Archive | April 2016

ईमानदार ऑटोरिक्शा चालक

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आदर्श : सत्य
  उप आदर्श: ईमानदारी

उस रात बहुत ठण्ड थी और तेज़ हवा चल रही थी. मैं अपने दोस्त से एक लम्बे समय के बाद मिला था और इसलिए हम घंटों बातें करते रहे. हमें समय का ध्यान ही नहीं रहा और जब ध्यान आया तो रात के लगभग दस बजने वाले थे. हमने घर जाने के लिए ऑटोरिक्शा बुलाने का फैसला किया.

इतने में तेज़ बारिश शुरू हो गई. मौसम खराब होने के कारण हम जल्द से जल्द ऑटो लेकर घर जाना चाहते थे. परन्तु कोई भी ऑटो हमारे लिए रूकने को तैयार नहीं था, सिवाए एक ऑटो के. चालक ने हमसे पूछा कि हमें कहाँ जाना है और हमने उसे अपना ठिकाना बताया. भाड़े के बारे में कोई बात किए बिना ही उसने कहा, “कृपया अंदर आइए.” इतनी तेज़ बारिश में हमारे लिए रूकने के लिए हमने गाड़ीवान को धन्यवाद दिया.auto1

चूँकि मौसम बहुत ठंडा था, मैंने चालक से रास्ते में किसी भोजनालय या चाय की दुकान पर रूकने को कहा. हम गरम-गरम चाय पीना चाहते थे. चालक ने एक छोटे से भोजनालय पर ऑटो रोका.                    auto2

हमने चाय मँगवाई और वाहनचालक को भी हमारे साथ चाय पीने को कहा. पर उसने मना कर दिया. मैंने उससे एक बार फिर थोड़ा ज़ोर देकर कहा कि चाय पीने से उसे ताज़गी महसूस होगी. पर वाहनचालक ने एक बार पुनः विनम्रतापूर्वक मना कर दिया.
मेरे दोस्त ने पूछा, “क्या तुम इस दुकान की चाय पीना नहीं चाहते?”
चालक ने उत्तर दिया, “नहीं साहब, मुझे अभी चाय पीने का मन नहीं है.”
फिर मैंने उससे पूछा, “पर क्यों? चाय का एक प्याला पीने में तो कोई हर्ज़ नहीं है.”
चालक ने मुस्कुराकर कहा, “आपका धन्यवाद पर मुझे क्षमा कीजिए.”
मेरे दोस्त ने पूछा, “क्या तुम बाहर कभी खाते-पीते नहीं हो?”
चालक ने कहा, “नहीं!”

चालक की बात सुनकर मेरे दोस्त ने चिढ़कर पूछा, “ऐसा तो नहीं है कि तुम समझते हो कि हम तुम्हारे बराबर के नहीं हैं और इसलिए तुम हमारे साथ चाय पीना नहीं चाहते?”
चालक ने जवाब नहीं दिया और वह ख़ामोश रहा.
मैं चालक के व्यवहार पर बहुत हैरान था पर मैंने अपने दोस्त से उसे बाध्य न करने का आग्रह किया.

१५ मिनट बाद हम अपनी मंज़िल पर पहुँच गए. हमने भाड़ा अदा किया और वाहक ने हमें धन्यवाद दिया. मैं यह जानने के लिए बहुत उत्सुक था कि उसने चाय पीने से इंकार क्यों किया था. अतः मैंने उसे रोककर इस बारे में पूछा.

उसने कुछ देर सोचा और फिर बोला, “साहब, आज दोपहर एक दुर्घटना में मेरे बेटे का देहांत हुआ है. उसके अंतिम संस्कार के लिए मेरे पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं. इसलिए पर्याप्त पैसे कमा लेने तक मैंने पानी तक भी न पीने का प्रण लिया था. इसी कारण जब आपने मुझे चाय के लिए पूछा तब मुझे इंकार करना पड़ा था. मुझे गलत मत समझिएगा.”

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हम दोनों स्तंभित थे और हमने उसके बेटे के अंतिम संस्कार के लिए उसे और पैसे देने चाहे.
मैंने कहा, “कृपया यह रख लो.”
उसने विनम्रता से इंकार करते हुए कहा, “आपकी उदारता के लिए धन्यवाद, साहब. १-२ घंटों में अगर मुझे १-२ ग्राहक और मिल जाएंगें तो मैं अपनी ज़रुरत के पर्याप्त पैसे कमा लूँगा.” और वह वहाँ से चला गया.
तेज़ बारिश व देर रात होने के बावजूद उसने हमसे बहुत मामूली पैसे भाड़े में लिए. अगर वह चाहता तो हमसे दुगने या तिगुने पैसे भाड़े में माँग सकता था. अपनी कमज़ोर आर्थिक परिस्थिति और अपने गहन शोक के बावजूद उसने अपनी ईमानदारी बरकरार रखी और अपने कथन पर अटल रहा.

              सीख:
ईमानदारी सबसे श्रेष्ठ नीति है. किसी व्यक्ति का चरित्र कठिन परिस्थिति में ही निर्धारित होता है. सच्चाई व ईमानदारी के आदर्श हमारी प्रकृति बनने चाहिए. इससे हमें दूसरों के लिए सम्मान, भीतरी आनंद तथा शांति मिलेगी.

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अनुवादक- अर्चना

एक नेक आदमी का एक वरिष्ठ महिला को आगे बढ़कर मदद करना

 

आदर्श : सच्चाई, ईमानदारी, जिम्मेदारी, भला नागरिक

यह घटना दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के मंगलौर नामक शहर की है. यह घटना एक ऑटोरिकशा चालक की अच्छाई की है जिसके लिए मंगलौर शहर के अल्पसंख्यक जापानी समुदाय अत्यन्त आभारी है.news2

हाल ही में ६१ वर्षीय मकी मतसुरा, जो शहर में पिछले छह महीनों से रह रहीं थीं,news1 अपना बटुआ एक ऑटोरिकशा में भूल गईं थीं. श्रीमती हारुका इतो, जो विशु मार्शल आर्ट की विशेषज्ञ तथा शहर में उनकी अभिभावक थीं, ने इस घटना का बयान करते हुए बताया कि बटुया गुम जाने पर श्रीमती मतसुरा ने घबराकर अपने सभी जापानी जानकारों को संपर्क किया.

इतो ने बताया, “जब तक श्रीमती मतसुरा अपने जानकारों को संपर्क कर रहीं थीं, उतनी देर में वाहन चालक का उनके मोबाइल पर फ़ोन आ गया. भाषा का अंतर होने के कारण श्रीमती मतसुरा कुछ भी समझ नहीं पाईं. उनके आस-पास के लोगों ने वाहनचालक की बात का अनुवाद करके उन्हें चालक की बात समझाई” .

जब तक उनके जापानी दोस्त घटनास्थल तक पहुँचे, उतनी देर में वाहनचालक ने श्रीमती मतसुरा को ढूँढ़कर उनका बटुआ उन्हें वापस लौटा दिया. इतो ने कहा, “चालक ने श्रीमती मतसुरा द्वारा दिए गए पुरस्कार के पैसे लेने से भी इंकार कर दिया.”

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इस गुमनाम नेक व्यक्ति ने यह सब अपने शहर को एक अच्छा नाम देने के लिए किया था. प्रेस को दिए एक खुले पत्र में इतो ने कहा, “जिस प्रकार धोखेबाज़ी की एक छोटी सी घटना शहर की छवि को नष्ट कर देती है उसी प्रकार अच्छाई का एक छोटा सा काम भी लोगों तथा देश के प्रति सद्भावना का प्रचार कर सकता है. मंगलौर शहर की सबसे महत्त्वपूर्ण पूँजी यहाँ के लोगों की ख़ूबसूरत विचारधारा है.”

सौजन्य : ‘हिन्दू’ अखबार

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अनुवादक- अर्चना

पत्थर गढ़नेवाला

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          आदर्श : उचित आचरण
      उप आदर्श: आत्म विश्वास, संतुष्टि

एक समय एक छोटे से गाँव में एक पत्थर गढ़नेवाला रहता था. अपने ग्राहकों के अनुरोध के अनुसार वह दिनभर कड़ी मेहनत से मज़बूत पत्थरों को काट व तराशकर अलग-अलग आकार की मूर्तियाँ बनाता था. उसके हाथ सख्त थे और कपड़े गंदे व मैले थे. एक दिन उसने एक बड़े पत्थर पर काम करना शुरू किया. तेज़ सूरज के कारण बहुत गर्मी थी और ऐसे में उसके लिए काम करना बहुत ही कठिन व थकानेवाला था. काफी घंटों तक पत्थर को काटने व चिकना करने के बाद वह छाँव में बैठ गया और जल्द ही उसे नींद आ गई. कुछ देर बाद उसे अपनी ओर आते लोगों की आवाज़ सुनाई दी. king2जैसे ही उसने आँख खोली उसने सिपाहियों और मुलाज़िमों का एक लम्बा जुलूस देखा. जुलूस के बीचों बीच कुछ बलवान व्यक्ति राजा को पालकी में उठाकर ले जा रहे थे.

पत्थर गढ़नेवाले ने सोचा, ” राजा होना कितना गज़ब का होता होगा. एक पत्थर गढ़नेवाले की जगह यदि मैं राजा होता तो मैं कितना खुश होता.” जैसे ही उसने ऐसा सोचा एक अनोखी घटना घटी. king3पत्थर गढ़नेवाले ने स्वयं को चमकदार आभूषणों तथा रेशमी कपड़ों से सुसज्जित पाया. उसके हाथ कोमल थे और वह एक आरामदायक पालकी में बैठा हुआ था. उसने पालकी से बाहर देखा और सोचा, “राजा होना कितना आसान है. यहाँ सभी लोग मेरी सेवा में हाज़िर हैं.” जुलूस आगे बढ़ता रहा और समय के साथ-साथ सूर्य की गर्मी भी बढ़ती गई. पत्थर गढ़नेवाला जो अब राजा था, गर्मी के कारण बैचैन होने लगा. उसने जुलूस को कुछ देर रूकने का आदेश दिया ताकि राजा कुछ क्षण आराम कर सके. राजा का आदेश सुनते ही सेनापति ने राजा के सामने झुककर कहा, “महाराज! आज सुबह ही आपने शपथ ली थी कि यदि हम सूर्यास्त से पहले महल नहीं पहुँचे तो आप मुझे फांसी पर चढ़ा देंगें.”

पत्थर गढ़नेवाले को उस पर दया आई और उसने कबीले को पुनः चलने का आदेश दिया. जैसे-जैसे समय बीत रहा था, दोपहर का सूरज और अधिक गर्मी फैला रहा था और बढ़ते तापमान के कारण राजा और अधिक बैचैन होने लगा. उसने सोचा, “यद्यपि यह सत्य है कि मैं शक्तिमान हूँ पर सूरज मुझसे अधिक ताकतवर है. मुझे राजा के बदले सूरज होना चाहिए था.”king5
एकाएक वह सूरज में परिवर्तित हो गया और पृथ्वी पर दमकने लगा. उसके लिए इस नवीन शक्ति को नियंत्रित करना बहुत ही कठिन था. वह खूब डटकर चमका, उसकी किरणों की गर्मी से सारे खेत जल गए और उसके ताप से समुन्दर भाप बनकर इतना विराट बादल बन गया कि उसने समस्त धरती को ढक लिया. वह जितने भी प्रभाव से चमकता पर फिर भी वह बादलों के पार देख नहीं पा रहा था.

पत्थर गढ़नेवाला ने, जो अब सूरज था, सोचा, “इतना तो स्पष्ट है कि सूरज से कहीं अधिक शक्तिशाली व प्रबल बादल है.” उसने मन में सोचा कि काश वह सूरज के बदले बादल होता.king7 अचानक उसने स्वयं को एक विशाल काले घने बादल में परिवर्तित पाया. उसने अपनी नयी शक्ति का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. उसने खेतों में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी जिस के कारण बाढ़ आ गई. सारे घर व पेड़ तबाह हो गए.

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परन्तु एक शिलाखण्ड अटल व अपरिवर्तित था. यह वही शिलाखण्ड था जिसे वह एक समय काटा करता था. उस पत्थर पर अपने पूरे बल से लगातार बरसने पर भी वह पत्थर अपने स्थान पर अटल रहा.
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पत्थर गढ़नेवाले ने, जो अब बादल था, सोचा, “यह शिलाखण्ड मुझसे अधिक शक्तिमान कैसे है? अपनी निपुणता से केवल एक पत्थर गढ़नेवाला ही इसमें बदलाव ला सकता है.king12 काश मैं पत्थर गढ़नेवाला होता.” उसके ऐसा कहते ही उसने स्वयं को कठोर व रूखे हाथों सहित पत्थर पर बैठा पाया. उसने अपने औज़ार उठाए और खुशी-खुशी शिलाखण्ड पर काम करना शुरू कर दिया.
      सीख:
घास का दूसरा छोर सदा अधिक हरा दिखता है. हम जो करते हैं, हम उसी में सर्वोत्तम होते हैं. अक्सर हम सर्वश्रेष्ठ जगह पर होते हैं यद्यपि हम इसके विपरीत सोचते हैं. सब हमारे भले के लिए ही होता है.

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अनुवादक- अर्चना

उड़ने की क्षमता होते हुए चलने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए

 

  आदर्श : उचित आचरण
   उप आचरण : लगातार कोशिश, संकल्प, अपने सामर्थ्य का अहसास

एक समय एक अति दयालु व दरियादिल राजा था. falconउसे पशु-पक्षी बहुत प्रिय थे और इस कारण उसके राज्य में एक विशाल पक्षीशाला थी. उसे पशु-पक्षियों को हानि पहुँचाना बिलकुल पसंद नहीं था और इस कारण वह मांस भी नहीं खाता था.

पशु-पक्षियों के प्रति राजा की करुणा व उदारता के कारण एक व्यापारी ने उसे २ खूबसूरत बाज तोहफ़े में दिए. दोनों बाज अलग-अलग देशों से लाए गए थे और इसलिए दोनों अलग-अलग जलवायु के अभ्यस्त थे.falcon4

राजा ने व्यापारी का धन्यवाद अदा किया और पक्षियों के प्रशिक्षक को आदेश दिया कि वह दोनों बाजों को सभी सुविधाएँ प्रदान करेfalcon5 और उन्हें उनके नए देश में आरामदेह महसूस कराए. प्रशिक्षक दोनों बाजों को ले गया और उन्हें नए वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए उसने उन्हें सभी आवश्यक वस्तुएँ दीं. धीर-धीरे दोनों बाज उस देश के वातावरण के अनुकूल बन गए.

एक दिन राजा दोनों पक्षियों की उड़ान देखने आया क्योंकि उसने सुना था कि उनमें से एक बाज बहुत तेज़ रफ़्तार से बहुत ऊँचा उड़ सकता था. falcon3पहले बाज को इतना ऊँचा उड़ते देखकर राजा आश्चर्यचकित था और उसने प्रशिक्षक को सोने के सिक्कों से भरे एक बोरे से पुरस्कृत किया. पहले बाज को देखने के बाद राजा ने दूसरे बाज के बारे में पूछ-ताछ की. राजा के पूछने पर प्रशिशक ने खेद प्रकट करते हुए कहा कि दूसरा बाज पहले दिन से एक ही शाखा पर बैठा है falcon2और उसने एक कदम भी नहीं उठाया है. प्रशिक्षक ने राजा को बताया कि उसकी हर संभव कोशिश के बावजूद वह बाज को उड़ाने में असफल रहा है.

राजा ने प्रशिक्षक को दिलासा देते हुए कहा कि वह उससे अधिक अनुभवी व्यक्ति या किसी बूढ़े विद्वान को लेकर आएगा जिसे बाज के बारे में अच्छी जानकारी हो.
राजा ने एक ऐसे व्यक्ति की खोज शुरू कर दी जो उस पक्षी को उड़ा पाने में सफल हो सकता था. राजा के संदेशवाहकों की घोषणा सुनकर एक बूढ़ा आदमी राजमहल आया. उसने राजा को आश्वासन दिलाया कि पहले पक्षी की तरह वह इस पक्षी को भी उड़ाएगा.

राजा ने प्रशिक्षक से कहा कि बाज का प्रशिक्षण करने के लिए वह उस वृद्ध पुरुष को पक्षीशाला ले जाए. राजा ने कहा कि अगले दिन वह देखना चाहेगा कि उस वृद्ध व्यक्ति के प्रशिक्षण से कितनी प्रगति हुई है.

अगले दिन दूसरे बाज को पहले बाज की तरह तेज़ रफ़्तार से ऊँचाई पर उड़ते देखकर राजा चकित रह गया. राजा अत्यधिक खुश हुआ और उसने वृद्ध व्यक्ति को उचित रूप से पुरस्कृत किया.

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राजा यह जानने के लिए बहुत उत्सुक था कि जी पक्षी इतने लम्बे समय से अपनी टहनी से हिला भी नहीं था वह एक दिन में इतना ऊँचा कैसे उड़ पाया. वृद्ध व्यक्ति ने बहुत ही सरलता से उत्तर दिया, “मैंने केवल वह टहनी काट दी जिसपर वह बाज बैठा हुआ था.”

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   सीख :
हममें से बहुत से लोग ऐसे ही हैं. हममें उड़ने की क्षमता है, हमें मालूम है कि हमें कैसे और कहाँ उड़ना है परन्तु फिर भी हम निष्क्रिय रहते हैं. हम अपने हालात में इतने संतुष्ट व खुश रहते हैं कि हम कोई भी अतिरिक्त प्रयत्न करना नहीं चाहते. हम कार्य तभी करते हैं जब हमें किसी परिस्थिति में ज़बरदस्ती धकेला जाता है. अगर हम परिवर्त्तन के अनुसार स्वयं में बदलाव लायेंगें, अवसरों का प्रयोग करेंगें और पर्याप्त चेष्टा करेंगें तो हम अवश्य सफल होंगें. यदि हम ऐसा नहीं करेंगें तो बिना कुछ सार्थक किए और अपने स्वाभाविक सामर्थ्य का अहसास किए बिना ही हमारी ज़िन्दगी बीत जाएगी.

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अनुवादक- अर्चना

भगवान कहाँ रहते हैं

आदर्श : सत्य
उप आदर्श: आत्म विश्लेषण

एक व्यक्ति भगवान को देखना चाहता था. वह बहुत सी तीर्थयात्राओं पर गया और उसने अनेकों धर्मग्रन्थ भी पढ़े पर फिर भी उसकी तलाश ज़ारी थी. भगवान की खोज में वह जगह-जगह भटकता रहा.god1

जाड़े की एक शाम उसने एक बूढ़ी औरत को आग रखने के स्थान पर लकड़ी के लट्ठों को हिलाते हुए देखा.god2 थोड़ी-थोड़ी देर में कोयले के गोले राख से ढक जाते थे. तब वह औरत कोयले को कुरेदनी से हिलाकर खिसकाती थी. उसके ऐसा करते ही लाल गर्म अंगारे साफ़ दिखाई पड़ते थे. उस व्यक्ति ने पाया कि हर बार राख हटाने पर आग पहले से अधिक उज्जवलता से जलती थी.

 

अगले दिन अपने पैरों को आराम देने के लिए वह व्यक्ति एक पेड़ के नीचे बैठा और उसने चमकते सूरज को देखा. उसने कहा, “अरे सूर्य ! तुम तो पूरे संसार पर निगाह रखते हो. god3 तुम्हें अवश्य मालूम होगा कि भगवान कहाँ रहते हैं. वह कहाँ छुपे हुए हैं? मैं उन्हें हर जगह ढूँढ़ चूका हूँ पर वह मुझे कहीं नहीं मिले. तभी एक बादल वहाँ से गुजरा और बादल से ढक जाने के कारण सूरज कुछ देर के लिए अदृश्य हो गया.god5 कुछ समय बाद जब सूरज के आगे से बादल हटा तो सूरज एक बार फिर चमका : स्पष्ट और उज्जवल. उस व्यक्ति ने गहरी सांस ली और स्वयं से बोला, “क्या मैं भगवान को कभी देख भी पाऊँगा? ”

फिर एक दिन वह व्यक्ति एक तालाब के पास से गुजरा. तालाब का ऊपरी तल हरी काई से ठसाठस भरा हुआ था.god6 कुछ गाँववासी तालाब को साफ़ करने में लगे हुए थे और उनके प्रयास से तालाब का पानी कुछ स्वच्छ दिख रहा था. उस व्यक्ति ने गाँववालों से पूछा, “तालाब के पानी में यह गन्दी काई किसने डाली? ” गाँववालों ने उत्तर दिया, “किसी ने नहीं. यह काई पानी के भीतर से अपने आप ही पनपती है. शायद यह पानी में ही होती है. इस कारण यदि पानी काफ़ी समय तक निश्चल रहता है तो काई फैलनी शुरू हो जाती है. हम लोग इसे साफ़ कर रहे हैं.god7 जल्द ही तालाब एक बार फिर से साफ़ व शुद्ध हो जाएगा. ”

उस व्यक्ति ने इन सभी बातों पर चिंतन किया. काई पानी के अंदर से आई थी. पर वह पानी की सतह पर इतने घनेपन से फैल गई थी कि गाँववालों को उसे शारीरिक रूप से हटाना पड़ा ताकि पानी दुबारा स्पष्ट हो सके.
बादल सूर्य की ऊष्मा से बने थे. परन्तु वे सूर्य को इस हद तक ढक पा रहे थे कि सूर्य की किरणें क्षणभर के लिए अदृश्य हो गईं थीं. जब तेज़ हवा ने बादलों को ढकेला तब सूर्य पुनः दिखाई दिया.
राख के बनने का कारण आग थी. परन्तु कुछ समय बाद राख भी आग को इतने घनेपन से ढक पा रही थी कि आग करीब-करीब बूझने को थी. जब राख को हिलाकर खसकाया गया तो आग पुनः उज्जवल हो गई.

इन सभी उदाहरणों में, पानी, सूर्य और आग पहले से ही उपस्थित थे. उनका नए सिरे से जन्म नहीं हुआ था. केवल थोड़ी सी मेहनत से उन्हें पुनः स्थापित करना था.
उसे जैसे ही यह अहसास हुआ, उसे सच्चाई स्पष्ट हुई और सब समझ में आ गया. उसकी बूढ़ी आँखों का मोतियाबिंद उसकी स्वयं की आँखों के भीतर से विकसित हुआ था नाकि कहीं बाहर से.

       सीख :

मनुष्य का जन्म ईश्वर से हुआ है. परन्तु मनुष्य स्वयं को संसार रुपी आवरण से ढक लेता है और उसे अपना स्त्रोत भूल जाता है. यदि इस आवरण से बाहर निकलकर हम अपने भीतर झाँकेंगें तो हम ईश्वर को पायेंगें.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना