Archive | December 2014

ज्ञानी तथा स्टेशन मास्टर – सत्य बोलना

             आदर्श : सत्य
उप आदर्श : ईमानदारी, बदलाव

हिमालय से एक महाज्ञानीsage अपने शिष्य सहित महाद्वीप पर आये थे और शहर में थे. एक रेलवे स्टेशन मास्टर उनके दैवत्व से अति प्रभावित था और उसने महापुरुष से अनुरोध किया कि वह उसे आशीर्वाद दें. स्टेशन मास्टर ने उनसे विनती की कि वह उसे कुछ अभ्यास करने को दें और वादा किया कि वह उसका ईमानदारी से पालन करेगा.

शिष्य ने महाज्ञानी से कहा कि यह सांसारिक लोग उनकी शिक्षाओं का पालन नहीं करेंगें. अतः वह स्टेशन मास्टर को सलाह न दें. परन्तु महापुरुष ने कहा कि स्टेशन मास्टर और उसके विभाग में सभी सहकर्मी भ्रष्ट हैं और वह उनके सुधार के लिए स्टेशन मास्टर को सलाह देंगें. उन्होंने स्टेशन मास्टर से कहा कि वह तीन महीनों तक झूठ न बोलने का अभ्यास करे. ऐसा कहकर वह ज्ञानी पुरुष वहाँ से चले गए.

स्टेशन मास्टर ने ईमानदारी से उनकी सलाह का पालन करने का निश्चय किया. sage1अगले दिन रेलवे विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप पर तहक़ीक़ात करने एक अधिकारी स्टेशन मास्टर से मिलने आए. स्टेशन मास्टर ने स्वीकार किया कि उनका विभाग अब तक रिश्वत लेता आया था पर कहा कि अब उसने घूस लेना बंद कर दिया है. उनके सहकर्मी उससे नाराज़ हुए और उन्होंने आयोग से कहा कि स्टेशन मास्टर स्वयं भ्रष्ट है और उन सब को अनावश्यक फँसाना चाहता है.

अंततः स्टेशन मास्टर को सच बोलने के लिए नौकरी से निकाल दिया गया और कारागाह में डाल दिया गया. इस कारण उनकी पत्नी और बेटा उन्हें छोड़कर घर से चले गए. न्यायालय में केस चल रहा था और केस के अंतिम दिन न्यायाधीश ने स्टेशन मास्टर से पूछा यदि वह अपने लिए वकील नियुक्त करना चाहेगा. स्टेशन मास्टर ने कहा कि वह नहीं चाहता है कि कोई उसका केस लड़े और वह अपना तर्क स्वयं प्रस्तुत करना चाहेगा.sage2 फिर उसने महापुरुष के उपदेश का जिक्र किया. बाद में न्यायाधीश ने उसे अपने कक्ष में बुलाकर उस ऋषि के बारे में पूछा. उनके बारे में बताए जाने पर न्यायाधीश खुश हुए क्योंकि वह स्वयं भी उसी महापुरुष की शिक्षाओं पर चलते थे. आखिरकार न्यायाधीश ने उसे केस से रिहा कर दिया.

एक महीने बाद उसे अचानक रेलवे अधिकारियों द्वारा सन्देश प्राप्त हुआ. उनके पिता की ज़मीन, जो रेलवे ने हासिल कर ली थी, के हरजाने में स्टेशन मास्टर को १० लाख रूपए से पुरस्कृत किया जाता है. स्टेशन मास्टर इससे परिचित नहीं था. उसने यह धन अपनी पत्नी और बेटे को दे दिया और कहा कि वह वहाँ से जा रहा है. अगर झूठ नहीं बोलने से १ महीने के अल्प समय में उसे आश्चर्यजनक रूप से इतनी बड़ी धनराशि मिल गई तो आजीवन झूठ न बोलने से क्या होगा? ऐसा सोचकर वह उन महाज्ञानी के साथ अपनी शेष की ज़िन्दगी बिताने के लिए हिमालय चला गया.

सीख :

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है. महान संत व गुरु अच्छे आदर्श सिखाते हैं. उनके उपदेशों को ग्रहण करके उनपर अमल करने से हममें बदलाव आता है.

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अनुवादक – अर्चना

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सदा सहायता करें – जैसी करनी वैसी भरनी

     आदर्श : उचित आचरण

उप आदर्श : ज़रूरतमंद की मदद करना

एक दिन एक व्यक्ति को सड़क के किनारे एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखी.chil दिन की कम रोशिनी में भी उस आदमी ने समझ लिया कि उस औरत को मदद की ज़रुरत थी. इसलिए वह उनकी मर्सिडीज़ के पास गया और अपनी गाड़ी से बाहर निकला. जब वह महिला के पास जा रहा था उसकी गाड़ी का इंजन जारी था.

इस व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कराहट देखने के बावजूद वह महिला परेशान थीं. पिछले एक घंटे से कोई भी उनकी मदद के लिए नहीं रूका था. क्या यह व्यक्ति उन्हें चोट पहुँचाने वाला था? वह सुरक्षित नहीं लग रहा था; वह गरीब व भूखा प्रतीत हो रहा था. उस व्यक्ति को मालूम चल रहा था कि ठण्ड में खड़े रहकर वह डरी हुईं थीं. उसे अंदाज़ा था कि वह कैसा महसूस कर रहीं थीं. ऐसी कंपकंपी केवल भयभीत होने पर ही होती है. उसने कहा, ” महोदया, मैं यहाँ आपकी मदद के लिए आया हूँ. आप गाड़ी में इंतज़ार क्यों नहीं करतीं जहाँ गर्मी है. वैसे, मेरा नाम ब्रायन एंडरसन है.”

उनकी गाड़ी का केवल पहिया पंक्चर हुआ था लेकिन एक वृद्ध महिला के लिए यह काफी गंभीर समस्या थी. ब्रायन गाड़ी का पहिया बदलने लगा chil1और इस दौरान उसके हाथ में चोट भी लग गई और उसके कपड़े मैले हो गए.

जब वह पहिये के पेंच कास रहा था तब महिला ने गाड़ी की खिड़की का शीशा नीचे किया और ब्रायन से बात करने लगीं. उन्होंने ब्रायन को बताया कि वह सेंट लुइस से थीं और उधर से गुज़र रहीं थीं. उनकी मदद करने के लिए वह उसका यथेष्ट धन्यवाद नहीं कर सकतीं थीं. उनका ट्रंक बंद करते हुए ब्रायन केवल मुस्कुराया. महिला ने पूछा कि वह उसे कितने पैसे दें. उनके लिए कोई भी रकम सही होती. वे पहले से ही सभी घोर घटनाओं की कल्पना कर चुकीं थीं जो उनके साथ हो सकतीं थीं अगर ब्रायन वहाँ रुका नहीं होता. ब्रायन ने पैसे के बारे में एक बार भी नहीं सोचा. यह उसके लिए काम नहीं था. यह तो केवल ज़रुरत में किसी की सहायता करना था. ब्रायन की ज़िन्दगी में भी बहुत से लोगों ने उसकी मदद की थी. वह सारी ज़िन्दगी इसी प्रकार जीया था और उसे इससे अलग तरीके से काम करने का ध्यान कभी आया भी नहीं था.

ब्रायन से महिला से कहा कि अगर वह सच में उसे पैसे देना चाहतीं थीं तो अगली बार किसी ज़रूरतमंद को देखने पर वह उसकी वह सहायता कर सकतीं हैं जो उसे चाहिए. ब्रायन ने आगे कहा, “और मेरे बारे में सोचना.”

उसने उस महिला के जाने तक इंतज़ार किया. वह एक ठंडा और निराशाजनक दिन था परन्तु घर जाने समय ब्रायन प्रसन्न था.

कुछ दूर जाने पर उस वृद्ध महिला को एक छोटा सा ढाबा दिखा. वह वहाँ कुछ खाने के लिए गईंchil2 ताकि घर तक की यात्रा का अंतिम चरण तय करने के पहले थोड़ा गरम महसूस कर सकें. भोजनालय देखने में काफी गंदा था. उसके बाहर दो पुराने पेट्रोल पंप थे. सारा दृश्य उनके लिए अंजान सा था. उनके गीले बाल पोंछने के लिए सेविका एक स्वच्छ तौलिया लेकर आई. उसके चेहरे पर एक मधुर मुस्कान थी जो दिन भर के काम के बावजूद भी बरकरार थी.chill3 महिला ने देखा कि सेविका लगभग आठ महीने गर्भवती थी पर थकान व दर्द के कारण उसने अपने रवैये में कोई बदलाव नहीं आने दिया. वृद्ध महिला को आश्चर्य हुआ कि खुद के पास इतना कम होने के बावजूद किसी अजनबी के प्रति कोई इतना उदार कैसे हो सकता है. तब उन्हें ब्रायन की याद आई.

भोजन समाप्त करने के बाद, महिला ने भुगतान १०० डॉलर से किया. सेविका तुरंत १०० डॉलर के छुट्टे लाने गई परन्तु तब तक वह वृद्ध महिला जा चुकीं थीं. सेविका को ताजुब्ब हुआ कि वह महिला कहाँ होंगीं. फिर उसने रूमाल पर कुछ लिखा हुआ पाया.

जब उसने पढ़ा कि महिला ने क्या लिखा था, उसकी आँखों में आँसू आ गए. महिला ने लिखा था, “तुम मेरी देनदार नहीं हो. मैं भी इस प्रकार की परिस्थिति में थी. जिस प्रकार से मैं तुम्हारी मदद कर रहीं हूँ, एक बार किसी ने मेरी भी मदद की थी. अगर तुम सचमुच मुझे लौटाना चाहती हो तो ऐसा करो : इस प्रेम की कड़ी को अपने पर ख़त्म मत होने देना.”

रूमाल के नीचे १०० डॉलर के चार और नोट थे.

भोजनालय का सारा काम समाप्त करने के बाद उस रात जब वह घर पहुँचकर सोने गई तो वह धन तथा महिला द्वारा लिखी पंक्तियों के बारे में सोच रही थी. महिला को कैसे मालूम चला होगा कि उसे व उसके पति को इन डॉलर्स की कितनी ज़रुरत थी? अगले महीने बच्चे के आने के बाद उन्हें दिक्कत होने वाली थी…

उसे ज्ञात था कि उसका पति कितना परेशान था. पति उसके बगल में सो रहा था. उसने पति को धीमे से चूमा और कोमलता से फुसफुसाई, “सबकुछ ठीक होने वाला है. मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, ब्रायन एंडरसन.”

सीख:

हमें दूसरों की मदद ईनाम के लिए नहीं अपितु मदद करने हेतु करनी चाहिए. निस्स्वार्थ भाव से की गई सहायता बदले में ढेर सारी खुशियाँ व आशीर्वाद लाँएगीं. और अक्सर हमारे द्वारा की गई मदद हम तक वापस अवश्य पहुँचती है. इसके अतिरिक्त किसी को खुशी प्रदान करना अपने आप में एक उपहार है.
एक पुरानी कहावत है, “जैसी करनी, वैसी भरनी.”

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translation : अर्चना

हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं

आदर्श : शान्ति
उप आदर्श : ठहराव, शांत

एक हिन्दू साधु गंगा नदी पर नहाने गए. उन्हें नदी के किनारे एक परिवार के सदस्यों का समूह मिला saintजो एक दूसरे पर चिल्ला रहे थे. साधु अपने शिष्यों की ओर मुड़े, मुस्कुराये और बोले,

“लोग गुस्से में एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं?”
शिष्यों ने कुछ पल सोचा और तब उनमें से एक ने कहा, “हम अपनी स्थिरता खो देने के कारण चिल्लाते हैं.”
“पर जब दूसरा व्यक्ति तुम्हारे बिलकुल पास है तो तुम्हें क्यों चिल्लाना चाहिए? तुम्हें जो कहना है वह तुम मधुर तरीके से भी कह सकते हो.”
शिष्यों ने कुछ अन्य उत्तर दिए परन्तु कोई भी संतोषजनक नहीं था.

अंततः ऋषि ने समझाया,
“जब दो लोग एक दूसरे से नाराज़ होते हैं तो उनके दिलों में बहुत फ़ासला आ जाता है. उस दूरी को तय करने के लिए उन्हें चिल्लाना पड़ता हैsaint1 ताकि वे एक दूसरे को सुन सकें. वे जितना अधिक गुस्सा होते हैं, उतना ही उन्हें वह लंबा फ़ासला तय करने के लिए और अधिक ज़ोर से चिल्लाना पड़ता है.

जब दो लोगों में प्यार होता है तो क्या होता है? वे एक दूसरे पर चिल्लाते नहीं हैं बल्कि मधुरता से बात करते हैंsaint3 क्योंकि उनके दिल बहुत करीब होते हैं. उनके बीच दूरी या तो बहुत कम या फिर बिलकुल नहीं होती है…”

ऋषि आगे बोले, “जब वे एक दूसरे से और अधिक प्रेम करते हैं तो क्या होता है? वे बात नहीं करते हैं, केवल फुसफुसाते हैं और अपने प्रेम में एक दूसरे के और अधिक नज़दीक आ जाते हैं. अंत में उन्हें फुसफुसाने की भी ज़रुरत नहीं पड़ती है और वे केवल एक दूसरे को देखते हैं. दो व्यक्ति जब आपस में प्रेम करते हैं तो वे इस प्रकार नज़दीक होते हैं.”

उन्होंने अपने शिष्यों को देखा और बोले,
“अतः तुम जब बहस करो तो अपने दिलों को दूर मत होने दो. ऐसे शब्द मत बोलो जो आपसी फासले और बढ़ाते हैं. अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा जब फ़ासले इतने बढ़ जायेंगें कि तुम उन्हें कभी मिटा नहीं पाओगे.saint2

सीख:

जब गुस्सा आए तो सबसे अच्छा तरीका है कि हम चुप रहें. गुस्से में बोले गए हमारे शब्द दूसरे व्यक्ति पर कभी न सुधरने वाली छाप छोड़ सकते हैं. क्रोध हमें अपने प्रियजनों से दूर ले जाता है.

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Translation : अर्चना

विनम्रता का अभ्यास करो

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          आदर्श : उचित आचरण
      उप आदर्श: विनम्रता

बहुत साल पहले एक घुड़सवार को कुछ फ़ौज़ी दिखे जो एक भारी लट्ठे को हटाने की कोशिश कर रहे थे.rider5 अधिकारी पास खड़ा था और सिपाही संघर्ष कर रहे थे. घुड़सवार ने अधिकारी से पूछा कि वह मदद क्यों नहीं कर रहा था. अधिकारी ने जवाब दिया, “मैं अधिकारी हूँ, मैं आदेश देता हूँ.” घुड़सवार नीचे उतरा,rider3 जवानों के पास जाकर खड़ा हुआ और जब वे लट्ठा उठा रहे थे, उसने उनकी सहायता की. उसकी मदद से लट्ठा हट गया. घुड़सवार चुपचाप घोड़े पर सवार होकर अधिकारी के पास गया और बोला, “अगली बार तुम्हारे आदमियों को सहायता की ज़रूरत हो तो प्रधान सेनापति को बुला लेना.” उसके जाने के बाद अधिकारी और उसके जवानों को मालूम चला कि वह घुड़सवार जॉर्ज वाशिंगटन थे.

     सीख :

सन्देश काफी साफ़ है. सफलता व विनम्रता साथ-साथ चलती हैं. जब दूसरे आपका भोंपू बजाते हैं, आवाज़ अधिक दूर तक जाती है. इस बारे में ज़रा सोचिए? सादगी और विनम्रता– महानता के दो प्रमाण चिन्ह हैं. विनम्रता का मतलब स्वयं को नीचा दिखाना नहीं होता है.

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Translation : अर्चना