Archive | March 2017

दीवार के दूसरी तरफ

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: ध्यान रखना, लगातार कोशिश

एक युवा महिला थी जिसे अपने फूलों के बगीचे की देखरेख व उगाई पर बहुत गर्व था. इस महिला का लालन-पालन उसकी दादी ने किया था और उन्होंने ठीक अपनी ही तरह उसे भी पौधों की देखरेख व उनसे प्रेम करना सिखाया था.

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इस कारण उसकी दादी की ही तरह उसका बगीचा भी अत्यंत उत्कृष्ट था. एक दिन जब वह महिला अपने फूलों की तालिका को उलट-पुलट रही थी तब उसकी नज़र एक पौधे की तस्वीर पर पड़ी.

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उसने ऐसे खूबसूरत फूल पहले कभी नहीं देखे थे. उसने मन ही मन सोचा, “ऐसे फूल मेरे पास होने ही चाहिए ” और उसने तुरंत वह पौधा मंगवा लिया.

पौधे के आने से पहले ही उसने बगीचे में उसके लिए स्थान तैयार रखा हुआ था. पौधा आने पर उसने उसे अपने घर के आँगन के पीछे पत्थर की दीवार के तले लगा दिया. देखते ही देखते वह पौधा बहुत ही खूबसूरती से पनपने लगा और आकर्षक हरी पत्तियों से भर गया. पर उसमें एक भी फूल नहीं खिला. वह महिला पूरे मन व मेहनत से पौधे को नियमित रूप से पानी व खाद देती रही. यहाँ तक कि पौधे को खिलने के लिए उससे मीठी बातें भी करती थी. परंतु कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

कुछ हफ़्तों बाद एक सुबह वह फूलों की बेल के पास खड़ी होकर सोच रही थी कि उस हरी-भरी बेल में फूल न खिलने से वह कितनी निराश थी. वह इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही थी यदि उसे उस पौधे को काटकर कोई अन्य पौधा लगाना चाहिए. तभी उसकी अपाहिज पड़ोसी, जिसके घर से वह पत्थर की दीवार सांझी थी, का फ़ोन आया. ph5
“तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद. तुम सोच भी नहीं सकती कि मैंने तुम्हारी लगाई बेल के मनमोहक फूलों का कितना आनंद उठाया है.”

पड़ोसी की बात सुनकर महिला झटपट पड़ोसी के आँगन में गई और उसने बेल अति सुन्दर फूलों से भरी पाई. ऐसे आकर्षक फूल उसने पहले कभी नहीं देखे थे. महिला द्वारा लगाया हुआ पौधा धीरे-धीरे पड़ोसी के बाड़े की तरफ फैल गया था और किसी कारण से पड़ोसी की तरफ की बेल अत्यंत ख़ूबसूरत फूलों से लदी हुई थी. सिर्फ इसलिए कि हम अपनी मेहनत का परिणाम देख नहीं सकते हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा परिश्रम सफल नहीं हुआ.

सीख:
कठिन परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता है. यह आवश्यक नहीं है कि अच्छा कार्य हमेशा प्रत्यक्ष हो पर किसी न किसी रूप में उसका सकारात्मक प्रभाव ज़रूर पड़ता है. हमारा अच्छा कार्य किसी और के जीवन में अंतर ला सकता है. हमें पूरे विश्वास के साथ लगातार प्रयास करते रहना चाहिए, परिणाम अवश्य प्रत्यक्ष होगा.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

अधिक उदार कौन है

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     आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: उदारता

एक बार कृष्ण और अर्जुन एक गाँव की ओर जा रहे थे. अर्जुन कृष्ण से बार-बार एक ही प्रश्न कर रहा था कि दान-दक्षिणा के संदर्भ में उसकी अपेक्षा कर्ण को अनुकरणीय व्यक्ति क्यों समझा जाता है. अर्जुन को सीख सिखाने के उद्देश्य से कृष्ण ने अपने हाथ की अंगुलियाँ तोड़ दीं और उनके ऐसा करते ही उनके मार्ग के आस-पास के दो पहाड़ सोने में परिवर्तित हो गए.

karn4फिर कृष्ण बोले, “अर्जुन, यह दोनों सोने के पहाड़ सभी ग्रामवासियों में बाँट दो. इस बात का ध्यान रखना कि तुम इन दोनों पहाड़ों का समस्त सोना दानस्वरूप दो.’

