Archive | July 2015

एक कीमती शाल

 आदर्श : उचित आचरण

 उप आदर्श: विभेद

यह कहानी एक आनन्दभोगी राजा की है जो अत्यधिक शराब, विषय भोग तथा अन्य बुरी आदतों में लीन रहता था. shawl3वह अपने प्रधान मंत्री से कहता था, “मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता है. इसलिए आर्थिक सुविधाओं तथा विषयी इन्द्रियों का अनुसरण करना चाहिए. जीवन का जी भरकर आनंद लेना चाहिए.” प्रधान मंत्री एक समझदार व शालीन व्यक्ति था. वह राजा की प्रतिकूल तथा असभ्य गतिविधियों को लेकर चिंतित रहता था और उसे राजा के स्वभाव से बहुत तकलीफ़ होती थी. हर संभव अवसर पर वह राजा को सलाह देने की कोशिश करता था. पर सब व्यर्थ था क्योंकि राजा को उसकी बात समझ में नहीं आती थी. जब राजा नशे में धुत्त होता था तब वह सही व गलत में पहचान नहीं कर पाता था. अतः अक्सर वह अपनी प्रजा से बुरा व्यवहार करता था. राजा की जनता सदा भय में रहती थीshawl4 पर चूँकि राजा बहुत ही निष्ठुर था, कोई भी राजा का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाता था.

एक दिन, संयोग से, प्रधानमंत्री के किसी काम से राजा अत्यधिक प्रसन्न था. राजा ने उपहार के रूप में प्रधान मंत्री को एक बेशक़ीमती शाल भेंट की.shawl5 दरबार से निकलने के तुरंत बाद, प्रधान मंत्री ने उस शाल का प्रयोग अपनी नाक पोंछने के लिए किया. एक दरबारी जो प्रधान मंत्री से ईर्ष्या करता था और इस अनुचित भाव प्रदर्शन को देख रहा था, राजा के पास गया और बोला, “महाराज, प्रधानमंत्री ने आज बहुत ही निरादरपूर्ण भाव व्यक्त किया है.”shawl6

राजा ने पूछा, “क्या हुआ?”

दरबारी ने कहा, “महाराज ने प्रधानमंत्री को एक अनमोल शाल से सम्मानित किया था. लेकिन, उस शाल से अपना नाक पोंछकर प्रधानमंत्री ने आपका अनादर किया     है.” राजा ने तुरंत प्रधानमंत्री के लिए बुलावा भेजा. shawl7

राजा ने पूछा, “मेरे दिए हुए शाल से अपना नाक पोंछकर, मेरा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?” प्रधानमंत्री ने सम्माननीय ढ़ंग से उत्तर दिया, “महाराज, मैंने तो केवल आपकी दी हुई सीख का अनुसरण किया है.” “मैंने तुम्हें अशिष्टता दिखाने की शिक्षा दी है?” राजा ने कठोरता से पूछा, “कैसे?” प्रधानमंत्री ने कहा, “आपको मनुष्य जीवन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जो कि इस शाल से कहीं अधिक अनमोल है. परन्तु आप शालीनता और नैतिकता का अपमान करते हुए अपना कीमती समय भौतिक सुविधाओं तथा विषयी इन्द्रियों में नष्ट करते हैं. आपके इसी आचरण से मैंने शाल का दुरपयोग करना सीखा है.”

इस बार प्रधानमंत्री का निशाना सही लगा. राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसकी ज़िन्दगी व साम्राज्य में सदा के लिए सुधार आ गया.  

        सीख :

हमें सही व गलत में भेद-भाव करना सीखना चाहिए. जब बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाता है तो वह बड़े होकर बुद्धिमान बनते हैं और एक सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

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अपने मालिक/ गुरु/ प्रभु के चरणों में समर्पण

                आदर्श : प्रेम    

           उप आदर्श : विश्वास, श्रद्धा

एक समय की बात है कि एक तालाब में बहुत-सी मछलियाँ रहतीं थीं. fishहर सुबह मछुआरे का जाल उनका सबसे बड़ा भय होता था.fish2 मछुआरा हर सुबह नियम से जाल डालने आया करता था और लगभग हर बार, ढेर सारी मछलियाँ उसके जाल में फँस जाती थीं. fish3कुछ मछलियाँ अचानक ही पकड़ी जाती थीं. कुछ सोते हुए फँस जाती थीं. कुछ इसलिए फँस जाती थीं क्योंकि उनको छुपने की जगह नहीं मिलती थी और कुछ अन्य जानलेवा जाल से खतरे के बारे में जानने के बावजूद भी उस जाल से बचने का उपाय नहीं ढूँढ़ पाती थीं. उन मछलियों में, एक युवा मछली थी जो सदा प्रसन्न रहती थी. fish5उसे मछुआरे के जाल का कोई डर नहीं था. ऐसा प्रतीत होता था कि उसने जीवित तथा उत्साहपूर्ण रहने की कला पर निपुणता हासिल कर ली थी. सभी ज्येष्ठ मछलियों को इस छोटी मछली के रहस्य पर ताजुब होता था. सभी आश्चर्य में थे कि जहाँ उन सब का संचयी अनुभव व बुद्धिमत्ता भी जाल से बचने के लिए पर्याप्त नहीं है वहाँ वह छोटी मछली इतना ठोस और आसान तरीका कैसे निकाल लेती है. अपनी जिज्ञासा शांत करने तथा जाल से बचने का तरीका ढूँढ़ने के लिए, एक शाम, सभी मछलियाँ इस छोटी मछली के पास गईं. “अरे छोटी! हम सब यहाँ तुमसे बात करने आए हैं.” “मेरे से!? छोटी मछली ने कहा, “आप सब मुझसे क्या बात करना चाहते हैं?” “दरसल हम सब तुमसे कुछ पूछना चाहते हैं. कल सुबह मछुआरा पुनः आएगा. तुम्हें जाल में पकड़े जाने का डर नहीं है?” छोटी मछली मुस्कुराई, “नहीं! मैं जाल में कभी नहीं पकड़ी जाऊँगी!” “हमें भी अपने दृढ़ विश्वास तथा सफलता का रहस्य बताओ” , सभी बड़ों ने निवेदन किया. “बहुत सरल है, ” छोटी मछली ने कहा. “जब मछुआरा अपना जाल डालने आता है तब मैं झटपट दौड़कर उसके पैरों में ठहर जाती हूँ.

fish6वही एक ऐसी जगह है जहाँ मछुआरे के लाख चाहने पर भी वह वहाँ नहीं पहुँच सकता. इसलिए मैं कभी नहीं पकड़ी जाती हूँ.” छोटी मछली के समझ की सहजता पर सभी मछलियाँ आश्चर्यचकित थीं.    

            सीख :

हमें भगवान या अपने गुरु में सम्पूर्ण विश्वास रखना चाहिए. अगर हम भगवान को अपना गुरु मानते हैं तो हमें भगवान में पूरा भरोसा व निष्ठा रखनी चाहिए. हम जो भी करते हैं उसमें हमें सर्वोत्तम कोशिश करनी चाहिए तथा शेष भगवान पर छोड़कर उनकी शरण में रहना चाहिए. तब भगवान हमारा ध्यान रखते हैं और वह करते हैं जो हमारे लिए सही है. ऐसी परिस्थिति में हम जीवन की परीक्षाओं को बेहतर सम्बोधित कर पाने में सफल रहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

सब हमारे भीतर ही है

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                   आदर्श : सत्य
              उप आदर्श : आत्मविश्लेषण

एक समय की बात है कि एक आकर्षक हिरणी थी deerजो दिनभर जंगल में उछलती-कूदती रहती थी. हर रोज़ उसे एक अद्भुत सुगंध महसूस होती थी. यह खुशबू बारिश या फूलों की महक से भी अच्छी थी.deer10 हिरणी को आश्चर्य होता था कि इतनी मनमोहक सुगंध कहाँ से आती है क्योंकि उसने ऐसी खुशबू इससे पहले कभी नहीं सूँघी थी. वह इसका पता लगाने के लिए हर तरफ सूँघने लगी. कभी उसे संदेह होता था कि खुशबू किसी वृक्ष से आ रही है, पर जब वह भागकर वहाँ पहुँचती थी तो उसे वह पेड़ किसी भी अन्य सामान्य पेड़ के समान प्रतीत होता था.deer2

हर जगह सूँघते हुए हिरणी इधर-उधर भटकने लगी. कभी वह सोचती, “क्या यह खुशबू तितलियों से आ रही है? deer3अरे नहीं….यह तो कहीं और से आ रही है.” कभी उसे अचरच होता कि वह सुगंध रोबिन पक्षी से आ रही है. deer4परन्तु सूँघने पर मालूम पड़ता कि वह गलत थी. यद्यपि उसे संदेह था पर एक बार को उसे शक हुआ कि शायद वह गंध दलदल से आ रही है.deer5 परन्तु जब वह दलदल के पास पहुँची तब उसे अहसास हुआ वह खुशबू वहाँ से भी नहीं आ रही थी. हिरणी ने गड्ढों में तथा झाड़ियों deer6में भी सूँघने की कोशिश की पर वह सुगंध इनमें से किसी में से भी नहीं आ रही थी.

हिरणी भागती व उछल-कूद करती रही और हर जगह इस मायावी खुशबू के स्त्रोत का पता लगाने की कोशिश करती रही. इस प्रकार प्रयास करते-करते हिरणी को कुछ समय बाद थकान महसूस होने लगी. पर हिरणी ने हिम्मत नहीं हारी. उसने सोचा, “मैं ढूँढ़ लूँगी. यह खुशबू कहीं से तो आ ही रही होगी.” पूर्णतः थक जाने के बावजूद हिरणी लगातार कोशिश करती रही और अपने आप में दोहराती रही, “मेरा शरीर जवाब देने लगा है पर मुझे यह पता लगाना होगा कि इतनी मनमोहक खुशबू कहाँ से आ रही है.” अंततः उसका शरीर बिलकुल बेजान सा हो गया और एकाएक वह ज़मीन पर गिर पड़ी.deer7

ज़मीन पर गिरने के बाद भी उसका दिमाग अपनी खोज जारी रखना चाहता था पर उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था. तभी अचानक उसे अपने आस-पास एक सुगंध महसूस हुई. “यही है! यही वह खुशबू है. मैं कब से यही ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी. मुझे पूरा विश्वास था कि यह खुशबू यहीं कहीं है. लेकिन यह कहाँ से आ रही है?” उसी क्षण हिरणी को कुछ बहुत अद्भुत महसूस हुआ, “अरे! यह तो मेरे अंदर से ही आ रही है. यह तो शुरू से ही मेरे अंदर थी.” हिरणी मुस्कुराई और चैन की नींद सो गई.deer8

यह खुशबू वास्तव में उसके स्वयं के अंदर से ही आ रही थी. भगवान भी ऐसे ही हैं. लोगों को लगता है कि भगवान कहीं बाहर हैं. परन्तु भगवान सर्वदा हमारे भीतर हैं; हमारे आस-पास हैं. वह हमसे दूर नहीं हैं. काफी देर व दूर तक खोजने के बाद हिरणी को अहसास हुआ कि जगत परमेश्वर सर्वदा उसके साथ ही थे.

सीख:

अगर हम आत्मविश्लेषण करेंगें तो हमें विश्वास होगा कि ईश्वर व शान्ति हमारे भीतर ही हैं पर हम उन्हें बाहर ढूँढ़ते रहते हैं.

गुरु राम दस ने कहा है, “मैं अपने भीतर आपके नाम के जाप की विनती करता हूँ और इसी नाम से दिन-रात मुझे शान्ति मिलती है.

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अनुवादक- अर्चना

ब्राह्मणी और नेवला

   आदर्श : उचित आचरण
 उप आदर्श : विभेदन

एक शहर में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था. ब्राह्मण की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया. ठीक उसी समय एक नेवले ने भी एक बच्चे को जन्म दिया. ब्राह्मणी ने नेवले के बेटे को गोद ले लिया nevla3और उसका लालन-पालन अपने बेटे के समान करने लगी. लेकिन फिर भी ब्राह्मणी अपने बेटे को नेवले के साथ कभी अकेला नहीं छोड़ती थी. ब्राह्मणी को नेवले पर भरोसा नहीं था और उसे डर था कि नेवला कभी भी उसके पुत्र को हानि पहुँचा सकता है. ऐसा कहा जाता है कि अपना सगा बेटा कितना भी चरित्रहीन, बदसूरत, मूर्ख व दुष्ट क्यों न हो, पर अपने माता-पिता का लाडला रहता है.

एक दिन ब्राह्मणी झील से पानी लेने गई और ब्राह्मणी के जाते ही घर में एक कोबरा घुस आया. ब्राह्मणी के पुत्र की रक्षा करने के लिए नेवले ने साँप पर हमला कियाnevla1 और उसे मार डाला. अपनी माँ, ब्राह्मणी, के पैरों की आहट सुनकर खून से लिपटा हुआ मुँह लेकर नेवला माँ का स्वागत करने गया. nevla2जब माँ ने देखा कि नेवले के मुँह से खून बह रहा है तो उसने सोचा कि जिस बात का उसे डर था वही हुआ है. और बिना कुछ सोचे-समझे, ब्राह्मणी ने नेवले पर पानी का घड़ा फेंका, जिससे नेवले की मृत्यु हो गई.

भयभीत ब्राह्मणी जब घर के अंदर गईnevla तो उसने अपने पुत्र को पालने में गहरी नींद में सोते हुए पाया. पास में एक लहू-लुहान कोबरा मरा पड़ा था. ब्राह्मणी शोक व पश्चाताप से भर गई कि उसने अपने बेटे समान नेवले को मार डाला था.nevla4

सीख :

ज्ञानी व्यक्तियों ने कहा है कि जो अपने काम विचारशीलता से नहीं करते हैं उन्हें, ब्राह्मणी की तरह, अपने कर्मों पर पछतावा करना पड़ता है. जल्दबाज़ी से सदा हानि ही होती है. हमें सोच-विचार कर ही हर कार्य करना चाहिए.

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अनुवादक – अर्चना

मगरमच्छ और पुजारी

आदर्श : सत्य
उप आदर्श : एकात्मकता

यह एक मगरमच्छ की कहानी है जो हर सुबह बहुत ही विचित्र बर्ताव करता था. उसका व्यवहार अन्य मगरमच्छों से काफी अलग था. वह हर रोज़ सूर्योदय से पहले, निष्ठापूर्वक अपनी साधना का अभ्यास करता था.croc6

तुम्हें पता है कि साधना क्या होती है? साधना तुम्हारा आध्यात्मिक अभ्यास है. साधना के अंतर्गत तुम हर रोज़ भगवान को याद करते हो. भगवान का ध्यान करने के लिए तुम क्या करते हो?

यह मगरमच्छ बहुत ही होशियार था. उसे मालूम था कि सूर्योदय से पहले का समय ईश्वर का मनन करने के लिए सर्वोत्तम होता है. इसलिए हर सुबह अपने शरीर का व्यायाम करने के लिए वह काफी लंबा तैरता था.croc3 तत्पश्चात पूरी श्रद्धा से भगवान की पूजा-अर्चना करता था. वह अपना प्रत्येक दिन साधना से आरम्भ करता था. साधना के उपरान्त वह पौष्टिक भोजन करता था जिससे उसे दिनभर के लिए शक्ति मिल सके. एक सुबह एक प्रसिद्द पुजारी वहाँ से गुज़रे.

पुजारी ने मगरमच्छ को साधना करते हुए देखा. उन्होंने मगरमच्छ से पूछा, “अरे घड़ियाल!…..तुम क्या कर रहे हो??? तुम एक पशु होने पर भी प्रतिदिन पूजा-पाठ करते हो. क्यों? इसका तुम्हें क्या लाभ है?”croc1
मगरमच्छ ने उत्तर दिया, “आपने ठीक कहा कि मैं एक पशु हूँ….परन्तु…..मैं भगवान को महसूस करना चाहता हूँ; इसलिए मैं हर रोज़ साधना का अभ्यास करता हूँ.”
“पर इसका कोई फायदा नहीं है, ” पुजारी ने कहा.
“क्यों नहीं?” , मगरमच्छ ने पूछा.
पुजारी ने उत्तर दिया, “तुम भगवान को महसूस नहीं कर सकते. तुम तो केवल एक मगरमच्छ हो. तुम्हें मानव शरीर में पुनर्जन्म का इंतज़ार करना पड़ेगा! ”
मगरमच्छ ने निडरता से उत्तर दिया, ” मगर…..मेरी सोच से तो आप मूर्ख हैं. आप पुजारी की तरह दिखते ज़रूर हैं पर आपको तो मूलभूत बातें भी नहीं पता हैं. जिस भगवान ने आपको रचा है, उसी भगवान ने मुझे भी बनाया है.”

मगरमच्छ की बात सुनकर पुजारी आश्चर्यचकित थे कि वह इतना समझदार कैसे था.

मगरमच्छ ने आगे कहा, “अगर मैं प्रतिदिन भगवान को याद करूँगा और उनका ध्यान करूँगा तो संभवतः मैं भगवान को अनुभव कर सकता हूँ. पर अगर आप कोई भी साधना नहीं करेंगें तब तो भगवान को महसूस करने की ज़रा भी संभावना नहीं है. वास्तव में, आप अपने अगले जन्म में मगरमच्छ बन जायेंगें.”

पुजारी ने उत्तर दिया, “मैं? मगरमच्छ?? तुम्हें इतना मूर्खतापूर्ण विचार कहाँ से आया?” अचानक, अरे !!! पुजारी उसी क्षण मगरमच्छ में बदल गए . अब वहाँ पर दो मगरमच्छ पास-पास बैठे हुए थे.croc2
मगरमच्छ ने पुजारी से पूछा, “तो….अब आपको कैसा लग रहा है?”
पुजारी हक्के-बक्के थे.
पुजारी ने कहा, “तुम्हें कैसे मालूम था कि मैं मगरमच्छ में बदल जाऊँगा?”
मगरमच्छ ने उत्तर दिया, “हालाँकि मैं एक मगरमच्छ हूँ पर मैं धार्मिक जीवन व्यतीत करता हूँ. दूसरी ओर, यद्यपि आप पुजारी दिखते हैं पर व्यवहार मगरमच्छ के समान करते हैं.”

पुजारी ने भले ही सोचा था कि वह मगरमच्छ से बेहतर हैं पर वास्तव में, हम सब की रचना एक ही ईश्वर ने की है.
तुम जो भी हो, ऐसा कभी मत सोचो कि तुम दूसरों से अधिक श्रेष्ठ हो.

सीख:

गुरु नानक ने कहा है, “सच्चाई महान है लेकिन सच्चाई में जीना उससे भी महान है.”
साधना व रोज़ाना मनन सच्चाई से जीने में हमारी मदद करते हैं.
गहरी श्वास लेते रहें और सदा याद रखें : हम सब एक हैं.

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अनुवादक- अर्चना