Archive | September 2017

लंगर- एक नि:स्वार्थ प्रेम की कहानी

आदर्श :प्रेम

उप आदर्श: कृपा,दयालुता

कई सौ सालों से पहले, गुरु गोबिंद राय सिख धर्म के दस्वें मदगुरु थे. भगवान के प्रति उनका प्यार गहरा और स्थिर था. जो भी उनके आसपास थे, वे हमेशा सुख और आनंद का अनुभव करते थे. सिख लोग हमेशा गुरु के सीख के लिए उत्सुक थे.

एक बार वे अपने प्यारे जनता से बोले ,”सभी के घरों में लंगर होना जरूरी है. आपके घर यात्रियों और अतिथियों के खानपान और खातिरदारी के लिए हमेशा तैयार रहने चाहिए. जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाइए. कोई भी आदमी आप के घर से भूखे या खाए बिना नहीं जायें “

सभी लोग गुरु के बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे. सिख समुदाय सेवा के लिए मशहूर हैं . फिर भी गुरुजी उनकी परीक्षा लेकर यह जानना चाहते थे कि वे कितने तैयार हैं; हमेशा तैयार थे या कभी कभी…..

एक दिन सवेरे एक मजेदार घटना घटी.यह गुरूजी की अनोखी लीला थी. गुरु गोबिंद राय साधारण यात्री के वेष में अपने भक्तों के घर के लिए निकल पड़े.

साधारणत: गुरुजी स्वच्छ और बिना सिकुडे हुए कपडे पहनते हैं. लेकिन उस दिन सुबह वे मैले और सिकुडे कपडे पहनकर निकले ताकि कोई उन्हें पहचान न पाए.

वे अपने भक्तों के घर एक वे असुविधा जनक समय पर पहुंचे ! सूर्योदय के पहले का समय था. इसलिए कई भक्त तब ही जाग रहे थे. दिनभर के कामों जैसे नहाना,धोना और प्रार्थना करने में व्यस्थ थे. गुरूजी उनके दरवाजे पर दस्तक देकर कहते थे,”भाई,तकलीफ के लिए माफ़ करना. मैं एक यात्री हूँ. मुझे भूख लगी है. क्या आप मुझे कुछ रोटी खाने के लिए दे सकते हैं?

लोगों का जवाब था “माफ़ कीजिये आप अपने कार्यक्रम में जल्दी निकले हैं; हमारे पास इस वक्त आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. हमारे घर खाना देर से बनती है. आप थोड़ी समय बाद आते तो ,हम आपको कुछ परोस सकते हैं.”गुरु अपने प्रियजनों की परीक्षा ले रहे थे.एक मामूली बात को वे अविस्मरणीय तरीके से दिखाना चाहते थे. वे उनको यह दिखाना चाहते थे कि वे (लोग) अभी भी थोड़े स्वार्थी हैं,पूर्ण रूप से नि:स्वार्थ नहीं थे. खुद को सुधारने के लिए उन्हें अब भी समय की जरूरत थी.

किसी घर पर अगर गुरुजी दाल के लिए पूछते वहां उन्हें जवाब मिलता; “माफ़ करना भैय्या , दाल पकने में तो बहुत समय लगता है; हमारे यहाँ तो अब तक नाश्ता भी नहीं बना है. आप को परोसने में हमें खुशी है,… मगर कृपया थोड़ी देर बाद आइये.

एक घर के बाद दूसरा घर….गुरुजी चलते गए. उनके होंठों पर एक मुस्कान और आँखों में चमक थी.

कोई भी सिख ने अब तक उन्हें खाने में कुछ नहीं दिया.

अंत में गुरुजी नंदलाल नाम के आदमी के घर आये. नंदलाल एक कवि था और सच्चे गुरुओं को प्रेम भाव से आदर करता था. गुरु गोबिंद राय से २३ वर्ष उम्र में बड़े होने के बावजूद ,वह उनका भक्त था. गुरुजी के दरबार में  उसका मन खिल जाता था. वह हमेशा प्रेम और भक्ति से गुरु की सेवा करता था.

नंदलाल ने खुशी से अपने अतिथि का स्वागत करते हुए कहा “सु स्वागत है, मेरे दोस्त “

गुरुजी के बात करने से पेहले ही नंदलाल ने कहा “अन्दर आकर बैठकर आराम कीजिये”. तब गुरु ने कहा “मैं एक मामूली यात्री हूँ. क्या आप के पास कुछ खाने के लिए है?” नंदलाल ने बेझिझक जवाब दिया, “आपको पूछने की जरूरत नहीं है. खाना अभी आ रहा है.”

खाना परोसने (सेवा) का अवसर पाकर वह बहुत खुश हुआ. वह अन्दरसे रोटी के कच्चे आटा, अध् पके दाल, सब्जियां और मक्खन ले आया.

अध् पके खाने को उसने अतिथि के सामने बड़े कृपा और गौरव के साथ रखा. नंदलाल ने कहा “आप जो चाहे, जितना चाहे खाइए. अगर आप थोड़ी प्रतीक्षा करें तो मैं आप के लिए गरम गरम रोटियाँ, स्वादिष्ट दाल और सब्जियोंको पका कर ले आऊँगा. आप की सेवा करना मेरा सौभाग्य है. यह मेरी गुरु की कृपा है. तब तक आप आराम कीजिये.

नंदलाल भाई की सेवा भाव देख, गुरुजी खुश हुए. इतने प्यार से बना खाना खाकर संतुष्ट हुए. नंदलाल अपने गुरुजी की सीख का सच्चा पालन करता था . जो कोई नंदलाल भाई के घर आता, वह बिना खाये कभी नहीं लौटता था.

अगले दिन सुबह गुरुजी ने सभी लोगों से कहा “इस गाँव में एक ही अतिथि-सत्कार मंदिर है, और वह है नंदलाल भाई का घर. नंदलाल प्रेम और भक्ति की भाषा बोलता है. हम सबको दुआएं देता है. उसकी वचन-बद्धता प्रशंसनीय है. उसका प्रेम सब के मन को जीत लेता है. ऐसे लंगर चलाने से ही सिख लोग सही माय्न्ने मे अमीर बनते हैं. इस प्रकार से नंदलाल का लंगर सफलपूर्वक है”

सभी भक्त यह सुनकर मन ही मन हसें और समझ गए कि गुरुजी ने उनकी परीक्षा ली है. स्नेहभाव से रहने पर भी ,वे सफलता न पा सके. भाई नंदलाल हमेशा सेवा केलिए तत्पर रहता था. वह खुशी से,बिना कुछ बहाने किये बेझिझक सब को लंगर परोसता था. जब हम नि:स्वार्थ बनते हैं, तब हमें कोई बहाने की जरूरत नहीं होती  है, हम हमेशा खुश रहेंगे. अतिथि-सत्कार करने के लिए भाई नंदलाल एक उदाहरण बना.

भाई नंदलाल ने कहा; “साधुओं को पानी देना संसार के बड़े बादशाह होने के समान है. उनके लिए खाना देना सभी स्वर्गों से भी आरामदायक है.गुरु के लिए लंगर बनाना सभी धन, दौलत से बढ़कर है. महान लोग जरूरतमंदों की सेवा करते हैं और उनके समक्ष रहकर दुसरे आदमी विनम्रता सीखतें हैं . गुरु की सीख इन सभी चीजों और हर जगह पर है.”

सीख :

आदमी को लगातार अच्छे कर्मों से अपने में परिवर्तन लाना चाहिए. प्रेम और सेवा की कोई सीमा नहीं होती है. अतिथि देवो भवः अतिथि भगवान का रूप होते हैं. जो भी अतिथि अपने घर आये ,उनका आदर प्रेम और सम्मान पूर्वक करना चाहिए. सभी से प्रेम करें सभी की सेवा करें.

http://saibalsanskaar.wordpress.com

 

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आम का पेड़

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: आदर, देख-रेख

एक बार आम का एक बहुत बड़ा पेड़ था. एक नन्हा बालक हर रोज़ उस पेड़ के आस-पास खेला करता था. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ता था, कभी पेड़ के पक्के आम तोड़कर खाता था और कभी पेड़ की छाया में सो जाता था. उसे आम का वह पेड़ बहुत पसंद था और पेड़ को भी उसके साथ खेलना अच्छा लगता था.

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समय बीतता रहा….. नन्हा बालक बड़ा हो गया और अब वह पेड़ के आस-पास नहीं खेलता था.

एक दिन उदास चेहरा लेकर वह लड़का पेड़ के पास वापस आया.

लड़के को देखकर पेड़ बोला, “आओ, मेरे साथ खेलो.”
“नहीं, अब मैं बच्चा नहीं रहा. मैंने पेड़ के आस-पास खेलना छोड़ दिया है,” लड़के ने जवाब दिया. “मुझे खिलौने चाहिए हैं और उन्हें खरीदने के लिए मुझे पैसों की आवश्यकता है.”aam3
“माफ़ करना, मेरे पास पैसे नहीं हैं…. पर तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बेचकर तुम्हें पैसे मिल जाएंगें.”
पेड़ का सुझाव सुनकर लड़का बहुत ही खुश हो गया. फिर पेड़ के सारे आम तोड़कर वह वहाँ से ख़ुशी-ख़ुशी चला गया. काफी समय तक वह लड़का वापस नहीं आया और पेड़ उदास था.

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एक दिन वह लड़का पेड़ के पास पुनः लौटा. इस बार वह बड़ा होकर आदमी बन चुका था. उसे देखकर पेड़ बहुत ही खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो, ” पेड़ ने कहा.
“मेरे पास खेलने का समय नहीं है. मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है. हमें एक घर की ज़रुरत है. क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?”
“माफ़ करना, मेरे पास घर नहीं है. पर अपना घर बनाने के लिए तुम मेरी शाखाएँ काट सकते हो.”

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अतः युवक ने पेड़ की सारी शाखाएँ काट लीं और ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया. उसे खुश देखकर पेड़ प्रसन्न था पर उसके बाद वह युवक वापस नहीं आया. एक बार फिर पेड़ अकेला व उदास था.

कड़ी गर्मी के एक दिन वह युवक लौटा और उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो.”
“मैं उदास हूँ और वृद्ध हो रहा हूँ. अपने विश्राम के लिए मैं नौकायान पर जाना चाहता हूँ. क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?”
“तुम मेरे तने से नाव बना लो. नाव लेकर तुम लम्बी जलयात्रा पर निकल जाओ और यात्रा का आनंद लो.”

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पेड़ की बात सुनकर उस व्यक्ति ने पेड़ का तना काटा और अपने लिए एक नाव तैयार कर ली. वह जलयात्रा पर चला गया और काफी समय तक वापस नहीं आया.

अंततः कई वर्षों के बाद वह व्यक्ति वापस लौटा.
“माफ़ करना, मेरे बच्चे, पर अब मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हें देने के लिए आम भी नहीं बचे हैं, पेड़ ने कहा.
व्यक्ति ने उत्तर दिया, ” अब तो मेरे पास दांत भी नहीं हैं.”
“तुम्हारे चढ़ने के लिए तना भी नहीं बचा है.”
व्यक्ति बोला, “उसके लिए मैं बूढ़ा हो चुका हूँ.”
“मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है…. केवल मेरी मुरझाई हुई जड़ें ही बाकी बची हैं, ” पेड़ ने निराश होकर कहा.
“अब मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. इतने वर्षों के बाद मैं थक चुका हूँ, ” व्यक्ति ने उत्तर दिया.
“अच्छा है! टेक लगाकर आराम करने के लिए पुराने वृक्ष की जड़ें सर्वोत्तम होती हैं.”

वह व्यक्ति मुस्कुराया और वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया.

सीख:
कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता को दर्शाता है. जब हम छोटे होते हैं तब हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम बड़े हो जाते हैं तब हम उन्हें छोड़कर चले जाते हैं और वापस तभी आते हैं जब हमें मदद चाहिए होती है. माता-पिता हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान करते हैं. हमें उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और जब उन्हें हमारी सबसे अधिक ज़रुरत होती है, हमें उनकी मदद अवश्य करनी चाहिए. उन्हें केवल हमारे प्रेम की आवश्यकता होती है और हमारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना