Archive | November 2014

पूर्णतावादी मूर्तिकार- सदा अपना सर्वोत्तम करो

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : सही कार्य करना

एक बार एक सज्जन मंदिर देखने गए जहाँ निर्माण कार्य चल रहा था. वहाँ उन्होंने एक मूर्तिकार को भगवान की प्रतिमा बनाते हुए देखा. idol2अचानक उन्होंने वैसी ही मूर्ति पास में पड़ी हुई देखी.idol हैरान, उन्होंने मूर्तिकार से पूछा, “क्या तुम्हें एक ही मूर्ति की दो प्रतिमायें चाहियें हैं?”

मूर्तिकार ने ऊपर देखे बिना कहा, “नहीं, मूर्ति हमें एक ही चाहिए पर पहले वाली मूर्ति अंतिम चरण में बिगड़ गई थी.”

उस सज्जन ने मूर्ति का निरिक्षण किया और उन्हें कोई स्पष्ट टूट-फूट नहीं दिखी. “मूर्ति कहाँ से खराब है?” उन्होंने पूछा.

“मूर्ति की नाक पर खरोच है” , काम में व्यस्त मूर्तिकार ने कहा.

“तुम मूर्ति को कहाँ स्थापित करने वाले हो?”

मूर्तिकार ने जवाब दिया कि मूर्ति २० फ़ीट ऊँचे खंभे पर स्थापित की जायेगी.

“अगर मूर्ति इतनी दूर होगी तो किसे मालूम पड़ेगा कि नाक पर खरोंच है?” भद्रपुरुष ने पूछा.

मूर्तिकार ने अपना काम बंद किया, उस सज्जन की ओर देखा, मुस्कुराया और बोला, “मुझे पता है और भगवान को मालूम है.”

सीख:

श्रेष्ठता हासिल करने की इच्छा इस हक़ीकत से अलग होनी चाहिए कि कोई हमारी प्रशंसा करता है या नहीं. उत्कृष्टता एक भीतरी प्रवृत्ति है. अपने कार्य में श्रेष्ठता हासिल करो- किसी और के ध्यान में लाने के लिए नहीं बल्कि स्वयं के संतोष के लिए.

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translation: अर्चना

करनी कथनी से ताकतवर होती है

आदर्श : उचित आचरण

उप आदर्श : पहल, कार्य या क्रिया

एक दिन एक किसान को एक से छोटे शहर की गली में चलते हुए अपने रास्ते के बीच एक बड़ा-सा पत्थर दिखा. stoneकिसान ने शिकायत की: ” कौन इतना लापरवाह है कि इतना बड़ा पत्थर सड़क पर छोड़ा हुआ है? कोई इसे हटाता क्यों नहीं है?” और शिकायत करते हुए वह चला गया.

अगले दिन, वही चीज़ दूधवाले के साथ भी हुई. वह भी बड़बड़ाते हुए चला गया पर पत्थर वहीँ छोड़ दिया.

फिर एक दिन, एक विद्यार्थी को वह पत्थर दिखा. उसे चिंता हुई कि कोई उससे गिरकर ज़ख़्मी हो सकता है और उसने उसे एक तरफ धकेलने का निर्णय किया.                 वह अकेले ही बहुत कठिनाई से लम्बे समय तक पत्थर को धकेलता रहाstone1 और अंततः पत्थर को रास्ते से हटाने में सफल हो गया. वह वापस आया और उसने पत्थर के स्थान पर एक कागज़ पाया.

उसने कागज़ को उठाया और उसे खोला.stone2 उस पर लिखा था, “तुम इस देश की असली सम्पत्ति हो.”

लोग दो प्रकार के होते हैं
वक्ता और कर्ता
वक्ता केवल बात करते हैं, जबकि कर्ता कार्य करते हैं.

सीख:
अगर हम किसी कार्य में शामिल नहीं होना चाहते हैं तो हमें दोष निकालने का कोई अधिकार नहीं है. इस संसार में हम जो बदलाव देखना चाहते हैं, वह हमें स्वयं बनना चाहिए.
समाज की सेवा वह किराया है जो हम इस धरती पर जगह घेरने के लिए अदा करते हैं.

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Transaltion : अर्चना

भगवान काम के पीछे भाव की परवाह करते हैं

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          आदर्श : प्रेम
     उप आदर्श : सहानुभूति

अब्दुल्लाह मक्का में एक मस्जिद के एक कोने में सो रहा था,mecca जब उसकी नींद दो फरिश्तों के बीच की बातचीत से खुली. वे दोनों भाग्यशाली लोगों की सूची तैयार कर रहे थे. एक फरिश्ता दूसरे से कह रहा था कि सिकंदर शहर का कोई मेहबूब प्रथम स्थान के योग्य है, भले ही वह पवित्र शहर की तीर्थयात्रा पर नहीं आया था. यह सुनकर अब्दुल्लाह सिकंदर शहर गया और उसने पाया कि मेहबूब लोगों के जूते मरम्मत करने वाला, मोची था. mecca2वह गरीब व भूखा था क्योंकि रोज़ की ज़रूरतें पूरी करने के लिए उसकी कमाई मुश्किल से पूरी पड़ती थी. पिछले कुछ वर्षों में घोर परिश्रम और कठिनाई से उसने चंदपैसे जमा किए थे. अपनी गर्भवती पत्नी को अकस्मात् उपहार देने के लिए, एक दिन मोची ने अपनी सारी जमा पूँजी एक विशेष व्यंजन तैयार करने में खर्च कर दी. भेंट लेकर जब वह घर जा रहा था, उसे एक निराहार भिखारी की पुकार सुनी जो अत्यंत भूख से कराह रहा था. mecca3मेहबूब और आगे बढ़ नहीं पाया , उसने स्वादिष्ट पकवान वाला मटका उस आदमी को दे दिया और उसके पास बैठकर उसके मरियल चेहरे पर बढ़ती संतुष्टि का आनंद लेने लगा. उस कार्य ने मेहबूब को भाग्यवानों की पंजिका में सम्मान व गौरव का स्थान प्रदान किया. ऐसा स्थान जो मक्का के तीर्थयात्री करोड़ों दान में खर्च करने के बाद भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं. भगवान कार्य के पीछे का भाव देखते हैं नाकि धूमधाम व हंगामा.

        सीख :

हम दूसरों की जो भी मदद करते हैं, उसकी विशेषता मायने रखती है नाकि उसकी तादाद. प्रेम व सहानुभूति से की गई छोटी सी सहायता, प्रेम भाव के बिना की गई बड़ी मदद से कहीं अधिक मूल्यवान है.

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Translation : अर्चना

स्वर्ण मछली का कटोरा

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            आदर्श : उचित आचरण
       उप आदर्श : दूसरों के लिए सहानुभूति

नौ साल का एक बच्चा अपनी मेज़ पर बैठा हुआ है और अचानक उसे अपने पैरों के बीच कुछ महसूस होता है और उसकी पतलून गीली हो जाती है. वह कल्पना भी नहीं कर पाया कि ऐसा कैसे हुआ और उसे लगा कि उसका दिल धड़कना बंद कर देगा.

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था और उसे मालूम था कि अगर दूसरे लड़कों को यह पता चल गया तो वे उसे सदा परेशान करते रहेंगें.f bowl2 जब लड़कियों को मालूम चलेगा तो वे उससे आजीवन बात नहीं करेंगीं.f bowl3

उस लड़के को लगता है कि उसका दिल रूकने वाला है, वह अपना सर नीचे करता है और प्रार्थना करता है- “प्रिय भगवान, यह आपातकाल है! मुझे अभी मदद चाहिए! अब से पाँच मिनट में मेरी मृत्यु निश्चित है.”

प्रार्थना के बाद जब वह सर ऊपर उठाता है तो वह देखता है कि अध्यापिका उसकी ओर ही आ रहीं थीं और उसे इस प्रकार देख रहीं थीं मानो उन्हें पता चल गया हो.

जैसे वह अध्यापिका उस लड़के की ओर बढ़ रहीं हैं तभी सुज़ी नामक एक सहपाठी पानी से भरा स्वर्ण मछली का कटोरा लेकर वहाँ से गुज़रती है.f bowl1 सुज़ी अध्यापिका के समक्ष लड़खड़ा जाती है और अकारण पानी का कटोरा लड़के के गोद में उलट देती है.

लड़का नाराज़ होने का नाटक करता है परन्तु स्वयं से बोलता रहता है, “शुक्रिया भगवान! शुक्रिया भगवान!”

अब एक दम से उपहास का विषय बनने के बजाय, लड़का सहानुभूति का विषय बन जाता है. अध्यापिका उसे तुरंत नीचे लेकर जातीं हैं और जब तक उसकी पतलून सूखती है उसे एक अन्य जाँघिया पहनने के लिए देतीं हैं. अन्य सभी बच्चे उसके मेज़ के आसपास सफाई करने में जुट जाते हैं. हमदर्दी कमाल की है. पर दुर्भाग्यवश, हँसी जो उस लड़के की उड़नी चाहिए थी, सुज़ी के हवाले हो गई.

सुज़ी मदद करने की कोशिश करती है पर सब उसे बाहर जाने को कहते हैं. “तुमने काफी कर दिया है, मूर्ख लड़की!” अंततः दिन समाप्त होने पर जब सभी बस का इंतज़ार कर रहे थे, वह लड़का सुज़ी के निकट गया और फुसफुसाया, “तुमने वैसा जानबूझकर किया था ना?”
सुज़ी ने धीरे से वापस बोला, “मैंने भी एक बार अपनी पतलून गीली की थी.”

       सीख:

काश भगवान हमें अच्छा करने के अवसरों, जो सदा हमारे आस-पास हैं, को देखने में हमारी सहायता करें. मदद सदा करो, चोट कभी न पहुँचाओ. सदैव दूसरों की मदद करने की कोशिश करो खासकर अगर तुम भी ऐसी कठिनाइयों से गुज़रे हो.

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Translation :अर्चना