Archive | December 2013

प्रार्थना के द्वारा अपने प्रिय ईश्वर से संपर्क बनाना- उप आदर्श: विश्वास, निष्ठा-आदर्श: प्रेम

faith

एक बार एक बहुत ही गरीब महिला थी. उसके चार बेटे और दो बेटियाँ थीं. उसके पति की तबियत ठीक नहीं रहती थी और वे बिस्तर पर पड़े रहते थे. इस कारण उनके घर में कमाई का कोई साघन नहीं था. जब रसोईघर में फल और सब्ज़ियों की मात्रा घटने लगी तो उसे चिंता होने लगी कि भविष्य में, वह इन चीज़ों की व्यवस्था कैसे कर पाएगी.  उसने नज़दीक के दुकानदार से कुछ दालें और सब्ज़ियाँ उधार लेने का सोचा.

वह नम्रतापूर्वक उस दुकानदार के पास पहुँची और उसने अपने परिवार की  परिस्थिति  समझाई. उसे आशा थी कि दुकानदार उसकी मदद करेगा और उसे खाद्य सामग्री देगा. परन्तु दुकानदार ने उसकी सहायता करने से इंकार कर दिया और उसे मदद के लिए कहीं और जाने को कहा. उसकी अवस्था देखकर पास खड़े एक व्यक्ति ने उसकी मदद करनी चाही और दुकानदार से कहा कि वह उसकी खाद्य पदर्थों का मूल्य चुका देगा.

दुकानदार ने अनिच्छापूर्वक महिला से कहा कि वह अपनी खरीदारी कि सूची तराज़ू पर रख दे और सूची के वज़न के अनुसार वह उसे सामग्री देगा. यह सुनकर महिला ने सर झुका लिया. फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और कुछ क्षण उपरान्त, कागज़ का एक टुकड़ा निकालकर उसपर कुछ लिखा. फिर  उसने नमन करते हुए, उस कागज़ के टुकड़े को सावधानी से तराज़ू के पलड़े पर रख दिया.

जैसे ही महिला ने कागज़ के टुकड़े को तराज़ू पर रखा, वह बैठ गया मानो कागज़ ने तौल की जगह ले ली हो.कागज़ के वज़न से तराज़ू की स्थिति  देख, दुकानदार और वह अन्य व्यक्ति हक्के-बक्के रह गए. चकित दुकानदार ने दूसरे पलड़े पर खाद्य सामग्री रखनी शुरू कर दी. तराज़ू को असंतुलित देख, दुकानदार ने और अधिक खाद्य पदार्थ रखना ज़ारी रखा, जब तक कि तराज़ू का काँटा सामान  हो जाता. दुकानदार को आश्चर्य हुआ कि तभी भी तराज़ू के पलड़े बराबर नहीं हुए.

अंततः उसने झपटकर पलड़े से कागज़ का टुकड़ा लिया तथा उसे और भी अधिक आश्चर्य से देखा. वह खाद्य पदार्थों की सूची नहीं थी. बल्कि वह प्रार्थना थी : “प्रिय प्रभु, आप मेरी ज़रूरतें जानते हैं. मैं आप पर छोड़ती हूँ कि आप मुझे कितना देते हैं. ”

यह चमत्कार देखकर, दुकानदार ने महिला को तराज़ू पर रखी सभी सामग्री निःशुल्क दे दी. महिला ने दुकानदार को उसके इस नेक भाव के लिए धन्यवाद दिया. दुकानदार को बाद में पता चला कि उस रहस्यमय कागज़ के टुकड़े के वज़न से तराज़ू के काँटे टूट गए थे. इसलिए, एक प्रार्थना का भार केवल ईश्वर ही जानते हैं.

सीख

प्रार्थना के द्वारा एक व्यक्ति प्रभु को अपना मन और अपने भाव व्यक्त कर सकता है. प्रार्थना, हमारे प्यारे ईश्वर से व्यक्तिगत अनुभूति और घनिष्ट सम्बन्ध बनाने का, माध्यम है. वह हर पल तुम्हें सुनने को इच्छुक रहते हैं और प्रेम और सहानुभूति से प्रत्यत्तुर देते हैं.

अपने विधाता को इस प्रकार पुकारने की पद्धति को प्रार्थना कहते हैं. जिन्हें भगवान्  में विश्वास होता है, वे साधारणतः उन्हें पूजते हैं.  प्रार्थना, उपासना के दौरान या हमारे मन में चुपचाप भी, की जा सकती है. अगर हम ईमानदारी से प्रभु का अर्चन करेंगे तो वो तुरंत हमारी प्रार्थना का उत्तर देंगें.

जिस खिड़की से हम देखते हैं-उप आदर्श : आत्मपरीक्षण-आदर्श: धर्म

The window through which you see- telugu

एक जवान दम्पति नई जगह रहने आया. अगली सुबह, नाश्ता करते हुए, नवयुवती ने अपनी पड़ोसी को धुले हुए कपड़े बाहर सुखाते हुए देखा . “उसकी धुलाई बहुत साफ़ नहीं है”,  उसने कहा.  “उसको ठीक से कपड़े धोने नहीं आते हैं. सम्भवतः उसे अच्छे धुलाई के साबून की जरूरत  है.” उस नवयुवती के पति ने देखा पर ख़ामोश  रहे.  हर बार जब उसकी पड़ोसी अपने कपड़े धोकर सुखाने डालती, वह युवा औरत इसी प्रकार से आलोचना करती थी.

एक महीने बाद, बाहर रस्सी पर साफ़ और स्वच्छ धुलाई देखकर, उस युवा औरत को आश्चर्य हुआ. और उसने अपने पति से कहा, “देखो उसने ठीक से कपड़े धोना सीख लिया है. मैं अचंभित हूँ कि यह उसे किसने सिखाया.”

पति बोला, ” मैंने आज सुबह जल्दी उठकर हमारी खिड़कियाँ साफ़ की हैं.”

जीवन में भी ऐसा ही होता है.  दूसरों का अवलोकन करते हुए, हम जो देखते हैं, वह उस खिड़की की शुद्धता पर निर्भर करता हैं जिसके द्वारा हम देखते हैं .

 सीख:

१) दूसरों के प्रति कभी भी आलोचनात्मक न हों.

२) जैसा चश्मा पहनते हैं, दुनिया वैसी ही दिखती हैं.  हमारे विचार, हमारी बातों में झलकते हैं.

३) दूसरों को आँकने या उनपर टिप्पणी करने से पहले खुद के अंदर झाँक लो

क्षमा करना अच्छा, भूलना सबसे अच्छा

आदर्श: प्रेम

उप आदर्श: क्षमा, दया

महान वैज्ञानिक आईसैक न्यूटन ने बीस वर्षों तक, प्रतिदिन कई घंटों काम किया और अपनी उत्कृष्ट खोज का परिणाम लिखा.

एक दिन खोज के पन्ने मेज़ पर छोड़ कर,वह सैर पर निकल गए. उनका पालतू कुत्ता ‘डायमंड’ कमरे में लेटा हुआ था. कुछ क्षणों में, वह खेल-खेल में, मेज़ पर कूद पड़ा. इस कारण हस्तलिपि की गठरी पर जलती हुई मोमबत्ती गिर गई और उसमें आग लग गई. बीस वर्षों की कठिन खोज, घड़ी भर में, राख हो गई.

जब  न्यूटन वापस आए तो चौंक गए.  उनके बेश कीमती कागज़ अब मुट्ठी भर राख थे. कोई और होता तो कुत्ते को मौत के घाट उतर देता. परन्तु न्यूटन ने कुत्ते के सर को सहलाया और उसकी ओर दयापूर्वक देखते हुए कहा, ‘डायमंड, तुम्हें नहीं पता तुमने क्या किया है.”

उन्होंने पुनः लिखना शुरू किया. उन्हें कार्य पूरा करने में कई वर्ष लग गए.  एक मूक पशु के लिए उनकी कितनी गहन सहानुभूति थी? न्यूटन का हृदय, उनके मस्तिष्क के समान, महान था.

सीख:

अपने प्रति हुए गलत को माफ़ करना मुश्किल है-  पर दृढ़ इच्छा से यह सम्भव है. पूरी कड़ी को भूलने के लिए अलौकिक प्रयास अवं उत्तम हृदय की आवश्यकता है.  अगर तुम माफ़ करने और भूलने की आदत विकसित कर लो, तो इस व्यापक संसार में तुम्हारा कोई भी शत्रु नहीं होगा.

तुम्हारा सभी से दोस्ताना रहेगा.  स्वामी विवेकानंद ने कहा, “जान लो कि दूसरों के लिए, एकांत में, बुरा बोलना पाप है.  तुम्हें सर्वथा इसका परिवर्जन करना चाहिए.  मन में कई चीज़े आती हैं, पर अगर तुम उन्हें प्रकट करने की चेष्टा करो तो वह धीरे-धीरे तिल का ताड़ बन जाता है. अगर तुम क्षमा करो और भूल जाओ तो सब कुछ वहीं अंत हो जाता है.

प्रेम का विकास करो और द्वेष का त्याग करो

Develop love

 आदर्श: धर्म

उप आदर्श: क्षमा

एक बालविहार अध्यापक ने अपनी कक्षा को एक खेल खिलाने का निश्चय किया.

अध्यापक ने हर छात्र से एक प्लास्टिक की थैली में कुछ आलू  डाल कर लाने के लिए कहा. खेल के नियम अनुसार प्रत्येक छात्र को अपनी थैली के आलूओं को उन छात्रों का नाम देना था जिनसे वह नफरत करता है. अतः एक छात्र की थैली में आलूओं की संख्या उन व्यक्तिओं की संख्या पर निर्भर करेगी जिनसे वह घृणा करता है.

निर्धारित दिन पर, सभी छात्र कुछ आलू ले कर आये, जिन पर उनके द्वारा घृणा करने वाले व्यक्ति का नाम लिखा था. कुछ के पास २ आलू थे, कुछ के पास ३ और कुछ के पास ५ आलू थे. अध्यापक ने फिर बच्चों से कहा कि वे, एक सप्ताह तक, आलू की थैली अपने साथ हर जगह लेकर जाए( शौचालय में भी ).

दिन पर दिन बीतते गए और बच्चों ने सड़े हुए आलूओं से गन्दी बदबू आने की शिकायत करनी शुरू कर दी. इसके इलावा जिनके पास ५ आलू थे, उन्हें अधिक भारी थैली भी उठानी पड़ रही थी. १ सप्ताह के बाद जब खेल अंततः समाप्त हुआ तब बच्चों की जान में जान आई  …

अध्यापक ने पूछा, “१ सप्ताह तक तुम्हें अपने साथ आलू उठाते हुए कैसा महसूस हुआ? “बच्चों ने अपनी निराशा व्यक्त की और हर जगह बदबूदार और भारी आलू उठाने से होने वाली परेशानी की शिकायत करने लगे.

फिर अध्यापक ने उन्हें खेल का गुप्त उद्देश्य बताया.  अध्यापक ने कहा, “जब तुम अपने दिल में किसी के प्रति घृणा रखते हो, तो स्थिति बिलकुल ऐसी ही होती है.  नफ़रत की दुर्गन्ध तुम्हारे ह्रदय को दूषित कर देती है और तुम हर जगह उसे अपने साथ लिए घूमते रहते हो. अगर तुम सड़े आलूओं की दुर्गन्ध १ सप्ताह के लिए भी सहन नहीं कर सकते, तो क्या तुम अनुमान लगा सकते हो कि उम्र भर अपने हृदय में घृणा की दुर्गन्ध रखना कैसा होता होगा??? ”

 सीख :

अपने दिल से किसी के भी प्रति घृणा को निकाल फेंको ताकि तुम्हें उम्र भर पाप न उठाना पड़े. दूसरों को क्षमा करना सबसे अच्छी प्रवृत्ति है.

सच्चा प्रेम, सम्पूर्ण व्यक्ति को प्यार करना नहीं बल्कि त्रुटिपूर्ण व्यक्ति को प्यार करना होता है.

दस्तूरजी-उप आदर्श- ईमानदारी-आदर्श-सत्य

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एक समय एक दस्तूरजी(पारसी पुजारी) थे. मुंबई के एक पारसी मंदिर में काम करने के लिए वह मुंबई आकर रहने लगे. मुंबई पहुँचने के कुछ हफ्ते बाद, उन्हें अपने घर से केंद्र के लिए बस में यात्रा करने का अवसर मिला. बस में बैठने के बाद उन्होंने जाना कि परिचालक ने गलती से उन्हें छुट्टे में १ रुपया ज्यादा दे दिया था. वे विचार करने लगे और उन्होंने अपने आप में सोचा, “मुझे १ रुपया वापस कर देना चाहिए. इसे अपने पास रखना गलत होगा.” फिर उन्होंने सोचा, “अरे! छोड़ो, १ रुपया ही तो है. इतने से पैसे के लिए कौन परेशान होगा? ऐसे भी यह बस कंपनी वाले काफ़ी पैसे कमाते हैं. एक रूपया कम पड़ने से उनको कुछ फरक नहीं पड़ेगा. इसे चुपचाप ‘ईश्वर का इनाम ‘ मानकर स्वीकार कर लेता हूँ. दस्तूरजी चुप रहे और शहर के नज़ारे का आनंद लेते रहे.”

जब उनका ठहराव आया तो वह द्वार पर क्षणभर के लिए रुके. फिर कुछ सोचते हुए परिचालक की ओर मुड़े और उसे वह रुपया देते हुए बोले, ” ये लो, तुमने मुझे जयादा छुट्टा दिया था. ”

परिचालक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “आप ही शहर के नए दस्तूरजी है ना?”

उन्होंने जवाब दिया, “हाँ. ”

“आजकल आपकी काफी प्रशंसा सुनने में आ रही थी. मैं केवल देखना चाहता था कि आप अतिरिक्त छुट्टे से क्या करेंगे. ”

परिचालक के शब्दों ने दस्तूरजी को हिला कर रख दिया. बस से उतरते ही निकट के बिजली के खम्बे का सहारा लेते हुए स्वयं में फुफुसाए, “हे भगवान! मैंने एक रूपए के लिए अपना ज़मीर बेच ही दिया था. ”

सीख :

इसलिए मित्रों सतर्क रहें ! हमारा मन खेल खेलता है. सावधान रहें.

अपने विचारों पर ध्यान दें , वे शब्द बनते हैं.

अपने शब्दों पर ध्यान दें ,  वे कर्म बनते हैं.

अपने कर्मों पर ध्यान दें, वे आदतें बनते हैं.

अपनी आदतों  पर ध्यान दें, वे चरित्र बनते हैं.

अपने चरित्र पर ध्यान दें, वह किस्मत बनता है.

, जब भी हमारा मन प्रतिकूल या गलत विचारों की ओर जाता है, हमें उस पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए. गलत काम करने के बाद, हमारा अपराध हमें शान्ति से नहीं रहने देगा.