कृष्ण के आदेशानुसार अर्जुन गाँव में गया और उसने घोषणा की वह प्रत्येक ग्रामवासी को सोना दान में देगा. अर्जुन ने सभी ग्रामवासियों को एक पहाड़ के पास एकत्रित होने को कहा. सभी ग्रामवासी अत्यंत प्रसन्न होकर अर्जुन की प्रशंसा करने लगे और अर्जुन छाती तानकर अभिमान से पहाड़ की ओर बढ़ा. दो दिन और दो रातों तक लगातार पहाड़ खोदकर वह सोना निकाल-निकालकर ग्रामवासियों को दान देता रहा. परंतु फिर भी पहाड़ वैसे के वैसे ही थे और उनका सोना ज़रा भी काम नहीं हुआ. बहुत सारे ग्रामवासी झटपट वापस आकर दुबारा कतार में खड़े हो रहे थे. कुछ समय बाद अर्जुन को थकान व कमज़ोरी महसूस होने लगी. पर फिर भी वह अपना अभिमान छोड़ने को तैयार नहीं था और उसने कृष्ण से कहा कि कुछ देर आराम करने के बाद वह वापस काम पर लग जाएगा.

इस दौरान कृष्ण ने कर्ण को बुलाया. उन्होंने कर्ण से कहा, “कर्ण, तुम्हें इन दोनों पहाड़ों का एक-एक अंश दान देना है.” कर्ण ने तुरंत दो गाँववालों को बुलाया और उनसे बोला, “तुम वह दो पहाड़ देख रहे हो? वह दोनों सोने के पहाड़ तुम सभी ग्रामवासियों के लिए हैं. तुम उन्हें जिस प्रकार चाहो उस प्रकार इस्तेमाल कर सकते हो.” ऐसा कहकर कर्ण वहाँ से चला गया.

 

कर्ण को देखकर अर्जुन अवाक था. उसे आश्चर्य हुआ कि ऐसा विचार उसके मन में क्यों नहीं आया.

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अर्जुन की ओर देखकर कृष्ण शरारती ढंग से मुस्कुराए और बोले, “अर्जुन, अवचेतन रूप से तुम स्वयं भी सोने की ओर आकृष्ट थे. तुमने दुखी मन से हर ग्रामवासी को दान दिया और उतना ही दिया जितना तुम्हारे हिसाब से प्रचुर था.karn6 इसलिए तुम्हारे दान का माप केवल तुम्हारी कल्पना पर आधारित था. लेकिन कर्ण के साथ ऐसा नहीं था. इतना सब दान करने के बाद भी वह असम्बद्ध रहा और उसने लोगों से अपनी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं की. उसे कोई परवाह नहीं थी कि लोग उसकी पीठ पीछे उसके लिए अच्छा बोल रहें हैं या बुरा. ज्ञानोदय के पथ पर चल रहे व्यक्ति का यही प्रतीक होता है.

सीख:

सही मायने में देना या प्रेम करना वह है जो बिना किसी शर्त के किया जाए. हमें सदा सही कार्य करना चाहिए क्योंकि हमें शुरू से यही सीख दी गई है. किसी नाम, सत्कार या प्रशंसा की परवाह किए बिना सही कार्य करना ही मनुष्य की विशिष्टता है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

जब आंधी चलती है

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आदर्श: शान्ति
उप आदर्श: विश्वास

बहुत साल पहले अटलांटिक महासागर के तट पर एक किसान की ज़मीन थी. किसान को अपनी ज़मीन पर खेती-बाड़ी करने के लिए एक मज़दूर की ज़रुरत थी और इस कारण वह निरंतर विज्ञापन देता रहता था.storm2 परंतु उसके खेत अटलांटिक महासागर के तट पर होने के कारण कोई भी काम करने को तैयार नहीं होता था. सभी भयानक तूफानों से डरते थे जो अटलांटिक महासागर में प्रबल थे और इमारतों व फसलों को तहस-नहस कर देते थे.

जब किसान ने आवेदकों से नौकरी के लिए बातचीत करनी शुरू की तब उसे एक के बाद एक मायूसी का ही सामना करना पड़ा. अंततः एक नाटा, दुबला और मध्य आयु का व्यक्ति किसान के पास आया. किसान ने उससे पूछा, “क्या तुम एक अच्छे मजदूर हो?”

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उस मजदूर ने सबेरे से रात तक एक जुट होकर खेत पर कठिन मेहनत से काम किया और किसान उसके काम से बहुत खुश भी था. फिर एक रात समुद्र में ज़ोर से सांय-सांय करती हुई तेज़ हवा चलने लगी. हड़बड़ाकर किसान अपने बिस्तरे से निकला, झटपट लालटेन पकड़ी और मजदूर के निवास की ओर तेज़ी से दौड़ा. किसान ने मजदूर को झकझोर और चिल्लाकर बोला, “उठो! तूफ़ान आने वाला है. सारा सामान बाँधकर ठीक से रखो वरना सब कुछ उड़ जाएगा.”

मजदूर बिस्तर पर लेटा रहा और स्थिर व विश्वस्त आवाज़ में बोला, “नहीं साहब! मैंने आपसे से कहा था कि आंधी आने पर मैं सो सकता हूँ.”

मजदूर का जवाब सुनकर किसान को बहुत गुस्सा आया और उसकी बहुत इच्छा हुई कि मजदूर को नौकरी से निकाल दे. परंतु आने वाले तूफ़ान के बारे में सोचकर वह पहले उसकी तैयारी करने के लिए झटपट खेत की ओर भागा. खेत पहुँचकर किसान अचंभित था क्योंकि उसने देखा कि घास का सारा ढेर तिरपाल से भली भाँती ढका हुआ था. गायें बाड़े में थीं, मुर्गियों के बच्चे पिंजरों में थे और सारे दरवाज़े बंद थे. सारे किवाड़ कसकर बाँधे हुए थे.

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सभी कुछ इतनी अच्छी तरह से व्यवस्थित था कि किसी भी प्रकार की हानि की कोई गुंजाइश नहीं थी. तब किसान को अपने मजदूर की बात समझ में आई और वह भी आराम से सोने चला गया.

सीख:

जब हम आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होते हैं तब हमें किसी प्रकार का डर नहीं होता है. हमारी ज़िन्दगी में तूफ़ान आने पर क्या हम भी सो सकते हैं? हमारी मानसिक ताकत व सही रवैये की बुनियाद हमारा विश्वास है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

क्षमा करना अच्छा है

 

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: क्षमा

रमेश ने बहुत ही बड़ा और उत्कृष्ट घर खरीदा. घर के चारों ओर एक विशाल बगीचा था जिसमें कई तरह के फलों के वृक्ष थे. रमेश के घर के पास एक पुराने से घर में एक ईर्ष्यालु व्यक्ति रहता था जो सदा रमेश को तंग करने की योजना तैयार करता रहता था. कभी वह दरवाज़े के नीचे से कूड़ा करकट फेंकता था तो कभी कोई अन्य गन्दी हरकत करता था.

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एक दिन सुबह उठकर जब रमेश अपने घर के बरामदे में गया तब उसे वहाँ गंदे, मैले और बदबूदार पानी से भरी एक बाल्टी मिली.

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रमेश ने बाल्टी उठाई, उसका गन्दा पानी फेंककर बाल्टी को साफ़ किया, उसमें सबसे बड़े स्वादिष्ट व पके हुए सेब भरे और बाल्टी लेकर उस ईर्ष्यालु व्यक्ति के घर गया.

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दरवाज़े पर दस्तक सुनकर ईर्ष्यालु व्यक्ति मन ही मन मुस्कुराया और बोला, “आहा! अब मज़ा आएगा!” अपवाद और झगड़े की उम्मीद में जब उसने दरवाज़ा खोला तब सेब से भरी बाल्टी हाथ में लिए रमेश बोला, “जो अमीर होता है वह ही दूसरों में बाँटता है.”

सीख:

हमें अपना सही आचरण व आदर्श बदलने नहीं चाहिए. हमारे आदर्श ही हमें दूसरों से अलग व बेहतर बनाते हैं. हमें चोट पहुँचाने वालों को भी क्षमा करके यदि हम उनके साथ प्रेम बांटेंगें तो हमें दूसरों से और अधिक प्रेम मिलेगा.

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अनुवादक- अर्चना

दूध की बाल्टी में मेंढक

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     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: दृढ़ता

एक मेंढक एक खेत में इधर-उधर फुदक रहा था. इस दौरान उसे खेत में एक अनाजघर दिखा. मेंढक ने अनाजघर की छान-बीन करने का निर्णय किया. कुछ-कुछ लापरवाह व कुछ ज़्यादा ही उत्सुक होने के कारण इधर-उधर देखते हुए वह अचानक एक बाल्टी में गिर गया. बाल्टी ताज़े दूध से आधी भरी हुई थी.

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बाल्टी से बाहर निकलने की अथक चेष्टा के बावजूद सफल न होने पर उसे अहसास हुआ कि बाल्टी की सतह तक पहुँचना उसकी पहुँच से बाहर था क्योंकि दूध की बाल्टी काफी ऊँची थी और उसकी ढलान तीव्र थी. उसने अपने पीछे के पैरों को पूर्णरूप से फैलाया ताकि वह बाल्टी की सतह को छूकर स्वयं को ऊपर की ओर धकेल पाता. लेकिन बाल्टी काफ़ी गहरी थी और इस कारण मेंढक के पैर तह तक नहीं पहुँच पा रहे थे. मेंढक दृढ़ संकल्प था कि वह हार नहीं मानेगा और उसने अपना संघर्ष जारी रखा.

वह लगातार इधर-उधर पैर मारता रहा और छटपटाता रहा. अंततः उसके इस निरंतर मंथन से दूध मक्खन के एक बड़े टुकड़े में परिवर्तित हो गया. मक्खन का टुकड़ा ठोस होने के कारण मेंढक उस पर चढ़कर बाल्टी से बाहर निकल आया.

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सीख:

सतत प्रयत्न करने से सफलता अवश्य ही मिलती है. हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना