Archive | April 2018

  मंत्री और कुत्ते 

      

       आदर्श: उचित आचरण, प्रेम

   उप आदर्श: कृतज्ञता, अनुकम्पा 

     एक निष्ठुर व सनकी राजा की कैद में १० जंगली कुत्ते थे. यह कुत्ते इतने ताकतवर थे कि एक इंसान को भी चीरकर फाड़ सकते थे. राजा का आदेश था कि किसी व्यक्ति द्वारा अपराध या अक्षम्य ग़लती होने पर उस व्यक्ति को सज़ा के रूप में जंगली कुत्तों के क़ैदख़ाने में फेंक दिया जाए. क़ैद में रखे कुत्तों को भूखा रखकर व कष्ट पहुँचाकर, राजा उन्हें खूँखार व उत्तेजित रखता था.  

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      एक बार ऐसा हुआ कि किसी विषय पर एक मंत्री द्वारा दी गई राय राजा को बिलकुल पसंद नहीं आई. निष्ठुर व अभिमानी होने के कारण राजा ने उस मंत्री को जंगली कुत्तों के बीच फेंकने का आदेश दिया. 

    मंत्री ने हाथ जोड़कर राजा से प्रार्थना की, “मैंने १० साल आपकी सेवा की है और आप मुझसे इस प्रकार का बर्ताव कर रहें हैं? ”

    मंत्री ने राजा से आग्रह किया कि कुत्तों के बीच फेंकने से पहले उसे १० दिनों का समय दिया जाए. सभी आश्चर्यचकित थे पर  राजा मंत्री की बात से सहमत हो गया. 

   मंत्री ने सबसे पहले उस संतरी से मित्रता की जो कुत्तों का उत्तरदायी था और उससे कहा कि अगले १० दिनों तक वह कुत्तों की देखभाल करना चाहता है. 

  संतरी चकित था पर सहमत हो गया. 

    होशियार मंत्री ने भयानक कुत्तों को खाना खिलाना, नहलाना, उनके साथ खेलना और टहलना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे प्रेमपूर्वक उन्हें प्रशिक्षित किया.

     जल्द ही १० दिन बीत गए…..

      राजा अपने आदेश का पालन करवाने के लिए तत्पर था और मंत्री को उसकी सज़ा के अनुरूप कुत्तों के क़ैदख़ाने में फेंकवाना चाहता था.

    राजा की आज्ञानुसार मंत्री को जंगली कुत्तों के बंदीगृह में झोंक दिया गया.

     इसके बाद का दृश्य देखकर सभी भौंचक्के थे…..

     सभी ने देखा कि कुत्ते मंत्री के पाँव चाट रहे थे!

     अचंभित राजा ज़ोर से चिल्लाकर बोला, “ये कुत्तों को क्या हो गया है? ”

     इस पर मंत्री बोला, “मैंने इन कुत्तों की १० दिन देखभाल की और यह मेरी सेवा नहीं भूले….यद्यपि मैंने निस्स्वार्थ भाव व निष्ठा से आपकी १० वर्ष सेवा की परन्तु मेरी पहली ग़लती पर आप सब भूल गए! ”

     राजा को अपनी ग़लती का अहसास हो गया और उसने मंत्री को मुक्त करने का आदेश दिया. 

   सीख:

    यह कहानी उन सभी के लिए सबक है जो समस्या आने पर दूसरों की अच्छाई भूल जाते हैं. अपनी पसंद के प्रतिकूल हुई एक छोटी सी घटना के कारण अच्छाई से भरा इतिहास नष्ट नहीं करना चाहिए. हमें अपने ऊपर हुआ उपकार सदैव याद रखना चाहिए. 

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com 

अनुवादक- अर्चना 

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        आलोचना के प्रति सही मनोभाव 

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      आदर्श: उचित आचरण 

  उप आदर्श: सही नज़रिया

  हज़रत मुहम्मद का अली नामक एक शिष्य था. हज़रत मुहम्मद के अन्य शिष्य अक्सर अली की आलोचना करते थे पर अली धीरता ali3से बर्दाश्त करता था. एक दिन अपने मालिक की उपस्थिति में दूसरों ने अली की निंदा की; काफी समय तक धैर्ययुक्त व सहनशील रहने के बाद आख़िरकार अली अपने प्रतिरक्षा के लिए खड़ा हुआ. अली के ऐसा करते ही, हज़रत मुहम्मद तुरंत वहाँ से चले गए. अली ने मालिक का अनुगमन किया और उनसे पूछा, “मालिक, जब दूसरों ने मेरी आलोचना करनी आरम्भ की तब आप वहाँ से चले क्यों आए? आपने ने मेरा समर्थन क्यों नहीं किया?”

  हज़रत बोले, “मैंने देखा कि जब तक तुम मौन थे तब तक तुम्हारे पीछे १० फरिश्ते खड़े थे और तुम्हारी रक्षा कर रहे थे; लेकिन जैसे ही तुमने अपनी वक़ालत करनी शुरू की, उसी क्षण फरिश्ते लुप्त हो गए और मैं भी वहाँ से चला आया.” 

  सीख:

    यह ज़रूरी नहीं है कि फरिश्ते मानव शरीर में हों. फरिश्ते आनंद, धैर्य, सहनशीलता तथा क्षमा के रूप में भी विद्यमान हो सकते हैं. जब हम पलट कर हमला करते हैं तब हम प्रतिशोध व द्वेष जैसे नकारात्मक स्वभाव का प्रदर्शन करते हैं. ऐसा विचार सही नहीं है कि जो अपनी प्रतिरक्षा करते हैं वह ही सशक्त होते हैं. यदि हमारा लक्ष्य शांत जीवन व्यतीत करना या भगवान् की खोज करना है तो दूसरों द्वारा निंदा किए जाने पर हमें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए. हमें दूसरों की त्रुटियों में संलग्न नहीं होना चाहिए. हम स्वयं में परिवर्तन लाकर अपने उदाहरण से दूसरों में बदलाव ला सकते हैं. हमें हिदायत तभी देनी चाहिए जब हमसे सलाह माँगी जाए. और वह उपदेश दूसरों के प्रति प्रेम से आना चाहिए… वरना हमें दूसरों की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना   

मछुआरा जिसने धर्मात्मा होने का ढोंग किया

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बदलाव

एक अँधेरी रात एक मछुआरा किसी के निजी बगीचे में चुपके से घुस गया. बगीचे में एक तालाब था जो मछलियों से भरा हुआ था. घर में अँधेरा देखकर मछुआरा बहुत खुश हुआ और सभी को सोता हुआ सोचकर उसने तालाब से कुछ मछलियॉँ पकड़ने का निश्चय किया.

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परन्तु जाल के पानी में गिरने की आवाज़ से घर के मालिक की नींद टूट गई. मालिक बोला, “तुमने सुना? शायद कोई हमारी मछली चुरा रहा है.”fish3

मालिक ने अपने नौकरों को जाँच कर पता लगाने का आदेश दिया. मछुआरा असमंजस में था. घबड़ाहट में स्वयं से बोला, “यह तो इसी तरफ आ रहे हैं? जल्द ही यहाँ आकर मुझे मारेंगे. मैं क्या करूँ?”

अपने जाल को झाड़ियों के नीचे छिपाकर वह भागने लगा. पर वहाँ से बचने का कोई रास्ता नहीं था. हताश होकर छिपने की जगह ढूँढ़ते हुए, उसे अचानक सुलगती हुआ आग दिखी जो शायद किसी धर्मात्मा ने वहाँ छोड़ी थी.

आग को देखकर मछुआरे के मन में तुरंत एक विचार आया और उसने सोचा, “मेरी तक़दीर मुझपर इससे अधिक मेहरबान नहीं हो सकती थी.” उसने फटाफट अपनी पगड़ी उतारी और अपनी बाँहों व माथे पर राख लगा ली. फिर आग के समक्ष बैठकर वह समाधि में मग्न किसी धर्मात्मा का ढोंग करने लगा.

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नौकर अचानक उस स्थान पर पहुँचे पर उसे कोई धर्मात्मा समझकर बिना कुछ कहे ही वहाँ से चले गए.
घर के मालिक ने नौकरों से पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें चोर मिला?”

नौकरों ने उत्तर दिया, “नहीं सरकार! वह भाग गया. लेकिन बगीचे में हमें एक धर्मात्मा ध्यानस्थ मिले.”

मेरे बगीचे में धर्मात्मा! “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. मुझे अभी उनके पास ले चलो” , मालिक बोला.

नौकर अपने मालिक को उस स्थान पर ले गए जहाँ मछुआरा तपस्या करने का ढोंग कर रहा था. उसके नज़दीक पहुँचने पर मालिक ने सबसे शांत रहने को कहा ताकि उस महान साधु की तपस्या में विघ्न न पड़े.
तपस्या करने का ढोंग कर रहे मछुआरे ने सोचा, “मैंने इन सबको मूर्ख बना दिया… यहाँ तक कि घर के मालिक को भी.”

अंततः मालिक और उसके नौकर वहाँ से चले गए. मछुआरे ने रात भर वहीं चुपचाप बैठकर सवेरे वहाँ से बचकर निकलने का निश्चय किया.
सवेरे जैसे ही वह जाने के लिए उठा तभी उसे एक युवा दम्पति अपने नवजात शिशु के साथ उस तरफ आते दिखे.fish7

मछुआरे को देखकर वह बोले, “हे महात्मा! आपके बारे में सुनकर हम आपका आशीर्वाद लेने आए हैं. कृपया हमारे बच्चे को आशीर्वाद दीजिए.”
नकली धर्मात्मा बोला, “भगवान् तुम्हारा भला करें.”

उस दम्पति के जाते ही मछुआरे ने लोगों का एक बड़ा झुंड अपनी ओर आते देखा. लोग उसका आशीर्वाद लेने आ रहे थे ओर उनके हाथ में नाना प्रकार का चढ़ावा था- जैसे कि फूल, मिठाई ओर चांदी की थाली भी.

लोगों का सम्मान व श्रद्धा देखकर मछुआरा द्रवित हो गया तथा उसने और ढोंग न करने का निश्चय किया. उस क्षण से वह वास्तव में भगवान् का भक्त बन गया. उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और अपना शेष जीवन पूजा व ध्यान में व्यतीत किया.

सीख:
इस कहानी के चोर के समान अक्सर परिस्तिथियाँ हमें स्वयं में बदलाव लाने के लिए विवश करती हैं. प्रारम्भ में हम ढोंग करते हैं और कुछ समय तक मिथ्या जीवन जीने पर हम शीघ्र ही उस साँचे में स्वयं को ढाल लेते हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना