Archive | August 2016

शांत व्यक्ति

 

आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : क्षमाशील

कार्ल एक शांत व्यक्ति थे. वह ज़्यादा बात नहीं करते थे और सबका अभिवादन उनसे मजबूती से हाथ मिलाकर उदार मुस्कराहट से करते थे. हमारे इलाके में ५० साल से भी अधिक रहने के बावजूद भी कोई यह दावे से नहीं कह सकता था कि वह कार्ल को अच्छे से जानता है. अपनी सेवा निवृत्ति से पहले वह रोज सुबह बस से अपने कार्य स्थल तक जाते थे. मोहल्ले में अक्सर उन्हें अकेले जाते देख हमें उनकी सलामती की चिंता होती थी. द्वितीय विश्व युद्ध में गोली के घाव से उनकी चाल में हल्का सा लंगड़ापन था. मोहल्ले में आकस्मिक उत्पात, गुण्डागर्दी तथा नशीली दवाइयों की नित्य बढ़ती गतिविधियाँ देखकर हमें कार्ल की और भी अधिक चिंता होती थी.

एक दिन उन्होंने स्थानीय गिरिजाघर में एक विज्ञापन देखा. पादरी के मकान के पीछे वाले बगीचे की देख-रेख हेतु कुछ स्वयंसेवकों की आवश्यकता थी. उन्होंने तुरंत अपना नाम दर्ज कर दिया और पूरी लगन से काम शुरू कर दिया. उनकी उम्र ८७ वर्ष के लगभग थी. अंततः वह घटना हो ही गई जिसका हम सभी को डर था.

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एक दिन जब वह बगीचे में पानी दे रहे थे तब गिरोह के ३ सदस्य उनकी तरफ आये. उन तीनों की कार्ल को डराने की कोशिश को अनदेखा करते हुए, कार्ल ने उनसे पूछा, “क्या तुम पाइप से पानी पीओगे?” तीनों में सबसे लंबे व कठोर व्यक्ति ने चेहरे पर दुष्कर मुस्कान लेकर कहा, “हाँ, ज़रूर!” जैसे ही कार्ल ने उसे पाइप पकड़ाई बाकी के दोनों गुंडों ने कार्ल को गिरफ्त में लिया और निर्दयता से ज़मीन पर गिरा दिया. फिर तीनों ने ज़बरदस्ती कार्ल की घड़ी और बटुआ ले लिया और वहाँ से भाग गए. कार्ल ने खड़े होने का प्रयास किया पर वह काफी बुरी तरह ज़ख़्मी थे. इतने में पादरी भागते हुए उनकी मदद के लिए आया.

यद्यपि पादरी ने अपनी खिड़की से हमला होते हुए देखा था पर वह समय पर मदद के लिए नहीं पहुँच पाए.
“कार्ल, तुम ठीक हो? तुम्हें चोट तो नहीं लगी?”, कार्ल को खड़े होने में सहायता करते हुए पादरी उनसे पूछ रहा था. कार्ल ने केवल गहरी सास भरी और सर हिलाते हुए कहा, “बस कुछ बदमाश बच्चे थे. मुझे उम्मीद है कि एक दिन उन्हें समझ आ जाएगी.”

कार्ल के कपड़े बुरी तरह से भीग जाने के कारण उनके बदन से चिपक गए थे. उन्होंने झुककर पाइप उठाई, पाइप का अगला भाग ठीक किया और वापस पानी देना शुरू हो गए. पादरी काफी हक्के-बक्के व चिंतित थे. उन्होंने कार्ल से पूछा, “कार्ल, तुम क्या कर रहे हो?” कार्ल ने जवाब दिया,”मुझे पौधों को पानी देना है. आजकल काफी गर्मी पड़ रही है.”carl2
कार्ल का व्यवहार देखकर पादरी अचंभित थे. कार्ल का स्वभाव अन्य सभी से बहुत भिन्न था.
कुछ हफ्ते बीत जाने के बाद वो तीनों वापस आए. पहली बार की तरह कार्ल ने उन तीनों की धमकियों का विरोध नहीं किया. कार्ल ने फिर से उन्हें पानी के लिए पूछा. इस बार उन्होंने कार्ल को लूटा नहीं. उन्होंने कार्ल के हाथ से पाइप छीनकर उन्हें सर से पाँव तक ठंडे पानी से भिगो दिया. कार्ल का इस प्रकार अपमान करने के बाद तीनों वहाँ से चले गए. गली से गुज़रते हुए उनके पाँव डगमगा रहे थे और वे अपनी करनी पर ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे. कार्ल उनको केवल देखते रहे. फिर पाइप उठाकर पुनः अपने काम में जुट गए.

गर्मी का मौसम समाप्त होने वाला था और पतझड़ शुरू होने वाली थी. कार्ल कुछ जोताई का काम कर रहे थे जब अचानक उन्हें अपने पीछे किसी के होने का अहसास हुआ. वह लड़खड़ाकर झाड़ियों में गिर गए. जब वह झाड़ियों से उठने का प्रयास कर रहे थे तब उन्होंने उस गिरोह के नेता को उनकी ओर हाथ बढ़ाते हुए देखा. कार्ल ने स्वयं को अपेक्षित हमले के लिए तैयार किया.
“चिंता नहीं करो, बूढ़े! इस बार मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाऊँगा.”

युवक ने कार्ल से विनम्रता से बात की. इस दौरान टैटू व चोट के निशान से भरा हुआ उसका हाथ अभी भी कार्ल की ओर मदद के लिए बढ़ा हुआ था. कार्ल को खड़े होने में मदद करने के बाद, युवक ने अपनी जेब से एक सिलवटदार थैला निकाला और कार्ल को दे दिया.
“यह क्या है?” , कार्ल ने पूछा.
“यह आपका सामान है” , युवक बोला. “मैं आपको आपका सामान लौटाने आया हूँ. बटुए में आपके सारे पैसे बरकरार हैं.”
“मैं समझा नहीं” , कार्ल ने कहा. “तुम अब मेरी मदद क्यों करना चाहते हो?”

युवक ने कहा, “मैंने आपसे कुछ सीखा है.” “मैं उस गिरोह के साथ भागता था और आप जैसे लोगों को कष्ट पहुँचाता था. carl3हमने आपको चुना क्योंकि आप वृद्ध थे और हमें मालूम था कि हम आपको चोट पहुँचा सकते थे. परंतु हमारे ऊपर चिल्लाने या हमारा विरोध करने के बजाय हर बार आपने हमें पानी के लिए पूछा. आपसे नफरत करने पर भी आपने हमसे नफरत नहीं की. हमारी नफरत के बावजूद आप हमारे लिए प्यार दिखाते रहे.”

क्षणभर रूककर वह पुनः बोला, ” आपका सामान चुराने के बाद मैं चैन से सो नहीं पाया इसलिए उसे लौटाने आया हूँ. यह थैली मुझे सही राह दिखाने के लिए मेरी ओर से धन्यवाद का प्रतीक है.” ऐसा कहकर वह वहाँ से चला गया.
कार्ल ने अपने हाथ में थैली को देखा और उसे धीरे से खोला. उन्होंने अपनी घड़ी निकालकर पहनी और फिर अपना बटुआ खोलकर अपनी शादी की तस्वीर ढूँढी. तस्वीर में उनकी युवा वधू अभी भी उनकी ओर मुस्कुराकर देख रही थी.

उसी साल क्रिसमस के दौरान एक दिन कार्ल की मृत्यु हो गई. भीषण सर्दी के बावजूद उनके अंतिम संस्कार के लिए बहुत सारे लोग आए. भीड़ में पादरी का ध्यान एक लंबे युवक पर गया जिसे वह जानते नहीं थे. वह व्यक्ति गिरिजाघर के एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था. पादरी ने एकत्रित लोगों से कहा कि कार्ल का बगीचा जीवन में एक सीख के समान था.carl5

भावुक पादरी ने कहा, “अपना सर्वश्रेष्ठ करो और अपना बगीचा अधिक से अधिक सुन्दर बनाओ. हम कार्ल और उसके बगीचे को कभी भी नहीं भूल पायेंगें.”

अगली बसंत एक और विज्ञापन निकला. उसमें लिखा था, “कार्ल के बगीचे के लिए एक व्यक्ति कि आवश्यकता है.”
बहुत समय तक विज्ञापन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. फिर एक दिन पादरी के दफ्तर के दरवाज़े पर किसी ने दस्तख दी. दरवाज़ा खोलने पर पादरी ने वहाँ एक युवक को खड़ा पाया. युवक के हाथों पर टैटू तथा ज़ख्मों के निशान थे. हाथ में विज्ञापन लेकर युवक ने पादरी से कहा, “अगर आपको मंजूर हो तो मैं यह काम करना चाहूँगा.”

पादरी ने उसे पहचान लिया. यह वही युवक था जिसने कार्ल को उसकी घड़ी और उसका बटुआ वापस लौटाया था. पादरी को मालूम था कि कार्ल की दयालुता ने इस व्यक्ति को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया था. पादरी ने उसे बगीचे की चाभी देते हुए कहा, “हाँ, जाओ और कार्ल के बगीचे की देखभाल करके उसे सम्मानित करो.”

वह युवक काम पर लग गया और अगले कई वर्षों तक उसने फूलों तथा सब्ज़ियों की ठीक कार्ल के समान देखरेख की. इस दौरान वह कॉलेज गया, उसका विवाह हो गया और वह अपने समुदाय का एक प्रतिष्ठित सदस्य बन गया. परंतु यह सब होने के बावजूद उसे कार्ल से अपना वादा नहीं भूला. उसने बगीचे को उतना ही ख़ूबसूरत रखा जितना उसके ख़याल से कार्ल स्वयं रखते.carl6

एक दिन वह नए पादरी के पास गया और उनसे बताया कि अब वह बगीचे की देखरेख नहीं कर पाएगा. उसने लज्जित व खुशी से भरी मुस्कराहट से कहा, “कल रात मेरी पत्नी ने हमारे बेटे को जन्म दिया है और शनिवार को वह उसे घर लेकर आ रही है.”
“ओह, बधाई हो! ” “यह तो बहुत ही खुशी की बात है ! बच्चे का नाम क्या है?”
“कार्ल, ” उसने जवाब में कहा.

सीख:
अँधेरा अँधेरे को दूर नहीं कर सकता; केवल रोशनी कर सकती है. नफरत कभी नफरत को दूर नहीं कर सकती; केवल प्रेम कर सकता है. प्रेम में परिवर्त्तन लाने की शक्ति होती है. प्रेम की शक्ति को कभी कम नहीं समझना चाहिए. एक प्रेममय व शांतिमय संसार के लिए प्रेम ही एकमात्र समाधान है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

नन्हे मेंढकों की कहानी

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आदर्श : आशावाद
उप आदर्श : दृढ़ता

एक बार नन्हे मेंढकों के एक उत्साहशील समूह ने चढ़ाई प्रतियोगिता का आयोजन किया. प्रतियोगिता का लक्ष्य एक बहुत ऊँचें पेड़ के सिरे तक पहुँचने का था. चढ़ाई प्रतियोगिता देखने तथा प्रतियोगियों का प्रोत्साहन बढ़ाने पेड़ के इर्द-गिर्द विशाल भीड़ जमा हुई. अंततः दौड़ शुरू हुई.tf4

प्रतियोगियों को जिस पेड़ पर चढ़ना था वह वाकई में विराट था. इस कारण भीड़ में किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि प्रतियोगियों में से एक भी नन्हा मेंढक वास्तव में पेड़ के सिरे तक चढ़ पाएगा. नन्हे मेंढकों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी और सभी चिल्ला रहे थे,

“ओह! यह तो बहुत ही मुश्किल है!!”
“ये तो कभी भी ऊपर तक नहीं पहुँच पायेंगें.”
“यह वृक्ष बहुत ऊँचा है! इनके सफल होने की कोई उम्मीद नहीं है.”

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एक एक करके कुछ नन्हे मेंढक हिम्मत हारने लगे और पेड़ से गिरने लगे. परंतु कुछ मेंढक अभी भी अटल थे और निरंतर ऊपर की ओर चढ़ते जा रहे थे. भीड़ का चिल्लाना अभी भी जारी था,

“यह बहुत ही कठिन है!! कोई भी ऊपर तक नहीं पहुँच पाएगा.”

धीरे धीरे कई और मेंढक थककर हार मानने लगे. पर इन सबमें एक बहादुर नन्हे मेंढक ने अपनी चढ़ान जारी रखी. वह लगातार दृढ़ मनोबल के साथ ऊपर चढ़ते जा रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह नन्हा मेंढक हार मानने वालों में से नहीं था.

अन्य सभी नन्हे मेंढक विशाल पेड़ की चढ़ाई से हार मान चुके थे सिवाय इस एकमात्र मेंढक के, जो अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अडिग था और निरंतर ऊपर की ओर चढ़ते जा रहा था. अपनी अद्भुत मेहनत के बाद वह अंततः विराट पेड़ के सिरे तक पहुँचने में सफल हो गया.tf2 भीड़ में सभी चकित थे कि जहाँ अन्य सभी मेंढक हार मान चुके थे वहाँ यह नन्हा मेंढक कैसे सफल हो पाया.

एक सह प्रतियोगी ने नन्हे मेंढक से उसके लक्ष्य तक पहुँच पाने तथा सफल होने की शक्ति का कारण पूछा.

और तब मालूम पड़ा कि विजेता बहरा था.

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सीख:

हमें सदा सकारात्मक रहना चाहिए. हमें दूसरों को हमसे हमारे सबसे अधिक ख़ूबसूरत सपने छीनने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. हमें सदा स्वयं में सम्पूर्ण विश्वास रखना चाहिए. उस नन्हे मेंढक के समान हमें दूसरों को अनसुना करके निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए- सफलता हमें अवश्य मिलेगी.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

गाँधीजी की ईमानदारी की कहानी

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: ईमानदारी

मोहन बहुत ही शर्मीला लड़का था. स्कूल में छुट्टी की घंटी बजते ही वह अपनी किताबें इकट्ठी करके जल्दी से घर चला जाता था.gandhi2 बाकी के लड़के स्कूल के बाद गपशप करते थे. कुछ लड़के रास्ते में खेलने के लिए रूक जाते थे तो कुछ खाने-पीने के लिए. पर मोहन हमेशा सीधे घर ही जाता था. उसे डर था कि कहीं उसके सहपाठी उसे रोककर उसका मज़ाक न उड़ाएं.

एक दिन विद्यालयों के निरीक्षक, श्री गिल्स, मोहन के स्कूल आए. उन्होंने कक्षा में अंग्रेजी के पाँच शब्द पढ़े और सभी लड़कों से उन पाँचों शब्दों को लिखने के लिए कहा. मोहन ने चार शब्द सही लिख लिए पर पाँचवा शब्द वह ठीक से नहीं लिख पा रहा था. मोहन की दुविधा देखकर उसके अध्यापक ने निरीक्षक की पीठ के पीछे से उसे इशारा करते हुए कहा कि वह अपने साथ के लड़के की स्लेट से नक़ल कर ले. परंतु मोहन ने अपने अध्यापक के इशारों पर ध्यान नहीं दिया. अन्य सभी लड़कों ने पाँचों शब्द सही लिखे; मोहन ने केवल चार ही लिखे.

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निरीक्षक के जाने के बाद अध्यापक ने मोहन को डाँट लगाई. “मैंने तुमसे कहा था कि साथ वाले लड़के की नक़ल कर लो,” उन्होंने गुस्से से कहा. “तुम ठीक से नक़ल भी नहीं कर सकते? ” सभी लड़के हंस पड़े.

उस शाम जब मोहन घर लौटा तो वह उदास नहीं था. उसे मालूम था कि वह गलत नहीं था. उसे दुःख केवल इस बात का था कि उसके अध्यापक ने उसे नक़ल करने के लिए बढ़ावा दिया था.

    सीख:

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है. धोखेबाज़ी व बेईमानी से हम जीवन में कभी सफल नहीं हो सकते. बचपन से ही बच्चों में सच बोलने की आदत डालनी चाहिए तथा ईमानदार बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. जो निष्कपट होते हैं, वे शांत और खुश रहते हैं.

 

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना