Archive | March 2018

श्री आदि शंकर के तीन अपराध

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: शाश्वत सत्य; मनसा, वाचा और कर्मणा में सामंजस्य

श्री श्री शंकर एक बार अपने शिष्यों के साथ काशी के श्री विश्वनाथ मंदिर पहुँचे. गंगा में स्नान करने के बाद वह सीधे मंदिर गए और भगवान् विश्वनाथ के समक्ष अपने तीन अपराधों के लिए क्षमादान की प्रार्थना करने लगे. उनके शिष्य चकित थे और अचरज में थे कि उनके आचार्य अपने किन अपराधों के लिए प्रायश्चित कर रहे होंगे.

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अपने आचार्य के तीन अपराधों को जानने की अभिलाषा से एक शिष्य ने श्री श्री शंकर से उन अपराधों के बारे में पूछा. श्री श्री शंकर ने उसे सविस्तार समझाया, “यद्यपि मेरा मानना है कि परम तत्व सर्वव्याप्त हैं और मैंने अपनी कई रचनाओं में ऐसा अभिव्यक्त भी किया है, पर फिर भी उनके दर्शन करने के लिए मैं काशी नगर आया हूँ मानो वह केवल काशी नगर में ही विद्यमान हैं. मैंने अपने कथन से भिन्न आचरण करने का अपराध किया है. यह मेरा पहला अपराध है.”

“तैत्तिरिय उपनिषद् में कहा गया है ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह:’ अर्थात जहाँ से वाणी लौट आती है और जिसे समझने में मन असमर्थ है. यद्यपि मैं जानता था कि परम तत्व विवेचन व शब्दों से परे हैं पर फिर भी ‘श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम’ में मैंने adi4शब्दों द्वारा उनकी व्याख्या करने की चेष्टा की है. एक बार पुनः मैंने अपने उपदेश पर अमल न करने का अपराध किया है. यह मेरा दूसरा अपराध है.”

“अब तीसरा अपराध- अपने ‘निर्वाण षट्कम’ में मैंने स्पष्ट लिखा है; न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम न मंत्रो न तीर्थं न वेदाः न यज्ञा:, अहं भोजनं नैव भौज्यं न भोक्ता चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम : मैं पुण्य, पाप, सुख व दुःख से विलग हूँ. मुझे न तो पवित्र मन्त्रों की आवश्यकता है, न ही तीर्थयात्रा की. मुझे उपनिषदों, संस्कारों या यज्ञ की भी आवश्यकता नहीं है. न मैं भोजन हूँ, न ही भोग का अनुभव और न ही भोक्ता हूँ. मैं शुद्ध चेतना हूँ, अनादि शिव हूँ. पर इन सब के बावजूद मैं यहाँ प्रभु के सामने खड़ा होकर अपने अपराधों के प्रायश्चित की प्रार्थना कर रहा हूँ. यह मेरा तीसरा अपराध है.”

 

सीख:

श्री श्री शंकर के जीवन की यह उपकथा हमारे विचारों, शब्दों व कार्यों में सामंजस्य की महत्ता प्रकाशित करती है. यदि हममें परम तत्व को हासिल करने की उत्सुकता है तो हमें मनसा, वाचा और कर्मणा में तालमेल लाना ही होगा. हमारे विचार कितने भी नेक क्यों न हों परन्तु संसार हमारे प्रदर्शन को महत्त्व देता है. लेकिन हमारा प्रदर्शन कितना भी अच्छा क्यों न हो, परम तत्व हमारे विचारों को महत्त्व देते हैं. कहा जाता है, मनस एकम, वाचस एकम, कर्मण एकम महात्मनं, मनस अन्यथा, वाचस अन्यथा, कर्मण अन्यथा दुरात्मनं. हमें अपने जीवन में मनसा वाचा कर्मणा के सम्पूर्ण तालमेल का निरंतर अभ्यास करना चाहिए.

 

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

 

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विश्वास की सीमा

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     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, भरोसा

वह विमान में एक लम्बी उड़ान पर था. यात्रा के दौरान, आने वाली परेशानियों की पहली चेतावनी तब मिली जब विमान में संकेत प्रकाशित हुआ: “कृपया अपनी कुर्सी की पेटी बाँध लें.”

फिर कुछ समय के बाद एक स्थिर आवाज़ बोली, “मौसम खराब होने के कारण हम कुछ समय के लिए पेय पदार्थ देने की सेवा बंद कर रहे हैं. कृपया सुनिश्चित कर लें कि आपकी कुर्सी की पेटी बँधी हुई है.”

जैसे उसने विमान में अपने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाई, उसे अहसास हुआ कि अधिकतर यात्री चिंतित व भयभीत थे. तभी उद्घोषक की आवाज़ आई, “हमें खेद है कि इस समय हम भोजन की सेवा भी स्थगित कर रहे हैं. मौसम काफ़ी खराब है.”

और फिर अपेक्षित तूफ़ान उमड़ पड़ा. विमान के इंजन की आवाज़ के बादजूद बिजली की डरावनी कड़कड़ाहट सुनाई दे रही थी. बिजली चमकने से अंधकारमय आसमान प्रकाशित हो रहा था और पलक झपकते ही ऐसा प्रतीत होने लगा मानो विमान और उसके यात्रियों का अंत निकट था. एक क्षण प्रचंड हवा का प्रवाह विमान को ऊपर उठाता था और दूसरे ही क्षण इस प्रकार गिराता था मानो विमान ध्वस्त होने वाला हो.

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उस व्यक्ति ने स्वीकार किया कि अपने सहयात्रियों की तरह वह भी भयभीत व परेशान था. उसने कहा, “जब मैंने अपने आसपास देखा तो पाया कि लगभग सभी यात्री घबराए और डरे हुए थे. कुछ अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रहे थे.

भविष्य निर्जन व निराशाजनक प्रतीत हो रहा था और कई यात्री अचम्भे व संदेह में थे यदि वह तूफ़ान का प्रकोप झेल पायेंगें.

तभी अचानक मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी जो तूफ़ान से ज़रा भी प्रभावित नहीं थी. उसने बहुत सहजता से अपने पैर कुर्सी पर रखे हुए थे और एक किताब पढ़ रही थी.

उसके छोटे से संसार में सब कुछ शांत व स्थिर था. कभी वह अपनी आँखें बंद कर लेती थी तो कभी पुनः किताब पढ़ने लगती थी; फिर कभी अपने पैर नीचे कर के सीधे कर लेती थी, पर चिंता या भय का कहीं नामोनिशान नहीं था. जब विमान प्रचंड तूफ़ान के कारण बुरी तरह डाँवाडोल हो रहा था, भयानक उग्रता से अचानक ऊपर उठने या नीचे गिरने के कारण इधर-उधर झटके खा रहा था; जब प्रायः सभी यात्री बुरी तरह डरे हुए थे, वह अनोखा बच्चा पूरी तरह से भयरहित व शांतचित था.

उस व्यक्ति को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. अंततः जब विमान अपने गंतव्य स्थान पर उतरा और सभी यात्री झटपट विमान से उतरने में लगे हुए थे, वह उस बच्चे, जिसे वह अचंभित होकर देख रहा था, से बात करने के लिए रूक गया.

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बातों-बातों में उसने भयानक तूफ़ान और विमान के अनियंत्रित ‘उतार-चढ़ाव’ के बारे में बात करते हुए उससे पूछा कि वह भयभीत क्यों नहीं थी? उस मासूम बच्चे ने उत्तर दिया,
“महाशय, इस विमान के चालक मेरे पिता हैं और वह मुझे घर ले जा रहे हैं.”

सीख:
जब हमें स्वयं पर पूरा भरोसा होता है और हमारा आत्मविश्वास अटल होता है, तब हम हर कार्य शांत रहकर सफलतापूर्वक करते हैं. विश्वास और निष्ठा सदा सफल होते हैं. कहानी में बच्ची सम्पूर्ण रूप से आश्वस्त थी कि उसके पिता उसे सुरक्षित रूप से घर पहुँचाएँगे. ठीक इसी प्रकार हमारे मालिक, प्रभु भी हमसे बेहद प्रेम करते हैं. यदि हमें अपने प्रभु में विश्वास व निष्ठा है तो हममें आत्मविश्वास विकसित होता है जो हमें सांसारिक यात्रा में सफल बनाता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक-अर्चना

 

केवल समय ही प्रेम की कदर करेगा

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आदर्श: प्रेम

कई वर्ष पूर्व सभी भावनाएँ व जज़्बाद छुट्टी मनाने एक तटीय टापू पर एकत्रित हुए. सभी आनंदमय समय व्यतीत कर रहे थे. एक दिन अचानक आने वाले तूफ़ान की घोषणा हुई. मौसम विभाग से घोषणा सुनकर सभी जल्द से जल्द टापू से निकलने की चेष्टा करने लगे.

हर तरफ यथेष्ट तहलका मच गया और सभी टापू से बाहर निकलने के लिए अपनी नौकाओं की ओर भागने लगे; सारे कोलाहल के बावजूद विचित्र बात यह थी कि केवल प्रेम को कोई जल्दी नहीं थी. बहुत सारा अधूरा काम शेष बचा हुआ था. सारा काम समाप्त होने पर जब प्रेम के जाने का समय हुआ तब उसे अहसास हुआ कि उसके लिए कोई भी नाव नहीं बची थी. फिर भी आश्वासन रखकर उसने अपने चारों ओर देखा.

तभी सफलता अपनी उत्कृष्ट नाव में वहाँ से गुज़री. प्रेम ने उससे निवेदन किया, “कृपया मुझे अपनी नाव में ले लो.” परन्तु सफलता बोली, “मेरी नाव सोने और अन्य बेशकीमती जवाहरतों से भरी हुई है, तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है.”

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फिर अभिमान अपनी ख़ूबसूरत नाव में आया. प्रेम ने उससे पूछा, “अभिमान, क्या तुम मुझे अपनी नाव में लोगे? कृपया मेरी मदद करो.” अभिमान बोला, “नहीं, तुम्हारे पैर मैले हैं और मैं अपनी नाव गन्दी नहीं करना चाहता.”

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कुछ समय बाद शोक वहाँ से गुज़रा. प्रेम ने उसे भी मदद के लिए पुकारा पर शोक ने जवाब दिया, “मैं बहुत उदास हूँ. मैं एकांत में रहना चाहता हूँ.”

शोक की नाव वहाँ से गुजरने के जल्द बाद ख़ुशी वहाँ से गुज़री. प्रेम ने उसे भी मदद के लिए पूछा पर ख़ुशी अपने आप में इतनी प्रसन्न थी कि उसे किसी और की परवाह ही नहीं थी.

तभी अचानक कहीं से किसी ने आवाज़ दी, “प्रेम आओ, मैं तुम्हें अपने साथ लेकर चलूँगा.” प्रेम ने अपने इस रक्षक को पहचाना नहीं पर फिर भी कृतज्ञतापूर्वक झटपट नाव में बैठ गया.

सभी के सकुशल किनारे पर पहुँच जाने पर प्रेम भी अंत में नदी तट पर पहुँचा. नाव से उतरने के बाद वह ज्ञान से मिला. प्रेम ने पूछा, “ज्ञान, क्या तुम्हें पता है कि अन्य सभी द्वारा ठुकराए जाने पर किसने मेरी मदद की थी?” ज्ञान मुस्कुराया, “वह समय था क्योंकि केवल समय को ही तुम्हारा असली मोल और क्षमता मालूम है. प्रिय प्रेम, केवल तुम ही शान्ति व ख़ुशी ला सकते हो.”

सीख:
इस कहानी का सन्देश यह है कि जब हम संपन्न होते हैं तब हम प्रेम को नाकाबिल समझते हैं. जब हम स्वयं को महत्त्वपूर्ण समझते हैं तो हम प्रेम को सराहते नहीं हैं. सुख और दुःख में हम प्रेम पर ध्यान नहीं देते हैं. परन्तु समय के साथ हम प्रेम का वास्तविक महत्त्व समझते हैं. हमें अपने जीवन में प्रतिदिन प्रेम संजोकर सबके साथ बाँटना चाहिए.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना