Archive | March 2014

एक जुट होकर कार्य करना

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उप आदर्श : एकता

आदर्श : उचित आचरण

यह टीम का दूसरा मैच था. हम UWC ईस्ट, सिंगापुर से खेल रहे थे. यह एक महत्वपूर्ण मैच था और हमारी टीम को जीतना था. हमारे प्रशिक्षक ने बताया कि टीम के अधिकतम विद्यार्थियों की संख्या पर प्रतिबन्ध होने के कारण, हममें से कोई एक मैच नहीं खेल सकता.

मैंने स्वेच्छा से स्थानापन्न होने की  पहल की क्योंकि मैं अपने साथियों को खेल में भाग लेने का अवसर देना चाहता था. मैच अच्छे से हो गया और मैंने अपने साथियों का प्रोत्साहन किया.

अंत में जीत हमारी हुई और हमने ख़ुशी का उत्सव मनाया. टीम की मदद कर और उनके साथ कार्य कर के मुझे प्रसन्नता हुई.
इस अनुभव से मैंने यह सीखा है कि हमें केवल अपने बारे में नहीं बल्कि संगठित समूह के दृष्टिकोण से भी सोचना चाहिए.

विवेक- ११ वर्षीय – प्रेमार्पण आदर्श एवं प्रार्थना कक्षा समूह २

वसुंधरा एवं अर्चना  द्वारा अनुवादित

http://premaarpan.wordpress.com

 

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पिता और पुत्र

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उप आदर्श : धैर्य, सहानुभूति

आदर्श :  प्रेम

 

एक ८० वर्षीय बुज़ुर्ग अपने ४५ वर्षीय उच्च शिक्षा प्राप्त पुत्र के साथ घर में सोफे पर बैठे हुए थे. अचानक एक कौआ उनकी खिड़की पर आकर बैठ गया. पिता ने अपने पुत्र से पूछा, “यह क्या है?”

पुत्र ने उत्तर दिया, “यह कौआ है.”

कुछ पल बाद पिता ने अपने पुत्र से दूसरी बार पूछा, “यह क्या है?”

पुत्र बोला, “पिताजी, मैंने आपसे अभी कहा कि यह कौआ है.”

थोड़ी देर बाद, पिता ने अपने बेटे से तीसरी बार पुनः पूछा, “यह क्या है?”

इस बार पुत्र के स्वर में झुँझलाहट  महसूस हुई जब उसने अपने पिता से झिड़क कर कहा, “यह कौआ है, कौआ.”

कुछ और समय उपरान्त, पिता ने अपने बेटे से चौथी बार फिर पूछा, “यह क्या है?”

इस बार पुत्र ने चिल्लाकर पिता से कहा, “जब मैंने आपसे इतनी बार कहा है कि ‘यह एक कौआ है’ तो फिर आप वही प्रश्न बार-बार क्यों दोहरा रहें हैं? क्या यह आपकी समझ में नहीं आता है?”

कुछ समय बाद पिता अपने कमरे में गए और एक फटी-पुरानी दिनचर्या पत्रिका लेकर आये, जो उन्होंने अपने पुत्र के जन्म से संभालकर रखी थी. एक पृष्ठ खोलकर उन्होंने अपने बेटे से उसे पढ़ने को कहा. जब बेटे ने पढ़ा तो उसमें निम्नलिखित शब्द लिखे हुए थे :

आज जब एक कौआ खिड़की पर बैठा हुआ था, मेरा तीन वर्षीय नन्हा बालक मेरे साथ सोफे पर बैठा हुआ था. मेरे पुत्र ने मुझसे २३ बार पूछा कि वह क्या है और मैंने उसे २३ बार उत्तर दिया कि वह एक कौआ है. मैंने उसके बार-बार वही सवाल करने पर भी, उसे हर बार प्रेमपूर्वक गले लगाया. मुझे ज़रा भी क्रोध नहीं आया बल्कि मुझे अपने मासूम बालक के प्रति स्नेह महसूस हुआ.

नन्हे बालक के २३ बार वही प्रश्न करने पर भी पिता को गुस्सा नहीं आया पर आज जब उसी पिता ने वही सवाल अपने बेटे से ४ बार किया तो पुत्र को झुँझलाहट और परेशानी महसूस हुई.

सीख :

अगर आपके माता-पिता वृद्ध हो जाए तो उन्हें ठुकराए नहीं या उन्हें बोझ न  समझें . उनके प्रति शांत, आज्ञाकारी, विनम्र और उदार रहें तथा उनसे शालीनता से बात करें. अपने माता-पिता का ध्यान रखें. आज से यह ऊँचे स्वर में बोलें, “मैं अपने माता-पिता को सदा खुश देखना चाहता हूँ. उन्होंने बचपन से मेरी देखभाल की है. उन्होंने मुझपर सदा निस्वार्थ प्रेम की बौछार की है.  उन्होंने मुझे आज समाज में योग्य और आकर्षक बनाने के लिए, तूफ़ान और गर्मी की परवाह किये बिना, हर पहाड़ तथा घाटी पार की है.”

वसुंधरा और अर्चना

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प्रशंसा

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आदर्श : उचित आचरण

उप आदर्श : कृतज्ञता

शिक्षा की दृष्टि से श्रेष्ठ एक युवा ने एक बड़ी कंपनी में प्रबंधक के पद के लिए आवेदन दिया. पहली इंटरव्यू में वह खरा उतरा. अंतिम निर्णय के लिए कंपनी के निर्देशक ने आखिरी इंटरव्यू ली.  निर्देशक ने युवा के शैक्षणिक परिणामों से पाया कि उसने हमेशा अति उत्तम अंक प्राप्त किये हैं.  निर्देशक ने पूछा,”क्या तुम्हें विद्यालय में छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी?”  युवा ने जवाब दिया, “नहीं.”  निर्देशक ने फिर पूछा, “क्या तुम्हारे पिता स्कूल की फीस देते हैं?” युवक ने कहा, “जब मैं १ वर्ष का था, मेरे पिता का देहांत हो गया था. मेरे स्कूल की फीस मेरी माँ ने दी है.” निर्देशक ने पुनः सवाल किया, “तुम्हारी माँ कहाँ काम करतीं हैं?”  युवा ने उत्तर दिया कि उसकी माँ धोबी थीं.  निर्देशक ने युवा से उसके हाथ दिखाने का अनुरोध किया.  युवक ने निर्देशक को अपने नरम और साफ़ हाथ दिखाए.  निर्देशक ने पूछा,”क्या तुमने कपड़े धोने में पहले कभी अपनी माँ की मदद की है?” युवा ने इंकार करते हुए कहा कि उसकी माँ सदा चाहतीं थीं कि वह अधिक से अधिक पढ़ाई करे.  निर्देशक ने युवा से निवेदन किया कि वह घर जाकर अपनी माँ के हाथ साफ़ करे और अगली सुबह उनसे पुनः मिले. नौकरी को लेकर, युवा के मन में आशा की किरण जागी. उसने घर लौटकर  ख़ुशी से अपनी माँ के हाथ साफ़ करने चाहे. उसकी माँ को काफ़ी आश्चर्य हुआ. ख़ुशी और भय के मिश्रित भावों से उन्होंने अपने हाथ दिखाए. युवा ने धीरे- धीरे माँ के हाथ साफ़ करने शुरू किये और इस दौरान उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे. उसने पहली बार अपनी माँ के हाथों पर झुरियाँ और अनेक घाव देखे.

युवा को पहली बार अहसास हुआ कि यही वो हाथ हैं जिन्होंने उसकी स्कूल की फीस अदा करने के लिए रोज़ कपड़े धोए हैं. उसके शैक्षिक उत्कृष्टता और उज्जवल भविष्य की कीमत उसकी माँ के हाथों के घाव थे. अपनी माँ के हाथ साफ़ करने के बाद युवा ने चुपचाप बाकी के कपड़े धो दिए. उस रात माँ और बेटे ने काफी लम्बे समय तक बातें कीं.

अगली सुबह युवा निर्देशक के कार्यालय गया. निर्देशक ने युवा की आँखों में आँसू देख उससे पूछा, “क्या तुम बता सकते हो कि कल तुमने घर पर क्या किया और क्या सीखा?” युवा ने उत्तर में कहा कि उसने अपनी माँ के हाथ साफ़ किये और उनके बाकी के सारे कपड़े धोए. युवा ने आगे कहा, “मैंने सीखा कि सराहना क्या होता है क्योंकि अपनी माँ के बिना आज मैं इतना सफल नहीं होता. अपनी माँ के साथ काम करके मुझे अहसास हुआ कि कोई भी कार्य करवाना कितना मुश्किल होता है. मैंने पारिवारिक रिश्तों का महत्त्व और मूल्य भी जाना.”

निर्देशक ने कहा,” मैं ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करना चाहता हूँ जो दूसरों की मदद को सराह सके, दूसरों की पीड़ा को समझे तथा जिसके जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना ही न हो. अतः मैं तुम्हे नियुक्त करता हूँ.”

बाद में, इस युवा ने बहुत मेहनत से कार्य किया और अपने सहकर्मियों का सम्मान प्राप्त किया. सभी कर्मचारियों के एक जुट होकर और लगन से काम करने के फलस्वरूप कंपनी ने ज़बरदस्त तरक्की की.

सीख:

संरक्षित वातावरण में पला बच्चा जिसे सारी सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, सर्वप्रथम अपने बारे में ही सोचता है. वह अपने माता पिता के प्रयासों से अनभिज्ञ रहता है. कार्यस्थल में वह सबसे अपेक्षा करता है कि वे उसके निर्देशों का पालन करें. जब वह प्रबंधक बन जाता है, तब भी अपने कर्मचारियों के कष्ट नहीं जान पाता और सदा दूसरों को दोष देता है. ऐसे व्यक्ति जीवन में कितनी भी उपलब्धियाँ हासिल कर ले पर वे सदा असंतुष्ट रहते हैं.  यदि हम संरक्षण देने वाले ऐसे माता-पिता हैं तो सोचें कि हमने अपने बच्चों को प्यार किया या बरबाद किया है? अपने बच्चे को एक बड़े घर में रहने दें, बढ़िया भोजन करने दें, पियानो सीखने एवं बड़ा टीवी देखने दें. परन्तु आप जब घास काटें, उसे भी इसका अनुभव लेने दें. भोजन के पश्चात् अपने भाई-बहनों के साथ अपनी प्लेट व कटोरियाँ धोने दें. ऐसा नहीं है कि आपके पास नौकरानी रखने हेतु धन नहीं है परन्तु इसलिए कि आप बच्चे को सच्चा प्यार देना चाहते हैं. अतः हमें अपने बच्चों को इस प्रकार बड़ा करना चाहिए कि वे दूसरों के प्रयत्नों की प्रशंसा कर सकें. दूसरों की समस्याओं को अनुभव कर सकें और सब के साथ मिल जुल कर काम कर सकें.

वसुंधरा एवं अर्चना

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प्रेम ही तीर्थयात्रा है

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उप आदर्श :  सहानुभूति

आदर्श     :  प्रेम

जब हज़रत जुनैद बग़दादी तीर्थयात्रा पर मक्का जा रहे थे, तो उन्हें एक बेचारा कुत्ता मिला जो कि घायल था. कुत्ते की चारों टाँगे गम्भीर रूप से घायल और लहू लुहान थीं. उस धर्मात्मा ने लाचार जीव को कुएँ पर ले जाने के लिए अपने बाहों में लिया, ताकि वह उसके घाव पानी से धो पाते. उन्होंने इस बात पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया कि उनके कपड़े कुत्ते के ज़ख्मों के खून से नष्ट हो रहे थे. उस समय वह एक रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. अतः उन्हें हरित भूमि मिलने पर ही, कुआँ दिखाई दिया. पर वहाँ कोई रस्सी और बाल्टी नहीं थी जिससे वह कुएँ से पानी निकाल पाते. उन्होंने तुरंत पास के वृक्षों से कुछ पत्ते एकत्रित किये और उन्हें एक साथ बाँधकर छोटी सी बाल्टी बनाई. उन्होंने रस्सी के लिए अपनी पगड़ी का प्रयोग किया.

जब उन्होंने तत्काल तैयार की बाल्टी को कुएँ में डाला तब उन्हें अहसास हुआ कि पानी तक पहुँचने के लिए, उनकी पगड़ी की लम्बाई बहुत कम थी. रस्सी की लम्बाई बढ़ाने के लिए उन्होंने झटपट अपनी कमीज़ उतार कर पगड़ी से बाँध दी. पर रस्सी अभी भी छोटी थी. फिर उन्होंने अपनी पतलून, जो कि मलमल की थी, उतारी और “रस्सी ” से बाँध दी. इससे रस्सी काफी लम्बी हो गयी. तब धर्मात्मा ने कुएँ से पानी निकाला, कुत्ते के घाव धोए और उसकी मलहम पट्टी की. फिर कुत्ते को गोद में लिए, वे आगे बढ़ते रहे. अंततः वह एक गाँव पहुँचे और वहाँ एक मस्जिद में जाकर मुल्लाह से विनती की , “जब तक मैं मक्का से लौटकर नहीं आ जाता, कृप्या इस बेचारे कुत्ते का ध्यान रखिये.”

“मेरे भाई, किसी शंका या भय में मत रहना. मैं वापसी में कुत्ते को अपने साथ अवश्य ले जाऊँगा. ”

उस रात हज़रत जुनैद को सपने में एक उज्जवल दिव्यात्मा के दर्शन हुए. जुनैद को आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा, “जुनैद, तुम्हारी मक्का की तीर्थ यात्रा सम्पूर्ण हो चुकी है. तुमने अपने सुख की परवाह किये बिना, भगवान के इस प्राणी के प्रति दया दिखाकर, ईश्वर के प्रति अपना प्रेम दर्शाया है.”

“ओ भाई, अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम मक्का की यात्रा पूर्ण करना चाहते हो या नहीं. भगवान तो तुमसे पहले से ही  प्रसन्न हैं. भगवान को अपने तथा अपने सभी जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम, सौ तीर्थ यात्राओं से भी अधिक प्रिय है. ”

सीख:

भगवान के दरबार में केवल प्रेम ही महत्वपूर्ण है. प्रेम और भक्ति उन्हें सबसे अधिक अज़ीज़ हैं.

वसुंधरा और अर्चना

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