Archive | May 2014

धुलाई की ज़रूरत है

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: आशावाद

एक नन्ही लड़की अपनी माँ के साथ वॉल मार्ट में खरीदारी कर रही थी. वह लगभग छह वर्ष की होगी- ख़ूबसूरत लाल बाल और चित्तीदार मासूम चेहरा.

बाहर भीषण वर्षा हो रही थी. बारिश इतनी तेज़ थी कि पानी बरसात की नालियों में भर कर ऊपर आ चूका था मानो धरा को छूने की जल्दी में हो. हम सब, तिरपाल के नीचे, वॉल मार्ट के दरवाज़े के ठीक अंदर, खड़े थे. हम सब इंतज़ार कर रहे थे- कुछ धैर्यपूर्वक और कुछ झुँझलाकर- क्योंकि प्रकृति ने उनका दिन अस्तव्यस्त कर दिया था.

मैं बारिश से हमेशा मंत्रमुग्ध हो जाती हूँ. गगन के संसार की धूल और मिट्टी धोने के दृश्य व ध्वनि में, मैं गुम हो जाती हूँ. बचपन के अल्हड़पन में छपछपाते हुए भागने की यादें, मेरे चिंता युक्त दिन में सुखद अवकाश बनकर, उमड़ती हुई आईं.

उसके नन्हे मधुर स्वर ने हम सबका सम्मोहन खंडित किया जब उसने कहा, “माँ, चलो बारिश में भागते हैं”.
“क्या?” माँ ने पूछा.
“चलो बारिश में भागते हैं!” उसने दोहराया.
माँ ने उत्तर दिया, “नहीं बेटा. हम बरसात के कम का इंतज़ार करते हैं.”

इस युवा बच्चे ने १ मिनट इंतज़ार किया और पुनः कहा, “माँ, चलो बरसात में भागते हैं.”
“अगर हम भागे तो पूरी तरह भीग जायेंगे.” माँ ने कहा.
“नहीं, हम नहीं भीगेंगे, माँ. आपने आज सुबह तो ऐसा नहीं कहा था,” युवा लड़की ने अपनी माँ की बाह को झटके से खीचते हुए कहा.
“आज सुबह? मैंने कब कहा था कि हम बरसात में भाग सकते हैं और गीले नहीं होंगे?”
“आपको याद नहीं है? जब आप पिताजी से उनके कैंसर के बारे में बात कर रहे थे, आपने कहा था, “अगर भगवान हमें इससे निकाल सकते हैं, तो वह हमें किसी परिस्थिति से भी निकाल सकते हैं.”

सारी भीड़ मानो खामोशी से थम सी गई. बारिश के सिवाय और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. हम सब चुपचाप खड़े थे. माँ ने क्षणभर रूक कर सोचा कि वह क्या बोलें.

कुछ लोग इस पर हँस पड़ेंगे और कुछ अन्य उन्हें नादान होने के लिए गुस्सा करेंगे. कुछ इस व्यक्तव्य को अनदेखा भी कर देंगें. पर एक छोटे बच्चे की ज़िन्दगी में यह अभिपुष्टि का पल था. ऐसा समय जब मासूम भरोसे का विकास कर सकते हैं ताकि विश्वास का फूल खिल सके.
“बेटा, तुम बिलकुल सही हो. चलो, बारिश में भागते हैं. अगर भगवान हमे गीला होने देते हैं तो संभवतः हमें धुलाई की आवश्यकता है,” माँ ने कहा.

और फिर वे दोनों भाग लिए. जब वे कीचड़ से होते हुए गाड़ियों से आगे भागे, हम सब वहाँ खड़े मुस्कुराते और हँसते हुए उन्हें देख रहे थे. वे पूरी तरह से भीग गए.

कुछ लोगों ने उनका अनुकरण किया तथा बच्चों की तरह चिल्लाते और हँसते हुए अपने वाहनों तक दौड़े. और मैंने भी ऐसा ही किया. मैं भागी. मैं गीली हुई. मुझे भी धुलाई की ज़रूरत थी.

   सीख:

अपने कथन पर विश्वास रखो. अपने कथन को सार्थक रख उसे हर परिस्तिथि में प्रयोग करो. जब हम किसी बालक से विश्वास रखने को कहते हैं, पहले हमें खुद भरोसा होना चाहिए. तभी हम उस बालक (या जिसे हम सलाह दें) को यकीन दिला सकते हैं कि विश्वास में शक्ति है.
प्रत्येक प्रतिकूल परिस्तिथि का सकारात्मक पक्ष लो. यह हमें कुछ सबक सिखाने आई है.

 

Courtesy:http://moralsandethics.wordpress.com/2008/09/01/need-washing-2/

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अर्चना द्वारा अनुवादित

 

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पशुओं के प्रति प्रेम

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 आदर्श: प्रेम

१४ नवंबर, २०१२ को हम जब अपनी साईं प्रार्थना तथा नैतिक आदर्शों की कक्षा से घर लौट रहे थे, हमें रास्ते में ‘म्याऊ’ की आवाज़ सुनाई दी. हम छान-बीन करने गए कि आवाज़ कहाँ से आ रही थी . तब हमने देखा कि एक बिल्ली पिंजरे में फसी हुई थी. हमने बिल्ली को संघर्ष करते हुए देखा. अतः हम बिल्ली को विपदा से बाहर निकालने में उसकी मदद करना चाहते थे. हमें शीघ्र ही अहसास हो गया कि किसी ने बिल्ली के लिए पिजरा रखा था. ये जाल हमारे बल्डिंग के चौकीदारों ने छोड़े थे चूँकि वे बिल्लियों को कंटक समझते थे. परन्तु हम बिल्लियों से प्यार करते थे और हमने उसे आज़ाद करने का निश्चय किया. हमें पिंजरा खोलना नहीं आता था. जल्द ही वहाँ से एक उदार सहायक गुजरी. हमने उन्हें पिंजरा खोलने में हमारी मदद करके, बिल्ली को आज़ाद करने का आग्रह किया. हमने उनके साथ मिलकर बिल्ली को मुक्त कर दिया. हम बहुत खुश थे और जब हमने बिल्ली को ख़ुशी से कूदते हुए देखा तो हमें बहुत ही अच्छा लगा. बिल्ली ने किसी को भी परेशान नहीं किया. हम प्रसन्न थे कि उस दिन हमने एक अच्छा कार्य किया था.
तब से हम ऐसे और पिंजरे, जो बिल्लियों को विपदा में डाल देेंगे, के प्रति चौकस रहते हैं.

 सीख:

१) हमने पशुओं के प्रति उदार व प्रेमपूर्ण होना सीखा.

२) हमने अपने पास-पड़ोस के प्रति उत्तरदायी होना सीखा.

 

योगदान:  कुणाल/ नंदिनी, आर्यन, किमाया

(प्रेमार्पण कक्षा के बच्चे ७-११ वर्षीय)

अनुवादन:  अर्चना

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सेवा करने वाले हाथ, प्रार्थना करने वाले होठों से अधिक पवित्र होते हैं

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा

बहुत लोग अपने अच्छिन्न कष्टों का बयान करते हुए ईश्वर से शिकायत करते हैं कि उन्हींने उनके प्रति कोई दया नहीं दिखाई है. ऐसे व्यक्तियों के लिए रामायण की एक घटना से सबक सीखना लाभदायक होगा.

विभीषण की हनुमान से मित्रता होने के बाद, एक बार उन्होंने हनुमान से पूछा, “हनुमान! हालाँकि तुम वानर हो, तुम प्रभु की कृपा के प्राप्तकर्ता हो.hanuman

यद्यपि मैं निरंतर भगवान राम के ध्यान में लगा हुआ हूँ, फिर भी ऐसा क्यों है कि मैंने उनकी अनुकम्पा हासिल नहीं की है?” हनुमान ने उत्तर दिया, “विभीषण! यह सत्य है कि तुम निरंतर राम नाम का स्मरण करते हो. परन्तु तुम भगवान राम के कार्य में किस हद तक जुटे हो? भगवान राम के नाम मात्र का ध्यान करने से तुम उनकी कृपा प्राप्त नहीं कर सकते. जब तुम्हारे भ्राता, रावण माता सीता को उठा ले गए थे, तब तुमने सीता देवी की क्या मदद की थी? क्या तुमने भगवान राम की परेशानी को आंशिक रूप से भी कम करने के लिए कुछ किया था?”  hanuman3

सीख:

ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए मात्र प्रार्थना करना पर्याप्त नहीं है. हमें उनकी शिक्षा को अभ्यास में लाना है. इस कार्यप्रणाली का एक साधन ज़रूरतमंद लोगों से प्रेम व उनकी सेवा करना है. करनी कथनी से ताकतवर होती है.

अर्चना द्वारा अनुवादित

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बुद्ध पूर्णिमा- तीन कारणों से पवित्र

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बुद्ध पूर्णिमा उत्सव या बुद्ध जयंती समारोह बौद्धधर्मी तालिका में सबसे पवित्र दिन है. यह बौद्धधर्मियों का सबसे महत्त्वपूर्ण त्यौहार है और इसे विभिन्न देशों जैसे नेपाल, श्रीलंका, तिब्बत, बांग्लादेश, भूटान, भारत, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार तथा इंडोनेशिया में बहुत उत्साह से मनाया जाता है. हालाँकि बौद्धधर्मी हर पूर्णिमा को पवित्र मानते हैं परन्तु वैसाख के महीने की पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है. इस दिन बुद्ध का जन्म, उनका ज्ञानोदय व उनको निर्वाण की प्राप्ति हुई थी. यह अद्भुत तिगुना संयोग बुद्ध पूर्णिमा को विशिष्ट महत्त्व देता है.

कहावत

बौद्धधर्मी कहावत के अनुसार, बुद्ध की पत्नी यशोधरा, बुद्ध का प्रथम अनुयायी आनंद, उनका सारथी चन्ना तथा घोड़ा कंटका जिसपर उन्होंने अपने साम्राज्य का त्याग किया था, सभी का जन्म बुद्ध जयंती के पवित्र दिन हुआ था.

उत्सव

बुद्ध के जन्मदिन पर बुद्ध पूर्णिमा के उत्सव में शामिल होने के लिए दुनिया भर से बौद्ध तीर्थयात्री बोधगया, नेपाल, आते हैं. दिनभर प्रार्थना समारोह, गौतम बुद्ध की जीवनी पर उपदेश, धार्मिक प्रवचन, बौद्ध धर्मग्रंथों का निरंतर अनुवाचन, सामूहिक ध्यान, शोभायात्रा और बुद्ध की मूर्ति की अर्चना का आयोजन किया जाता है. बुद्ध पूर्णिमा के दिन, बौद्धधर्मी खीर खाते हैं और इसे गरीबों के साथ बाँटते हैं. वे सार्वजनिक जगहों पर स्टाल लगाकर जनता को स्वच्छ पीने का पानी देते हैं.

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रीति-रिवाज़ व संस्कार

– पक्षियों को पिंजरे से मुक्त करते हैं. बीमारों में फल व कपड़ों का वितरण और मांस खाने से परहेज करते हैं.

– बोधी वृक्ष की पूजा की जाती है. इसकी शाखाओं को माला तथा रंगीन झंडों से सजाया जाता है. वृक्ष के इर्द-गिर्द दीये जलाये जातें हैं और दूध व सुगन्धित पानी इसकी जड़ों पर छिड़का जाता है.

– भक्तजन अगरबत्ती, फूल, मोमबत्ती तथा फलों का चढ़ावा चढ़ाते हैं और मूर्ति के समक्ष अनेकों बार दंडवत करते हैं.

– इस पवित्र दिन बौद्धधर्मी स्नान के बाद सिर्फ श्वेत वस्त्र ही पहनते हैं . पूजा के लिए सभी लोग विहारों में एकत्रित होकर भिक्षुओं को दान देते हैं.

– बौद्धधर्मी पांच सिद्धांतों, पंचशील, में अपने विश्वास की पुनः पुष्टि करते हैं-
जान न लेना
चोरी न करना
झूठ न बोलना
शराब का सेवन न करना
परस्त्रीगमन न करना .

‘ओम मणि पद्मे हूं’ – बौद्धधर्मियों का सबसे लोकप्रिय मन्त्र है. यह छह अक्षरों का मन्त्र छह अवगुणों- अहम, ईर्ष्या, इच्छा, अज्ञानता, लालच व घृणा- से शुद्धिकरण का प्रतीक है. ऐसा माना जाता है कि इस मन्त्र के सच्चे व नियमित उच्चारण से हम स्वयं में बदलाव ला सकते हैं और बुद्ध के समान निर्मल व महान बन सकते हैं.     bp2

 

http://www.nepal.saarctourism.org/buddha-purnima.html

 

 

प्रभु क्या आप हार नहीं मानने का एक कारण दे सकतें हैं

 

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : विश्वास, दृढ़ता

 

एक दिन मैंने सब कुछ छोड़ने का निश्चय किया- मैंने अपनी नौकरी, अपने रिश्ते, अपनी आध्यात्मिकता छोड़ दी- मैं अपनी ज़िन्दगी भी त्यागना चाहता था.

मैं भगवान से एक आखिरी वार्तालाप करने जंगल गया.

“भगवान”, मैंने कहा, “क्या आप हार नहीं मानने का एक कारण दे सकते हैं?” भगवान के उत्तर ने मुझे चकित कर दिया.
उन्होंने कहा, “अपने आसपास देखो. क्या तुम फ़र्न और बॉस देख रहे हो?”
मैंने उत्तर दिया, “जी” .
“जब मैंने फ़र्न और बॉस के बीज बोए थे तब मैंने उनकी बहुत अच्छी देखभाल की थी. मैंने उन्हें रोशनी दी. मैंने उन्हें पानी दिया.fern rain फ़र्न का पौधा झटपट धरती से निकल आया. उसकी उत्कृष्ट हरियाली ने धरती को ढक दिया. लेकिन अभी भी बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा. परन्तु मैंने बॉस को छोड़ा नहीं.

दूसरे वर्ष में फ़र्न का पौधा बढ़कर और अधिक आकर्षक और समृद्ध हो गया.fern और एक बार फिर, बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा. परन्तु मैंने बॉस को त्यागा नहीं.

तीसरे और चौथे सालों में भी बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा . लेकिन मैंने बॉस को छोड़ा नहीं.

फिर पाँचवे वर्ष में, ज़मीन से एक नन्हा सा अंकुर उभरा. फ़र्न की तुलना में वह काफ़ी छोटा व मामूली था.
लेकिन केवल छह महीने बाद, बॉस बढ़कर १०० फुट से भी अधिक ऊँचा हो गया. उसने पाँच वर्ष अपनी जड़ें बढ़ाने में बिताए थे. उन जड़ों ने उसे मज़बूत बनाया और वह सब कुछ दिया जो उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक था. मैं अपनी किसी भी सृष्टि को ऐसी चुनौती नहीं दूँगा जो वह निभा न पाए.

“मेरे बच्चे, क्या तुम्हें पता है कि तुम जो इस समय तक संघर्ष कर रहे थे,तुम वास्तव में अपनी जड़े बढ़ा रहे थे. मैं बॉस को नहीं छोड़ूंगा. तुम्हें भी मैं कभी नहीं छोड़ूंगा.”

उन्होंने जहा, “दूसरों से अपनी तुलना मत करो. बॉस का फ़र्न से भिन्न प्रयोजन था. फिर भी वह दोनों वन को ख़ूबसूरत बनातें हैं.”

ईश्वर ने मुझसे कहा, “तुम्हारा समय आएगा. तुम ऊँचा उठोगे.”

“मुझे कितना ऊँचा उठना चाहिए?” मैंने पूछा.

“बॉस कितना ऊँचा बढ़ता है?” उन्होंने मुझसे पलटकर पूछा.

“”वह जितना ऊँचा बढ़ सकता है.” मैंने जवाब दिया .

उन्होंने कहा, “हाँ. तुम जितना ऊपर उठ सकते हो, उतना उठकर मुझे गौरवान्वित करो.”

मैं जंगल से चला आया इस विश्वास के साथ कि भगवान मुझे कभी नहीं छोड़ेगें. और वे तुम्हारा त्याग भी कभी नहीं करेंगें.

अपने जीवन में एक दिन भी पश्चाताप न करो.

अच्छे दिन तुम्हें ख़ुशी देतें हैं; बुरे दिन तुम्हें अनुभव देतें हैं. दोनों जीवन के लिए अनिवार्य हैं.

सीख:

हमें हमारा कर्त्तव्य करते रहना चाहिए और शेष उनपर छोड़ देना चाहिए. अपने कार्य में हमें समर्पित व अटल रहना चाहिए. सदा सर्वोत्तम देना चाहिए और कभी हार नहीं माननी चाहिए . दृढ़ विश्वास रखना चाहिए; सफलता निश्चित मिलेगी. हमें सर्वदा ध्यान रखना चाहिए कि हम सबका जीवन में विभिन्न उद्देश्य है और हमें उसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए. हमें दूसरों से तुलना करना छोड़कर, अपना मानदंड स्वयं बनकर, अपने लक्ष्य पर केंद्रित होकर खुद में निरंतर सुधार करना चाहिए.

 

अर्चना द्वारा अनुवादित

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अक्षय तृतीया

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अक्षय तृतीया एक बहुत ही लोकप्रिय त्यौहार है जो हिन्दू और जैन हर साल अति प्रेम और श्रद्धा से मनाते हैं. हिन्दू संप्रदाय के लोगों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण त्यौहार है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम का जन्म हुआ था. अतः इसे ‘परशुराम तृतीया’ भी कहते हैं.

इसे ‘आखा तीज’ भी कहते हैं. यह पर्व वैसाख के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाते हैं. कहा जाता हैं कि इस दिन ज्ञान और बुद्धि के महा प्रभु गणेश ने वेद व्यास की आज्ञा से महाकाव्य “महाभारत” लिखना शुरू किया था.

अक्षय तृतीया को वर्ष का सर्वाधिक सुनहरा दिन माना जाता है क्योंकि ‘अक्षय’ का अर्थ है शाश्वत अर्थात जो कभी काम न हो. ऐसा माना जाता है कि जब पांडव वनवास में थे तब भगवान कृष्ण ने उन्हें ‘अक्षय तृतीया’ नामक कलश दिया था. वह कलश कभी खाली नहीं रहता था और आवश्यकता पड़ने पर असीमित मात्रा में खाना पेश करता था.

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन त्रेता युग का आरम्भ हुआ था तथा भारत की सबसे पवित्र नदी, गंगा, स्वर्ग से धरती पर उतरीं थीं.

अक्षय तृतीया के दिन दान-पुण्य करना बहुत लाभदायक माना जाता है. नया व्यापार या कार्य शुरू करने के लिए यह बहुत ही भाग्यशाली दिन माना जाता है. बहुत लोग आज के दिन सोना व जायदाद खरीदते हैं.

 

स्त्रोत: Calendarlabs.com, wikipedia.com

ईसाह मसीह की तरह बनने की कोशिश करना- एक बड़े भाई का उपहार

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : कर्त्तव्य, सहानुभूति

क्रिसमस का मौसम था. नौ वर्षीय जरोन एवं उसका छह वर्षीय भाई, पार्कर, उत्साहित थे. उन्होंने अपने शहर के किराने की दूकान द्वारा प्रायोजक पढ़ने की एक प्रतियोगिता में भाग लिया था. सबसे अधिक किताबें पढ़ने वाले दो विद्यार्थी एक-एक नई साइकिल जीतने वाले थे. सभी विद्यार्थियों को प्रत्येक पुस्तक पढ़ने के बाद अपने माता-पिता तथा अध्यापकों से हस्ताक्षर करवाने थे. इनाम में दो साइकिलें थीं- एक पहली से तीसरी कक्षा स्तर के बच्चों के लिए और एक चौथी से छठी कक्षा स्तर के बच्चों के लिए.

पार्कर विशेष रूप से उत्साहित था क्योंकि उसके लिए यह साइकिल जीतने का एक माध्यम था. उसे साइकिल की सचमुच इच्छा थी. उसके बड़े भाई ने बाज़ार बिक्री में काम करके एक दस-गति वाली साइकिल हासिल की थी. और पार्कर अपने बड़े भाई को उसकी नई बैंगनी साइकिल हर जगह चलाते देख थक चुका था. पार्कर ने सोचा कि अगर किताबें पढ़कर वह अपनी साइकिल स्वयं हासिल कर सकता है तो यह बहुत ही अच्छा होगा. अतः उसने जल्दी-जल्दी किताबें पढ़नी शुरू कर दीं. लेकिन वह चाहे कितनी भी किताबें पढ़ता, उसके स्तर का कोई और छात्र उससे अधिक किताबें पढ़ लेता था.

इसी दौरान, जरोन प्रतियोगिता को लेकर अधिक उत्सुक नहीं था. जब वह किराने की दूकान पर गया और उसने सभी पाठकों के नाम व हर पाठक द्वारा पढ़ी किताबों की संख्या लेखाचित्र पर देखी तब उसने पाया कि उसके छोटे भाई की प्रतोयोगिता जीतने की संभावना बहुत कम थी.

क्रिसमस के सही तात्पर्य, देने की ख़ुशी, से प्रभावित होकर उसने निश्चय किया कि वह जो अपने लिए नहीं कर सकता था, पार्कर के लिए करेगा. अतः जरोन ने अपनी साइकिल अलग रखी और हाथ में पुस्तकालय का कार्ड लेकर, पुस्तकालय की ओर चल पड़ा. उसने पढ़ा और पढ़ता गया. वह एक दिन में ८ घंटे तक पढ़ता था. इतना अद्भुत उपहार दे पाने की ख़ुशी ने संभवतः उसे प्रगति के मार्ग पर जारी रखा.

आखिर वह दिन आ गया जब अंतिम सूचियाँ समर्पित करनीं थीं. जरोन की माँ उसे दूकान पर ले गयीं और उसने अपनी सूची जमा कर दी और प्रदर्शन पर रखी पुरस्कार-विजेताओं की साइकिलों को सराहने लगा.bicycle

दूकान का प्रबंधक उसे २०” की लाल चमकदार साइकिल को सराहते हुए देख रहा था. प्रबंधक ने कहा, “मुझे लगता है कि अगर तुम मुकाबला जीत जाओगे तो तुम बड़ी वाली साइकिल लेना चाहोगे?”

जरोन ने प्रबंधक के मुस्कुराते हुए चेहरे की ओर देखा और बहुत गंभीरता से कहा, “नहीं महाशय! मैं ठीक इसी कद की साइकिल लेना पसंद करूंगा.”

“लेकिन यह साइकिल तुम्हारे लिए बहुत छोटी नहीं है?”

“नहीं महाशय- मैं इसे अपने छोटे भाई के लिए जीतना चाहता हूँ?”

वह आदमी अचंभित था. वह जरोन की माँ की तरफ मुड़कर बोला, “पूरे साल की मैंने यह सबसे अच्छी कहानी सुनी है!”

जरोन की माँ को पता नहीं था कि उसने अपने छोटे भाई के लिए इतना कठिन परिश्रम किया था. उन्होंने जरोन को अत्यधिक गर्व और ख़ुशी से देखा और प्रतियोगिता के परिणामों की प्रतीक्षा करने घर चले गए.

अंततः टेलीफोन की घंटी बजी. २८० किताबें पढ़कर जरोन जीत गया था. अपने माता-पिता की सहायता से उसने क्रिसमस की पूर्वसंध्या तक साइकिल को अपनी दादी के घर के तहखाने में छुपा दिया. वह पार्कर को उसका उपहार देने के लिए मुश्किल से इंतज़ार कर पा रहा था.

क्रिसमस की पूर्वसंध्या पर सारा कुटुंब दादी के घर पर एक विशेष पारिवारिक शाम के लिए एकत्रित हुआ. माँ ने दुनिया को अलौकिक पितामह के उपहार- उनके पुत्र ईसाह मसीह की कहानी सबको सुनाई. फिर उन्होंने एक अन्य बड़े भाई के प्यार की कहानी सुनाई. उन्होंने कहा कि हालाँकि यह उतना महान बलिदान नहीं था जोकि उद्धारक ने हम सब के लिए किया है पर फिर भी यह एक त्याग है. यह बलिदान एक बड़े भाई का अपने छोटे भाई के प्रति प्रेम को दर्शाता है. पार्कर और उसके परिवार ने एक भाई की कहानी सुनी, जिसने अपने छोटे भाई को साइकिल जितवाने के लिए २८० किताबें पढ़ीं थीं.

पार्कर ने कहा, ” मेरा बड़ा भाई मेरे लिए कुछ इस प्रकार ही करेगा.”

इस पर जरोन भाग कर दूसरे कमरे में गया जहाँ दादी ने साइकिल रखी थी. जब वह दो पहिये का खज़ाना, जो उसने अपने छोटे भाई के लिए जीता था, बाहर लेकर आया, परिवार के सभी सदस्य गर्व से मुस्कुरा रहे थे. पार्कर साइकिल की ओर दौड़ा और दोनों भाइयों ने एक दूसरे को सीने से लगा लिया.two bros

   सीख :

हममें सबसे प्रेम और सबकी परवाह करनी चाहिए. यह हमारे परिवार, माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी से शुरू होता है और फिर पड़ोसियों तथा अन्य सभी जो आपत्ति में हैं, उन तक विस्तृत होता है. ज्येष्ठ सहोदर का अपने अनुजों का ध्यान रखना और मदद करना कर्त्तव्य बनता है. छोटों को इसका प्रतिदान प्रेम और आदर से करना चाहिए.

वसुंधरा व अर्चना द्वारा अनुवादित

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