Archive | January 2019

राजा और आध्यात्मिक सूफ़ी

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     एक राजा ने एक आध्यात्मिक सूफ़ी को राजमहल में भोजन के लिए आमंत्रित किया. सभी आमंत्रित मेहमान उत्कृष्ट विद्वान थे. निर्धारित दिन राजा आमंत्रितगणों के साथ भोजन की मेज़ पर सूफ़ी का इंतज़ार कर रहा था.  सूफ़ी साधारण से कपड़े पहनकर आया. सूफ़ी को साधारण कपड़ों में देखकर राजमहल के संतरी उसे पहचान नहीं पाए और सूफ़ी को अंदर नहीं जाने दिया. फिर सूफ़ी जब उपयुक्त कपड़े पहनकर राजमहल गया तो उसका सही स्वागत किया गया. भोजन की मेज़ पर बैठने के बाद सूफ़ी ने अपना अँगरखा उतारा और उसे अपनी साथ की कुर्सी पर रख दिया.  जब खाना परोसा गया तब उसने भोजन अँगरखा को अर्पण किया. सभी उपस्थित मेहमानों को यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण व हास्यास्पद लगा. 

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    इस प्रकार का व्यवहार सूफ़ी जैसे विवेकी को शोभा नहीं देता था और सभी मेहमान आश्चर्यचकित थे. राजा ने सूफ़ी से पूछा कि वह एक अँगरखा जैसी निर्जीव वस्तु को खाना खिलने का मूर्खतापूर्ण व्यवहार क्यों कर रहा था? बुद्धिमान सूफ़ी ने तब जवाब दिया, “मुझे मेरी पोशाक, जो कि यह अँगरखा है, के कारण अंदर आने की अनुमति दी गई थी.  अतः इस अँगरखा का मुझसे अधिक मूल्य व सम्मान है. लोग पोशाक को अधिक मान्यता देते हैं, इस कारण मैं स्वयं को खाना खिलाने के बजाय इस पोशाक को खाना खिला रहा हूँ.”

    सारांश:

   मनुष्य अपने परिवार व भौतिक संपत्ति सहित आर्थिक संसार से जुड़ जाता है. उसे लगता है कि उसका परिवार व मित्र उससे प्रेम करते हैं.

      वह उनके लिए कठिन परिश्रम करता है और हर संभव सर्वश्रेष्ठ प्रयास करता है. जैसे वह वृद्ध होने लगता है और उसका शरीर निर्बल हो जाता है; उसे अहसास होता है कि लोग उससे उसकी संपत्ति के लिए प्रेम करते थे; कि वह उन्हें क्या दे सकता था. वह वास्तविकता में जो है, उसके लिए उसे कोई नहीं प्रेम करता है. तब मनुष्य भ्रान्ति से मुक्त होता है. मनुष्य को समझ में आता है कि जिन लोगों से उसे अपेक्षा थी कि वह उससे प्रेम करेंगे और उसकी भावनाओं का प्रत्युत्तर देंगे; वह ऐसा नहीं करते हैं. जीवन में उसे इस बात का अहसास बहुत देर से होता है. 

   अतः आदि शंकर  हमसे आग्रह करते हैं कि हमें इस सत्य का अहसास जीवन में पहले ही कर लेना चाहिए और दूसरों के प्रति अपना कर्तव्य प्रेम से निभाना चाहिए परन्तु उनमें आसक्त नहीं होना चाहिए. 

   इसके बदले प्रभु के नाम का गुणगान करने की आदत का विकास करना चाहिए. ईश्वर सदा हमारे साथ रहते हैं और कभी भी हमारा परित्याग नहीं करते हैं.

 Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com     

अनुवादक- अर्चना 

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