Archive | September 2018

       आनंद का रहस्य – हर्षित किसान 

farmer2

     आदर्श: उचित आचरण 

     उप आदर्श : प्रेम से अपने कर्तव्य का पालन करना, आनंद का रहस्य 

    एक राजा एक बार रूप बदलकर अपने साम्राज्य के सबसे अधिक प्रसन्न व्यक्ति का पता लगाने निकला. 

    सैकड़ों लोगों को मिलने के बाद आखिरकार उसे एक गरीब किसान दिखा जो खेत में हल चलाते हुए आनंदपूर्वक गाना गा रहा था. किसान के चेहरे पर इतनी दीप्तिमान ख़ुशी थी कि राजा का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हुआ.

    राजा किसान से बोला, “प्रिय मित्र, मुझे अपनी ख़ुशी का रहस्य बताओ.”

     किसान बोला, “यह तो बहुत ही सरल है. अपनी कमाई के चौथाई भाग से मैं अपने ऋण का भुगतान करता हूँ; चौथाई भविष्य में निवेश करता हूँ; चौथाई दान-पुण्य में देता हूँ और चौथाई अपने कर्तव्य पर खर्च करता हूँ.”

    किसान की बात सुनकर राजा बिल्कुल चकित था. उसने किसान से और अधिक विवरण देने का अनुरोध किया. 

     “मेरे माता-पिता ने मुझे जीवन रुपी उत्कृष्ट उपहार दिया है और मैं उनके प्रति अथाह कृतज्ञता का ऋणी हूँ. अब मैं उनका पोषण करता हूँ और वृद्धावस्था में उनका ध्यान रखता हूँ. मेरी कमाई का चौथाई हिस्सा इस ऋण के भुगतान पर खर्च होता है.”

      “मेरे बच्चे भविष्य का प्रतीक हैं. अपनी आमदनी का चौथाई मैं उनके भोजन, कपड़े व शिक्षा पर खर्च करता हूँ. यह मेरा भविष्य में निवेश है.”

      “यद्यपि मैं गरीब हूँ परन्तु ऐसे भी लोग हैं जो मुझ से भी अधिक दरिद्र हैं. अपनी क्षमता के अनुसार मैं उनकी सहायता करता हूँ. इस कारण मेरी कमाई का चौथाई दान पर खर्च होता है.” 

“मेरी पत्नी मुझपर भरोसा करती है. मेरा कर्तव्य है कि मैं जीवनभर उससे प्रेम करूँ और उसकी रक्षा करूँ. मेरी आमदनी का चौथाई हिस्सा उसे एक अच्छा घर देने में खर्च होता है.”

farmer3farmer4farmer5farmer6

      सीख:

     वास्तविक ख़ुशी भगवान्, परिवार व दूसरों के प्रति हमारे दायित्व निभाने से मिलती है न कि धन, नाम व कीर्ति के पीछे भागने से.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

      अनुवादक- अर्चना 

Advertisements

  नन्हे मार्ग पर चलना

       

     आदर्श: प्रेम

    उप आदर्श: सहानुभूति, अनुकम्पा, शुद्ध इरादा 

     एक व्यक्ति ने एक बार स्वप्न में देखा कि वह स्वर्गलोक के द्वार पर खड़ा है. अपने सपने में उसने विविध जीवात्माएं देखीं जो सुनहरे द्वार की ओर जा रही थीं और स्वर्गलोक में प्रवेश होने की अनुमति माँग रही थीं.

small1

      सुनहरे द्वार पर खटखटाने वाली पहली जीवात्मा एक ज्ञानी पंडित की थी. “मुझे अंदर आने दो” ,पंडित ने स्वर्गलोक के प्रवेशद्वार पर पहरा दे रहे देवदूत से कहा. “दिन-रात पावन शास्त्रों का अध्ययन करने के फलस्वरूप मैंने स्वर्गलोक में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त किया है.”   

      देवदूत बोला, “रूको! हम अपने भौतिक अभिलेखों को देखकर इस बात की जाँच करेंगे कि तुमने शास्त्रों का अध्ययन प्रभु की भक्ति में किया है या सामाजिक सराहना व प्रशंसा के लिए.”

     द्वार पर अगली आत्मा एक धार्मिक पुरुष की थी. “मुझे अंदर आने दो, “उसने देवदूत से कहा. “मैंने कई निराहार व्रत किए हैं.”

     देवदूत बोला, “रूको! हम पहले छानबीन करेंगे कि तुम्हारी मंशा कितनी पवित्र थी.”

    फिर एक बहुत ही साधारण सा व्यक्ति आया और विनम्रता से बोला, “क्या मुझे अंदर आने की अनुमति मिल सकती है?”

    देवदूत ने उससे पूछा, “बताओ तुमने अपनी ज़िन्दगी के साथ क्या किया है.”

    हिचकिचाते हुए वह व्यक्ति बोला, “मैंने अपनी रोटी के कुछ टुकड़े प्रतिदिन एक भ्राता के साथ बाँटे हैं, जो लंगड़ा था और अपनी जीविका कमाने में असमर्थ था. मैं उसका घर साफ़ करता था और हर रोज़ उसके पानी का जग भरता था. मैं भगवान् से प्रार्थना करता था, “प्रिय प्रभु, मुझे उन लोगों का सेवक बनाइए जो पीड़ित व दुखी हैं.”

    देवदूत उस व्यक्ति से बोला, “नश्वर जीवों में तुम सबसे भाग्यवान हो. अपने नन्हे मार्ग पर चलकर तुमने अमरत्व हासिल किया है. स्वर्गलोक के द्वार तुम्हारे लिए खुले हैं.”

      सीख:

     दरिद्र व ज़रूरतमंदों की मदद करना, प्रभु के योग्य अधिकारी होने के समान है. मानव सेवा माधव सेवा है. गरीब व ज़रूरतमंद में प्रभु को देखो.

small2

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

      अनुवादक- अर्चना