Archive | June 2014

सब कुछ भले के लिए होता है

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आदर्श : शान्ति
उप आदर्श : धैर्य, सहनशीलता

जो भी होता है, भले के लिए होता है.

परन्तु हम शायद इसे समझ नहीं पाते हैं; विशेषतः अगर वह हमारी पसंद का न हो. निम्न कहानी इसे प्रभावशाली रूप से दर्शाती है-

मैं : भगवान, क्या मैं आपसे एक प्रश्न कर सकता हूँ?

भगवान: अवश्य

मैं : वादा, आप नाराज़ नहीं होंगे?

भगवान : मैं वादा करता हूँ.

मैं(आलोचनात्मक ढंग से) : आज आपने मेरे साथ इतना सब कुछ क्यों होने दिया?

भगवान : क्या मतलब है?

मैं (चिड़चिड़ाकर) : आज मैं देर से उठा था.

भगवान : हाँ

मैं (गुस्से से) : मेरी गाड़ी को शुरू होने में बहुत देर लगी थी .

भगवान : ठीक

मैं (शिकायत करते हुए) : दोपहर के भोजन में मेरा सैंडविच गलत बना था जिस कारण मुझे इंतज़ार करना पड़ा था.

भगवान : हम्म्म …

मैं (झल्लाकर) : घर लौटते समय जैसे ही मैंने फ़ोन उठाया, मेरा फ़ोन खराब हो गया.

भगवान : बिलकुल सही

मैं (निराश होकर) : और इन सब के बाद, जब मैं घर पहुँचा तो थकान उतारने के लिए मैं अपने पैर मालिश की नई मशीन में डुबोना चाहता था पर वह भी काम नहीं कर रही थी. आज कुछ भी ठीक नहीं हुआ. आपने ऐसा क्यों किया?

भगवान : आज सुबह यमदूत तुम्हें लेने आए थे और तुम्हारी ज़िन्दगी के लिए संघर्ष करने हेतु मुझे एक अन्य देवदूत भेजना पड़ा था. मैंने तुम्हें उस दौरान सोने दिया.

मैं (विनम्रता से) : ओह!

भगवान : मैंने तुम्हारी गाड़ी शुरू नहीं होने दी क्योंकि तुम्हारे रास्ते में एक नशे में धुत्त चालक था. अगर तुम सड़क पर होते तो वह तुम्हें मार देता.

मैं (लज्जित)…

भगवान : पहला व्यक्ति जिसने आज तुम्हारा सैंडविच बनाया था, वह बीमार था. मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें उसकी बीमारी लगे क्योंकि मैं जानता था कि तुम्हें काम पर जाना कितना ज़रूरी है.

मैं (शर्मिंदा) : अच्छा …

भगवान : तुम्हारा फ़ोन इसलिए खराब हो गया था क्योंकि एक व्यक्ति तुम्हें गलत सूचना देने वाला था. तुम्हारी सुरक्षा के लिए मैंने तुम्हारी उससे बात नहीं होने दी.

मैं (विस्मय में) : समझा भगवान

भगवान : और तुम्हारी मालिश की मशीन में खराबी होने के कारण, आज रात तुम्हारा सारा घर बिजली के बिना रहता. मुझे नहीं लगता कि तुम अंधेरे में रहना पसंद करते.

मैं : मुझे खेद है, प्रभु

भगवान : दुखी मत हो. केवल मुझ पर भरोसा करना सीख लो- हर चीज़ में, अच्छी या बुरी.

मैं : मैं आप पर विश्वास करूँगा.

भगवान : इस पर शक मत करना कि तुम्हारे दिन के लिए मेरी योजना, तुम्हारी योजना से सदा बेहतर होती है.

मैं :  नहीं करूँगा भगवान. मैं आपसे केवल इतना कहना चाहता हूँ कि आज की हर चीज़ के लिए आपका धन्यवाद .

भगवान :  तुम्हारा स्वागत है, बच्चे.  तुम्हारा ईश्वर बने रहने का यह एक और दिन था. मुझे अपने बच्चों का ध्यान रखना बहुत अच्छा लगता है.

   सीख :

जो वस्तुएँ हमारे नियंत्रण में नहीं है, हमें उनके प्रति धैर्य तथा सहनशीलता रखनी चाहिए. हमें अपना श्रेष्ठ करना चाहिए, सही रवैया रखना चाहिए और सहनशीलता का विकास करना चाहिए. हमें मालूम पड़ेगा कि जो भी होता है, वह सर्वश्रेष्ठ के लिए होता है. उसमें सदा हमारे लिए सीख होती है.

http://saibalsanskaar.wordpress.com

translation-  अर्चना

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ज्ञान का दीप जलाना

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आदर्श : सत्य
उप आदर्श : ज्ञान

एक साधक जो ईश्वर के बारे में जानने का अति अभिलाषी था, अपने ज्ञान के नेत्र खुलवाना चाहता था. उसने एक गुफा में प्रवेश किया जहाँ एक गुरु रहते थे. गुफा में घुसते समय उसे एक हलकी रोशनी दिखाई दी.lamp1 पर जैसे ही वह आगे बढ़ा, वह लघु रोशनी भी बूझ गई. अंधकार में हमें डर लगता है और डर में हम भगवान को और अधिक याद करते हैं. अतः उसने ज़ोर से “नमः शिवाय” दोहराया. यह सुनकर साधु ने उससे पूछा कि वह कौन है. उसने कहा कि वह उनकी कृपा प्राप्त करने आया था. वह महान ऋषि स्वयं को हवा के श्वसन से जीवित रखते थे और अपने पर्यटक के मन को जानने की क्षमता भी रखते थे. ऋषि ने कहा कि वह उसके प्रश्न का उत्तर बाद में देंगे. उन्होंने उसे पहले दीया जलाने को कहा, जो कि बूझ गया था. पर्यटक ने माचिस लेकर दीया जलाने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुआ. उसने गुरु से कहा कि उसने माचिस की सारी तीलियाँ ख़त्म कर दीं पर फिर भी दीप नहीं जला पाया था.

गुरु ने तब उसे दीया खोलकर, सारा पानी निकालकर उसमें तेल डालने को कहा. और पुनः दीया जलाने की कोशिश करने को कहा. उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया पर दीपक फिर भी नहीं जला. गुरु ने तब कहा कि संभवतः बत्ती पानी से गीली थी. अतः उसे खुले में अच्छी तरह सूखाकर, दीया जलाने का प्रयास करने को कहा. पर्यटक ने वैसा ही किया और सफल हो गया.lamp फिर उसने अपने प्रयोजन का जिक्र करने का साहस किया तथा गुरु से याचना की. विस्मित गुरु ने कहा कि अबतक उसे उपयुक्त उत्तर ही दिया जा रहा था. पर्यटक ने विनती की कि नादान होने के कारण वह उनकी शिक्षा का अर्थ समझ नहीं पाया था. उसने गुरु से उसे और अधिक स्पष्ट शब्दों में समझाने को कहा. गुरु ने कहा :

“तुम्हारे हृदय के बर्त्तन में, तुम्हारे जीवन की बत्ती है. अब तक यह बत्ती तुम्हारी इच्छाओं जैसे लालच, अहम्, ईर्ष्या इत्यादि, के पानी में डूबी हुई है. इसलिए तुम ज्ञान का दीपक नहीं जला पा रहे हो. अपने हृदय के बर्त्तन से इन इच्छाओं का सारा पानी निकालकर, इसे प्रेम से भर दो. अपने जीवन की बत्ती लेकर इसे दृढ़ता की धूप में सूखाओ; कामना के रूप में उपस्थित पानी निचोड़कर, हृदय में श्रद्धा तथा विश्वास का तेल डालो. तुम्हारे लिए ज्ञान का दीप जलाना संभव हो पाएगा. ”

सीख:
हम सभी के अंदर निर्मल हृदय है. हम अपने दिमाग में विचारों की भीड़ तथा कामना, क्रोध, लालच, अभिमान, अनुराग तथा ईर्ष्या नामक छह भीतरी शत्रुओं के कारण इसे देख नहीं पाते हैं. इन सब के ऊपर अहम् है. एक बार हम अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों को दूर करना शुरू कर देंगे तो हमारा प्रकाश अपने आप चमकने लगेगा.

http://www.sathya.org.uk/resources/books/chinnakatha/getstory.php?id=131

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translation:   अर्चना

गाय और सूअर

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सामयिक मदद

एक बार एक बहुत धनी पर अति कंजूस व्यक्ति था. उसकी कंजूसी के कारण गाँव वाले उसे बेहद नापसंद करते थे.

गाँव वालों के रवैये से उदास होकर, एक दिन उसने उनसे कहा, “तुम मुझसे ईर्ष्या करते हो और पैसे के लिए मेरे प्रेम को नहीं समझते- केवल ईश्वर ही जानते हैं. पर मैं इतना जानता हूँ कि तुम मुझे नापसंद करते हो. जब मैं मर जाऊँगा, मैं अपने साथ कुछ नहीं लेकर जाऊँगा. मैं सब दूसरों के लिए छोड़ दूँगा. मैं एक वसीयतनामा बनाऊँगा और सब कुछ दान में दे दूँगा. तब तुम सब खुश हो जाओगे.”

उसपर भी लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया और उसपर हँसे. अमीर आदमी ने उनसे कहा, ” क्या बात है? मेरा धन दान में जाते हुए देखने के लिए क्या तुम कुछ वर्ष इंतज़ार नहीं कर सकते?”

गाँव वालों को उसपर विश्वास नहीं हुआ. उसने आगे बोला, “तुम्हें लगता है कि मैं अविनाशी हूँ? अन्य सभी लोगों के समान मेरी भी मृत्यु होगी और तब मेरा धन, दान में जाएगा.”

वह गाँव वालों के दृष्टिकोण पर हैरान था.

एक दिन वह घूमने निकला. अचानक मूसलाधार बारिश शुरू होने के कारण उसने एक विशाल वृक्ष के नीचे पनाह ले ली. वहाँ एक गाय और सूअर भी थे. गाय और सूअर में बातचीत शुरू हो गयी और उसने उनकी बातें सुनीं.

सूअर ने गाय से पूछा, “ऐसा क्यों है कि सभी तुम्हारी सराहना करते हैं पर मेरी प्रशंसा कोई भी नहीं करता? मरने के बाद मैं लोगों को मांस और कबाब देता हूँ. लोग मेरे बाल भी इस्तेमाल कर सकते हैं. मैं लोगों को तीन-चार चीज़ें देता हूँ जबकि तुम केवल एक चीज़ देती हो- दूध.cow1 हर समय लोग तुम्हारी ही प्रशंसा क्यों करते हैं पर मेरी नहीं?”

गाय ने उत्तर दिया, “देखो, मैं जीवित रहते हुए दूध देती हूँ. लोग देखते हैं कि मेरे पास जो भी है मैं उसमें उदार हूँ. पर तुम अपने जीवनकाल में लोगों को कुछ नहीं देते. तुम अपनी मृत्यु के बाद ही उन्हें मांस इत्यादि देते हो. लोग भविष्य में विश्वास नहीं करते हैं ; वे वर्त्तमान में विश्वास रखतें हैं. अगर तुम जीवित रहते हुए दोगे तो लोग तुम्हें भी सराहेंगे. यह साधारण सी बात है.”

उस पल से वह अमीर व्यक्ति दानशील बन गया और अपने गाँव के गरीब व ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करने लगा करने लगा.

        सीख:

समय पर की गई छोटी सी मदद भी, अनावश्यक या व्यर्थ में की गई सहायता से बेहतर है. सामयिक सहायता किसी ज़रूरतमंद की ज़िन्दगी में सचमुच अंतर ला सकती है.

Courtesy- http://timyrna.com/tpedrosa/lessonfromcowandpig.htm

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Tanslation- Archana

मेरा हाथ पकड़ो

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, भरोसा

एक बार एक छोटी सी लड़की अपने पिता के साथ पुल पार कर रही थी. पिता कुछ डरे हुए थे कि उनकी बेटी कहीं गिर न जाए. अतः उन्होंने अपनी नन्ही बेटी से कहा, “बेटी, तुम मेरा हाथ पकड़ लो. वरना तुम नदी में गिर सकती हो.” hold hand2

छोटी लड़की ने कहा, “नहीं पिताजी. आप मेरा हाथ पकड़िए.”

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हैरान पिता ने पूछा, “दोनों में क्या अंतर है?”

“बहुत अंतर है,” नन्ही बालिका ने उत्तर दिया.

“अगर मैं आपका हाथ पकड़ूंगी और मुझे कुछ हो गया तो संभवतः मैं आपका हाथ छोड़ दूँगी. पर अगर आप मेरा हाथ पकड़ेंगें तो मुझे निश्चित रूप से मालूम है कि चाहे कुछ भी हो, आप मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ेंगें.”

 सीख:

अगर हम ईश्वर को छोड़ना भी चाहे तो भी परम दयालु ईश्वर हमें कभी नहीं छोड़ेंगें.  उन्हें प्रेम व श्रद्धा से बाँधकर, कसकर पकड़कर रखो.
Courtesy:http://www.islamicthinking.info/post/6530586668/father-and-daughter

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अर्चना द्वारा अनुवादित