Archive | April 2015

प्रतिबिम्ब

 आदर्श : सत्य

  उप आदर्श : आशापूर्ण दृष्टि

एक पुत्र और उसके पिता पहाड़ पर चल रहे थे.refअचानक पुत्र गिर पड़ा, उसे चोट आई और वह चिल्लाया, “आह्ह्ह्ह !!!!!!”
पहाड़ पर अपनी आवाज़ की गूँज सुनकर उसे बहुत हैरानी होती है.
“आह्ह्हह्ह !!!!”

जिज्ञासावश वह चिल्लाता है, “कौन हो तुम?”
उसे जवाब मिलता है, “कौन हो तुम?”

इस जवाब से क्रोधित होकर वह चीखता है, “डरपोक !”
उसे जवाब मिलता है, “डरपोक !”

वह अपने पिता की ओर देखकर उनसे पूछता है, “यह क्या हो रहा है?”
पिता मुस्कुराकर कहते हैं, “मेरे बेटे, ध्यान दो.”
और फिर पिता चिल्लाकर पहाड़ को कहते हैं, “मैं तुम्हारा समादर करता हूँ.”
आवाज़ जवाब देती है, “मैं तुम्हारा समादर करता हूँ.”
पिता पुनः चिल्लाते हैं, “तुम सर्वोत्तम हो.”ref2
आवाज़ जवाब देती है, “तुम सर्वोत्तम हो.”
लड़के को आश्चर्य होता है पर उसे समझ नहीं आता है.

तब पिता उसे समझाते हैं,ref1 “लोग इसे प्रतिध्वनि कहते हैं परन्तु वास्तव में यह जीवन है. तुम जो भी कहते या करते हो, ज़िन्दगी तुम्हें वापस देती है. हमारा जीवन सारे कर्मों का प्रतिबिम्ब मात्र है. अगर तुम्हें संसार में और अधिक प्रेम चाहिए तो अपने हृदय में और अधिक प्रेम उत्पन्न करो.”

“अगर तुम अपने समूह में और अधिक योग्यता चाहते हो तो अपनी योग्यता में सुधार करो. यह सम्बन्ध जीवन के हर पहलू में लागू होता है. ज़िन्दगी तुम्हें वह सब कुछ वापस देगी जो तुमने ज़िन्दगी को दिया है.”

सीख:

हमारा जीवन संयोग नहीं है. यह हमारा प्रतिबिम्ब है. अतः यदि हम सकारात्मक विचारों का निर्माण करेंगें और स्वयं में विश्वास रखेंगें तो हम सफलता अवश्य हासिल कर सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

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शालुक की जीत

 आदर्श : प्रेम
  उप आदर्श : श्रद्धा

गुजरात के महूदी नामक गॉंव में, मेशवो नदी के उपजाऊ तट shalukपर जीवनभाई नाम का एक गरीब किसान रहता था. जीवनभाई एक प्रकार का ख़रबूज़ा उगाता था जिसे चिबुद कहते हैं.shaluk3 उसकी पत्नी, केसरबाई तथा बेटा, शालुक भी उसकी मदद करते थे.

एक बार शालुक ने अपनी माँ, केसरबाई से कहा, “माँ, मैं चाहता हूँ कि श्री महाराज हमारा एक रसीला चिबुद चखें. क्या मैं एक उनके लिए ले जाऊँ?” “अगर महाराज हमारा चिबुद खायेंगें तो यह हमारा सौभाग्य होगा.”

अगले दिन शालुक ने नदी के तट से सबसे सुन्दर व पका हुआ चिबुद तोड़ा और महाराज को फल देने चल पड़ा. shaluk2

जल्द ही उसे चिबुद खाने का मन होने लगा; उसके मुहँ में पानी आने लगा और उसने सोचा, “अमीर भक्तों द्वारा भेंट किए गए स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन की तुलना में हमारा यह सस्ता फल क्या महाराज वास्तव में स्वीकार करेंगें? चलो मैं इसे स्वयं ही खा लेता हूँ.”

जल्द ही उसके विचार इतने ढृढ़ हो गए कि वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और उसने अपने थैले में से चाकू निकाला. जैसे ही वह फल काटने लगा, उसे एक और विचार आया. यह भाव उसके हृदय से आता प्रतीत हो रहा था. “शालुक, तुम कितने कमज़ोर हो.” जिस फल को तुम महाराज को देना चाह रहे हो, तुम उसे स्वयं कैसे खा सकते हो? महाराज के प्रति तुम्हारी महान श्रद्धा का क्या हुआ?”

महाराज के प्रति शालुक की तीव्र निष्ठा ने उसे झिंझोड़ दिया. अतः उसने अपने मन से कहा, “अब सुनो, यह चिबुद महाराज के लिए है.”और दृढ़ मत होकर वह पुनः चलने लगा.

कुछ समय बाद पैदल चलने ने शालुक को प्यासा और भूखा कर दिया और उसका मन फिर से चंचल हो गया. “बेवकूफ, चिबुद खा ले. ऐसी तुच्छ व छोटी सी चीज़ में महाराज को दिलचस्पी नहीं होगी. अमीर भक्त उन्हें कहीं बेहतर खाना देंगें. फटा फट खा ले और घर लौट जा.”

लालच ने नन्हे शालुक को वशीभूत कर लिया. जैसे ही उसने चाकू निकालने के लिए अपना हाथ थैले में डाला, उसे फिर से अपने भीतर से एक आवाज़ सुनाई पड़ी, “नहीं शालुक! तुम महाराज के सच्चे बाल भक्त हो. अपने मन की मत सुनो.”

“अब यह सुनिश्चित है,” शालुक ने स्वयं से दृढ़ता से कहा, “मैं चिबुद नहीं खाऊँगा. यह महाराज के लिए है. स्वामी नारायण! स्वामी नारायण!” जैसे ही उसने इस   दिव्य मन्त्र का जाप करना शुरू किया, उसका ध्यान महाराज की उत्कृष्ट छवि पर केंद्रित होने लगा. shaluk4वह तेज भागने लगा और लगातार जाप करता रहा, “स्वामी नारायण! स्वामी नारायण!”

शीघ्र ही वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ महाराज सभा में बैठे हुए थे और परमहंस कीर्तन कर रहे थे. महाराज की पवित्र छवि देखकर शालुक मंत्रमुग्ध था. शालुक को देखकर सर्वज्ञानी महाराज उसके भाव तुरंत जान गए और उन्होंने इशारे से शालुक को अपने पास बुलाया. शालुक का दिल ख़ुशी के कारण ज़ोर से धड़के लगा. वह महाराज की ओर भागा और उनके चरणों में गिर गया. फिर खड़े होकर उसने अत्यंत श्रद्धा व विनम्रता से चिबुद महाराज की गोद में रखा.

तब महाराज बोले, “शालुक, अपने थैले में से मुझे वह चाकू दो. मैं इस चिबुद को अभी खाना चाहता हूँ.”
महाराज ने चिबुद खाना शुरू किया और सारा ख़त्म कर दिया. वहाँ उपस्थित सभी जन आश्चर्यचकित थे और शालुक के मनोभाव पर हैरान थे. सभा को कुछ बताने से पहले, महाराज ने शालुक को बर्फी का मटका देकर उसे गले लगाया.

इस दृश्य को देखकर समस्त सभाजन जोर-जोर से ताली बजाने लगे. अब सब लोग यह जानने को व्याकुल व उत्सुक थे कि इस नन्हे बालक पर महाराज इतनी खुशी व कृपा क्यों बरसा रहे थे.

अंततः महाराज बोले, “इस नन्हे बालक ने चिबुद यहाँ तक लाने के लिए अपने मन से संघर्ष किया है. इसने लालच का बहादुरी से सामना किया और कई बार “घायल” भी हुआ. पर इसने हार नहीं मानी और विजय हासिल की. भगवान और उनके साधु सदा उनकी मदद करते हैं जो अपने मन से संघर्ष करते हैं.”

सभी को अहसास हुआ कि महाराज ने सारा चिबुद स्वाद के लिए नहीं बल्कि शालुक की तीव्र व हार्दिक श्रद्धा संतुष्ट करने के लिए खाया था.

सभी ने शालुक की प्रशंसा की, “शाबाश शालुक! अपने मन को पराजित कर के, तुमने सारे संसार पर जीत हासिल की है.”

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अनुवादक- अर्चना

बारिश में बचाना

            आदर्श : प्रेम

       उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा

एक रात, ११:३० बजे, एक बुज़ुर्ग अफ़्रीकी अमरीकी महिला एक राजमार्ग के किनारे खड़ी हुईं थीं. वह प्रचूर वर्षा-तूफ़ान को सहने की कोशिश कर रहीं थीं.rain2 उनकी गाड़ी खराब हो गई थी और उन्हें मदद की सख्त ज़रुरत थी. बुरी तरह भीगे हुए, उन्होंने अगली गाड़ी को रोककर मदद माँगने का निश्चय किया. rain1एक जवान गोरा आदमी उनकी सहायता के लिए रूका.rain4 ऐसा १९६० के संघर्ष ग्रस्त ज़माने में असाधारण था. वह व्यक्ति उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गया, उन्हें सहायता दिलवाने में मदद की और उन्हें एक टैक्सी में बैठा दिया.

वह महिला काफ़ी जलबाज़ी में लग रहीं थीं पर फिर भी उस व्यक्ति का ठिकाना लिखकर उन्होंने उसका धन्यवाद दिया. सात दिन बीत गए और उस व्यक्ति के दरवाज़े पर खटखटाहट हुई. उसे आश्चर्य हुआ जब एक विशाल रंगीन टेलीविज़न उसके घर पहुँचाया गया. rain5उसपर एक विशेष टिप्पणी लगी हुई थी.

उस पर लिखा था, “उस रात राजमार्ग पर मेरी सहायता करने के लिए तुम्हारा अत्यधिक धन्यवाद. बारिश ने न सिर्फ मेरे कपड़े परन्तु मेरे उत्साह को भी भिगो दिया था. फिर तुम आए. तुम्हारे कारण मैं अपने, अंतिम सासें ले रहे, पति के पास पहुँच पाई – ठीक उनकी मृत्यु से पहले…..मेरी सहायता तथा दूसरों की निस्स्वार्थ भाव से सेवा करने के लिए भगवान तुम्हें सदा सुखी रखें.”

 सीख :
दूसरों की बिना किसी अपेक्षा सेवा करो. जब तुम किसी की मदद करोगे या किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट ला पाओगे तो तुम्हें अत्यंत ख़ुशी होगी.

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अनुवादक- अर्चना

ज़रुरत के समय मदद करना

           आदर्श : प्रेम
      उप आदर्श : सहानुभूति

बहुत समय पहले मैं एक अस्पताल में स्वयंसेवी के रूप में काम करता था. तब मेरी जान-पहचान लिज़ नामक एक लड़की से हुई जो एक दुर्लभ तथा गंभीर बीमारी से पीड़ित थी. transfusion1 उसके अच्छे होने की एक मात्र उम्मीद उसके ५ वर्षीय भाई द्वारा रक्ताधान था. उसका भाई इसी बीमारी से चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से बचा था और उसने इस बिमारी से लड़ने के लिए आवश्यक रोग-प्रतिकारक विकसित कर लिए थे. डॉक्टर ने लड़की के छोटे भाई को परिस्थिति समझाई और पूछा यदि वह अपनी बहन को अपना खून देने के लिए तैयार है.transfusion2

मैंने उसे केवल एक क्षण के लिए हिचकिचाते हुए देखा और फिर गहरी साँस लेकर वह बोला, “हाँ, अगर इससे उसकी जान बचती है तो मैं करूँगा.” जैसे रक्ताधान की प्रक्रिया चालू हुई, वह अपनी बहन के साथ वाले बिस्तर पर लेटकर मुस्कुरा रहा था. हम सब लड़की के गालों का गुलाबी रंग वापस आते देख खुश थे. फिर लड़के का चेहरा फीका पड़ने लगा और उसकी मुस्कुराहट मुरझा गई.

लड़के ने डॉक्टर की ओर देखा और काँपती हुई आवाज़ में पूछा, “क्या मैं फौरन मरने वाला हूँ?”

नासमझ होने के कारण, नन्हें बालक ने डॉक्टर को गलत समझा था. उसने सोचा था कि अपनी बहन को बचाने के लिए उसे अपना सारा खून देना पड़ेगा.
सीख :

“काम ऐसे करो जैसे तुम्हें पैसे की ज़रुरत नहीं है, प्यार ऐसे करो जैसे तुम्हें कभी चोट नहीं पहुँची हो और नाचो ऐसे मानो तुम्हें कोई नहीं देख रहा हो.”

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अनुवादक- अर्चना