Archive | August 2019

        क्रोधी साधु 

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    यह कहानी एक साधु की है जो एक गाँव में रहता था. गाँव में साधु को बहुत सम्मान दिया जाता था और गाँव घनी आबादी का होने के कारण कई लोग उस साधु से आशीर्वाद लेने और आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करने आते थे. मिलनेवालों और ग्रामीणों के निरंतर व भारी मात्रा में आने का मतलब था कि साधु सदैव उनके प्रश्नों और समस्याओं में व्यस्त रहता था. इसके परिणामस्वरूप साधु अपनी रोज़मर्रा की आध्यात्मिक कार्यप्रणाली व साधना नहीं कर पाता था और इसलिए आसानी से चिड़चिड़ा व क्रोधित हो जाता था. उसने सोचा कि यदि वह गाँव छोड़कर कहीं दूर पहाड़ों में चला जाएगा तो बिना किसी बाधा के जप-तप कर पाएगा और फिर कभी क्रोधित नहीं होगा.  

  ऐसा सोचकर साधु एक दूरवर्ती पहाड़ की ओर चला गया. यह पहाड़ फलों से लदे पेड़ों से घिरा हुआ था और पास ही एक नदी थी जिसमें ताज़ा व मधुर पानी बहता था. साधु ने वहाँ अपनी कुटिया बनाई और निर्बाध तप करना शुरू कर दिया.

     एक दिन साधु को बहुत प्यास लगी और एक पात्र लेकर वह पानी लेने पहाड़ी से नीचे आया. पानी लेते समय पात्र उसके हाथ से फिसल गया और पहाड़ी से लुढ़क गया. वह पुनः एक पात्र लेकर आया और पानी लेकर वापस जाने लगा. लौटते समय गलती से एक पत्थर से ठोकर लगने के कारण वह लड़खड़ा गया. एक बार फिर पानी का पात्र साधु के हाथ से फिसल गया. इस बार साधु को गुस्सा आया. 

    तब उसे एकाएक अहसास हुआ- जब वह गाँव में था तब वह सोचता था कि उसके गुस्से का कारण वहाँ के लोग थे पर अब यहाँ तो कोई भी नहीं था. फिर भी वह अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था. तब उसे समझ में आया कि उसके क्रोध का कारण लोग नहीं थे परन्तु यह उसके स्वभाव का परिणाम था.

   उसे स्पष्ट समझ में आया कि उसने अपने परिवार आदि का त्याग करके गेरू वस्त्र इसलिए धारण किये थे ताकि वह अपनी आध्यात्मिक खोज का लक्षण हासिल कर सके. उसे क्रोध व अहंकार जैसे भीतरी शत्रुओं का त्याग करना था और प्रेम व धैर्य जैसे सद्गुणों का विकास करना था. यद्यपि लोग उसे एक आदरणीय संत मानते थे पर दुर्भाग्यवश वह अपने क्रोध पर भी नियंत्रण नहीं कर पाया था. 

    बाहरी रूप का क्या लाभ था जब वह सहनशीलता व क्रोध पर नियंत्रण जैसे उत्तम सद्गुणों का अभ्यास करने में असक्षम था. 

    उन आदर्शों को व्यवहार में लाने का संकल्प करके वह गाँव वापस गया. वहाँ उसने अपना तप जारी रखा और दुबारा कभी गुस्सा नहीं किया. 

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     सारांश:

    गुरु कहते हैं कि उलझे बाल या सिर मुंडा वाले भिक्षु, सिद्ध पुरुष हो भी सकते हैं और नहीं भी. ऐसे बाहरी परिवर्तन, अंतरात्मा के सूचक नहीं होते हैं. हमें प्रभु व सत्य की तलाश में अपने अंदर के मौलिक तत्त्व पर ध्यान देना चाहिए.

   भीतरी बदलाव ही वास्तविक बदलाव है.

   यद्यपि बाहरी बदलाव आतंरिक परिवर्तन पर असर डाल सकता है, भीतरी परिवर्तन बाहरी बदलाव को और भी अधिक प्रभावित करता है. उन विशेषताओं को अपनाने वाले व्यक्ति के चेहरे पर अंतरीय सुंदरता झलकती है; बाहरी श्रृंगार केवल कुछ समय के लिए ही क़ायम रहता है.

   अतः आत्म-निरिक्षण बहुत महत्वपूर्ण है. पवित्र मन से आत्म-निरिक्षण हमें हमारी आध्यत्मिक यात्रा में मदद करता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक-अर्चना    

    कृतज्ञता नसीब बदल सकती है 

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    एक छोटी सी चिड़िया रेगिस्तान में रहती थी. मरूस्थल में हरियाली न होने के कारण वह चिड़िया दिनभर गर्म रेत पर फुदकती रहती थी.

    भगवन के पास जा रहे एक देवदूत ने नन्हीं चिड़िया को देखा और उसकी दशा देखकर उस पर तरस आया. उसने चिड़िया से पूछा, “अरे नन्हीं चिड़िया ! तुम इस गर्म रेगिस्तान में क्या कर रही हो? क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ?”little bird1

   नन्हीं चिड़िया बोली, “वैसे तो मैं अपने जीवन से बहुत प्रसन्न हूँ लेकिन यह गर्मी असहनीय है. मेरे दोनों पैर जल रहे हैं. मुझे ख़ुशी होती यदि यहाँ एक पेड़ होता.” 

    देवदूत बोला, “रेगिस्तान के बीच में पेड़ उगाना मेरे कार्यक्षेत्र के बाहर है. मैं भगवान् से मिलने जा रहा हूँ. उनसे मिलकर पूछता हूँ यदि वह तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकते हैं.”

    भगवान् से मिलने पर देवदूत ने उनसे पूछा यदि वह चिड़िया की मदद कर सकते थे. भगवान् बोले, “मैं एक पेड़ अवश्य उगा सकता हूँ पर उस चिड़िया की नियति इसकी अनुमति नहीं देती है. मैं उसका नसीब नहीं बदल सकता हूँ. लेकिन तुम उस तक मेरा यह सन्देश पहुँचा दो जो उसे गर्मी से बचे रहने में मदद करेगा. उससे कहो कि वह एक समय में केवल एक पैर से कूदे और बीच-बीच में पैर बदलती रहे. ऐसा करने से केवल एक पैर को ही ताप सहना पड़ेगा और दूसरे पैर को कुछ देर आराम करके पुनः स्वस्थ होने का समय मिलेगा. उससे यह भी कहो कि वह अपने जीवन में घटित सभी अच्छी घटनाओं को याद करके ईश्वर की आभारी रहे.”

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     देवदूत चिड़िया के पास आया और उसे भगवान् का सन्देश दिया.

     चिड़िया इस सुझाव से प्रसन्न हुई और उसके जीवन को आरामदायक व सुखद बनाने के लिए देवदूत द्वारा किये गए प्रयास के लिए उसका आभार माना. 

     कुछ दिनों बाद देवदूत उसी रेगिस्तान से गुज़र रहा था और उसने नन्हीं चिड़िया का हाल-चाल पूछने का सोचा. उसने देखा कि वह चिड़िया रेगिस्तान के ठीक बीच में एक बड़े से हरे-भरे पेड़ पर बैठी हुई थी. चिड़िया को आनंदित देखकर देवदूत खुश था लेकिन ईश्वर से बहुत निराश था क्योंकि उन्होंने उसे संकेत दिया था कि इस चिड़िया के नसीब में कोई पेड़ नहीं था. 

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    देवदूत भगवान् से मिलने गया और उन्हें सारी कहानी सुनाई. भगवान् बोले, “मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला. चिड़िया के नसीब में कोई पेड़ नहीं था. लेकिन तुमने जब चिड़िया को मेरा सन्देश दिया और उससे सभी हितकर चीज़ों के लिए भगवान् के प्रति आभारी होने के लिए कहा तो उसने वास्तव में उन शब्दों को कार्यान्वित किया. अपने जीवन की हर संभव बात को याद करके उसने एक निर्मल मन से प्रभु को धन्यवाद दिया. उसकी कृतज्ञता की भावना ने मुझे द्रवित कर दिया और इसी कारण मुझे उसका नसीब बदलना पड़ा.” 

प्रभु का उत्तर सुनकर देवदूत प्रसन्न था. 

      सीख:

  कृतज्ञता सदैव अनुग्रह उत्पन्न करती है. जीवन में हमारे पास जो कुछ भी है हमें उसके लिए सदा आभारी रहना चाहिए और इन्हें प्रदान करने के लिए ब्रह्माण्ड का धन्यवाद करना चाहिए. हमें जीवन में मिले आशीर्वादों की गणना करनी चाहिए. एक छोटी सी कृतज्ञता हमारे जीवन में सकारात्मकता ला सकती है.

   यह अतिआवश्यक है कि अपनी दैनिक गतिविधियों को करते हुए बच्चे कुछ समय निकालकर ईश्वर का ध्यान करें और अपने ऊपर बरसाए सभी आशीर्वादों के लिए प्रभु का आभार प्रकट करें. यदि अच्छी व प्रेरक किताबें पढ़ने में समय निवेश किया जाए और मौन बैठकर कुछ समय व्यतीत किया जाए तो यह एक संतुलित व संतोषजनक जीवन बिताने में बहुत मदद करता है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक-अर्चना