Archive | July 2014

ईश्वर का विनम्र भक्त

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : नम्रता

मेलपथुर नारायण भट्टतिरि, गुरुवायुरप्पन- भगवान कृष्ण के भक्त थे. उन्होंने सम्वत १५८६ में १०३४ छंदों युक्त नारायणीयम के रूप में भागवत पुराण के सारांश की रचना की थी. मेलपथुर भट्टतिरि, अच्युत पिशरोदी के विद्ध्यार्थी थे. उनके गुरु जब बीमार पड़े तब शिष्य होने के नाते मेलपथुर भट्टतिरि ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने गुरु की बीमारी अपने ऊपर ले ली. बीमारी का कोई उपाय नहीं था अतः एज़ुथाचं ने उन्हें गुरुवायुरप्पन का भक्त बनने की हिदायत दी. संस्कृत में विद्वान होने के कारण, मेलपथुर भट्टतिरि प्रतिदिन प्रभु के लिए एक छंद की रचना करते थे. और अंतिम छंद पूरा होने के पश्चात उन्हें उनके रोगों से मुक्ति मिल गई.

पूनतनाम नम्बूदिरी, भगवान गुरुवायुरप्पन के एक विनम्र भक्त थे. poontaउन्होंने प्रभु की प्रशंसा में एक मलयाली गीत ‘ज्ञानप्पन’ लिखा. वे भट्टतिरि के समान विद्वान नहीं थे पर उनके गीत अपनी सादगी व धार्मिक भावना के लिए प्रसिद्द थे. उन्होंने भट्टतिरि से अपने गीतों का संशोधन करने का निवेदन किया. परन्तु भट्टतिरि में नम्रता का अभाव होने के कारण उन्होंने पूनतनाम के संस्कृत ज्ञान का मज़ाक उड़ाया. पूनतनाम घर लौटकर भगवान के समक्ष फूट-फूट कर रोये.

उस रात जब भट्टतिरि नारायणीयम सुनाने की तैयारी कर रहे थे तब एक लड़का उनके घर प्रकट हुआ. narayaneeyam1लड़के को अपने साथ बैठाकर उन्होंने पाठ करना शुरू किया. लड़के ने पहले छंद में ही एक गलती निकाल दी. कवि ने गलती स्वीकार की और अगले छंद की ओर बढ़ गए. लड़के ने दूसरे छंद में दो गलतियाँ अंकित कीं. इस प्रकार तीसरे में तीन इत्यादि. दसवें छंद तक भट्टतिरि समझ गए कि वह बालक स्वयं ईश्वर है. उन्हें स्पष्ट हो गया कि पूनतनाम की भक्ति भगवान को उनकी शिक्षा व विभक्ति (संस्कृत व्याकरण) के उत्कृष्ट ज्ञान से अधिक प्रिय है. वे पूनतनाम के पास दौड़े और उनसे क्षमा याचना की. जब उन्होंने ‘ज्ञानप्पन’ पढ़ा तो पाया कि वह दोषरहित था.

सीख:

ईश्वर के लिए प्रेम व विनम्रता रहित ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण विश्वास व श्रद्धा है. विनम्रता चरित्र निर्माण का प्रमाण-चिन्ह है.

 

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translation: अर्चना

केवल रुक जाओ

        आदर्श : प्रेम

उप आदर्श : सहानुभूति

एक थके हुए और उत्सुक सैनिक को एक वृद्ध पुरुष के पास ले जाकर नर्स ने कहा, “आपका बेटा यहाँ है.” जब तक रोगी ने अपनी आँखें खोलीं, उसे इन शब्दों को कई बार दोहराना पड़ा.stay2

दिल के दौरे के दर्द के कारण उन्हें भारी मात्रा में नींद की दवा दी गई थी. उन्होंने धीमे से वर्दी वाले युवा नौसैनिक को तम्बू के बाहर खड़े देखा. stay1उन्होंने अपने हाथ उसकी ओर बढ़ाए. नौसैनिक ने वृद्ध का कमज़ोर हाथ अपने मज़बूत हाथ में लेकर, प्रेम और उत्साह का सन्देश दिया.

नर्स एक कुर्सी लेकर आई ताकि नौसैनिक बिस्तरे के निकट बैठ पाता. बूढ़े व्यक्ति का हाथ पकड़े वह युवा नौसैनिक रात भर हल्के प्रकाशित रोगीकक्ष में बैठा रहा और प्रेम तथा भरोसे के शब्द बोलता रहा. समय- समय पर नर्स नौसैनिक को उठकर कुछ पल आराम करने का सुझाव देती.

उसने इंकार कर दिया. जब भी नर्स रोगीकक्ष में आती थी, नौसैनिक उसके तथा अस्पताल के रात्रि कोलाहल- ऑक्सीजन टैंकों का झनझनाना, रात्रि कर्मचारियों का अभिनन्दन अदल-बदल करते हुए खिलखिलाना, अन्य रोगियों का रोना- कराहना – के प्रति अनजान होता था.

समय-समय पर नर्स ने नौसैिनक को कुछ सौम्य शब्द बोलते सुना. अपनी अंतिम साँसे लेते हुए उस व्यक्ति ने कुछ नहीं कहा, केवल अपने बेटे को रातभर कसकर पकड़े रखा.

सुबह होते-होते उस वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु हो गई. नौसैनिक ने रात भर से जिस हाथ को पकड़ा हुआ था अब वह बेजान था. उस वृद्ध से अपना हाथ छुड़ाकर वह जवान नर्स को इस की सूचना देने गया. जब तक नर्स कुछ कार्य कर रही थी, नौसैनिक ने धैर्यता से इंतज़ार किया.
आखिरकार वह वापस आई. उसने हमदर्दी के शब्द बोलने शुरू किये पर नौसैिनक ने उसे रोक दिया.

नौसैनिक ने पूछा, “वह व्यक्ति कौन था?”
नर्स भौचक्की रह गई. “वह आपके पिता थे, ” उसने उत्तर दिया.
“नहीं, वो मेरे पिता नहीं थे,” नौसैनिक ने उत्तर दिया. “मैंने अपनी ज़िन्दगी में उन्हें पहले कभी नहीं देखा था.”
“तो जब मैं आपको उनके पास ले गई तो आपने कुछ कहा क्यों नहीं?”
“मुझे तभी मालूम हो गया था कि कोई भूल हुई है पर मुझे यह भी मालूम था कि उन्हें अपने बेटे की ज़रुरत थी और उनका बेटा वहाँ नहीं था. जब मैंने जाना कि वे इतने बीमार हैं कि मुझमें और अपने बेटे में भेद भी नहीं कर पा रहे हैं, तब यह जानते हुए कि उन्हें मेरी कितनी आवश्यकता है, मैं रूक गया.”

“मैं आज रात यहाँ श्री विलियम ग्रे को खोजने आया था. उनका पुत्र आज इराक में मारा गया था और मुझे श्री ग्रे को सूचित करने के लिए भेजा गया था. इन सज्जन का क्या नाम था?”
आँखों में आँसू लिए नर्स ने उत्तर दिया, “श्री विलियम ग्रे…….”

“अगली बार किसी को तुम्हारी ज़रुरत हो…..वहीँ रहना. रुके रहना.”

 सीख:

जब भी कर सको तो ज़रुरतमंद लोगों की मदद करो. पता नहीं तुम्हारे एक शब्द, मुस्कान या उदार कार्य का दूसरे व्यक्ति पर क्या असर होगा.

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translation:  अर्चना

गुरु पूर्णिमा

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हिन्दू आध्यात्मिक गुरुओं को सर्वोच्च महत्व देते हैं. गुरु को प्रायः भगवान के बराबर माना जाता है- गुरु देवो नमः जीवन में गुरू के महत्व का वर्णन कबीर दास जी ने अपने दोहों में पूरी आत्मियता से किया है।

 गुरू गोविन्द दोऊ खङे का के लागु पाँव,
        बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।

गुरु को सदा जीव तथा अनश्वर के बीच कड़ी माना जाता है. जिस प्रकार सूरज की रोशनी से चन्द्रमा दमकता है और उसे गौरवान्वित करता है, उसी प्रकार गुरु से लाभान्वित होकर सभी शिष्य चन्द्रमा के समान चमक सकते हैं. गुरु पूर्णिमा का दिन हमारे जीवन के सभी शैक्षिक तथा आध्यात्मिक गुरुओं को समर्पित है.
हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, गुरु पूर्णिमा का दिवस महान ऋषि वेद व्यास को समर्पित है. इसीलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं.

 गुरु पूर्णिमा का अर्थ :

गुरु शब्द के दो अंश हैं: ‘गु’ व ‘रु’. ‘गु’ का अर्थ होता है- अंधकार (अज्ञान) एवं ‘रु’ का अर्थ होता है- प्रकाश (ज्ञान). अतः गुरु हमें अज्ञान रुपी अन्धकार से ज्ञान रुपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं.

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, गुरु पूर्णिमा आषाढ़ माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है. गुरु हमारे जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हम सब आजीवन नई चीज़ों के बारे में सीखते हैं और अपना ज्ञानोदय करते हैं. यह सब गुरु के कारण संभव होता है. सभी गुरुओं को भगवान का स्थान दिया जाता है. उनकी इच्छा, आदेश तथा उपदेश को मूलभूत माना जाता है. निम्न श्लोक इस कथन की उचित रूप से पुष्टि करता है-

       गुरुब्रह्मा गुरुविर्ष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
      गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।

गुरु को भगवान का दर्जा इसलिए दिया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु के द्वारा हम सर्वोच्च ज्ञान हासिल करके परमात्मा तक पहुँच सकते हैं.

   वेद व्यास : त्रिकालिक सर्वोच्च गुरु

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गुरु वेद व्यास अब तक के सबसे महान तथा सर्वाधिक ज्ञानी गुरु माने जाते हैं. गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा, गुरु वेद व्यास को समर्पित है और उनके जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. वेद व्यास सर्वाधिक सम्मानित गुरुओं में से एक हैं. उन्होंने हमें सच्चे आदर्श सिखाये हैं और सही व गलत में भेद करने में हमारी सहायता की है. वेद व्यास द्वारा लिखित विराट महाकाव्य, महाभारत, इसका प्रमाण है. महाभारत से मिलीं शिक्षाएँ आज के युग में भी वैद्य हैं तथा आज के समाज में प्रचलित सभी अनैतिक परिस्तिथियों में हमारा मार्ग दर्शन करतीं हैं.

वेद व्यास वे गुरु हैं जिन्होंने वेदों को चार भागों में वर्गीकृत किया. हम उन्हें रिग वेद, यजुर वेद, साम वेद तथा अथर्व वेद के नामों से जानते हैं. वेद व्यास ने ‘श्रीमद भगवद गीता’ एवं १८ पुराण भी लिखें थे. vyasa इन महाग्रंथों की शिक्षाएँ मानवजाति को सबसे भव्य तथा सर्वोत्तम भेंट हैं. दत्तात्रेय, जिन्हें गुरुओं का गुरु माना जाता है, ने भी ऋषि व्यास से शिक्षा ग्रहण की थी.

 गुरु पूर्णिमा की महत्ता :

प्राचीन काल से, गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरु को विशेष पूजा व अभिनन्दन अर्पण करते हैं. अतः गुरु पूर्णिमा, गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण का पर्व है.
गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा केवल हिन्दूओं के लिए ही महत्त्वपूर्ण दिन नहीं है. दुनियाभर के बौद्धधर्मी तथा जैन भी इसे पूरी श्रद्धा तथा विश्वास के साथ मनाते हैं.
गुरु पूर्णिमा के दिन सभी बौद्धधर्मी भगवान गौतम बुद्ध को श्रद्धांजलि अर्पण करते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस दिन गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला धर्मोपदेश दिया था. बुद्ध का प्रथम धर्मोपदेश जिसे धर्म चक्र प्रवर्तन सूत्र कहते हैं, आषाढ़ की पूर्णिमा को दिया गया था.
जैन परंपरा के अनुसार, इस दिन २४वे तीर्थंकर महावीर ने इंद्रभूति गौतम को अपना पहला शिष्य बनाया था. इस प्रकार वे स्वयं गुरु बने थे.
अतः गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु तथा शिक्षकों को विशेष आदर दिया जाता है. हमारी आत्मिक शिक्षा शुरू करने का यह शुभ दिवस है. परंपरा के अनुसार, आत्मिक जिज्ञासु, गुरु पूर्णिमा के दिन, अपनी आध्यात्मिक साधना सशक्त करनी शुरू कर देते हैं.

गुरु पूर्णिमा के दिन से ‘चतुरमास’ की अवधि आरम्भ होती है. ‘चतुरमास’ आषाढ़ की देवशयानी एकादशी से कार्तिक की प्रबोधिनी एकादशी तक ४ महीनों का पवित्र समय है. यह समय वर्षा ऋतु का काल है. पुराने समय में, विचरण करने वाले गुरु तथा उनके शिष्य एक स्थान पर ठहरकर अध्ययन करते थे और व्यास द्वारा कृत ब्रह्म सूत्र पर उपदेश देते थे. सन्यासी एक जगह पर रूककर जनता को प्रवचन देते थे.

गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाना :

इस पवित्र अवसर पर सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सशक्त जाप व ध्यान करना चाहिए. गुरु के रूप का ध्यान करना चाहिए, गुरु के चरणों की पूजा करनी चाहिए, उनके शब्दों को पावन मन्त्र मानना चाहिए क्योंकि गुरु कृपा से ही मोक्ष मिलता है.
विकल्प के रूप में हम मौन धारण कर अपने गुरु की पुस्तकों का अध्ययन कर सकते हैं अथवा मानसिक रूप से गुरु की शिक्षाओं पर विचार कर सकते हैं.
इस पावन दिन पर नए संकल्प लेकर अपने गुरु के निर्देश के अनुसार हमें आध्यात्मिक पथ पर चलना चाहिए.
गुरु पूजा का सर्वोत्तम तरीका उनकी शिक्षाओं का पालन, उनकी महिमा व सन्देश का प्रचार करना तथा उनकी शिक्षायों को स्वयं में सम्मिलित कर दमकना है.

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sources : experience-nepal.com/event/guru-purnima

hinduism.about.com

–  अर्चना द्वारा अनुवादित

राम नाम का जाप

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आदर्श : सत्य
उप आदर्श : ज्ञान

एक गुरु युवा बालकों के एक समूह को विष्णु सहस्त्रनाम सिखा रहे थे. गुरु ने श्लोक दोहराया:

श्री राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
फिर उन्होंने लड़कों से कहा, “अगर तुम तीन बार राम नाम का जाप करते हो तो यह सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम या १००० बार ईश्वर के नाम का जाप करने के बराबर है.”

उनमें से एक लड़का अध्यापक से सहमत नहीं था. उसने शिक्षक से प्रशन किया, “गुरूजी! ३ बार = १००० बार कैसे हो सकता है? मुझे इसका तर्क समझ में नहीं आया. ३ नाम = १००० नाम कैसे?

ज्ञानी तथा निपुण गुरु, जो भगवान राम के एक महान भक्त थे, ने अति सरलता से समझाया, “भगवान शिव कहतें हैं कि भगवान राम का नाम सभी शब्दों से अधिक मधुर है और इस नाम का जाप, सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम या विष्णु के १००० नामों के जाप के समतुल्य है.”

इस बात की पुष्टि करने के लिए कि ३ बार राम नाम का जाप = १००० बार या सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम के जाप के बराबर है, यहाँ एक दिलचस्प संख्यात्मक गणना है-
राम के नाम में संस्कृत के दो अक्षर हैं- र एवं म

र (संस्कृत का द्वितीय व्यंजन : य, र, ल, व, स, श)
म (संस्कृत का पाँचवा व्यंजन : प, फ, ब, भ, म)
र और म के स्थान पर २ तथा ५ रखने से राम = २* ५= १०
अतः तीन बार राम राम राम बोलना = २ * ५* २* ५* २* ५ = १० * १० * १० = १०००. इस प्रकार ३ बार राम नाम का जाप १००० बार के बराबर है.

बालक इस उत्तर से प्रसन्न हुआ और उसने पूरी एकाग्रता और निष्ठा से विष्णुसहस्त्रनाम सिखना शुरू कर दिया.
आइए इस जिज्ञासु बालक का धन्यवाद करते हुए इस जानकारी को अधिकतम बंधुओं में फैलाएँ और प्रतिदिन सुबह- शाम राम नाम का जाप कम-से-कम १००० बार करें.

  सीख :
जब किसी रीति-रिवाज़ या पूजा को करने का अर्थ या उद्देश्य दूसरों, खासकर बच्चों, को समझाते हैं तो वे इन्हें सराहते हैं. और इनका अभिप्राय समझकर, जबरदस्ती में नहीं अपितु श्रद्धा से, इनका पालन करते हैं. ज्ञान व अनुभव द्वारा बुद्धिमत्ता आती है.

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translation :  अर्चना

स्वयं की निंदा अहंभाव है

आदर्श : सत्य
उप आदर्श : रवैया, आशावाद

एक बार कृष्ण ने सरदर्द होने का दिखावा किया – प्रचण्ड, असहनीय दर्द! उन्होंने अपनी भूमिका का अभिनय काफ़ी वास्तविकता से किया. उन्होंने अपने सर पर गरम कपड़े बाँध लिए और बिस्तर पर बेचैनी से लोटते रहे. उनकीं आँखें लाल थीं और वे स्पष्ट रूप से कष्ट में दिख रहे थे. उनका चेहरा भी सूजा हुआ और फीका दिखाई पड़ रहा था. रुक्मिणी, सत्यभामा तथा अन्य रानियाँ विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ तथा प्रशामक उपचार लेकर दौड़ी, पर वह भी बेकार था. अंत में रानियों ने नारद से सलाह की. नारद बीमार कक्ष में स्वयं कृष्ण से विचार विमर्श करके यह पता लगाने गए कि कौन सी दवाई उनका उपचार करेगी.

आपके अनुमान से कृष्ण ने नारद को क्या लाने का निर्देश दिया होगा? कृष्ण ने नारद को एक सच्चे भक्त के पैर की धूल लाने को कहा. पलक झपकते ही नारद ने स्वयं को भगवान के कुछ प्रसिद्ध भक्तों के समक्ष प्रदर्शित किया. परन्तु अपने ईश्वर के द्वारा दवाई के लिए इस्तेमाल हेतु अपने पैर की धूल भेंट करने के लिए वे अति विनम्र थे.

यह भी अहंभाव है: “मैं नीच, घटिया, तुच्छ, बेकार, पापी, निम्न हूँ” – ऐसी भावनायें भी अहंवादी हैं; जब अहम चला जाता है तो आप न तो श्रेष्ठ और न ही निम्न महसूस करते हैं. कोई भी ईश्वर को धूल नहीं देना चाहता था. सभी ने कहा कि वे अति निरर्थक थे. निराश होकर नारद रोग-शैय्या पर वापस आ गए. तब कृष्ण ने उनसे पूछा, “क्या तुमने वृन्दावन में प्रयास किया, जहाँ गोपियाँ रहतीं हैं?” इस सुझाव पर रानियाँ हँसी और नारद ने भी निराश होकर पूछा, “उन्हें भक्ति के बारे में क्या पता है?” फिर भी ऋषि को तुरंत उधर जाना पड़ा. जब गोपियों ने सुना कि कृष्ण बीमार हैं और उनके पैर की धूल कृष्ण को ठीक कर सकती है तो बिना सोचे समझे उन्होंने अपने पैर की धूल झाड़कर, नारद के हाथ उस धूल से भर दिए.

जब तक नारद द्वारका पहुँचे, सरदर्द जा चुका था. यह केवल पाँच दिन का नाटक था, यह सिखाने के लिए कि स्वयं की निंदा भी अहंभाव है. स्वामी के आदेश का पालन, सभी भक्तों को, बिना संकोच करना चाहिए.

http://bababooks.org/chinnakatha1/ck1.html
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translation: अर्चना