Archive | July 2018

  पदचिन्हों की प्रार्थना 

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       आदर्श: प्रेम

   उप आदर्श: विश्वास, प्रभु की इनायत 

    एक रात मैंने एक सपना देखा…….मैंने देखा कि समुद्रतट के किनारे मैं प्रभु के साथ टहल रहा था और आसमान में हर तरफ मेरे जीवनकाल की विभिन्न घटनाएँ प्रदर्शित हो रही थीं. प्रत्येक घटना के दौरान मैंने रेत पर पदचिन्हों के दो जोड़े देखे : जिसमें से एक मेरा था और दूसरा प्रभु का. foot4जब मेरे जीवन की अंतिम घटना प्रसारित हो रही थी, मैंने मुड़कर रेत पर पड़े पदचिन्हों को देखा. मैंने पाया कि मेरे जीवन की राह में कई बार पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा था. पदचिन्हों के एक जोड़ों को गौर से देखने पर मुझे अहसास हुआ कि ऐसा मेरे जीवन के सबसे अधिक दुखद व उदासीन समय में था. पदचिन्हों का एक जोड़ा देखकर मैं बहुत परेशान था और मैंने इस विषय में प्रभु से प्रश्न किया. 

 “प्रभु, आपने कहा था कि एक बार जब मैं आपका अनुसरण करने का निश्चय करूँगा तब आप सदा मेरे साथ रहेंगें;  परन्तु मेरे जीवन की सबसे अधिक कष्टप्रद परिस्थितियों में मैंने पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा देखा है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जब मुझे आपकी सबसे अधिक ज़रुरत थी, आपने मेरा साथ क्यों छोड़ दिया.”

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   प्रभु ने उत्तर दिया, “मेरे प्रियतम व अनमोल बच्चे. मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे मुसीबत व आपत्ति के समय में मैं कभी भी तुम्हारा साथ नहीं छोडूँगा. तुमने जब-जब पदचिन्हों का एक जोड़ा देखा है तभी वह समय था जब मैंने तुम्हें अपने पास उठाया हुआ था.”

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     सीख:

    भगवान् के प्रति आस्था, प्रेम व निष्ठा रखने से वह कभी भी हमारा त्याग नहीं करते हैं. वह हमारी परेशानियाँ पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं करते परन्तु कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त साहस व सहारा अवश्य देते हैं. वह हमारा मार्गदर्शन करते हैं और दुःख व आपत्ति के समय में हमें सँभालते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना    

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      गाँव वाला और एक सुखी व्यक्ति 

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     आदर्श: शांति 

    उप आदर्श: मन को शांत करना

     एक घाटी के छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था जो सदा खुश रहता था और सब के प्रति दयालु व सहानुभूतिशील रहता था. वह हमेशा मुस्कुराता रहता था और जब भी ज़रुरत होती थी सदा विनम्र व उत्साहपूर्वक शब्द बोलता था. उससे मिलने के बाद सभी खुश हो जाते थे. लोगों को उस पर भरोसा था और सभी उसे अपना विशेष मित्र समझते थे. 

    एक ग्राम वासी इस व्यक्ति के हमेशा खुश रहने के रहस्य को जानना चाहता था. वह हैरान था कि कैसे इस व्यक्ति के मन में किसी के भी प्रति द्वेष नहीं था और वह सदा प्रसन्नचित्त रहता था.

    एक बार यह जिज्ञासु व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को राह चलते मिल गया और उससे पूछा, “हमारे आसपास अधिकतर लोग स्वार्थी व असंतुष्ट हैं. तुम्हारी तरह वह हर समय मुस्कुराते नहीं हैं; और न ही तुम्हारी तरह वह मेहरबान व मददगार हैं. इसका क्या कारण है?”   

   उसने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जब तुम अपने अंदर शांति स्थापित करते हो, तुम समस्त विश्व के साथ शान्ति कायम कर सकते हो. अगर तुम अपनी अंतरात्मा को पहचान सकते हो, तुम सबके भीतर की आत्मा को भी पहचान लोगे और तब सबके प्रति दयालु व विनम्र होना तुम्हें स्वाभाविक प्रतीत होगा. यदि तुम्हारे विचार तुम्हारे नियंत्रण में हैं तो तुम प्रबल व सुदृढ़ बनोगे. तुम्हारा व्यक्तित्व एक रोबोट के समान है जो कुछ नियत कार्य करने के लिए योजनाबद्ध होता है. तुम्हारे विचार व स्वभाव साधन हैं जो तुम्हारे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. इनसे स्वयं को स्वाधीन करने पर तुम्हारे भीतर की अच्छाई व ख़ुशी प्रकट होगी.”

    अपने साथी की बात सुनकर ग्रामवासी शोक प्रकट करते हुए बोला, “पर उसके लिए बहुत सारा कार्य करना पड़ेगा. हमें अच्छी व अनुकूल आदतें विकसित करनी पड़ेंगी. ध्यान केंद्रित करने तथा विचारों को नियंत्रित करने की क्षमता सुदृढ़ करनी होगी. सफल होने के लिए कार्य कठिन व अनंत हैं. बहुत सारी बाधाएं पार करनी पड़ेंगी. यह कोई सरल कार्य नहीं है.”  

    “कठिनाइयों के बारे में मत सोचो वरना तुम सब कुछ वैसा ही देखोगे और उसी प्रकार से अनुभव करोगे. अपनी भावनाओं व विचारों को शांत करो और इसी शान्ति की अवस्था में स्थिर रहने की चेष्टा करो. तुम केवल निश्चल रहो और अपने विचारों को स्वयं पर हावी मत होने दो.”

   “मुझे बस इतना ही करना है? ” ग्रामीण ने पूछा. 

   “अपने विचारों पर विशेष निगरानी रखो और ध्यान दो कि वह कैसे आते और जाते हैं. इससे उत्पन्न शांति में स्थिर रहो. शुरूआत में शांति के पल संक्षिप्त होंगे पर समय के साथ यह पल लम्बे समय तक बरकरार रहेंगे. यह शान्ति शक्ति, सामर्थ्य, करुणा और प्रेम है. समय के साथ तुम्हें अपनी और सर्वव्यापी शक्ति में एकता का अहसास होगा और यह तुम्हें एक अलग ही दृष्टिकोण से काम करने का रास्ता दिखाएगा. यह नया पहलू स्वार्थी व संकुचित अहम् का नहीं होगा बल्कि चेतना का होगा. ”

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   ग्रामवासी बोला, “मैं तुम्हारा कथन याद रखने की कोशिश करूँगा. पर मैं एक और बात को लेकर उत्सुक हूँ. ऐसा प्रतीत होता है कि तुम परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते हो. तुम्हारे पास सबके लिए विनम्र वचन हैं और तुम सदा सहायक रहते हो. लोग तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और तुम्हारी अच्छाई का कभी शोषण नहीं करते हैं.”  

     “ज़रूरी नहीं है कि अच्छा व हितैषी होना कमज़ोरी का संकेत है. एक अच्छे व्यक्ति होने के साथ तुम सशक्त भी बन सकते हो. लोग तुम्हारी भीतरी शक्ति महसूस कर लेते हैं और इस कारण तुम पर हावी नहीं होते हैं. जब तुम सशक्त व भीतर से शांत होते हो, तुम दूसरों की मदद करते हो क्योंकि तुम सहायता करना चाहते हो और मदद करने की सक्षमता रखते हो. तुम निर्बलता से नहीं बल्कि शक्ति के फलस्वरूप काम करते हो. अच्छाई दुर्बलता का प्रतीक नहीं है जैसा कि कुछ लोगों की ग़लतफहमी है. ताकत व क्षमता से साथ भी अच्छाई  ज़ाहिर की जा सकती है.”

  “तुम्हारे उपदेश व स्पष्टीकरण के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद” , ग्रामीण बोला और खुश व संतोष होकर घर लौट गया.

   सीख:

    हमें स्वयं में विश्वास रखना चाहिए और सही कार्य काने के लिए भीतरी शक्ति व आस्था विकसित करनी चाहिए. मन की शान्ति के फलस्वरूप अन्य आदर्श जैसे प्रेम व धार्मिकता भी प्रदर्शित होते हैं.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना 

  गुरु और शेर 

     

    आदर्श: शान्ति 

   उप आदर्श: धीरज, एकाग्रता

   एक शिक्षक और उनका छात्र एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे. अचानक उन्होंने एक दहाड़ सुनी. उन्होंने पीछे मुड़कर गौर से देखा और पाया कि एक विशाल शेर उनका पीछा कर रहा था. 

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छात्र झटपट वहाँ से भागने को तैयार था पर तभी उसे अपनी आत्मसंयम की शिक्षा और अभ्यास का ध्यान आया. उसने स्वयं को संभाला, शांत किया और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने लगा कि उसके शिक्षक क्या करेंगे.

   शिष्य ने पूछा, “हम क्या करें, गुरूजी? ”

   शिष्य की ओर देखकर शिक्षक शांत स्वर में बोले, “हमारे पास अनेकों विकल्प हैं. अपने मन में ख़ौफ़नाक डर भर कर हम स्वयं को शक्तिहीन बना सकते हैं ताकि शेर जैसे चाहे वैसे पेश आ सकता है. हम बेहोश होकर गिर सकते हैं. हम भाग सकते हैं पर शेर भी हमारे पीछे भागेगा. हम शेर के साथ संघर्ष कर सकते हैं  पर शेर शारीरिक रूप से हमसे अधिक शक्तिमान हैं.” 

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   “हम भगवान् से अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर सकते हैं. यदि हमारी एकाग्रता यथेष्ट सुदृढ़ है तो हम अपने मन की ताकत से शेर को प्रभावित कर सकते हैं. हम शेर को प्रेम प्रेषित कर सकते हैं. हम अपनी भीतरी शक्ति पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. हम इस सत्य पर मनन कर सकते हैं कि शेर सहित हम और सम्पूर्ण जगत एक ही इकाई हैं और इस प्रकार हम शेर की अंतरात्मा को प्रभावित कर सकते हैं.”

    “तुम किस विकल्प का चयन करना पसंद करोगे?”

    “आप गुरु हैं. आप मुझे बताएं कि हमें क्या करना चाहिए. हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है, “छात्र ने उत्तर दिया.

    शिक्षक ने निडर होकर शेर की तरफ देखा, अपने मन से सारे विचार निकाले और गहरे ध्यान की स्थिति में चले गए. उन्होंने अपनी चेतना में शेर सहित समस्त जगत को समाविष्ट कर लिया. इस अवस्था में शिक्षक और शेर की चेतना मिलकर एक हो गई.

    इस दौरान छात्र डर कर काँप रहा था क्योंकि शेर उनके काफी नज़दीक था और उनपर छलांग लगाने के लिए तैयार था. छात्र अपने शिक्षक को देखकर हैरान था कि ऐसी खतरनाक परिस्थिति में भी वह कैसे इतने शांत व निर्लिप्त थे.

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    शिक्षक निरंतर निडरतापूर्वक ध्यानमग्न थे.

    कुछ समय के बाद शेर ने अपना सर और पूँछ नीचे की और वहाँ से चला गया. 

  अचम्भित शिष्य ने शिक्षक से पूछा, “आपने क्या किया?” 

    “कुछ नहीं. मैंने केवल अपने मन से सारे विचार निकालकर, शेर की आत्मा को अपने आप में संयुक्त कर लिया था. इससे guruji4आध्यात्मिक स्तर पर हम दोनों में शान्ति का रिश्ता जुड़ गया और इसके परिणाम स्वरूप शेर ने भीतरी शान्ति, शीतलता और एकता भाँप ली. उसे किसी खतरे का आभास या उग्र व्यवहार करने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई और वह वहाँ से चुपचाप चला गया.”

    शिक्षक ने अंत में कहा, “जब मन शांत व स्थिर होता है, उसकी शांति स्वतः ही आसपास के वातावरण व व्यक्तियों में संचारित हो जाती है और उन्हें अत्यंत प्रभावित करती है.”

    सीख:

  यदि हमारा मन शांत व विचार केंद्रित होंगे तो सब कुछ सरलता से सुलझ जाता है और हम सफलता हासिल कर सकते हैं.

 

source: saibalsanskaar.wordpress.com

 अनुवादक- अर्चना