Archive | July 2017

माँ के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: आदर

एक नन्हा बालक अपनी माँ के साथ रहता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बालक बहुत ही रूपवान और अत्यंत बुद्धिमान था. समय के साथ-साथ वह बालक और भी अधिक आकर्षक व तीव्रबुद्धि होता गया. परन्तु उसकी माँ हमेशा उदास रहती थी.

एक दिन बालक ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, तुम सदा उदास क्यों रहती हो?”
माँ ने उत्तर दिया, “बेटा, एक ज्योतिषी ने एक बार मुझसे कहा था कि जिनके दाँत तुम्हारे जैसे होते हैं वह जीवन में बहुत विख्यात होते हैं.”
इस पर बालक ने पूछा, “अगर मैं प्रसिद्ध हो जाऊँगा तो क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा?”
“अरे, मेरे बच्चे! ऐसी कौन सी माँ होगी जो अपने बच्चे को प्रसिद्ध देखकर खुश नहीं होगी. मैं तो यह सोचकर उदास रहती हूँ कि जब तुम प्रसिद्ध हो जाओगे तब तुम मुझे भूल जाओगे.”

माँ की बात सुनकर लड़का रोने लगा. वह कुछ देर माँ के सामने खड़ा रहा और फिर घर से बाहर भाग गया. बाहर जाकर उसने एक पत्थर उठाया और अपने दाँतों पर ज़ोर से मारकर आगे के २ दाँत तोड़ दिए. पत्थर के प्रहार से दाँत टूटने पर उसके मुँह से खून बहने लगा.

उसकी माँ भागकर बाहर आई और अपने पुत्र की हालत देखकर दंग रह गई. माँ ने पूछा, “बेटा! यह तुमने क्या किया?”
माँ का हाथ पकड़कर बालक बोला, “माँ, अगर इन दाँतों से तुम्हें कष्ट पहुँचता है और अगर यह तुम्हारी उदासी का कारण हैं तो मुझे यह दाँत नहीं चाहियें. यह मेरे किसी काम के नहीं हैं. मैं इन दाँतों से विख्यात नहीं होना चाहता. मैं आपकी सेवा करके और आपके आशीर्वाद से प्रसिद्ध होना चाहता हूँ.”

दोस्तों, यह बालक और कोई नहीं बल्कि चाणक्य था.

सीख:
माता-पिता व बड़ों का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. हमारे माता-पिता हमसे निस्स्वार्थ प्रेम करते हैं. जो भी अपने माता-पिता से प्रेम करता है, उनका सम्मान करता है और उनकी सेवा करता है उन्हें माता-पिता का आशीर्वाद प्रचुरता में मिलता है जिसकी बदौलत वह सदा खुश रहते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

नदी पार करते हुए एक गुरु और शिष्य

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बूझ, मन पर नियंत्रण

एक वयोवृद्ध गुरु और उनका युवा शिष्य हिमालय से पैदल चलकर अपने आश्रम वापस लौट रहे थे. रास्ता काफ़ी लंबा था और वह इलाक़ा पहाड़ी होने के कारण वहाँ की सड़कें बेढंगी व कठिन थीं. आश्रम के रास्ते में उन्हें गंगा नदी का एक भाग पार करना था जहाँ पानी का प्रवाह तेज़ था परन्तु प्रचंड नहीं था.

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जब वह दोनों नदी के पास पहुँचे तब देखा कि वहाँ एक युवती बैठी हुई थी जिसका गाँव नदी के उस पार था. अकेले नदी पार करने में उसे डर लग रहा था और इस कारण नदी पार करने में सहायता के लिए वह गुरु के पास आई.

“अवश्य”, गुरु बोले और उसे अपनी बाहों में उठाकर सावधानीपूर्वक नदी के पार ले आए. सही समय पर मदद के लिए युवती ने गुरु को धन्यवाद दिया और अपने रास्ते चली गई. युवा शिष्य इस भाव प्रदर्शन से खुश नहीं था और उसका चेहरा विषादग्रस्त हो गया.

पहाड़ियों में कुछ समय और कठिन व थकाऊ सफर के बाद दोनों आश्रम पहुँचे. आश्रम लौटने के बाद भी युवक स्पष्ट रूप से व्याकुल था. युवक को बेचैन देखकर गुरु ने शिष्य से उसकी उत्तेजना का कारण पूछा.

शिष्य बोला, “गुरुदेव, किसी भी औरत को न छूने का हमने प्रण लिया है पर फिर भी आपने उसे अपनी बाहों में उठाया. हमें आप स्त्री के बारे में सोचने से भी मना करते हैं पर आपने उस स्त्री को छूआ.”

गुरु मुस्कुराये और शिष्य से बोले, “मैंने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की और उसे नदी के पार छोड़ दिया परन्तु तुम तो अभी भी उसे उठाए हुए हो.”

सीख:
गुरु से मिली शिक्षा से हमें उसमें निहित सन्देश पर ध्यान देना चाहिए. हमें शिक्षा का विश्लेषण करके उससे गलत समझ निकालकर स्वयं को उलझाना नहीं चाहिए.

अनुवादक- अर्चना