Archive | November 2018

  एक टैक्सी-चालक की ईमानदारी 

              taxi

    आदर्श: सत्य 

   उप आदर्श: ईमानदारी 

     शिव खेरा, एक सुप्रसिद्ध लेखक और प्रबंधन प्रशिक्षक, अपने सिंगापुर के अनुभव के बारे में लिखते हैं –

          ६ वर्ष पहले, सिंगापुर में एक विशेष ठिकाने पर जाने के लिए मैंने टैक्सी-चालक को एक परिचय कार्ड दिया. जल्द ही हम कार्ड पर उल्लेखित ठिकाने पर पहुँच गए; चालक ने इमारत का एक चक्कर लगाने के बाद गाड़ी रोकी. यद्यपि उसकी गाड़ी का मीटर $११ का भाड़ा दिखा रहा था पर चालक ने केवल $१० ही लिए.   

        मैंने चालक से कहा, “हेनरी, तुम्हारे मीटर के अनुसार भाड़ा तो $११ का है पर तुम केवल $१० ही क्यों ले रहे हो?”

         चालक बोला, “महाशय, मैं एक टैक्सी-चालक हूँ. मुझे आपको सीधे आपके गंतव्य स्थान पर लाना चाहिए था. चूँकि मुझे आपको छोड़ने का सही स्थान नहीं पता था, मुझे इस इमारत का एक चक्कर लगाना पड़ा. यदि मैं आपको सीधे यहाँ लेकर आता तो आपका भाड़ा $१० ही आता. मेरी अज्ञानता की कीमत आप क्यों चुकायेंगें?”

         चालक आगे बोला, “महाशय, वैधरूप से मैं $११ का दावा कर सकता हूँ परन्तु ईमानदारी व नैतिक रूप से मैं केवल $१० का ही हकदार हूँ. इसके अलावा सिंगापुर पर्यटक स्थान है. अधिकतर लोग यहाँ ३-४ दिनों के लिए आते हैं. सीमा-शुल्क पार करने के बाद पर्यटक जब हवाई-अड्डे से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला अनुभव हमेशा टैक्सी-चालकों के साथ ही होता है और यदि वह अच्छा न हो तो उनके बाकी के दिन भी सुखद नहीं बीतते हैं.”

       चालक बोला, “महाशय, मैं मात्र एक टैक्सी-चालक नहीं हूँ. मेरे पास राजनयिक पासपोर्ट नहीं होते हुए भी, मैं सिंगापुर का राजदूत हूँ.”

       मेरे अनुमान से उसकी शिक्षा शायद आठवीं कक्षा तक की ही होगी पर मेरे लिए वह एक व्यवसायी था. मेरे लिए उसका व्यवहार उपलब्धि व व्यक्तित्व में गर्व दर्शा रहा था.

      उस दिन मैंने सीखा कि व्यवसायी बनने के लिए मनुष्य को सिर्फ व्यावसायिक योग्यता ही नहीं चाहिए होती है. 

 सीख:

      सारांश में ……”मानवीयता व आदर्शों से परितृप्त व्यवसायी बनो”……. इससे गुणवत्ता में बहुत अधिक अंतर पड़ता है. ज्ञान, योग्यता, धन, शिक्षा सब दूसरे दरजे के हैं. पहला स्थान मानवीय आदर्शों, ईमानदारी व समग्रता का है जैसा कि टैक्सी-चालक ने प्रदर्शित किया. एक सभ्य व्यक्ति वह होता है जिसके विचार व आचरण अच्छे होते हैं. मनुष्य ने निस्संदेह धन संचय व संपत्ति समेटने के कई तरीके सीख लिए हैं पर फिर भी वह खुश नहीं हैं. क्यों? क्योंकि उसका व्यवहार उचित नहीं हैं. एक अच्छे आचरण के लिए सदगुण का होने सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. एक सदाचारी व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकता हैं. सदगुणों के अभाव में जीवन अर्थहीन हो जाता हैं.  अच्छा आचरण जीवन का मूल आधार होना चाहिए.

     शिक्षा जीवन को समृद्ध बनाने के लिए होनी चाहिए न कि केवल जीवन निर्वाह के लिए. इन दोनों में क्या अंतर हैं? वास्तव में इन दोनों उक्तियों में बहुत अधिक अंतर हैं. औपचारिक व सांसारिक शिक्षा मनुष्य को बुद्धिमान, विवेकी और ज्ञानपूर्ण बनाती है; पर क्या केवल इस ज्ञान का होना पर्याप्त है? ऐसी शिक्षा मनुष्य को इस सांसारिक जीवन में अवश्य मदद करती है पर हमारे भीतर के आतंरिक संसार का क्या?

     इसलिए बच्चों; इस सांसारिक शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी एकत्रित करो. इससे आपको अपनी भीतरी शक्ति विकसित करने में मदद होगी और आप अपनी वास्तविक ताकत व सामर्थ्य को पहचान पाओगे. इसके अतिरिक्त यह ज्ञान आपको इस सांसारिक जीवन में मदद करने के साथ-साथ जीवन के हर कदम में आपका मार्गदर्शन करेगा और आख़िरकार आपको अपनी सही पहचान का अहसास कराएगा.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना         

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