Archive | February 2015

सफाई करने वाली महिला

cleaning lady

           आदर्श : उचित आचरण
      उप आदर्श : आदर

कॉलेज के मेरे दूसरे महीने के दौरान, हमारे प्रोफ़ेसर ने हमें एक प्रश्नोत्तरी दी. मैं एक निष्ठापूर्ण छात्र था और मैंने आखिरी प्रश्न छोड़कर, सारे प्रश्नों का आसानी से उत्तर दे दिया. cleaning lady1आखिरी प्रश्न था :
“जो महिला विद्यालय साफ़ करती है उसका क्या नाम है?”
अवश्य ही यह किसी किस्म का मज़ाक था. मैंने सफाई करने वाली औरत को अनेकों बार देखा था. वह लम्बी, काले बालों वाली थी तथा उसकी उम्र ५० वर्ष के लगभग थी. पर मुझे उसका नाम कैसे मालूम होगा?

आखिरी प्रश्न रिक्त छोड़कर मैंने अपना पेपर दे दिया. ठीक कक्षा समाप्त होने के पहले एक छात्र ने प्रोफ़ेसर से पूछा यदि आखिरी प्रश्न की गिनती हमारे प्रश्नोत्तरी की ग्रेडिंग में होगी.

“बिलकुल,” प्रोफ़ेसर ने कहा, “अपने व्यावसायिक जीवन में तुम बहुत सारे लोगों से मिलोगे. सभी महत्वपूर्ण हैं. वे तुम्हारे ध्यान व आदर के पात्र हैं, भले ही तुम केवल मुस्कुराकर उन्हें ‘नमस्ते’ बोलो.”

मुझे वह सबक कभी नहीं भूला है. मैंने यह भी सीखा कि उस महिला का नाम डोरोथी था.

        सीख:

ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो हमारी ज़िन्दगी को सुखद व आसान बनाते हैं. हम उनका महत्व नहीं समझ पाते. क्या हम अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसे लोगों के बिना हमारा जीवन कितना मुश्किल होगा? आइए थोड़ा समय निकालकर इन व्यक्तियों को कम से कम एक मुस्कान या धन्यवाद या फिर शुभकामना दें.

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अनुवादक- अर्चना

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भगवान कहाँ हैं?

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आदर्श : सत्य

उप आदर्श : चेतना

एक बार एक जिज्ञासु भक्त ने सिद्ध संतwhere God से पूछा, “भगवन, ईश्वर का क्या रूप है? वे कहाँ रहते हैं और मैं उन्हें कहाँ खोज सकता हूँ? ”

संत बोले, “ईश्वर हर जगह हैं और सर्वव्यापी हैं. ईश्वर आनंद, सर्वज्ञ तथा अनश्वर हैं और तुम स्वयं भी ईश्वर हो.” भक्त ने पूछा, “अगर ऐसा है तो मैं उन्हें महसूस तथा अनुभव क्यों नहीं कर सकता?” संत ने उत्तर दिया, “चूँकि ईश्वर सर्वव्यापी हैं, वह तुम्हारे स्वयं के मन में हैं पर तुम्हारा मन उनमें नहीं है. तुम्हारा दिल संसार में तल्लीन हैं.”

संत ने कई भिन्न तरीकों से उसे भगवान के अस्तित्व के बारे में समझाने की चेष्टा की पर वह भक्त ईश्वर को समझ नहीं पा रहा था. तब संत ने उससे कहा, “हरिद्वार जाओ, वहाँ पर गंगा हैwhere God2 जिसमें एक अनोखी रंग की मछली है जो मनुष्यों की आवाज़ में बोल सकती है. वह मछली तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उचित उत्तर देगी.”

जिज्ञासु भक्त ने संत को प्रणाम किया, उनके पाँव छूए और हरिद्वार के लिए निकल पड़ा. वहाँ नदी के किनारे बैठकर वह उस अनोखी मछली के आने का इंतज़ार करने लगा.  जब भी वह कोई मछली देखता था तो अपना प्रश्न दोहराता था और पूछता था कि भगवान कहाँ रहते हैं और वह उन्हें कैसे देख सकता है? कुछ समय बाद अनोखी मछली आई where God4और उसने भक्त से पूछा, “तुम कहाँ से आए हो?” भक्त ने उत्तर दिया, “मुझे एक साधू ने तुमसे मिलने को कहा था और मैं जानना चाहता हूँ कि भगवान कहाँ रहते हैं तथा मैं उन्हें कैसे देख सकता हूँ?” मछली ने भक्त से कहा, “मैं पिछले सात दिनों से प्यासी हूँ. तो तुम मुझे बताओ कि मुझे पानी कहाँ से मिल सकता है.”

मछली की बात सुनकर भक्त हँसा और बोला, “अरे मूर्ख! पानी तुम्हारे ऊपर है, नीचे है, वह तुम्हारे दायें है, तुम्हारे बायें है और तुम्हारे हर तरफ पानी है.”
भक्त के इस प्रकार बोलने पर मछली गंभीर हो गई और बोली, “अरे, मासूम भक्त! तुम भी मेरी तरह मूर्ख हो! भगवान, जिन्हें तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे ऊपर हैं, नीचे हैं, तुम्हारे दायें हैं और बायें हैं. संक्षेप में, वह तुम्हारे हर तरफ हैं.”where God1

भक्त कुछ संतुष्ट हुआ और बोला, “अगर ऐसा है तो मैं आनंदमय प्रभु को देखने में असमर्थ क्यों हूँ और मैं इतना दुखी क्यों हूँ?” मछली बोली, “मेरा भी यही प्रश्न है. अगर मेरे हर तरफ पानी है, तो फिर मेरी प्यास क्यों नहीं बुझती है.”

भक्त मछली के शरीर की बनावट को जानता था. उसे ज्ञात था कि जब तक मछली अपना मुँह ऊपर रखकर सीधे तैरती है, उसके मुँह में पानी नहीं घुस सकता है. अपनी प्यास बुझाने के लिए मछली को उलटा होकर तैरना पड़ता है. अगर मछली के शरीर की बनावट इस प्रकार नहीं बनी होती तो पानी बिना रोक-टोक के उसके शरीर में घुस सकता था और मछली की मृत्यु हो जाती. अतः भक्त ने मछली को सुझाव दिया कि अपनी प्यास बुझाने के लिए वह उल्टी पलटे.

तब मछली ने भक्त से कहा, “जैसे हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए पलटना पड़ता है, भगवान को देखने के लिए तुम्हें भी मुड़ना चाहिए. प्रभु को देखने के लिए स्वयं को इच्छाओं से दूर रखो. अन्य शब्दों में, जब तुम अपने मन के विचारों के प्रवाह को संसार से मोड़कर आनंदमय सर्वज्ञ ईश्वर की ओर लगाओगे, तब तुम्हारे सारे दुखों का अंत हो जाएगा. भक्त ने तदानुसार किया और अपने वास्तविक स्वरुप को समझ पाया.

सीख:

जब हम अपना मन भगवान की ओर मोड़ते हैं तब हम उन्हें पा सकते हैं. इसके साथ ही, भगवान की हर संरचना में हमें उन्हें देखना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

महाशिवरात्रि

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महाशिवरात्रि का पर्व महादेव शिव, जो हिन्दुओं के त्रिदेवों में से एक हैं, के मान-सम्मान में भक्ति व धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है. महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत के सबसे प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक है और हिन्दू तालिका के अनुसार इसे माघ मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है. महाशिवरात्रि का यथाशब्द अर्थ है ‘शिव की महान रात’ और इसे मुख्यतः भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है.

महाशिवरात्रि से अनेक मनोरंजक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं. इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कहानी के अनुसार, शिवरात्रि की रात शिव व पार्वती का विवाह हुआ था. कुछ विद्वानों का मानना है कि शिवरात्रि की मांगलिक रात को भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया था- यह नृत्य सृष्टि, संरक्षण तथा विनाश का मुख्य मौलिक नृत्य है. लिंग पुराण में चर्चित एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार शिवरात्रि के शुभ अवसर पर भगवान शिव, लिंग के रूप में व्यक्त हुए थे.shivarati6 एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष का सेवन करके भगवान शिव ने संसार को विनाश से बचाया था. विष को अपने गले में धारण करने के परिणामस्वरूप शिव का कंठ नीला पड़ गया था और इसके बाद से महादेव को “नीलकंठ” भी कहा जाता है. अतः शिवरात्रि का पर्व शिव भक्तों द्वारा अत्यंत शुभ माना जाता है और वे इसे महाशिवरात्रि के रूप में मनाते हैं.

शिवरात्रि के पावन अवसर पर लोग निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए महादेव के दिव्य नाम का भजन करते हैंshivaratri5 तथा शिवलिंग की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं. शिवलिंग पर बेल पत्ते, पानी तथा दूध अर्पण किया जाता है क्योंकि ये महादेव के मनभावन माने जाते हैं. shivaratri3shivaratri4शिव भक्त भगवान शिव के परमपावन पंचाक्षर मन्त्र “ओम नमः शिवाय” का निरंतर जाप करते हैं. इसके अतिरिक्त, शिवरात्रि की रात ‘महा मृत्युंजय’ के सशक्त तथा प्राचीन संस्कृत मन्त्र का उच्चारण करने की विशेष महत्ता है. शिवरात्रि के अवसर पर प्रत्येक शिव मंदिर को दीपक तथा रंग-बिरंगी सजावटों से अलंकृत किया जाता है. मंदिरों में लोगों का जमघट लगा रहता है और भक्तजन रातभर पूजा करते हैं और प्रभु का ध्यान करते हैं.

महाशिवरात्रि का पर्व सबसे अधिक लोकप्रिय उज्जैन में है, जो भगवान शंकर का निवास स्थान माना जाता है. shivaratri1
भारत के इलावा, नेपाल में भी विश्वभर से हज़ारों हिन्दू प्रख्यात पशुपतिनाथ मंदिर में एकत्रित होते हैं और अत्यधिक श्रद्धा व उल्लास से भगवान शिव की आराधना करते हैं.shivaratri नेपाल के शिव शक्ति पीठम में भी इसी प्रकार से श्रद्धालु बहुत निष्ठा से महादेव की पूजा-अर्चना करते हैं.

शिवरात्रि का आध्यात्मिक अभिप्राय :

मनुष्य की दस इन्द्रियाँ उसे गलत पथ पर आकर्षित करने की जिम्मेदार होती हैं. शिवरात्रि शब्द में चार अक्षर हैं- शि, व, रा, त्रि. इन चार अक्षरों के अर्थ तथा अंकविद्या में घनिष्ठ सम्बन्ध है. ‘शि’ अंक ५ का प्रतिक है, ‘व’ अंक ४ की ओर संकेत करता है तथा ‘रा’ अंक २ को दर्शाता है. ५+४+२ को जोड़ने ने ११ प्राप्त होता है. ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मस्तिष्क का जोड़ ११ होता है और ये ११ रूद्र हैं- एकादश रूद्र. यह एकादश रूद्र मनुष्य को सांसारिक वस्तुओं में तल्लीन करते हैं, तुच्छ इच्छाओं को बढ़ावा देते हैं और मनुष्य को सांसारिक जीवन में डुबो देते हैं. इन सभी रुद्रों के पार एक और अस्तित्व है और वह परमात्मा है. केवल जब हम इस बारहवें को पकड़ पाते हैं, हम अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण पर पाने में समर्थ हो पाते हैं.

शिवरात्रि का अर्थ है परमपवित्र रात. रात्रि मूल रूप से अन्धकार को दर्शाती है. “चन्द्रमा मनसो जातः चक्षो सूर्योSजायता”-चन्द्रमा हमारे मस्तिष्क का अधिष्ठ देवता होता है. अतः हमारे मस्तिष्क तथा चन्द्रमा में बहुत गहन सम्बन्ध होता है . चद्रमा के १६ चरण हमारे मस्तिष्क के १६ पहलुओं को दर्शाते हैँ. शिवरात्रि अमावस्या के एक दिन पहले होती है जब चाँद की केवल एक लकीर प्रत्यक्ष होती है. यह मस्तिष्क के घटते हुए प्रभाव का प्रतिक है जब १५ पहलु आत्मा में विलीन हो चुके होते हैँ तथा केवल एक अवशेष रहता है. अतः इस दिन मस्तिष्क पर नियंत्रण करके उसे ईश्वर की ओर निदेशित करना अधिक सरल होता है.

ओम नमः शिवायshivaling

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-अर्चना

सूफी संत – क्या मैं भगवान को देख सकता हूँ?

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         आदर्श : उचित आचरण
  उप आचरण : दोषों पर नियंत्रण

एक पहाड़ के ऊपर एक सूफी संत रहते थे. महीने में एक बार वे पहाड़ की तराई में स्थित एक गाँव में आया करते थे. S mएक बार एक आदमी उनके पास आया और उसने पूछा, “मुझे भगवान के दर्शन क्यों नहीं होते? क्या आप भगवान को देखने में मेरी मदद कर सकते हैं?”s m 1

“अवश्य”, सूफी संत का जवाब था, परन्तु उसके लिए तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी.

“आपको क्या मदद चाहिए, महाशय?”

“तुम्हें एक समान माप व वज़न के पाँच पत्थर चुनने होंगें. s m 3उन्हें पहाड़ की शिखर पर लेकर जाओ ताकि मैं अपनी कुटिया के बाहर एक चबूतरा बनाने में उनका प्रयोग कर सकूँ.”
जिज्ञासु सहमत हो गया. दोनों ने पहाड़ के शिखर की यात्रा आरम्भ की. जल्द ही वह व्यक्ति थक गया और आगे चलना उसके लिए कठिन कार्य हो गया.

“एक पत्थर फेंक दो,” सूफी संत ने कहा, “फिर तुम्हारे लिए चलना आसान हो जाएगा.”

उस व्यक्ति ने एक पत्थर फेंक दिया और अब उसके लिए चलना आसान हो गया. कुछ समय बाद, एक बार फिर वह आदमी थक गया. पहाड़ की छोटी की ओर चलना बहुत कठिन हो रहा था. संत ने एक बार पुनः उसे एक पत्थर फेंकने को कहा. इस तरह पहाड़ की छोटी तक पहुँचते-पहुँचते उसने सारे पत्थर फेंक दिए थे. सूफी संत ने तब उस व्यक्ति से कहा, “अब मैंने तुम्हें भगवान तक का रास्ता दिखा दिया है.”

वह व्यक्ति हैरान था. उसने कहा, “मैं भगवान को देख नहीं सकता हूँ.”

मास्टर ने समझाया, “पाँच पत्थर भगवान को देखने में हमारी मुख्य कमज़ोरियों का प्रतीक हैं. वे लोभ, क्रोध, लालच, वासना तथा अहंकार हैं. इनका त्याग करना सीखो. मैं तुम्हें पहले ही सावधान करना चाहूँगा कि यह आसान नहीं होगा. कठिन प्रयास करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा. जब तुम इन सभी पत्थरों, जो कि तुम्हारे और ईश्वर के बीच पर्दा हैं, को फेंकने में सफल हो जाओगे तब तुम्हें अपने अतिप्रिय प्रभु के दर्शन सहजता से हो जायेंगें.”

अतः उस व्यक्ति ने सूफी मास्टर की देखरेख में सूफी पथ पर अपनी यात्रा आरम्भ की.

                    सीख :

जब हम अपने भीतरी शत्रुओं का त्याग करते हैं(जैसे कि अहंकार, क्रोध, लालच, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि) तब हम भगवान को देख सकते हैं और उन्हें आसानी से प्राप्त कर सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

क्रियाशील प्रेम

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आदर्श : उचित आचरण

   उप आदर्श : सहानुभूति

एक रात एक व्यक्ति हमारे घर आया और मुझसे बोला, “एक आठ बच्चों वाला परिवार है. उन्होंने बहुत दिनों से कुछ नहीं खाया है.” premमैंने थोड़ा खाना लिया और चली गई. आखिर में, जब मैं उस परिवार के पास पहुँची तो मैंने उन नन्हें बच्चों के भूख से बिगड़े चेहरे देखे. उनके चेहरों पर दुःख या निराशा नहीं थी, केवल भूख की गहरी पीड़ा थी. मैंने उनकी माँ को चावल दिए. उसने चावल के दो भाग किए और एक भाग लेकर बाहर चली गई. जब वह वापस आई तो मैंने उससे पूछा, “तुम कहाँ गई थी?” उसने मुझे यह साधारण सा उत्तर दिया,”अपने पड़ोसियों के पास- वे भी भूखे हैं.”

मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि उसने चावल दिए- क्योंकि गरीब लोग उदार होते हैं. पर मैं हैरान थी कि उसे मालूम था कि उसके पड़ोसी भी भूखे हैं. आम तौर पर जब हम कष्ट में होते हैं तो हम स्वयं पर इतने केंद्रित होते हैं कि हमारे पास दूसरों के लिए समय ही नहीं होता है.

मदर टेरेसाprem1

सीख:

सच्चा प्रेम वह है जब हम स्वयं कठिन समय से गुज़रने के बावजूद दूसरों की मुश्किलों को पहचान कर उनकी मदद करते हैं. खुद के पास सब कुछ होते हुए दूसरों की मदद करना भलाई का काम है. परन्तु सबसे उत्कृष्ट कार्य है , अपने पास अल्प होने पर भी दूसरों को विपत्ति में देखकर, उनसे अपना सब कुछ बाँटना.

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अनुवादक – अर्चना