Archive | February 2016

तीन स्तरीय परीक्षण

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            आदर्श : सत्य
       उप आदर्श : सच्चापन, लाभकर कार्य

ज्ञान को उच्चतम सम्मान देने के लिए सोक्रेटस प्राचीन ग्रीस में प्रख्यात थे.
एक दिन इस महान दार्शनिक से उनका एक परिचित मिला और उसने कहा, “तुम्हें पता हैtest2 मैंने अभी-अभी तुम्हारे दोस्त के बारे में क्या सुना है?”

“१ मिनट, ” सोक्रेटस ने उत्तर दिया, “मैं चाहता हूँ कि मुझे कुछ बताने से पहले तुम एक लघु परीक्षा से गुज़रो.” इसे तीन स्तरीय परीक्षण कहते हैं.

“तीन स्तरीय?”

सोक्रेटस ने कहा, “हाँ, इसके पहले कि तुम मेरे दोस्त के बारे में कुछ कहो अच्छा होगा कि तुम एक पल रूक कर इस बात की जाँच करो कि तुम क्या कहने वाले हो. इसलिए मैं इस जाँच को तीन स्तरीय परीक्षण कहता हूँ.”

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वह व्यक्ति बोला, “दरसल मैंने केवल किसी से सुना है और…””ठीक है,” सोक्रेटस ने कहा, “तो इसका मतलब तुम्हें पता नहीं है कि यह वास्तव में सत्य है या नहीं. अब दूसरे स्तर की जाँच का प्रयास करते हैं- अच्छाई की जाँच. मेरे मित्र के बारे में जो तुम मुझे बताने वाले हो, क्या वह अच्छा है?”

“नहीं, इसके विपरीत…….”
“तो तुम मुझे उसके बारे में कुछ बुरा बताने वाले हो.” सोक्रेटस बोले, “तुम अभी भी अपनी इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकते हो क्योंकि अभी भी एक परीक्षण बाकी है: उपयोगिता का परीक्षण. तुम जो मेरे मित्र के बारे में मुझे बताने वाले हो, क्या वह मेरे लिए उपयोगी होगा?”
“नहीं, कुछ ख़ास नहीं…..”

सोक्रेटस ने अंत में कहा, “तुम जो मुझे बताने वाले हो अगर वह न तो सच है और न नहीं अच्छा या उपयुक्त तो उसे बताना ही क्यों है?”

इसी कारणवश सोक्रेटस एक महान दार्शनिक थे जिनका सभी बहुत सम्मान करते थे.

सीख:

हमें सदा सत्य बोलना चाहिए. केवल आवश्यकता पड़ने पर ही बोलना चाहिए. अफवाह फैलाने व गपशप करने से समय तथा शक्ति का नुकसान होता है. हमें अपने समय को व्यर्थ के कामों में नहीं बल्कि सार्थक रूप से व्यतीत करना चाहिए.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com
अनुवादक- अर्चना

एक माँ का प्रेम

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 आदर्श : प्रेम
  उप आदर्श : बलिदान, बिना शर्त का प्रेम

मेरी माँ की केवल एक आँख थी. मैं अपनी माँ से नफरत करता था ………. वह मेरी शर्मिंदगी का कारण थी. घर की जीविका के लिए मेरी माँ छात्रों था अध्यापकों के लिए खाना बनाती थी. मेरे प्राथमिक विद्यालय के दौरान एक दिन मेरी माँ मुझसे मिलने आई. उसके आने से मैं बहुत ही लज्जित था. वह मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती थी? मैंने माँ की ओर घृणा की दृष्टि से देखा और उसे नज़रअंदाज़ करते हुए वहाँ से भाग गया.

अगले दिन विद्यालय में मेरे एक सहपाठी ने पूछा, “छी! तुम्हारी माँ की केवल एक ही आँख है?” यह सुनकर मैं स्वयं को ज़मीन में दफना ही देना चाहता था. मुझे लगा कि मेरी माँ कहीं गुम क्यों नहीं हो जाती. उस दिन मैंने अपनी माँ का सामना किया और कहा, “अगर तुम मुझे केवल हँसी का पात्र ही बनाना चाहती हो तो तुम मर क्यों नहीं जाती?”

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मेरी माँ चुप रही…..मैं गुस्से से इतना भरा हुआ था कि मैंने एक पल के लिए भी रूककर यह नहीं सोचा कि मैंने क्या कह दिया है. मैं माँ की भावनाओं से बिलकुल बेखबर था. मैं बस उस घर से निकल जाना चाहता था और माँ से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता था. अतः मैंने खूब जमकर पढ़ाई की और मुझे प्रौढ़ शिक्षा के लिए बाहर जाने का मौका मिला. फिर मेरा विवाह हो गया. जल्द ही मैंने अपना एक घर खरीद लिया और मेरे बच्चे भी हो गए. कुल मिलाकर मैं अपनी ज़िन्दगी, अपने बच्चों तथा सुख-साधनों से बहुत खुश था.

एक दिन अचानक मेरी माँ मुझसे मिलने आई. उसने मुझे वर्षों से नहीं देखा था और मेरे बच्चों को भी कभी नहीं देखा था. जैसे वह दरवाज़े पर खड़ी थी, मेरी बच्चे उस पर हँसे. बिना बुलाये चले आने के लिए मैं भी उसपर चिल्लाया. मैंने चीखकर कहा, “मेरे घर आकर मेरे बच्चों को डराने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई! यहाँ से बाहर निकालो! अभी !!

मेरे इस निष्ठुर व्यवहार पर मेरी माँ ने धीरे से उत्तर दिया, “ओह! मैं बहुत शर्मिंदा हूँ. शायद मेरे पास गलत पता है, ” और वह आँखों से दूर ओझल हो गई. एक दिन हमारे विद्यालय के पुनर्मिलन को लेकर एक चिट्ठी आई. मैं जाने के लिए काफ़ी इच्छुक था और इसलिए मैंने अपनी पत्नी से झूठ बताया कि मैं अपने व्यावसायिक दौरे पर जा रहा हूँ. विद्यालय के पुनर्मिलन के बाद, अपने जिज्ञासा हेतु, मैं उस पुरानी झोपड़ी में गया जहाँ मैं बड़ा हुआ था. मेरे पड़ोसियों ने मुझे बताया कि कुछ समय पहले मेरी माँ का देहांत हो गया था. मैंने फिर भी आँसू नहीं बहाए. फिर उन्होंने मिझे एक चिट्ठी सौंपी जो वह मुझे देना चाहती थी. उसमें लिखा था-

मेरे सबसे प्रिय पुत्र,
मैं हर समय तुम्हारे बारे में सोचती रहती हूँ. मैं शर्मिंदा हूँ कि मैं तुम्हारे घर आई और तुम्हारे बच्चों को डराया. मैं यह जानकार खुश थी कि तुम विद्यालय के पुनर्मिलन के लिए आ रहे हो. परन्तु तुम्हें देखने के लिए मैं शायद बिस्तर से उठ भी नहीं पाऊँगी. मुझे खेद है कि जब तुम बड़े हो रहे थे तब मैं सदा तुम्हारी शर्मिंदगी का कारण थी पर………जब तुम बहुत छोटे थे तब एक दुर्घटना में तुमने अपनी एक आँख गवाँ दी थी. एक माँ होने के नाते मैं तुम्हें एक आँख लेकर बड़ा होते नहीं देख सकती थी. अतः मैंने तुम्हें अपनी एक आँख दे दी. मुझे अपने बेटे पर बहुत गर्व था जो अब उस आँख से, मेरी जगह, मेरे लिए सम्पूर्ण संसार को देख रहा था.

अपने समस्त प्रेम सहित- तुम्हारी माँ

         सीख:

हमें सदा अपने माता-पिता से प्रेम व उनका सम्मान करना चाहिए. माता-पिता भगवान का आशीर्वाद होते हैं. भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने हमें हमारे जीवन की सबसे कीमती चीज़ दी- हमारे माता-पिता. हमारे माता-पिता के समान कोई भी अन्य हमें प्रेम या हमारे लिए बलिदान नहीं कर सकता. हम अपने माता-पिता का महत्व तभी समझते हैं जब वे हमारे आस-पास नहीं होते हैं. वास्तव में हम कभी भी उनका सही मूल्य समझ नहीं सकते हैं. इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जिस प्रकार हमारे माता-पिता अपने बारे में सोचे बिना हमारे लिए बलिदान करते हैं उसी प्रकार अगर हमें उस प्यार को किसी रूप में वापस लौटाने का मौका मिले तो हमें उन्हें खुश रखने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

