Archive | September 2015

अनेकता में एकता- कबूतरों से सीख

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आदर्श : प्रेम
  उप आदर्श : सहनशीलता, एकता

एक प्राचीन मंदिर की छत पर बहुत सारे कबूतर आनंद से रहते थे.pigeons1 मंदिर के वार्षिक उत्सव के लिए जब मंदिर की मरम्मत का कार्य शुरू हुआ तब सारे कबूतर गिरजाघर पर रहने चले गए.

गिरजाघर के कबूतरों ने नए कबूतरों को खुशी-खुशी रहने की जगह दे दी.pigeons2

क्रिसमस का त्यौहार निकट था अतः गिरजाघर की पुनर्सज्जा की गई. इस कारण सभी कबूतरों को वहाँ से हटकर कोई और जगह देखनी पड़ी. उनका सौभाग्य था कि उन्हें पास की मस्जिद पर जगह मिल गई.pigeons3

मस्जिद के पुराने कबूतरों ने नए मेहमानों का खुशी से स्वागत किया. फिर रमादान का समय आया और मस्जिद को पुनः रंगना था. सारे कबूतर वापस उसी पुराने मंदिर पर आ गए.pigeons4

एक दिन मंदिर की छत से कबूतरों ने नीचे बाज़ार में कुछ जातिगत मुठभेड़ होते देखे. एक शिशु कबूतर ने अपनी माँ से पूछा, “ये लोग कौन हैं?”
माँ ने उत्तर दिया, “ये सब मनुष्य हैं.” शिशु ने पूछा, “पर ये सब आपस में झगड़ क्यों रहे हैं?”pigeons5
माँ ने शिशु को समझाया, “मंदिर जाने वाले मनुष्यों को ‘हिन्दू’ कहते हैं, गिरजाघर जाने वाले मनुष्यों को ‘ईसाई’ कहते हैं और मस्जिद जाने वाले मनुष्यों को ‘मुस्लिम’ कहते हैं.”

शिशु कबूतर ने पूछा, “ऐसा क्यों है? जब हम मंदिर पर रहते थे हम कबूतर कहलाते थे, जब हम गिरजाघर में थे हम कबूतर कहलाते थे और जब हम मस्जिद में थे तब भी हम कबूतर कहलाते थे. इसी प्रकार वे जहाँ भी जाएँ उन्हें केवल ‘मनुष्य’ के नाम से ही पुकारा जाना चाहिए.”

माँ कबूतर ने जवाब दिया, ” तुम, मैं और हमारे सभी कबूतर साथी एक दूसरे में कोई अंतर नहीं समझते हैं और आपस में मिल-जुलकर, शांतिपूर्वक रहते हैं. इन लोगों ने अभी तक यह नहीं सीखा है. यद्यपि सारे ‘मनुष्यों’ का एक ही स्त्रोत है और सब में वही ईश्वर विद्यमान है, परन्तु ‘मनुष्य’ इस बात को भूल गया है. इस कारण से ये एक-दूसरे से झगड़ते रहते हैं.”

 सीख:
हम सब सर्वप्रथम मनुष्य हैं और एक समान हैं. आइए एक दूसरे का आदर करें और एक शांतमय व स्नेहमय संसार के लिए एकजुट होकर रहें.

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अनुवादक- अर्चना

कॉफ़ी का प्याला

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 आदर्श: उचित आचरण
  उप आदर्श : निस्वार्थ सेवा

वेनिस, इटली का एक शहर है जिसे रोशनी व पानी का शहर भी कहते हैं.cofee1 मैं अपने दोस्त के साथ वेनिस के पड़ोसी शहर की जानी-मानी कॉफ़ी की दुकान में बैठा हुआ था.cofee2 हम अपनी कॉफ़ी का आनंद ले रहे थे. इसी दौरान एक व्यक्ति दुकान में आया और हमारे पास की खाली मेज़ पर बैठ गया. उसने वेटर को बुलाया और बोला, “२ प्याले कॉफ़ी, एक वहाँ दीवार पर.” हमने यह आर्डर कुछ विशेष दिलचस्पी से सुना और देखा कि यद्यपि उसे केवल एक ही कॉफ़ी परोसी गई, उसने भुगतान २ प्यालों का किया.

इस व्यक्ति के दुकान से जाते ही वेटर ने दीवार पर कागज़ का एक टुकड़ा चिपकाया जिसपर लिखा था, “कॉफ़ी का एक प्याला.” हम अभी वहीँ थे जब २ अन्य व्यक्ति दुकान में आए और उन्होंने ३ प्याले कॉफ़ी का आदेश दिया – २ मेज़ पर और एक दीवार पर. उन्होंने कॉफ़ी के २ प्यालों का सेवन किया पर ३ प्यालों का भुगतान करके चले गए. इस बार भी वेटर ने ऐसा ही किया; उसने कागज़ का एक टुकड़ा दीवार पर लगाया जिसपर लिखा था, “कॉफ़ी का एक प्याला.” यह सब हमारे लिए कुछ विचित्र व आश्चर्यपूर्ण था. हमने अपनी कॉफ़ी ख़त्म की, बिल का भुगतान किया और दुकान से चले आए.

कुछ दिनों बाद, हमें दुबारा इस दुकान में जाने का मौका मिला. जब हम अपनी कॉफ़ी का मज़ा ले रहे थे तब एक पुराने से कपड़े पहना व्यक्ति दुकान में आया. मेज़ पर बैठकर उसने दीवार की ओर देखा cofee4और कहा, “दीवार से कॉफ़ी का एक प्याला.” वेटर ने इस व्यक्ति को उसी आदर व इज़्ज़त से कॉफ़ी परोसी जैसे वह औरों को परोस रहा था. उसने कॉफ़ी पी cofee5और भुगतान किए बिना चला गया. यह सब देखकर हम आश्चर्यचकित थे. पर फिर जब वेटर ने दीवार से कागज़ का एक टुकड़ा निकालकर कूड़ेदान में फेंका, तब सारा मामला स्पष्ट हुआ. दरिद्रों के प्रति इस शहर के निवासियों का विशेष आदर देखकर हमारी आँखों में पानी आ गया.

अगर हम इस व्यक्ति की ज़रुरत पर विचार करेंगें तो पायेंगें- वह अपना आत्म-सम्मान बरकरार रखकर दुकान में घुसता है- उसे मुफ्त की कॉफ़ी माँगने की कोई ज़रुरत नहीं है….वह केवल दीवार की ओर देखकर अपने लिए कॉफ़ी मँगाता है, कॉफ़ी का आनंद लेकर चला जाता है.

सीख:

हम जब वास्तव में किसी की मदद करना चाहते हैं और उनके जीवन में अंतर लाना चाहते हैं, तो हमें ऐसा निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए. हमें कोई भी उदार कार्य इस प्रकार करना चाहिए कि मदद माँगने वाले व्यक्ति को अपना आत्म-सम्मान नीचा न करना पड़े. अगर कभी हम किसी की सहायता करने की स्थिति में हो तो अपनी प्रशंसा किए बिना तथा अपने अहंकार से अलग होकर मदद करनी चाहिए. अच्छा कार्य बिना किसी दिखावे व अपेक्षा के, केवल इसलिए करें क्योंकि वही उचित है.

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अनुवादक- अर्चना

यात्रा उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी की मंज़िल

एक समय एक राजा था जिसे अपना आराम तथा भोग-विलास बहुत प्रिय था. वह लाल गुलाब से ढके बिस्तर पर सोता था और सबसे अधिक स्वादिष्ट भोजन खाता था. एक दिन, राजा और उसके दरबारी शिकार करने निकले.hunting1 सभी ने शिकार का आनंद उठाया और जब शिकार समाप्त हुआ, तब अँधेरा हो चुका था. राजा अपनी टोली का नेतृत्व कर रहा था पर पर कुछ समय बाद उसे अहसास हुआ कि वह अकेला था. वह अपने समूह से अलग हो गया था. टोली के लोगों ने राजा को ढूँढ़ने की कोशिश की पर जब वे विफल रहे तो वे सब वापस लौट गए.

राजा अत्यंत भूखा व थका हुआ था. वह इस अनपेक्षित परिस्थिति से अत्यधिक गुस्से में था. जब वह घुड़सवारी करते हुए कुछ दूर और पहुँचा hunt3तो उसे एक कुटिया दिखी जहाँ एक पंडित पूजा कर रहा था. राजा ने पंडित को अपनी परिस्थिति बताई और पंडित से प्रार्थना की कि वह उसे उसका साम्राज्य व विलासिता वापस दिलाने में उसकी मदद करे. पंडित मुस्कुराया और राजा से बोला, “मैं तुम्हें एक मंत्र सिखाऊँगा. अपना साम्राज्य वापस पाने के लिए तुम्हें यह मन्त्र आग के घेरे में चालीस दिन खड़े रहकर दोहराना होगा.”hunt4

राजा ने शीघ्र ही मन्त्र सीख लिया और पंडित के अनुदेश का पालन किया. परन्तु चालीस दिनों की इस तपस्या के बाद भी कुछ नहीं हुआ. पंडित से पूछने पर, उसने हिदायत दी कि इस बार वह इस मन्त्र को सबसे ठंडी नदी में खड़े होकर दोहराए.hunt6 परन्तु इस प्रकार ४० दिनों तक पूजा करने पर भी कुछ हासिल नहीं हुआ. इस प्रकार राजा के सारे प्रयास व्यर्थ होने पर, वह अत्यधिक परेशान व निराश था. तब पंडित ने राजा को समझाया कि उसे उसकी प्रार्थना का फल इसलिए नहीं मिला क्योंकि राजा ने मन्त्र का उच्चारण, मन्त्र पर ध्यान केंद्रित करके नहीं बल्कि सदा उसके परिणाम पर ध्यान रखते हुए किया था. इस कारण वह विफल रहा था.

सीख :

हमें कोई भी काम करते समय केवल उसके अंतिम परिणाम को देखने के बजाय, उस कार्य पर ध्यान केंद्रित रखकर उस कार्य का आनंद लेना चाहिए. अगर हम कोई कार्य बिना समझ व रूचि के, मात्र उसे करने के उद्देश्य से करेंगें तो हमें कभी भी उसका वांछित फल नहीं मिलेगा. प्रत्येक कार्य से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है. अतः यात्रा उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी की मंज़िल.

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अनुवादक- अर्चना

जन्माष्टमी

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  यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् !

जब जब संसार में धर्म का ह्रास होता है, सदा कृपालु निराकार भगवान उचित व नया रूप लेकर, धर्म के उत्थान हेतु, लोगों के समक्ष प्रकट होते हैं. कुछ विशिष्ट कारणों से भगवान श्री कृष्ण, जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे, इतिहास के सबसे लोकप्रिय व सबसे शक्तिशाली मानव अवतरण माने जाते हैं. कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है और लोग कृष्ण को अनेकों नामों से जानते हैं- रास रसिला, लीलाधर, देवकी नंदन, गिरिधर, माखन चोर, माधव इत्यादि.

जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण के जन्म के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से दुनिया भर में मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि द्वापर युग के अंतिम चरण में भाद्रपद माह के रोहिणी नक्षत्र में तथा कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था. जन्माष्टमी को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे कि कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयंती तथा श्री जयंती. लगभग ५००० वर्ष पूर्व, भगवन श्री कृष्ण के जन्म का एक मात्र उद्देश्य धरती को राक्षसों की दुष्टता से मुक्ति दिलाना था. भगवन कृष्ण ने महाभारत में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उन्होंने भक्ति व अच्छे कर्मों के सिद्धांतों का प्रचार किया था जिसका वर्णन भगवत गीता में गहराई से है.
 भगवन कृष्ण का जन्म :

मथुरा का शासक, कंस, एक निष्ठुर राजा था जिससे उसकी प्रजा बहुत डरती थी. कंस की बहन, देवकी, का विवाह जब वासुदेव से हुआ तब भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का नाश करेगा. भयभीत व क्रोधित कंस, अपनी बहन को मारना चाहता था पर वसुदेव ने कंस से वादा किया कि वह अपना हर नवजात शिशु कंस के हवाले कर देगा. कंस मान तो गया पर उसने देवकी व वसुदेव को कारगाह में बंद कर दिया.

भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ. jn3और भगवान विष्णु के आदेशानुसारjn2 वसुदेव कृष्ण को उनके जन्म के तुरंत बाद बाबा नन्द व माता यशोदा के पास गोकुल ले गए.jn5 इस प्रकार कंस की आँखों में धुल झोंककर, वसुदेव भगवान श्री कृष्ण को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा पाए.jn6

भगवान श्री कृष्ण का जीवन तीन चरणों में बाँटा गया है- वृन्दावन लीला, द्वारका लीला और कुरुक्षेत्र लीला.

वृन्दावन लीला

गोकुल में भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ बड़े हुए और उन्होंने अपने गोकुल- वृन्दावन समयकाल में कई लीलायें दिखाईं. इसमें से कुछ प्रमुख हैं- राक्षसी पूतना का वध, अधसुर राक्षस का नाश, धेनुकासुर का अंत, वृन्दावन में जहरीले सर्प, कालिया का वध करके यमुना नदी की पवित्रता लौटना, असुर प्रलम्ब का विनाश, गोपिकाओं के साथ रास-लीला, तथा अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्रदेव का अहम नष्ट करना.

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इसके पश्चात, कुछ वर्षों बाद श्री कृष्ण ने मथुरा लौटकर पापी कंस का अंत किया और महाराजा उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा प्रतिष्ठित किया.

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द्वारका लीला के दौरान कृष्ण ने सत्यभामा, गरुड़ व सुदर्शन चक्र के अभिमान पर प्रहार किया था.

कुरुक्षेत्र लीला का सबसे विशिष्ट अंश कृष्ण का पांडवों तथा कौरवों के साथ सम्बन्ध था. इस दौरान भगवान कृष्ण ने ऐसी कई परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जो आगे जाकर महाभारत के युद्ध का कारण बनीं. jn12इस विश्व विख्यात युद्ध के दौरान भगवत गीता की रचना हुई थी happiness8जिसके द्वारा भगवान श्री कृष्ण ने हमें अच्छे व बुरे में भेद करना सिखाया तथा हमें अच्छे कर्मों के लिए प्रेरित कर अपने सारे कार्य ईश्वर को समर्पित करना सिखाया. भगवत गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो घर-घर में तथा प्रत्येक मंदिर में रखा व पूजा जाता है.

जन्माष्टमी उत्सव

देश-विदेश के हिन्दू इस पर्व को बहुत ही आनंद व उत्साह से, दिनभर उपवास रखकर तथा मध्यरात्रि तक जग कर मनाते हैं. लगभग प्रत्येक घर तथा मंदिर में बाल गोपाल को झूले में झुलाया जाता है. jn22कई मंदिरों में भगवद गीता के पाठ का आयोजन भी किया जाता है.

महाराष्ट्र- महाराष्ट्र राज्य में गोकुलाष्टमी को दही हांडी के रूप में मनाया जाता है.

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उत्तरी तथा पूर्वी भारत-
उत्तरी भारत के प्रसिद्द स्थान जैसे मथुरा, वृन्दावन और गोकुल हैं, जहाँ श्री कृष्ण ने अपना बचपन बिताया तथा समस्त गोपियों का मन मोहा था. यहाँ दूर-दूर से जन्माष्टमी पर बहुत से लोग आते हैं.
द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर विशेष उल्लेख योग्य है.

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पूर्वी भारत में भागवत पुराण के १०वे स्कन्द से पुराण का प्रवचन होता है.

दक्षिण भारत-
सभी घरों के बाहर ख़ूबसूरत रंगोली बनती है तथा घरों के चौखट पर गृहणियाँ श्री कृष्ण के पदचिन्ह बनातीं हैं. गीत गोविन्दम् तथा कृष्ण सम्बन्धी अन्य भक्तिपूर्ण गीत गाए जाते हैं. दूध व दही से बने आहार भगवान कृष्ण को भोग लगते हैं.
गुर्वायुरपुर का कृष्ण मंदिर विशेष महत्ता रखता है, क्योंकि कहा जाता है कि द्वारका शहर के समुद्र में डूब जाने के उपरान्त गुर्वायुरपुर में भगवान कृष्ण की प्रतिमा की स्थापना हुई थी.

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      कृष्ण शब्द का अर्थ:

कृष्ण= कृष + ण अर्थात कृष्ण वह हैं जो हृदय का विकास करते हैं.

कृष्ण शब्द के तीन अर्थ हैं-

१) कृषिति इति कृष्णा- जो जोतता है वह कृष्ण है. हमारा हृदय मैदान का प्रतीक है. हमें हृदय से घासपात(हानिकर गुणों) को निकालकर, हृदय को प्रेम से भरना चाहिए. हृदय में भगवान के नाम के बीज बोन चाहिए.

२) कर्षति इति कृष्णा- चूँकि वह आकर्षित करता है, वह कृष्ण है. कृष्ण में आकर्षित करने की सर्वोच्च शक्ति है. अपने कार्यों, लीलाओं, संगीत तथा मधुर शब्दों द्वारा कृष्ण सभी को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं.

३) कृष्यति इति कृष्णा- उन्हें कृष्ण कहते हैं क्योंकि वह परमानंद प्रदान करते हैं. हम सब ख़ुशी की तलाश में हैं. भगवान जो आनंद की अभिव्यक्ति हैं, हम सब के भीतर हैं. हमें अपने भीतर आनंद के स्त्रोत को पहचानकर सदा प्रसन्न रहना चाहिए.

जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर भगवान कृष्ण द्वारा दी गई इस सार्वलौकिक शिक्षा पर प्रकाश डालना उचित रहेगा-
भगवान में सम्पूर्ण श्रद्धा रखकर हमें अपना कर्त्तव्य निष्ठा से निभाना चाहिए तथा सदा सहायक रहकर अपना जीवन परिष्कृत करना चाहिए. हमें अपने सभी कार्य भगवान को समर्पित करने चाहिए- भगवान से एकात्मकता अनुभव करने का यही तरीका है.

श्री कृष्ण जिसका नाम है,
गोकुल जिसका धाम है!
ऐसे श्री भगवान को बारम्बार प्रणाम है.

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