Archive | December 2019

         गुरु- अज्ञानता दूर करने वाले 

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         आदर्श: उचित आचरण 

    उप आदर्श:  सम्मान 

          गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः 

          गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ||

       गुरुर्ब्रह्मा : गुरु ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के समान होता है|

      गुरुर्विष्णु : गुरु विष्णु (संरक्षक) के समान होता है|

       गुरुदेवो  : गुरु महेश्वर (ध्वंसक) के समान होता है|

  गुरुः साक्षात : सच्चे गुरु (वास्तव में) हमारी आँखों के सामने 

       पर ब्रह्म  : सर्वोच्च वास्तविकता 

          तस्मै   : केवल उसी को 

    गुरुवे नमः   : केवल उस सच्चे गुरु को मैं नमन करता हूँ; 

                     “गुरु” –   गु: अंधकार    रु: हटाने वाला 

    एक समय किसी ख़ूबसूरत जंगल में एक आश्रम था. वहाँ महान ऋषि धौम्य अपने शिष्यों के साथ रहते थे. एक दिन उपमन्यु नामक एक हृष्ट-पुष्ट बालक आश्रम आया. वह गन्दा व मैला दिख रहा था. बालक ने महान ऋषि धौम्य को प्रणाम किया और स्वयं को ऋषि का छात्र स्वीकार करने की विनती की.

     प्राचीन समय के गुरुकुल दिनों में गुरु निश्चित करते थे: यदि कोई छात्र जीवन के वास्तविक मूल्यों व सभी में भगवान् को देखने के साथ प्रशिक्षित व शिक्षित होने के लिए गुरुकुल में स्वीकार किये जाने के वास्ते उपयुक्त था या नहीं.

     धौम्य ऋषि ने इस भारी-भरकम बालक को गुरुकुल में स्वीकृत करने का निश्चय किया. यद्यपि उपमन्यु सुस्त व मोटी बुद्धि का था, विद्वान् गुरु ने इस बात का ध्यान रखा कि उसे गुरुकुल के बाकी छात्रों, जो शायद उससे अधिक तीव्रबुद्धि के थे, के साथ शामिल किया जा रहा था. उपमन्यु ने अपनी शिक्षा में अधिक रूचि नहीं दिखाई. वह न तो शास्त्रों को समझ सकता था और न ही उन्हें याद कर सकता था. वह अवज्ञाकारी था और उसमें कई अच्छे गुणों का अभाव था.      

       धौम्य ऋषि, एक प्रबुद्ध आत्मा व दक्ष शिक्षक, उपमन्यु को उसकी कमज़ोरियों के बावजूद प्रेम करते थे. ऋषि उसे अपने अन्य होशियार छात्रों से भी अधिक प्रेम करते थे. जल्द ही उपमन्यु भी अपने गुरु, धौम्य ऋषि, के प्रति अपने प्रेम का प्रतिदान करने लगा. अब वह अपने गुरु के लिए कुछ भी करने को तैयार था. गुरु को अहसास हुआ कि उपमन्यु अपनी लोलुपता के कारण मंदबुद्धि था. 

        अत्याहार या लोलुपता, छात्रों में बुरा स्वास्थ्य और उनींदापन उत्पन्न करता है. ऐसे छात्र न तो सतर्क रहते हैं और न ही स्पष्टता से सोच पाते हैं. वास्तव में इस प्रकार का अतिभोग “बुद्धि की मंदता या तमोगुण” का कारण होता है. एक गुरु के रूप में धौम्य ऋषि चाहते थे कि उनके सभी छात्र अपना शरीर बरकरार रखने के लिए जितना भोजन अनिवार्य था उतना ही खाएं अर्थात जीने के लिए खाएं, खाने के लिए न जीएं और जीभ नामक ४ इंच के निरंकुश शासक को नियंत्रण में रखें.  

    उपमन्यु को सुधारने के उद्देश्य से धौम्य ऋषि ने उसे आश्रम की गायों की देख-भाल करने का काम दिया. उपमन्यु का काम था कि तड़के गायों को चराने लेकर जाना और संध्याकाल उन्हें वापस लेकर आना. ऋषि की पत्नी हर रोज़ उपमन्यु के लिए दोपहर का भोजन बाँधकर देतीं थी. 

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   लेकिन हृष्ट-पुष्ट उपमन्यु की भूख बहुत बलवान थी. दोपहर के भोजन के बाद भी उसे बहुत भूख लगती थी और अपनी भूख शांत करने के लिए वह कुछ गायों का दूध निकालकर पी जाता था. धौम्य ऋषि ने ध्यान दिया कि उपमन्यु और अधिक मोटा हो रहा था. वह चकित थे कि गायों के साथ चारागाह तक चलने व सामान्य भोजन के बावजूद भी उपमन्यु पतला नहीं हो रहा था. इस विषय में उपमन्यु से प्रश्न करने पर उसने सच्चाई से जवाब देते हुए बताया कि वह गाय का दूध पी रहा था. तब धौम्य ऋषि ने उपमन्यु को आदेश दिया कि वह दूध न पीये क्योंकि गायें उसकी नहीं थीं. ऋषि ने उपमन्यु को समझाते हुए कहा कि गुरु की अनुमति के बिना वह दूध नहीं पी सकता था. 

    यद्यपि उपमन्यु अपने गुरु के आदेश का पालन करने के लिए सहज ही सहमत हो गया पर अपनी असंतुष्ट भूख को लेकर अभी भी व्यथित था. उपमन्यु ने देखा कि बछड़ों के अपनी माताओं के स्तन से दूध पीते समय दूध की कुछ बूँदें गिर जातीं थी. उसने अपनी हथेलिओं को प्याले के आकार का बनाकर दूध एकत्रित करना आरम्भ किया और फिर वह इस दूध को पीने लगा.  

    धौम्य ऋषि, जिनकी नज़र लगातार उपमन्यु पर थी, ने पाया कि बालक का वज़न अभी भी कम नहीं हो रहा था. उन्होंने एक बार फिर उपमन्यु से प्रश्न किया और सत्य सामने आया. धौम्य ऋषि ने उसे धीरता से समझाया कि बछड़ों के मुँह से गिरने वाला दूध अशुद्ध होता है अतः ऐसे दूध को पीना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता था. उपमन्यु ने वचन दिया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा. 

    इन सभी घटनाओं के बावजूद उपमन्यु अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था. एक दोपहर गायों को चराते हुए उसने एक पेड़ पर कुछ फल देखे और उसने वह फल खा लिए. अफ़सोस! वह फल जहरीले थे और उनका सेवन करने से वह अंधा हो गया. आश्रम लौटने का रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश करते हुए, भयभीत व अंधा उपमन्यु, ठोकर खाकर एक गहरे कुँए में गिर गया. 

    संध्याकाल जब गायें उपमन्यु के बिना घर लौटीं तो धौम्य ऋषि को अहसास हुआ कि कुछ गलत था और वह उपमन्यु की खोज में निकल पड़े. उन्हें उपमन्यु एक कुँए में गिरा दिखा और उन्होंने सावधानी व अत्यंत परिश्रम से उसे बाहर निकाला. इस भीषण अवस्था में उपमन्यु के प्रति करुणा से परिपूर्ण ऋषि ने उसे जुड़वां बच्चों, अश्विनी कुमारों, का आह्वान करने का मन्त्र सिखाया. अश्विनी कुमार स्वर्गिक चिकित्सक थे और मन्त्रों की जाप से वह दोनों प्रकट हुए और उन्होंने उपमन्यु की दृष्टि पुनः स्थापित कर दी.  

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  अत्यंत धीरता से धौम्य ऋषि ने उपमन्यु को विशिष्ट रूप से समझाया कि किस प्रकार भोजन की इच्छा ने उसे वह फल खाने पर बाध्य किया था जो जहरीले थे और उसके अंधेपन का कारण थे. ऋषि ने उसे यह भी समझाया कि यदि समय पर उसका बचाव नहीं होता तो कुँए में उसकी मृत्यु भी हो सकती थी. आखिरकार उपमन्यु को अपनी गलती की गंभीरता स्पष्ट हुई और उसने अत्याहार का त्याग कर दिया. फिर वह जल्द ही तंदुरुस्त व स्वस्थ बनने के साथ-साथ बुद्धिमान व चतुर भी हो गया. 

    धौम्य ऋषि ने उपमन्यु के हृदय में गुरु के प्रति प्रेम उत्पन्न किया अतः गुरु ने ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता, का कार्य किया.

    ऋषि ने अपनी प्रेमपूर्ण सलाह से उपमन्यु की रक्षा की और उसे कुँए में मरने से बचाया, इस लिए गुरु ने विष्णु, रक्षक, का किरदार निभाया.

    अंत में गुरु ने उपमन्यु की लालच नष्ट करके महेश्वर का काम किया, जो बुरे गुणों के नाशक हैं.

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     सीख: 

     गुरु/ शिक्षक वह होता है जो हमें सही आदर्श सिखाता है और सही मार्ग की ओर पथप्रदर्शन करता है. अपने शिक्षक के प्रति सदैव सम्मान व कृतज्ञता प्रदर्शित करनी चाहिए. 

    विधिशास्त्र व पवित्र ग्रंथों की सही समझ आवश्यक है. छात्रों को आदर्श, संस्कृति व विधिशास्त्र सिखाते समय, गुरु व शिक्षक को उदाहरण के माध्यम से निर्देशन करना चाहिए. ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए न कि केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए. एकाग्रता व मन की स्थिरता का विकास करने के लिए मौन बैठना आवश्यक है.  शिक्षक को दीपक जलाने जैसे अनुष्ठानों के महत्व को प्रकाश द्वारा अन्धकार को दूर करना और नकारात्मकता का सकरात्मक विचारों द्वारा दूर करने के उदाहरण से समझना चाहिए. ईश्वर से प्रेम करना न कि डरना सिखाना चाहिए. इस प्रकार गुरु छात्रों में अच्छे संस्कारों के बीज बोते हैं जो बाद में सही समय आने पर आध्यात्मिक मार्ग में मदद करते हैं. अतः एक सही शिक्षक या गुरु छात्रों का सही पथ पर मार्गप्रदर्शन करने में बहुत अधिक सहायक सिद्ध होते हैं.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना   

         विट्ठोबा और नामदेव 

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   विट्ठोबा ने पाया कि नामदेव को अभी तक सर्वोच्च सत्य का अहसास नहीं हुआ था और वह नामदेव को सिखलाना चाहते थे. जब ज्ञानेश्वर और नामदेव तीर्थयात्रा से वापस लौटे तो गोरा कुंभार ने सभी संतों को अपने घर एक भोज पर आमंत्रित किया. अतिथियों में ज्ञानेश्वर और नामदेव भी थे. गोरा के साथ योजना बनाकर प्रीतिभोज में ज्ञानेश्वर गोरा से खुलेआम बोले, “तुम एक कुम्हार हो, रोज़ाना मटके बनाने में व्यस्त रहते हो और फिर उनकी जाँच करते हो कि वह सही प्रकार से सूखकर तैयार हुए हैं या नहीं.

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  तुम्हारे सामने यह मटके (अर्थात संत) ब्रह्मा के मटके हैं. देखो इनमें से कौन से मजबूत व ठोस हैं और कौन से नहीं.”

  इस पर गोरा बोला, ” जी स्वामी, मैं अभी जाँच करता हूँ. ऐसा कहकर गोरा ने वह छड़ी उठाई जिसे वह अपने मटकों की मजबूती जांचने हेतु उनको थपथपाने के लिए प्रयोग करता था. छड़ी हाथ में लेकर वह प्रत्येक मेहमान के पास गया और हर एक के सिर पर थपथपाने लगा जैसा कि वह आमतौर पर अपने मटकों पर करता था. प्रत्येक मेहमान से इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया. परन्तु गोरा जब नामदेव के पास गया तो नामदेव क्रोध से चिल्लाया, “अरे कुम्हार, मुझे उसे छड़ी से थपथपाने से क्या मतलब है तुम्हारा?”

इस पर गोरा ज्ञानेश्वर से बोला, “स्वामी, अन्य सभी मटके ठीक से सूखकर ठोस बन चुके हैं. सिर्फ यह (यानि नामदेव) अभी तक ठीक से तैयार नहीं है.”

  सभी एकत्रित मेहमान हँसी से फूट पड़े.    

नामदेव ने बहुत ही अपमानित महसूस किया और भागकर विट्ठल (जिस देवता की वह पूजा करता था) के पास गया. विट्ठल से namdev1नामदेव की घनिष्ट मित्रता थी और वह उनके साथ खेलता था, खाना खाता था और सोता था. नामदेव ने विट्ठल से अपने अपमान की शिकायत की जो विट्ठल के सबसे करीबी दोस्त व साथी के साथ हुआ था. यद्यपि विट्ठल को सब कुछ पता था पर फिर भी उन्होंने नामदेव के साथ सहानुभूति रखने का ढोंग किया और गोरा के घर हुई सभी घटनाओं का विवरण पूछा. सब सुनने के बाद विट्ठल बोले, “अन्य सभी मेहमानों की तरह चुप रहकर तुमने भी क्यों नहीं थपथपाहट स्वीकार कर ली? यह सारी मुसीबत इसी कारण आई है.” 

 नामदेव और अधिक ज़ोर से रोते हुए बोले, “दूसरों की तरह आप भी मुझे अपमानित करना चाहते हैं. औरों की तरह मुझे भी क्यों झुकना चाहिए था? क्या मैं आपका निकटतम मित्र, आपका बच्चा नहीं हूँ?”

 विट्ठल बोले, “तुमने अभी तक सत्य को ठीक से समझा नहीं है और यदि मैं बताऊँगा तो तुम समझोगे नहीं. लेकिन अमुक जंगल में एक संत के पास जाओ जो एक जर्जर मंदिर में रहता है. वह तुमको आत्म ज्ञान दे पाएगा.”   

   विट्ठल के कहेनुसार नामदेव उस मंदिर में गया और एक वृद्ध व सहज व्यक्ति को एक कोने में शिवलिंग पर पैर रखकर सोते हुए पाया. नामदेव को विश्वास नहीं हुआ कि यही वह व्यक्ति था जो उसे- विट्ठल के साथी- आत्मज्ञान देने वाला था. चूँकि वहाँ और कोई नहीं था, नामदेव उस व्यक्ति के पास गया और ताली बजाई. वृद्ध व्यक्ति झटके से उठा और नामदेव को देखकर बोला, “ओह- तुम नामदेव हो न जिसे विट्ठल ने भेजा है. आओ.”

   नामदेव हक्का-बक्का रह गया और सोचने लगा, “यह अवश्य ही महान व्यक्ति होगा.” 

   फिर भी उसे लगा कि कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, एक शिवलिंग पर पैर रखना द्रोही होने के बराबर है. उसने बूढ़े व्यक्ति से पूछा, “तुम एक श्रेष्ठ पुरुष लगते हो. लेकिन एक शिवलिंग पर पैर रखना क्या तुम्हारे लिए उचित है?”

    वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया, “ओह! क्या मेरे पैर शिवलिंग पैर हैं? कहाँ हैं? कृपया मेरे पैरों को कहीं और हटा दो.”

   नामदेव ने वृद्ध व्यक्ति के पैर शिवलिंग से हटाकर विभिन्न स्थानों पर रखने की चेष्टा की. परन्तु जहाँ भी पैरों को रखा, शिवलिंग वहीँ था. अंततः उसने पैरों को अपनी गोद में रखा और वह स्वयं ही शिवलिंग बन गया. तब उसे सच्चाई का अहसास हुआ और वृद्ध सज्जन बोले, “अब तुम वापस जा सकते हो.”

    सारांश:

   इस कहानी में ध्यान देने वाली बात यह है कि नामदेव का ज्ञानोदय केवल तभी हुआ जब उसने आत्मसमर्पण किया और अपने गुरु के चरण स्पर्श किए. नामदेव की ऐसी आदत थी कि वह प्रतिदिन न केवल विट्ठल से मिलने जाते था बल्कि अपना अधिकतम समय विट्ठल के साथ मंदिर में व्यतीत करता था. लेकिन इस अंतिम प्रबोधन के बाद नामदेव घर लौटा और कुछ दिनों तक विट्ठल के पास मंदिर नहीं गया.  इस कारण विट्ठल नामदेव के घर गए और बहुत भोलेपन से पूछा कि यह कैसे संभव था कि वह विट्ठल को भूल गया था और उनसे मिलने नहीं जा रहा था. नामदेव ने उत्तर दिया, “अब मुझे और बुद्धू नहीं बनाओ. अब मैं जान गया हूँ. ऐसी कौन सी जगह है जहाँ आप नहीं हो! आपके साथ रहने के लिए, क्या मुझे मंदिर जाने की ज़रुरत है? मेरा अस्तित्व क्या आपसे अलग है?”   

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 तब विट्ठल बोले, “तो अब तुम सत्य को समझते हो. इसीलिए मुझे तुम्हें इस अंतिम सीख के लिए भेजना पड़ा था.”

  तीर्थयात्रा, धर्मदान, शास्त्रों का अध्ययन जैसे बाहरी अनुष्ठान मनुष्य को अनुशासन, विश्वास व धैर्य से सन्नद्ध करते हैं जो चित्त की शुद्धि के लिए आवश्यक हैं लेकिन वास्तविक अनिवार्य अभ्यास सच्चा ज्ञान है जिसके लिए मनुष्य को स्वयं को जानने की आवश्यकता है. जो स्वयं को जानता है वह मिथ्या भ्रम से बंधता नहीं है. अज्ञानी व्यक्ति अहंकार से घिरे रहते हैं. अहंकार एक आत्म विकल्प है न कि वास्तविक आत्म. अहंकार ईश्वर को हमसे दूर रखता है. चूँकि हम अपनी वास्तविक अवस्था से परिचित नहीं हैं, इसलिए हममें अहंकार उपस्थित है. सच्चे स्व की अनुपस्थिति बनावटी स्वयं की रचना करता है. 

   हम बाहर से कितने भी अच्छे क्यों न हों; यदि हम अभी भी भीतर से अहंकार से घिरे हैं तो हमारे अंदर इच्छाएँ उत्पन्न होती रहेंगी. गुरु कहते हैं; हमें इस पर अवश्य कार्य करना चाहिए और अपने बनावटी स्वयं से बाहर आकर अपने स्वाभाविक स्व का विकास करना चाहिए.  अरे मूर्ख मन; गोविन्द की तलाश करो!

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http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना