Archive | September 2019

    भगवान मेरे प्रदाता हैं 

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    एक धनवान व्यक्ति रेलगाड़ी में यात्रा कर रहा था. उसके सामने एक अनजान व्यक्ति बैठा हुआ था जो एक संत था. वह अमीर व्यक्ति संत को अत्यंत ही घृणा व नफ़रत से देख रहा था. मध्याह्न भोजन के समय उसने अपने नौकर, जो एक कोने में बैठा हुआ था, को भोजन परोसने का इशारा किया. भोजन करते समय अचानक ही वह संत को डाँटने-फटकारने लगा, “तुम कामचोर, बेकार भिखारी, आवारा और निकम्मे!! तुम केवल भगवान् का समय व्यर्थ करते हो और किसी काम के नहीं हो. क्या तुम दूसरों से यह अपेक्षा करते हो कि वह तुम्हें खाना खिलाएं और तुम्हारी सहायता करें? दूसरों का सम्मान तुम केवल काम करके और जीविकापार्जन करके ही हासिल कर सकते हो. मैंने कठिन परिश्रम करके अपना रास्ता बनाया है और अपने असामान्य प्रयासों से स्वयं को इतना अमीर व समर्थ बनाया है कि आज मैं कुछ भी खरीद सकता हूँ. देखो, मैं कितने आलीशान ढंग से खाता हूँ पर मुझे नहीं लगता कि मैं अपना खाना तुम्हारे साथ बाटूँगा- देखते हैं तुम्हें भोजन कहाँ से मिलता है.“ 

  संत ने विनम्र व स्नेहशील आवाज़ में कहा, “श्रीमान, मुझे डाँटने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि मैं आपसे कुछ नहीं माँग रहा हूँ. अगर मैंने अनजाने में आपको नाराज़ कर दिया हो तो मुझे क्षमा कर दीजिये. मेरा ऐसा इरादा नहीं था. मुझे जब और जहाँ ज़रुरत होती है, भगवान् सदैव सभी अत्यावश्यक वस्तुएँ प्रदान कर देते हैं. अतः श्रीमान, आप डरे नहीं कि मैं आपसे कुछ माँगूंगा.”

   अमीर व्यक्ति ताना मारते हुए बोला, “हाँ, हाँ सब कुछ आसमान से गिरता है और अपने आप आता है. मुझे हँसाओ मत. मेरा सिद्धांत ‘कठिन परिश्रम’ है क्योंकि कुछ भी स्वर्ग से नहीं गिरता है.”

     संत ने चुपचाप नज़रे नीचे झुका लीं और कुछ नहीं बोला.

   अगले स्टेशन पर रेलगाड़ी जैसे ही रुकी, एक पहरेदार झटपट गलियारी में चिल्लाकर बोलने लगा कि गाड़ी उस स्टेशन पर आधे घंटे के लिए रूकेगी.

   संत धीरता व शांति से उठा और पानी पीने के लिए गाड़ी से निकलकर बाहर आया. अमीर व्यक्ति रेलगाड़ी की खिड़की से संत को ग़ौर से देख रहा था. उसने देखा कि बहुभागी डब्बे वाला खाने का डब्बा लिए एक व्यक्ति संत को पुकार रहा था, “स्वामी, स्वामी! मेरे गुरु ने मुझे आपको यह भोजन भेट करने के लिए भेजा है.” जैसे ही संत ने भोजन का डब्बा ग्रहण किया वह व्यक्ति आँखों से ओझल हो गया. 

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धनी व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर देखता रहा. जब उसका ध्यान संत पर पुनः गया तो उसने पाया कि ज़मीन पर बैठकर संत ने सारे डब्बे खोले और भगवान् की इस अद्भुत देखभाल के लिए उनका धन्यवाद देते हुए प्रभु को सारा भोजन अर्पित किया. तत्पश्चात उसने आसपास के सभी भिखारियों को बुलाया, स्वयं के लिए भोजन का छोटा सा हिस्सा रखा और बाकी का खाना भिखारियों में बाँट दिया. आश्चर्य व ईर्ष्या से परिपूर्ण अमीर व्यक्ति को तब अहसास हुआ कि संत का खाना उसके अपने खाने से कहीं अधिक शानदार व लुभावना था. 

   जब संत अपने कुप्पे में वापस आया तो कोमल व स्नेहमय नज़रों से धनवान व्यक्ति को देखते हुए बोला, “देखिए श्रीमान, मेरे प्रभु ने मुझे एक भरपूर भोजन से प्रफुल्लित किया है. आप इस संसार के सज्जन मात्र हैं परन्तु मेरे प्रभु पूरे ब्रह्माण्ड के शासक हैं. चूंकि मैं केवल उनके लिए जीता हूँ, उनपर भरोसा करता हूँ और उनसे प्रेम करता हूँ, वह हर पल मेरा ध्यान रखते हैं और मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ते हैं. हर ज़रुरत की वस्तु से वह हर पल और हर जगह मेरा भरण-पोषण करते हैं. मैंने अपना जीवन पूर्णतः उन्हें समर्पित कर दिया है. प्रभु पर सम्पूर्ण भरोसा करके मैं निरंतर उनका चिंतन करता हूँ.”

     सारांश:

  मनुष्य होने के नाते हम अपने परिवार व संसार की भौतिक वस्तुओं से जुड़े हुए हैं. हम भय और असुरक्षा में जीते हैं. हम नित्य उनकी चिंता करते रहते हैं और सदा उनकी रक्षा का प्रयास करते रहते हैं. चिंता एक दोलन कुर्सी के समान है; यह हमें व्यस्त रखती है परन्तु हमारा मार्गदर्शन नहीं करती है. जब हम चिंता करते हैं तो ऊर्जाओं का रिसाव होता है. जब ऊर्जाओं का रिसाव होता है तो अधिकता संभव नहीं है. ऊर्जा की अधिकता से ही हम स्वयं को ईश्वर के रहस्य से परिपूर्ण कर सकते हैं. हमें चिंतारहित होना होगा. इसके लिए यदि हम ईश्वर में विश्वास करना सीख लेंगे और भरोसे के आधार पर काम करेंगे तो चिंता अपने आप ही ख़त्म हो जाएगी.

   अच्छे व समझदार लोगों की संगति में रहकर विश्वास, निष्ठा और कृतज्ञता का विकास आसान हो जाता है. यद्यपि अच्छी संगत में रहने से हमारे विकास की अभिवृद्धि संभावित है परन्तु केवल बुद्धिमानों की संगत में होना ही पर्याप्त शर्त नहीं है.

  उत्तर भारत के एक आश्रम में एक गाय थी जो निरंतर आदि शंकराचार्य की संगत में रहती थी. यद्यपि उस गाय को कई दिनों तक लगातार श्री आदि शंकराचार्य के आध्यात्मिक प्रवचनों को सुनने का सुअवसर मिला पर बेचारी गाय उससे कोई लाभ नहीं उठा पाई. कारण- गाय का सारा धयान शंकर के खूबसूरत प्रवचनों के बजाय उस घास पर था जो वह खा रही थी. अतः सत्संग में सिखाए जाने वाले ज्ञान को समझने की चेष्टा किए बिना उसमें बैठने वाले व्यक्ति की दशा उस गाय से ज़्यादा बेहतर नहीं है, जिसे अब तक के सबसे अधिक बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक की संगति का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. इसलिए हमें सत्संग के सार व उद्देश्य को समझना चाहिए क्योंकि ख़ुशी व शांति के पथ पर यह हमारा मार्गदर्शन करता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना