान कीं थी. मित्र ने व्यापारी को समझाया कि उसे कृतज्ञ रहना चाहिए और कभी-कभी प्रभु का धन्यवाद अवश्य करना चाहिए; तभी वह अपने अंतिम दिनों में ईश्वर का ध्यान कर सकता है.   

 अमीर व्यक्ति ने अपने दोस्त की बात सुनी और भगवान् के साथ चालाकी करने की योजना बनाई. उसने सोचा कि अगर वह अपने बच्चों का नाम भगवान् के नाम पर रखेगा तो अपने जीवन के अंतिम क्षणों में वह उन्हें ही बुलाएगा और यह सबसे पक्का और आसान तरीका था. बचपन में उसने अजमिला की कहानी सुनी थी. अजमिला एक दुष्ट व्यक्ति था पर चूँकि उसने अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ रखा था, अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उसने पुत्र का नाम पुकारा. प्रभु का नाम लेने के कारण यमराज ने उसे क्षमा कर दिया था और उसने वैकुण्ठ सिद्ध कर लिया. व्यापारी ने भी उसी रणनीति को लागू करने का फैसला किया. 

   उसने अपने चार पुत्रों का नाम माधव, गोपाल, नारायण और राम रखा. उसे यकीन था कि अपने अंतिम क्षणों में इन नामों को पुकार कर वह स्वर्ग हासिल कर लेगा. इस प्रकार की योजना बनाकर वह धन व आर्थिक संपत्ति की तलाश में पुनः जुट गया. समय बीतता गया, वह बूढ़ा हो गया और अब वह अपनी मृत्यु शय्या पर था. अपने आखिरी समय का अहसास होने पर उसने अपने पुत्रों को बुलाया.    

  सारा परिवार उसके पास खड़ा हुआ था. उसने सब को देखा और अपने चारों बेटों को वहाँ देखकर चिल्लाया, “तुम सब यहाँ क्या कर रहे हो? कम से कम किसी एक को दुकान पर होना चाहिए था; हमारा व्यापार नष्ट हो जाएगा.” उन अंतिम शब्दों के साथ उसका निधन हो गया. अपने जीवन के अंतकाल में उसने वही स्मरण किया जो वह जीवनभर करता आया था. भगवान् को चकमा देने में उसकी चतुराई काम नहीं आई.

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 अतः अपने जीवन के अंतिम चरण में हम ईश्वर का स्मरण तभी कर सकते हैं जब हम अपनी युवावस्था में प्रभु का ध्यान करते हैं.

    सारांश:

   इस पद्य में शंकर बताते हैं कि जीवन क्षणिक है. मौसम, उतार-चढ़ाव आते जाते रहते हैं पर हम कभी अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं करते. दिन-प्रतिदिन हमारी इच्छाएँ बढ़ती ही जाती हैं. हम ख़ुशी की तलाश बाहर करते हैं जबकि वह ख़ुशी अस्थायी है; हम उसका पीछा करते रहते हैं और भ्रम में पड़ जाते हैं. फिर भी हम बाहरी ख़ुशी का पीछा करना नहीं छोड़ते और अपने भीतर देखना भूल जाते हैं. हम आध्यात्मिकता की तलाश नहीं करते जो हमें परम आनंद की ओर ले जाएगी.  

शंकर हमें आध्यात्मिक खोज की आवश्यकता की नसीहत देते हैं और हमसे उसकी तलाश करने का आग्रह करते हैं जो चिरस्थायी है. इस मार्ग पर अभ्यास अति आवश्यक है. यदि हम बचपन में ईश्वर का ध्यान नहीं कर सकते तो जीवन के अंतिम चरण में प्रभु को याद करने की कामना कैसे कर सकते हैं? जीवन का हर पल बहुमूल्य है और हमें इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए. अपनी अस्थायी इच्छाओं को दूर करने के लिए हमें सभी इन्द्रियों व बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए; इसे चिरस्थायी शांन्ति व सुख की तलाश की ओर निदेशित करना चाहिए.

   source: saibalsanskaar,wordpress.com 

  अनुवादक- अर्चना