Archive | May 2016

अनमोल तलवार

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     आदर्श : अहिंसा
उप आदर्श : शांति

एक समय एक कीमती तलवार थी. यह तलवार एक प्रसिद्ध राजा की थी जो हर समय अपने महल में विभिन्न प्रदर्शनों तथा समारोह के आनंद में लीन रहता था. एक दिन इस राजा तथा उसके पड़ोसी देश के राजा में बहुत बड़ा झगड़ा छिड़ गया.k2 अंततः दोनों राजाओं ने युद्ध की घोषणा कर दी.

तलवार इस बात से काफी उत्तेजित थी कि वह पहली बार किसी वास्तविक लड़ाई में भाग ले पाएगी. वह सभी को अपनी बहादुरी व विशिष्टता दिखना चाहती थी. उसे विश्वास था इस लड़ाई के बाद वह पूरे साम्राज्य में विख्यात हो जाएगी. रणभूमि की ओर आगे बढ़ते हुए तलवार ने पहले से ही स्वयं को अनेक संघर्षों की विजेता मान लिया था. परन्तु जब वह तलवार अपनी सेना के साथ युद्धक्षेत्र पहुँची तो पहली लड़ाई समाप्त हो चुकी थी. अतः युद्ध के परिणाम तलवार के सामने थे. उसने युद्ध की जैसी कल्पना की थी और जो परिणाम उसके सामने था, उन दोनों में ज़रा भी समानता नहीं थी. सूर्य की रोशनी में चमकते हुए शस्त्र लिए सफलता का हर्ष मनाने के लिए वहाँ एक भी योद्धा नहीं था. k3वास्तव में हर तरफ छिन्न-भिन्न शस्त्र थे और भूखी प्यासी सेना थी. खाने के लिए मुश्किल से ही अन्न बचा था. बहुत सारे लोग बुरी तरह घायल थे और ज़मीन पर इधर-उधर अधमरे से पड़े हुए थे. सब कुछ धूल-मिट्टी से ढका हुआ था और दूर-दूर तक घिनौनी बदबू फैली हुई थी.

ऐसा निराशाजनक दृश्य देखकर तलवार को अहसास हुआ कि उसे युद्ध बिलकुल पसंद नहीं था. उसने निश्चय किया कि युद्ध में भाग लेने के बजाय वह खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेकर शान्ति से रहना अधिक पसंद करेगी. अतः युद्ध के अंतिम दिन से एक रात पहले तलवार लड़ाई रोकने का रास्ता सोचने लगी. इस दौरान अचानक तलवार को स्वयं में थरथराहट महसूस हुई. पहले तो तलवार में हलकी सी भनभनाहट थी लेकिन धीरे-धीरे यह आवाज़ तेज़ होने लगी. जल्द ही यह ध्वनि इतनी बढ़ गई कि वह कर्कश कोलाहल में बदल गई. अन्य सैनिकों की तलवारों तथा कवच ने राजा की तलवार से पूछा कि वह क्या कर रही थी. तलवार ने उनसे कहा, “मैं नहीं चाहती कि कल कोई युद्ध हो. मुझे युद्ध पसंद नहीं है.”

एक ने जवाब दिया, “युद्ध तो किसी तो भी पसंद नहीं है पर हम क्या कर सकते हैं?”

“तुम भी मेरी तरह थरथराना शुरू कर दो, “राजा की तलवार ने कहा. “अगर हम सब मिलकर शोर मचाएंगे तो सेना का कोई सिपाही सो नहीं पाएगा.”

राजा की तलवार की बात से प्रभावित होकर सभी अस्त्र-शस्त्र भनभनाने लगे जब तक की उनका शोर कान फाड़नेवाला न हो गया. कोलाहल इतना तेज़ था कि उसकी आवाज़ शत्रुओं के पड़ाव तक पहुँच रही थी. शत्रुओं के शस्त्र भी इस युद्ध से प्रसन्न नहीं थे अतः वह सब भी विरोध में शामिल हो गए.

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अगली सुबह जब युद्ध के शुरू होने का समय हुआ तब कोई भी सैनिक लड़ने को तैयार नहीं था. सभी बहुत थके हुए थे क्योंकि शस्त्रों के कोलाहल के कारण किसी को भी रात की नींद नसीब नहीं हुई थी. राजाओं और सेनापतियों ने युद्ध अगले दिन तक स्थगित करने का फैसला किया और उस दिन सबने दिनभर खूब आराम किया.

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परन्तु रात होने पर राजा की तलवार के नेतृत्व में एक बार फिर सभी शस्त्रों ने अपना शान्ति का नारा दोहराया जिसके परिणामस्वरूप कोई भी सैनिक रातभर सो नहीं पाया. युद्ध को एक बार फिर स्थगित करना पड़ा. ऐसा अगले ७ दिनों तक जारी रहा. सातवें दिन की शाम को दोनों सेनाओं के राजा एक साथ बातचीत करने के लिए मिले.k7शुरू में दोनों अपने पिछले झगड़े को लेकर क्रोधित थे पर कुछ समय साथ बैठने के बाद दोनों अपनी अशांत रातों, अपने सैनिकों के विस्मित चेहरों, रात और दिन का भ्रम तथा इस सब के द्वारा उत्पन्न दिलचस्प परिस्थितियों के बारे में बात करने लगे. जल्द ही दोनों २ दोस्तों की तरह इन नन्हीं कहानियों पर हँस रहे थे.

 

सौभाग्यवश दोनों राजाओं ने अपने पुराने झगड़े भूलाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी. दोनों राजा अपने-अपने राष्ट्रों में दोहरी खुशी लेकर लौटे- उन्हें लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी और दोनों ने एक दूसरे की दोस्ती एक बार फिर से हासिल कर ली.k9 उस दिन के बाद से दोनों राजा अक्सर मिलकर अपने राजा होने के अनुभवों के बारे में चर्चा करते थे. आपस में दोस्ती होने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि जो चीज़ें उन्हें जोड़ती थीं वह उन्हें अलग करने वाली चीज़ों से कहीं अधिक थीं.

सीख:

सभी को शान्ति, खुशी और आनंद चाहिए है. समस्याओं का समाधान युद्ध नहीं है. अहिंसा शांति प्राप्त करने का एक प्रबल उपकरण है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

एक दावेदार का रूपांतर

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     आदर्श : अहिंसा
उप आदर्श : सहनशीलता, क्षमाशील व प्रेम

संत एकनाथ भारत के महाराष्ट्र राज्य के एक प्रतिष्ठित महात्मा थे. एक बार उनके आश्रम के बाहर कुछ लोग ताश के पत्ते खेल रहा थे. उन दिनों में इस प्रकार की गतिविधियाँ बेरोज़गार लोगों में समय बिताने के लिए काफी प्रचलित थीं.

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यह घटना उस दिन की है जब समूह के एक खिलाड़ी के पत्ते उस दिन विशेषतः अनुकूल न होने के कारण, वह लगातार अपने पैसे हार रहा था.saint5 इस कारण वह बेचैन था और न केवल अपनी बदकिस्मती पर नाराज़ था बल्कि दूसरे खिलाड़ी, जो उससे बेहतर स्थिति में थे, उनके प्रति ईर्षयालु भी था. किसी भी अन्य हारे हुए खिलाड़ी के समान क्रोधित होना उसके लिए स्वाभाविक था. वह अन्य खिलाड़ियों से बात-बात पर बहस करने लगा और जल्द ही बहस लड़ाई में बदल गई.

किसी ने हारनेवाले को सलाह दी, “नाराज़ मत हो.”
हारनेवाले ने कठोरता से उत्तर दिया, ” ऐ! तुम्हें क्या लगता है? मैं क्या संत एकनाथ हूँ जो मुझे गुस्सा नहीं आएगा.”

उसके ऐसा बोलते ही झगड़े ने अलग ही मोड़ ले लिया.

समूह के एक अन्य व्यक्ति ने बीच में दखल देते हुए पूछा, “संत एकनाथ कोई दिव्य पुरुष हैं कि उन्हें गुस्सा नहीं आएगा? वह भी एक साधारण मनुष्य हैं. तुम मुझे ऐसा एक व्यक्ति दिखाओ जिसे गुस्सा न आता हो.”
किसी ने प्रश्नकर्ता का समर्थन करते हुए कहा, “शायद एकनाथ में कोई भावना या आत्म-सम्मान नहीं है. आत्म-सम्मान रखने वाले किसी भी व्यक्ति को गुस्सा आना स्वाभाविक है और वह हर परिस्थिति में शांत नहीं रह सकता.”

ताश खेलने वाले एक अन्य खिलाड़ी ने एकनाथ का साथ देते हुए कहा, “नहीं, एकनाथ कभी क्रोधित नहीं होते.”
“नहीं, यह सच नहीं है. ऐसा कोई मानव नहीं है जिसे गुस्सा न आता हो.”
“बिलकुल नहीं. मैं एकनाथ को जानता हूँ और मैंने उन्हें देखा भी है. वे कभी गुस्सा नहीं होते.”
“मैं कहता हूँ कि तुम गलत हो. उन्हें गुस्सा अवश्य आता है.”
“नहीं, बिलकुल नहीं.”

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इस समूह में सभी जुआरी थे. वाद-विवाद और चिल्लाने के अलावा और इनसे क्या उम्मीद कर सकते थे? उनकी बेतुकी बातचीत चलती रही.
“तुम शर्त में क्या लगाओगे? मैं एकनाथ को क्रोधित कर दूँगा.”
“तुम सर के बल खड़े होकर भी ऐसा नहीं कर सकते.”
“चलो ठीक है. तुम सब शर्त के १०० रूपए रखो. एकनाथ को क्रोधित करने की शर्त मैं स्वीकार करता हूँ. इस प्रकार जुए में हारे सारे पैसे मुझे वापस मिल जाएंगें.”

सब सहमत हो गए. अगले दिन योजना के अनुसार दावेदार एकनाथ के घर के बाहर जाकर खड़ा हो गया. बाकी के सभी लोग दूर खड़े होकर उसे देख रहे थे.
रोज़ की तरह सूर्यास्त के समय संत एकनाथ विट्ठल भगवान् के भजन गाते हुए घर से निकले. वह गोदावरी नदी पर नहाने व समर्पण के लिए जा रहे थे. नदी में स्नान के बाद उन्होंने अपनी नियमित प्रार्थना की और फिर घर लौटने लगे.
वह दावेदार जिसने एकनाथ को क्रोधित करने का दावा किया था, अपने मुँह में पान के पत्ते चबाकर एकनाथ के वहाँ से गुज़रने का इंतज़ार कर रहा था. जैसे ही एकनाथ अपने घर में घुसने लगे, दावेदार ने पान की लाल लार एकनाथ के मुँह पर थूक दी. कुछ पल के लिए एकनाथ स्तंभित खड़े रहे और फिर उन्होंने घूमकर देखा कि यह हरकत किसने की थी. पर बिना कुछ बोले वह दोबारा गोदावरी नदी पर गए और एक बार पुनः नहाकर वापस लौटे.saint3
इस बार फिर दावेदार ने अपनी हरकत दोहराई. परन्तु उसे बहुत हैरानी हुई जब एकनाथ ने केवल इतना ही बोला, “जय पांडुरंग, जय विट्ठल” और बिना किसी शिकायत के वापस नदी पर जाकर एक बार पुनः नहाकर आए.

देखने वाले सभी लोग अवाक थे कि ऐसा ३-४ बार होने के बावजूद भी, बिना कुछ बोले या मुँह बिचकाए, एकनाथ हर बार विट्ठल के नाम का उच्चारण करते हुए गोदावरी नदी पर स्नान करने गए. ऐसा बार-बार होने के बावजूद भी उनके चेहरे पर अप्रसन्नता, नाखुशी या क्रोध का नामोनिशान नहीं था.

संत एकनाथ का धैर्यपूर्ण व शांत स्वभाव देखकर समूह के सारे जुआरी तथा दावेदार जिसने ऐसी अश्लील हरकत की थी, एकनाथ के पास गए और उनके पैरों में गिरकर उनसे क्षमा की याचना करने लगे. एकनाथ ने सभी को गले लगाया. वह अपराधी व्यक्ति जिसने एकनाथ के चेहरे पर थूका था, ज़ोर- ज़ोर से रोते हुए बोला, “स्वामीजी, मैं मूर्ख हूँ. मैं ही वह पापी हूँ जिसने यह भयंकर भूल की है. कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये.” संत एकनाथ के पैरों में गिरकर उसने संत के पैर ज़ोर से पकड़ लिए और दहाड़े मार-मारकर दोहराने लगा, “कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये. कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये.” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और वह अपने किए पर सच्चे दिल से शर्मिंदा था. एकनाथ ने अत्यन्त प्रेम से उसे उठाया और गले लगा लिया.

एकनाथ दूसरों से अलग थे. उन्होंने रोते हुए अपराधी से सप्रेम कहा, “मेरे बच्चे तुम धन्य हो. तुम रो क्यों रहे हो? तुमने कोई अपराध नहीं किया है. तुमने कोई पाप नहीं किया है. वास्तव में तुम एक पवित्र आत्मा हो. मुझे तो तुम्हारी पूजा करनी चाहिए क्योंकि तुमने आज मेरे लिए बहुत ही दुर्लभ अवसर उत्पन्न किया है. तुम्हें पता है आज एकादशी का पावन दिवस है. केवल तुम्हारे कारण मुझे माता गोदावरी पर ४ बार जाकर उनकी अर्चना करने का सौभाग्य प्राप्त हो पाया. सिर्फ तुम्हारे कारण मैं अपने प्रभु विट्ठल के नाम का बार-बार उच्चारण कर पाया. अतः मुझे तुम्हें धन्यवाद देना चाहिए. ऐसा कहकर एकनाथ ने पूर्ण सच्चाई से उस जुआरी को झुककर प्रणाम किया.

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इस घटना के बाद से अपने नियमित स्थान पर इकट्ठा होकर ताश या जुआ खेलने के बजाय वह समूह एकनाथ का शिष्य बन गया. संत एकनाथ से शिक्षा लेकर समूह के सभी सदस्य दीया जलाकर नाम संकीर्तन करने लगे.

      सीख:

क्षमा करना एक ईश्वरीय विशेषता है. अगर हम इस पावन विशिष्ट गुण का विकास कर लें तो अपने भीतर प्रेम व शान्ति का विकास कर हम स्वयं में बदलाव लाने के साथ-साथ दूसरों में परिवर्तन लाने का साधन भी बन सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

समय का अनुशासित उपयोग

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 आदर्श : उचित आचरण
    उप आदर्श : समय का प्रभावपूर्ण उपयोग

एक लड़के को टीवी देखने की इतनी बुरी आदत थी कि वह हर जगह देर से पहुँचता था. वह टीवी देखने के लिए हमेशा इतना उत्सुक रहता था कि वह अपना नाश्ता या कोई भी अन्य कार्य कभी पूरा नहीं करता था.tv3

एक दिन उसकी डाक-पेटी में एक रहस्यमय पार्सल आया. पार्सल के अंदर एक विशिष्ट चश्मा था और साथ में एक कागज़ था जिसपर लिखा था, “इससे तुम समय देख सकोगे.”tv4

लड़का कुछ समझा नहीं.

उसने चश्मा पहनकर जब अपने भाई की ओर देखाtv5 तो उसे अपने भाई के सर पर फूलों का विशाल ढेर दिखा जिसमें से एक-एक करके फूल ज़मीन पर गिर रहे थे. उसे ताजुब इस बात पर हुआ कि ऐसा केवल उसके भाई के साथ ही नहीं था. जब भी वह चश्मा पहनकर किसी को देखता था तो उसे ठीक ऐसा ही दृश्य दिखता था. प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार के अनुसार उसके सर के ढेर में फूल कम या बढ़ रहे थे.tv6

अगली सुबह नाश्ता करते समय लड़के को अपने चश्मे का ध्यान आया. जब उसने चश्मा पहना तब वह यह देखकर अत्यन्त भयभीत हुआ कि उसके अपने ढेर से फूलों की धार लगातार टीवी की ओर जा रही थी. इतना ही नहीं उसने देखा कि टी वी का एक विराट मुँह था जो उग्रता से सारे फूल निगल रहा था.

उसे हर तरफ इसी प्रकार के जंगली टीवी दिखने लगे जो फूल निगल रहे थे.
अंततः लड़के को टीवी की वास्तविकता का अहसास हुआ और उसने निश्चय किया कि वह अपना बहुमूल्य समय टी वी पर व्यर्थ नहीं करेगा.

               सीख :
कहा जाता है, “समय बर्बाद करना, ज़िन्दगी नष्ट करना होता है.” हमें निरर्थक कामों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. हमें समय का समझदारी से उपयोग करना चाहिए. यह विशेषतः विद्यार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण है कि वे अपने समय का सदा सदुपयोग करें. बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता है. अधिकतर लोगों के जीवन में टीवी व कंप्यूटर इतना समय ले लेते हैं कि उन्हें अपने काम ख़त्म करने में, दोस्त बनाने में तथा परिवार के साथ समय बिताने में कोई रुचि नहीं होती है. हमें सदा चौकस रहना चाहिए, टी वी व कंप्यूटर पर कम से कम समय बिताना चाहिए ओर समय का लाभकारी ढंग से प्रयोग करना चाहिए.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

दो खरगोश

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       आदर्श : उचित आचरण
  उप आदर्श : अपने ज्ञान को दूसरों के साथ बाँटना

फ्रेडरिक और वांडा नाम के दो खरगोश थे जिन्हें इधर-उधर एक साथ घूमने में मज़ा आता था. एक बार ऐसे ही घूमते-घूमते उन्हें दो गाजरें दिखीं. पहली गाजर पर बड़े-बड़े पत्ते उग रहे थे और दूसरी ऊपर से बहुत छोटी दिखाई दे रही थी.

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गाजरें देखकर फेड्रिक उत्तेजित हो गया और भागकर बड़े पत्तों वाली गाजर के पास गया.
“मैं यह लूँगा, ” उसने गर्व से कहा और ज़मीन से गाजर उखाड़ने के लिए आगे बढ़ा.
वांडा ने अपने कंधे उचकाए और उसने दूसरी वाली गाजर उखाड़ी. वह गाजर फ्रेडरिक की गाजर से कहीं अधिक बड़ी निकली.

फ्रेडरिक चकित था और उसने वांडा से पूछा कि ऐसा कैसे संभव था. वांडा ने अपने दोस्त की ओर देखकर उत्तर दिया, “गाजर के पत्तों को देखकर तुम उनके आकार का अनुमान नहीं लगा सकते.”

दोनों दोस्त आगे बढ़े और उन्हें गाजरों का एक और जोड़ा मिला. इस बार भी दोनों के पत्तों का आकार भिन्न था. फ्रेडरिक ने अपनी दोस्त से पहले चयन करने को कहा.
वांडा कूदते हुए दोनों गाजरों के पास एक-एक करके गई, उनका निरीक्षण किया और उन्हें ध्यानपूर्वक सूंघा. फ्रेडरिक को यह देखकर बहुत हैरानी हुई कि वांडा ने बड़े पत्तों वाली गाजर चुनी. जब दोनों ने अपनी गाजर ज़मीन से उखाड़ी तो फ्रेडरिक चकित था कि उसकी गाजर वांडा की गाजर से छोटी थी.

उसने कहा, “मुझे लगा कि तुम कह रही थी कि छोटे पत्तों का अर्थ होता है कि वह गाजर बड़ी होगी.”
“नहीं, ” वांडा ने उत्तर दिया, “मैंने कहा था कि एक गाजर के आकार का अनुमान उसके पत्तों से नहीं लगाना चाहिए.”
फ्रेडरिक ने सर हिलाया और आगे बढ़ने से पहले दोनों दोस्तों ने अपनी गाजर खाई.

दोनों दोस्तों को एक बार पुनः अलग-अलग आकार के पत्तों वाली दो गाजरें मिलीं. फ्रेडरिक काफ़ी उलझन में था और समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिए. वांडा ने उसे गाजर पहले चुनने का संकेत दिया.rab6

बेचारे नासमझ खरगोश ने दोनों गाजरों का सविस्तार निरिक्षण करने का ढोंग किया परन्तु उसे बिलकुल पता नहीं था कि वह क्या करे. उसे मालूम था कि वह अपनी दोस्त के समान होशियार नहीं था और उसने वांडा की ओर अस्पष्ट भाव से देखा. वांडा मुस्कुराई और कूदती हुई गाजरों के पास गई. उसने गाजरों की जांच की और फिर एक गाजर उखाड़ी. फ्रेडरिक ने अपने कंधे उचकाए और वह दूसरी गाजर के पास जाने ही वाला था जब उसकी चतुर दोस्त ने उसे रोका.
वांडा बोली, “नहीं फ्रेडरिक, यह गाजर तुम्हारे लिए है.”rab5
“पर यह गाजर तुमने चुनी है और मुझे यकीन है कि यह गाजर बड़ी वाली है. मुझे पता नहीं कि तुम गाजर का चयन कैसे करती हो पर तुम निस्संदेह मुझसे अधिक होशियार हो.”

“फ्रेडरिक, ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं है जो तुम दूसरों के साथ बाँट नहीं सकते. तुम मेरे अच्छे दोस्त हो और मैं चाहती हूँ कि तुम यह गाजर रखो. एक चतुर खरगोश, जिसका पेट तो भरा हो पर जिसका कोई मित्र न हो, बुद्धिमान कैसे कहला सकता है?”

सीख :
यह कहानी इस बात की चेतावनी है कि बुद्धिमानी की खोज में हमें दूसरों को नहीं भूलना चाहिए. अपने ज्ञान के माध्यम से हमें अपने आस-पास के लोगों की सहायता करने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए. हमें समझदार बनना चाहिए, दूसरों के साथ अपना ज्ञान बाँटना चाहिए और अपने आस-पास के लोगों के लिए विश्व को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए.

source: saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना