Archive | January 2016

नकारात्मकता में सकारात्मकता

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     आदर्श  : सत्य
 उप आदर्श : आशावादी

एक स्त्री चिंता में अपने खाने के मेज़ पर बैठी हुई थी. उसे टैक्स के भुगतान की चिंता थी, घर के कामों की चिंता थी और अगले दिन थैंक्सगिविंग के दिवस पर उसका सम्पूर्ण परिवार उसके घर आने वाला था. ऐसे में वह बहुत कृतज्ञ महसूस नहीं कर रही थी. जैसे उसने अपनी निगाह तिरछी घुमाई, उसने देखा कि उसकी नन्ही बेटी अपनी नोटबुक पर ज़ल्दबाज़ी में कुछ लिख रही थी. माँ के पूछने पर बेटी ने कहा, “हमारी अध्यापिका ने आज हमें गृहकार्य में ‘नकारात्मक थैंक्सगिविंग’ पर एक अनुच्छेद लिखने को कहा है. अध्यापिका ने उन बातों को लिखने के लिए कहा है जिनके लिए हम कृतज्ञ हैं. वह सभी बातें जो आरम्भ में हमें ज्यादा अच्छी नहीं लगतीं हैं परन्तु अंततः हमारे लिए अच्छी साबित होती हैं.”

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जिज्ञासापूर्वक माँ ने अपनी बेटी की नोटबुक में झाँका. उसकी बेटी ने कुछ इस प्रकार लिखा था:
“मैं अपनी अंतिम परीक्षा के लिए आभारी हूँ क्योंकि इसका मतलब है कि स्कूल समाप्त होने वाला है.
मैं कड़वी दवाई के लिए आभारी हूँ क्योंकि वह मुझे स्वस्थ होने में मदद करती है.
मैं घड़ी के अलार्म की धुन पर उठने पर शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि इसका अर्थ है कि मैं अभी भी जीवित हूँ.”

अपनी बेटी के विचार पढ़कर माँ ने पुनः सोचा…..

उसे टैक्स का भुगतान करना था पर उसका मतलब था कि वह इतनी भाग्यशाली थी कि उसके पास व्यवसाय था.
उसे घर का काम करना था पर उसका तात्पर्य था कि उसके पास रहने के लिए घर था.
उसे थैंक्सगिविंग के अवसर पर अपने सम्पूर्ण परिवार के लिए खाना पकाना था पर इसका मतलब था कि उसका एक परिवार था जिसके साथ वह उत्सव मना सकती थी.

    सीख:
हम जीवन में प्रायः प्रतिकूल परिस्थितियों के बारे में शिकायत करते हैं और उनके सकारात्मक पक्ष को भूल जाते हैं. हमें कुछ समय निकालकर अपनी नकारात्मकता में सकारात्मकता पर विचार करना चाहिए और हमारे पास जो है उसके लिए कृतार्थ रहना चाहिए.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

मकर संक्रांति

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हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में मकर संक्रांति की गणना भी होती है. इसे सम्पूर्ण भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नाम और परंपरा के अनुसार मनाया जाता है. मकर संक्रांति जनवरी माह में मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है. इस दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरम्भ होती है और इसी कारण इस पर्व को उत्तरायणी भी कहते हैं.

मकर संक्रांति एक कृषि व फसल काटने की प्रक्रिया शुरू होने का उत्सव है. उत्तर भारत में इस पर्व को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. पंजाब व हरियाणा में इसे लोहड़ी के रूप में मनाते हैं. लोगों का मानना है कि इस दिन से शीतऋतु का प्रभाव कम होना शुरू हो जाता है और सभी बसंत ऋतु का हर्षोल्लास से स्वागत करते हैं.makar1

 

 

असम में संक्रांति भोगली बिहू के नाम से प्रख्यात है. जगह -जगह बिहू नृत्य व लोक गीतों का आयोजन किया जाता है.makar9

तमिल नाडु में पोंगल तथा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में संक्रांति के नाम से मनाया जाता है.
इस दिन यूपी व बिहार के लोग खिचड़ी बनाकर भगवान सूर्यदेव को भोग लगाते हैं और इस कारण   इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी मनाते हैं.makar8

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गुजरात प्रदेश में हर जगह आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती दिखाई पड़ती हैं.

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मकर संक्रांति से कई पौराणिक कथाएँ जुड़ीं हुईं हैं-

कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं. चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं, अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है.makar7.jpg

मकर संक्रांति के दिन गंगाजी ऋषि भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिलीं थीं. ऐसा कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था. उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद गंगा इसी दिन सागर में जा मिलीं थीं. इसी कारणवश मकर संक्रांति पर गंगासागर पर भव्य मेला लगता है. मकर संक्रांति पर गंगा नदी में स्नान करना अति शुभ मना जाता है और लोगों का ऐसा विश्वास है कि मकर संक्रांति पर गंगास्नान से सारे पाप धुल जाते हैं.

महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपना देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था.makar6

इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी और सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था. इस कारण यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को ख़त्म करने के दिन भी माना जाता है.

 

मकर संक्रांति का भीतरी अभिप्राय:

मकर संक्रांति के दिन से सूर्यदेव उत्तर की ओर यात्रा आरम्भ करते हैं. उत्तर दिशा मोक्ष की ओर जाने वाले रास्ते को दर्शाती है. ऐसी मान्यता है कि सूर्यदेव हिमाचल की ओर बढ़ना आरम्भ करते हैं. ‘हिम’ का अर्थ है- बर्फ के समान सफ़ेद और ‘अचल’ का अर्थ है- दृढ़ व अटल. इसका तात्पर्य यह है कि केवल एक पवित्र व अटल हृदय में बुद्धि के सूर्यदेव प्रवेश करते हैं और हृदय को प्रकाशित करते हैं. अतः सरल शब्दों में उत्तरायण का अर्थ है, अपनी बुद्धि को अपने भीतर अपने हृदय की ओर मोड़ना. संक्रांति के दिन हमें स्वयं को इस बात कास्मरण कराना चाहिए कि सांसारिक आनंद क्षणभंगुर हैं और हमें एक शुद्ध व पवित्र हृदय की ओर यात्रा आरंम्भ करनी चाहिए.

source: bharatdarshan.co.nz, media.radiosai.org

 

 

कृष्ण की बांसुरी की कहानी

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : आत्मसमर्पण, निष्ठा

कृष्ण की बांसुरी के बारे में एक सुन्दर कहानी है. हम सब जानते हैं कि कृष्ण सदा अपने हाथ में बांसुरी पकड़ते हैं. वास्तव में इसके पीछे एक विख्यात कहानी है. हर रोज़ कृष्ण बगीचे में जाकर सभी पौधों से कहते थे, “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ.” यह सुनकर सभी पौधे अत्यधिक प्रसन्न होते थे और जवाब में वे कृष्ण से कहते थे, “कृष्ण, हम भी आपसे प्रेम करते हैं.”

एक दिन अचानक तेज़ी से दौड़ते हुए कृष्ण बगीचे में आए और सीधे बांस के वृक्ष के पास गए.flute4 वृक्ष ने कृष्ण से पूछा, “कृष्ण, क्या बात है?” कृष्ण ने कहा, “यद्यपि यह बहुत मुश्किल है परन्तु मुझे तुमसे कुछ पूछना है.” बांस ने कहा, “आप मुझे बताइए. यदि संभव होगा तो मैं अवश्य आपकी सहायता करूँगा.” इस पर कृष्ण बोले, “मुझे तुम्हारा जीवन चाहिए. मैं तुम्हें काटना चाहता हूँ.” बांस ने क्षणभर के लिए सोचा और फिर बोला, “आपके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है? क्या दूसरा कोई रास्ता नहीं है?” कृष्ण बोले, “नहीं, बस यही एक रास्ता है.” बांस ने कहा, “ठीक है, मैं स्वयं को आपको समर्पित करता हूँ.”

जब कृष्ण बांस को काटकर उसमें छेद कर रहे थे तब बांस दर्द से चिल्ला रहा था क्योंकि छेद बनाने से बांस को बहुत पीड़ा हो रही थी. परन्तु काटने व तराशने की प्रक्रिया के दौरान होने वाली पीड़ा और दर्द को सहने के बाद, बांस ने स्वयं को एक मनमोहक बांसुरी में रूपांतरित पाया. यह बांसुरी हर समय कृष्ण के साथ रहती थी.

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इस बांसुरी से गोपियाँ भी ईर्ष्या करती थीं. उन्होंने बांसुरी से कहा, “अरे, कृष्ण हैं तो हमारे भगवान पर फिर भी हमें उनके साथ केवल कुछ समय ही व्यतीत करने को मिलता है. वह तुम्हारे साथ ही सोते हैं और तुम्हारे साथ ही उठते हैं. तुम हर समय उनके साथ रहती हो.” एक दिन उन्होंने बांसुरी से पूछा, “हमें इसका रहस्य बताओ. क्या कारण है कि भगवान कृष्ण तुम्हें इतना संजोकर रखते हैं?”

बांसुरी ने उत्तर दिया, “इसका रहस्य यह है कि मैं अंदर से खोखली हूँ. और मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं है.”

सही मायने में आत्मसमर्पण इसी को कहते हैं: जहाँ भगवान आपके साथ जैसा वह चाहें, वैसा कर सकते हैं. इसके लिए आपको डरने की ज़रुरत नहीं है- केवल स्वयं को पूर्णतया समर्पित करने की आवश्यकता है. वास्तविकता में आप कौन हैं? आप प्रभु का ही स्वरुप हैं.

सीख:
ईश्वर को पता है कि हमारे लिए क्या सर्वोत्तम है. उन्होंने हमारे लिए सर्वोत्तम आयोजित किया है. हमें अपना सर्वश्रेष्ठ करने के बाद शेष सब प्रभु पर छोड़ देना चाहिए. हमारी दृष्टि सीमित है. हम परीक्षाओं व पीड़ा से घबराते हैं. पर हमें इस बात का अहसास नहीं होता है कि आने वाले समय में इसमें हमारा भला निहित होता है. जब हम स्वयं को सम्पूर्ण रूप से ईश्वर के चरणों में समर्पित करते हैं तो प्रभु हमारे भले का उत्तरदायित्व अपने हाथ में ले लेते हैं और हमें सदा सर्वश्रेष्ठ ही मिलता है.

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Source:  www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना