Archive | January 2017

अपना अस्तित्व बनाए रखना

 

     आदर्श : सत्य
उप आदर्श: कृतार्थ, सही रवैया

एक राजा एक बगीचे में टहल रहा था और इस दौरान उसने कई कुम्हलाते और मुरझाते हुए वृक्ष, झाड़ियाँ और फूल देखे. ओक के वृक्ष ने कहा कि वह इसलिए मुरझा रहा था क्योंकि वह देवदार के वृक्ष के समान ऊँचा नहीं उग सकता था. देवदार के वृक्ष से पूछने पर राजा को ज्ञात हुआ कि देवदार इसलिए ढह रहा था क्योंकि वह अंगूर की बेल के समान अंगूर नहीं उपजा सकता था. इसी प्रकार अंगूर की बेल इस कारण कुम्हला रही थी क्योंकि वह एक गुलाब के समान खिल नहीं सकती थी.

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अंततः राजा को एक पौधा दिखा जो ताज़ा व दिलकश था और फल-फूल रहा था.

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पूछताछ करने पर राजा को निम्न उत्तर मिला:
यह तो बहुत ही प्राकृतिक सी घटना है. जब आपने मुझे बोया था तब आपको मुझसे आनंद की अपेक्षा थी. यदि आप ओक, अंगूर या गुलाब की इच्छा रखते तो आप उन पौधों को रोपते. इसलिए मेरा मानना है कि मैं जो हूँ उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं बन सकता. और इस कारण मैं अपने विशिष्ट गुणों का विकास करने की भरपूर कोशिश करता हूँ.

सीख:
हमें अपना ध्यान स्वयं पर केंद्रित करना सीखना चाहिए. हम अपना व्यक्तित्व बदल नहीं सकते हैं. हमारे लिए किसी और की तरह बनना असंभव है. हमारा विकास और हमारी समृद्धि तभी होगी जब हम अपने व्यक्तित्व को स्वीकार करेंगें. यदि हम स्वयं से प्रसन्न नहीं होंगें तो हम कुम्हला सकते हैं. हम सभी में सामर्थ्य, योग्यता, कौशल व उद्देश्य है जिस कारण हमारा जन्म हुआ है. यदि हम इस तथ्य को स्वीकार कर लें और अपनी योग्यताओं का सर्वोत्तम प्रयोग करना सीख लें तो हम अवश्य ही प्रसन्नचित रहेंगें और दूसरों में भी खुशियाँ फैलाएंगें.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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हर दिन एक उपहार है

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आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: रवैया

एक महिला ९२ वर्षीय वृद्ध, संतुलित, स्वाभिमानी और छोटे कद की थी. यद्यपि वह अंधी थी, फिर भी हर सुबह अपने बालों में कंघी करके, बखूबी पूरा श्रृंगार करके ८ बजे तक वह अच्छे तरीके से तैयार हो जाती थी. आज उसे नर्सिंग होम ले जाया जा रहा था.

उसके पति ने ७० साल तक उसका साथ निभाया था और हाल ही में उसकी मृत्यु हो गयी थी. इस कारण महिला को नर्सिंग होम ले जाना ज़रूरी हो गया था.

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नर्सिंग होम के प्रतीक्षाकक्ष में काफ़ी घंटों धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने के बाद जब उसे सूचित किया गया कि उसका कमरा तैयार है तो वह बहुत ही प्यार से मुस्कुरायी.

जब वह अपने वॉकर की मदद से लिफ्ट की ओर जा रही थी, मैंने उसके छोटे से कमरे का सविस्तार मानसिक विवरण दिया. एक आठ वर्षीय बच्चे, जिसे हाल ही में एक पिल्ला उपहार में मिला हो, के समान उत्साहित होकर वह बोली, “मुझे बहुत पसंद है.”

“मिसेज जोंस, ज़रा रूकिये…..अभी तो आपने अपना कमरा देखा भी नहीं है.”

“उससे कोई अंतर नहीं पड़ता है,” उसने उत्तर दिया. “खुशी वह होती है जिसका निश्चय हम समय से पहले ही कर लेते हैं. मुझे अपना कमरा पसंद है या नहीं, यह कमरे की सजावट पर निर्भर नहीं करता है. यह मेरी मनोदशा पर आधारित है. मैंने यह पहले से ही निश्चय कर लिया था कि मैं अपने कमरे से प्रेम करूँगी. यह एक ऐसा संकल्प है जो मैं प्रतिदिन सुबह उठने पर करती हूँ. मेरे पास २ विकल्प हैं: सारा दिन बिस्तर पर लेटकर मैं अपने उन अंगों के बारे में सोचती रहूँ जो अब काम नहीं कर रहे हैं या फिर बिस्तर से बाहर निकलकर मेरे पास जो भी है उसके लिए आभारी रहूँ. प्रत्येक दिन एक सौगात है और जब तक मैं जीवित हूँ, मैं अपना सारा ध्यान हर नए दिन व समस्त सुखद यादों पर केंद्रित करूँगी जो मैंने अपने जीवन के इन दिनों के लिए ही संजोकर रखीं हैं.”

उसने मुझे समझाया, “वृद्धावस्था एक बैंक-खाते के समान होती है, तुम अपनी जमा पूँजी में से ही राशि निकालते हो. इसलिए तुम्हें मेरी सलाह रहेगी कि अपनी यादों के बैंक-खाते में ढेर सारी खुशियाँ जमा करो. मेरे बैंक में अपनी मधुर याद जमा करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. मैं तो अभी भी मोहक यादों का संचय कर रही हूँ.”

और फिर मुस्कुराते हुए वह महिला बोली:

“खुश रहने के पाँच सरल सिद्धांत सदा याद रखो:
१) अपने हृदय को द्वेष से मुक्त रखो
२) अपने दिमाग को परेशानियों से दूर रखो
३) सादा जीवन बसर करो
४) दूसरों को अधिक से अधिक दो
५) कम से कम अपेक्षा रखो.”
सीख:

सब कुछ हमारे रवैये पर निर्भर करता है. खुशी कभी भी बाहरी साधनों पर आश्रित नहीं होती है. किसी भी चीज़ के प्रति हमारा दृष्टिकोण व रवैया सबसे अधिक महत्व रखता है. स्वयं को हम खुद ही खुश रख सकते हैं. हमें इस सुन्दर सत्य को सीखकर एक खुशहाल जीवन व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिए.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

अंधा लड़का

 

     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: अंतर्दृष्टि

एक अंधा लड़का एक इमारत की सीढ़ियों पर बैठा हुआ था. उसके पैरों के पास एक टोपी रखी हुई थी और पास रखे एक तख़्त पर लिखा था, “मैं अंधा हूँ, कृपया मदद कीजिए.” उसकी टोपी में केवल कुछ ही सिक्के पड़े हुए थे.

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एक व्यक्ति वहाँ से गुजरा. उसने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और टोपी में डाल दिए. फिर उसने तख़्त उठाई और उसे पलटकर उसके पीछे कुछ लिखा. उसके बाद उसने उस तख़्त को वापस वहीँ रख दिया ताकि वहाँ से आने-जानेवाले सभी राही उन नए शब्दों को देख सकें.

जल्द ही टोपी भरने लगी. अब पहले से कहीं ज़्यादा लोग टोपी में पैसे डाल रहे थे. जिस व्यक्ति ने तख़्त पर नए शब्द लिखे थे, वह उस दोपहर पुनः वहाँ आया. अंधे बालक ने उस व्यक्ति के पैरों की आहट पहचान ली और उसने पूछा, “आज सुबह क्या तुमने मेरे तख़्त पर लिखे शब्दों में बदलाव किया था? तुमने क्या लिखा था?”

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वह व्यक्ति बोला, “मैंने केवल सत्य ही लिखा था. मैंने तुम्हारे ही शब्दों को ज़रा अलग ढ़ंग से लिख दिया था.”

उस व्यक्ति ने तख़्त पर कुछ इस प्रकार लिखा था, “आज एक खूबसूरत दिन है पर मैं उसे देख नहीं सकता हूँ.”

क्या दोनों वास्तव में एक ही सन्देश व्यक्त कर रहे थे?
यक़ीनन दोनों ही सन्देश लोगों को बतला रहे थे कि वह लड़का अंधा था. परंतु पहले वाला तख़्त केवल इतना ही बता रहा था कि वह लड़का अंधा था. जबकि दूसरा वाला तख़्त लोगों को यह जता रहा था कि वह कितने भाग्यशाली हैं कि वह अंधे नहीं हैं. ऐसे में क्या यह आश्चर्य की बात है कि दूसरा वाला सन्देश कहीं अधिक प्रभावशाली था?

सीख:

हमारे पास जो भी है हमें उसके लिए आभारी रहना चाहिए. हमें अभिनव व रचनात्मक बनकर कुछ अलग व सकारात्मक सोचना चाहिए. हमें अपनी बुद्धिमत्ता से दूसरों को अच्छाई की ओर प्रेरित करना चाहिए. ज़िन्दगी बिना किसी क्षमायाचना के जीनी चाहिए और दूसरों से प्रेम, बिना किसी अपेक्षा के करना चाहिए. ज़िन्दगी में दुःख के कितने भी कारण क्यों न हों, हमें सदा सबल रहकर मुस्कुराने की वज़ह ढूँढ़नी चाहिए. हमें अपने अतीत का सामना बिना किसी अफ़सोस के करना चाहिए, अपने वर्तमान का संचलन दृढ़ विश्वास से करना चाहिए और निडर होकर भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए. हमें सदैव विश्वासपूर्ण व निर्भीक रहना चाहिए.

महान व्यक्ति कहते हैं, “जीवन निरंतर सुधार व पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है, बुराई से हटने व अच्छाई विकसित करने की कार्यविधि है …… जीवन के सफ़र में यदि तुम निडर होकर यात्रा करना चाहते हो तो तुम्हारे पास अनुकूल अंतरात्मा की टिकेट होनी चाहिए.”

किसी व्यक्ति को मुस्कुराते देखना सबसे अधिक ख़ूबसूरत बात है- और उससे भी अधिक सुन्दर है यदि उस मुस्कराहट का कारण आप हों!!

अनुवादक- अर्चना