अहम, ध्यान आकर्षण की प्रबल इच्छा

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यह बहुत ही निराशाजनक है कि आजकल प्रायः हर युवक, कामयाब माने जाने वाले लोग तथा प्रतिष्ठित लोग केवल ध्यान आकर्षित करने के लिए ही कार्य करते हैं. वे लोग अपने अहम के शिकंजे से कभी निकल ही नहीं पाते हैं. स्वभाव से अहम सदा और अधिक पाने की कामना में रहता है और इसलिए वह सदा भिक्षुक ही रहता है. अहम भाव की समस्या यह है कि जब अहम की संतुष्टि होती है तो हम ‘श्रेष्ठता मनोग्रंथि’ से संघर्ष करते हैं और जब अहम लालायित रहता है तो हम ‘हीन भावना’ से ग्रस्त रहते हैं. हर हाल में अहम हमें हमारे मन की शांति से वंचित करता है. हमारा प्रेरक बनने के लिए अहम हमसे हमारे मन की शांति छीन लेता है. भला एक कंघी खरीदने के लिए कोई अपने बाल बेचता है क्या?

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अहम के कारण हम परिस्थितियों पर विजय पाने के लिए सदा संघर्ष करते रहते हैं. हम सदैव श्रेष्ठतर बनने की होड़ में लगे रहते हैं. परन्तु जब हम अहम से आगे निकलते हैं तब हम केवल स्वयं पर विजय हासिल करना चाहते हैं- हम अपने सामर्थ्य को पहचानकर उसका सही उपयोग कर पाते हैं.

जीवन में हम सब एक दौर से गुज़रते हैं जब हमारा अहम हम पर हावी रहता है और हम हर कार्य दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए करते हैं. यह वह चरण है जब अच्छा तभी अच्छा होता है जब वह दूसरों का ध्यान आकर्षित करता है. दूसरों द्वारा सराहे जाने पर बुरा भी अच्छा बन जाता है. इसके प्रतिकूल यदि अच्छाई दूसरों का ध्यान आकर्षित करने में विफल रहती है तो वह भी बुरी बन जाती है. अहम के अस्तित्व का आधार दूसरों द्वारा प्रशंसा तथा उनका ध्यान आकर्षित करना है. पर हमें इस दौर से बाहर निकलने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.

जब अहमभाव आता है तो बाकी सब कुछ चला जाता है और अहंभाव के जाने से बाकी सब कुछ आता है.

अहमभाव को संतुष्ट व खुश रखने की चाह में कितने अनमोल रिश्ते टूटे हैं? यद्यपि अहम को छोड़कर हमें रिश्तों को बचाना चाहिए पर दुर्भाग्यवश हम रिश्तों को त्यागकर अहम को बचाने पर अधिक महत्त्व देते हैं. वास्तव में रिश्तों की अहमियत के आगे अहम की कीमत कुछ भी नहीं है.

अपने अहम को प्रधानता देने के कारण हमें कितनी बार सुनहरे सुअवसरों से हाथ धोना पड़ता है. हर क्षण बोझिल होता है, हर परिस्थिति तनावपूर्ण होती है, प्रत्येक पारस्परिक क्रिया कठिन होती है……..अहंभाव से भरा दिल सदैव खतरों से खेल रहा होता है. अहम और शान्ति में एक पल का भी मिलाप संभव नहीं है.

मुँह में मांस का एक टुकड़ा रखने वाले कौए का अन्य सभी पक्षी पीछा करते हैं. पर जब कौआ मांस का टुकड़ा गिरा देता है तो सभी पक्षी उस टुकड़े की ओर चले जाते हैं. अब आसमान में अकेला कौआ टिप्पणी करता है, “वह मांस का टुकड़ा गवांकर मैंने सम्पूर्ण आज़ादी हासिल कर ली है.”

स्वयं को अहम से मुक्त करने में अपरिमित आज़ादी है.

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अनुवादक- अर्चना

दूध के एक गिलास से पूरा भुगतान

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आदर्श : उचित आचरण
  उप आदर्श : कृतज्ञता

एक गरीब लड़का अपने विद्यालय की फ़ीस के पैसे जुटाने के लिए घर-घर जाकर सामान बेचता था. एक दिन उसे बहुत भूख लगी हुई थी और उसके पास केवल दस सेंट का एक सिक्का बचा हुआ था. उसने निश्चय किया कि अगले घर से वह कुछ खाने के लिए माँगेगा. मगर अगले घर पर दस्तक देने पर जब एक ख़ूबसूरत महिला ने दरवाज़ा खोला तो वह लड़का हड़बड़ा गया और भोजन के बजाय उसने पानी माँगा. महिला ने अनुमान लगाया कि वह लड़का भूखा था अतः महिला उसके लिए दूध का एक बड़ा गिलास लेकर आई. लड़के ने धीरे-धीरे दूध पीया milk2और फिर महिला से पूछा, “मैं आपको कितने पैसे दूँ? ” महिला ने नम्रता से उत्तर दिया, “कुछ नहीं. हमारी माँ ने हमें सिखाया है कि नेकी के काम के बदले में कभी भी पैसे नहीं लेने चाहिए.”

लड़के ने कहा……”फिर मैं तहे दिल से आपका धन्यवाद अदा करता हूँ.” जैसे ही हॉवर्ड कैली उस घर से निकला, उसने न केवल स्वयं को शारीरिक रूप से सशक्त पाया बल्कि भगवान व इंसान में उसकी निष्ठा भी और अधिक दृढ़ हो गई. इस मदद के मिलने से पहले वह लगभग हार मान ही चुका था.

कुछ वर्षों बाद वह जवान महिला बहुत नाज़ुक रूप से बीमार पड़ गई.milk5 उसकी बीमारी से सभी स्थानीय डॉक्टर चकराए हुए थे और उसका इलाज करने में असमर्थ थे. अंततः उन्होंने महिला को बड़े शहर भेज दिया जहाँ उसकी इस दुर्लभ बीमारी का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों को बुलाया गया. milk3डॉक्टर हॉवर्ड कैली को भी परामर्श के लिए बुलाया गया. जब डॉ कैली ने महिला के शहर का नाम सुना तो उसकी आँखों में एक अद्भुत रोशनी भर आई. वह तुरंत उठा और झटपट उस महिला के कमरे की ओर भागा.

डॉक्टर का गाउन पहनकर जब वह महिला के कमरे में गया तो उसने महिला को देखते ही पहचान लिया.milk4महिला का जीवन बचाने के लिए अपनी सर्वश्रेष्ठ कोशिश करने का निश्चय कर वह अपने कमरे में वापस आया. उस दिन से उसने महिला की दशा पर विशेष ध्यान दिया. एक लम्बे संघर्ष के बाद, दोनों की युद्ध में जीत हुई. तत्पश्चात डॉ कैली ने अपनी स्वीकृति के लिए कार्यालय से अंतिम बिल मँगवाया. उसने बिल देखा और कागज़ के नीचे कुछ लिखकर महिला के कमरे में भेज दिया. महिला बिल का लिफाफा खोलने से घबरा रही थी क्योंकि उसे विश्वास था कि उस बिल का भुगतान करते-करते उसकी पूरी ज़िन्दगी कट जाएगी. पर अंततः जब उसने बिल देखा तब उसका ध्यान बिल के एक कोने पर गया.

बिल के कोने में उसने निम्न शब्द पढ़े….
“दूध के एक गिलास से इस बिल का पूरा भुगतान हो गया है.” (हस्ताक्षर) डॉ हॉवर्ड कैली

यह पढ़कर उसकी आँखें खुशी के आँसुओं से भर आईं और उसने अत्यंत प्रसन्नचित्त मन से प्रार्थना की : “शुक्र है भगवान कि मानवीय हृदय व हाथों के द्वारा आपका प्रेम दूर-दूर तक फैला हुआ है.”

सीख:

कहा जाता है; जैसी करनी वैसी भरनी. जब हम दूसरों की सहायता करते हैं तो दूसरे भी हमारी मदद करते हैं. दूसरों के द्वारा किए गए भले को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए. हमें बिना किसी अपेक्षा के दूसरों की मदद करनी चाहिए. हमें अधिक से अधिक लोगों की सहायता करके, प्रेम का विस्तार कर जीवन में अंतर लाने की कोशिश करनी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना