Archive | December 2017

एक मरते हुए व्यक्ति की चार पत्नियाँ

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: आध्यात्मिक रूप से सशक्त होना, अपनी वास्तविकता का अहसास होना

एक व्यक्ति की चार पत्नियाँ थीं. वह अपनी चौथी पत्नी से सबसे अधिक प्रेम करता था और उसके लिए सबसे अच्छी पोशाक खरीदता था. अपनी चौथी पत्नी के लिए वह सबसे सुन्दर और मनमोहक आभूषण खरीदता था और अपना सारा समय उसे रिझाने में व्यतीत करता था. कुल मिलाकर उसकी पत्नी उससे प्रेम करती थी और वह अपनी पत्नी से प्यार करता था.

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वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. तीसरी पत्नी भी उसे प्रिय थी और वह उसकी भी हर इच्छा पूरी करता था. यह तीसरी पत्नी उसकी ज़िन्दगी नियंत्रित करती थी.

वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. उसपर उसे पूरा विश्वास था और वह उससे अपनी हर व्यक्तिगत चीज़ के बारे में बात करता था. अपने जीवन के विषय में वह सदा अपनी दूसरी पत्नी से ही सलाह करता था.

लेकिन किसी कारणवश उसे अपनी पहली पत्नी से अनुराग नहीं था. इसके बावजूद उसकी पहली पत्नी उसकी मदद के लिए सदा उपस्थित रहती थी, वह बहुत सुशील थी और अपनी पति को खुश रखने की हर संभव कोशिश करती थी.

एक दिन वह व्यक्ति बहुत बीमार पड़ गया और उसे अहसास हुआ कि उसका अंत निकट है. उसने अपनी चारों पत्नियों को बुलाया और बोला, “मेरी ख़ूबसूरत पत्नियों! मेरा अंत अब निकट है पर मैं अकेला नहीं मरना चाहता हूँ. तुम में से कौन मेरे साथ आने को तैयार है? ”

उसने अपनी चौथी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो. मैंने तुमसे हमेशा प्यार किया है और तुम्हें हर सर्वश्रेष्ठ वस्तु दी है. मेरी मृत्यु अब निश्चित है तो क्या तुम मेरे साथ आओगी? क्या तुम मेरा साथ दोगी?” पत्नी ने बिना सोचे झट से ‘नहीं’ कहा और पीछे मुड़कर चली गई. अपनी प्रियतम पत्नी का जवाब सुनकर उसका दिल टूट गया.

उदास मन से उसने अपनी तीसरी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “मेरा अंत निकट है, क्या तुम मेरे साथ चलोगी?” इस पर तीसरी पत्नी बोली, “बिलकुल नहीं. तुम्हारे जाते ही, मैं किसी और के साथ चली जाऊँगी.” फिर वह भी पीछे मुड़कर चली गई.

इसके बाद अपनी दूसरी पत्नी को बुलाकर उसने एक बार पुनः वही प्रश्न दोहराया. दूसरी पत्नी बोली, “मुझे दुःख है कि आपका अंत निकट है पर मैं केवल शमशान तक ही आपके साथ आ सकती हूँ. वहाँ तक मैं आपके साथ रहूँगी.” फिर पीछे मुड़कर वह भी अपनी जगह पर जाकर खड़ी हो गई.

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तभी पीछे से एक आवाज़ आई, “मैं आपके साथ आऊँगी.” उसने अपनी पहली पत्नी की ओर देखा और दुखी मन से बोला, “मेरी प्रियतमा, मैंने तुम्हारी ओर कभी ध्यान नहीं दिया, तुम कितनी कमज़ोर दिखती हो. अब जब मेरे जीवन का अंत आ गया है, मुझे अफ़सोस है कि मैं पहले समझ नहीं पाया कि तुम मुझे हर किसी से अधिक प्रेम करती हो. मुझे इस बात का बहुत खेद है कि मैंने हर समय तुम्हारी उपेक्षा की है.” ऐसा कहकर उस व्यक्ति का देहांत हो गया.

इस कहानी में चौथी पत्नी शरीर व उसकी तृष्णा का प्रतीक है जिसे मृत्यु के पश्चात हम खो देते हैँ. तीसरी पत्नी धन-दौलत का प्रतीक है जो हमारे शरीर छोड़ने पर दूसरों को मिलती है. दूसरी पत्नी हमारा परिवार व मित्र हैँ जो केवल शमशान घाट तक ही हमारे साथ आ सकते हैँ. पहली पत्नी जीवात्मा को दर्शाता है जो अप्रत्यक्ष होते हुए भी सदा हमारे साथ होती है. यद्यपि हमारी जीवात्मा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व प्रिय है परन्तु फिर भी हम उस पर ध्यान नहीं देते हैँ और इस बात का अहसास हमें जीवनकाल के अंत में होता है.

सीख:
शाश्वत सत्य यह है कि हम ‘शरीर’ नहीं जीवात्मा हैँ, जो जन्म व मृत्यु के परे है. ज़िन्दगी भर हम उन सभी अनावश्यक चीज़ों को महत्त्व देते रहते हैं जो निरर्थक व अस्थायी हैं. हमें अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान देकर अपने जीवन को श्रेष्ठतर बनाने की चेष्ठा करनी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

भगवान् राम से पत्र

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुकम्पा, सभी में भगवान् को देखना

शिवानी की डाक पेटी में आज एक ही पत्र था. उसने पत्र उठाया और उसे खोलने से पहले लिफ़ाफ़े पर एक नज़र घुमाई. आश्चर्यचकित शिवानी ने एक बार पुनः लिफ़ाफ़े को जाँचा. लिफ़ाफ़े पर कोई भी टिकट या डाक-घर की मुहर नहीं थी. उसपर केवल शिवानी का नाम व पता लिखा हुआ था.

शिवानी ने झटपट पत्र पढ़ा:

“प्रिय शिवानी: शनिवार की दोपहर मैं तुम्हारे मुहल्ले में आने वाला हूँ और मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ.

सप्रेम, भगवान् राम.”

शिवानी ने काँपते हुए हांथों से पत्र मेज़ पर रखा और सोचने लगी, “भगवान् मुझसे मिलने क्यों आना चाहते हैं? मैं तो बहुत ही साधारण से महिला हूँ. मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है.”

मन में इस प्रकार के विचार लिए वह अपनी रसोईघर की खाली अलमारियों के बारे में सोचने लगी.

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“हे भगवान्! मेरे पास तो आपको देने के लिए वास्तव में कुछ भी नहीं है. मुझे झटपट दुकान से कुछ खाने के लिए खरीदकर लाना होगा.”

उसने अपना बटुआ खोला और पैसे गिनने लगी- २० रूपए और ५० पैसे.

“चलो, कम से कम मैं डबल रोटी और सब्ज़ी खरीद सकती हूँ.”

शिवानी ने जल्दी से कोट पहना और दुकान के लिए निकल पड़ी. एक पाव रोटी, कुछ सब्ज़ियाँ और दूध का एक डिब्बा खरीदने के बाद उसके पास मात्र ३० पैसे ही शेष बचे थे. उसे सोमवार तक इन्हीं पैसों से काम चलाना था. फिर भी वह खुश थी. अपनी खरीदारी का सामान उसने हाथ में लिया और मंद-मंद मुस्कुराते हुए घर वापस जाने लगी.

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“अरे भद्र महिला, क्या तुम हमारी मदद कर सकती हो?”
शिवानी खाने की परियोजना में इतनी तल्लीन थी कि गली में सिमट कर बैठे दो व्यक्तियों पर इसका ध्यान ही नहीं गया. एक पुरुष और एक महिला गली के एक कोने में बैठे हुए थे और दोनों ने फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे.

“महोदया, मेरे पास नौकरी नहीं है. अपनी पत्नी के साथ मैं इसी गली में रहता हूँ. सर्दी का मौसम शुरू हो गया है और हम दोनों को बहुत भूख भी लगी हुई है. अगर आप हमारी मदद करेंगीं तो हम आपका बहुत आभार समझेंगें.”

शिवानी ने दोनों को ध्यान से देखा. दोनों मलिन थे और उनके पास से गन्दी बदबू आ रही थी. शिवानी को विश्वास था कि यदि वह पति-पत्नी चाहते तो किसी प्रकार का काम करके कुछ पैसे कमा सकते थे.

“भाईजी, मैं अवश्य ही आपकी मदद करना चाहती हूँ पर मैं स्वयं भी एक गरीब महिला हूँ. मेरे पास सिर्फ कुछ सब्ज़ियाँ, पावरोटी और दूध है. आज रात मेरे घर खाने पर एक महत्वपूर्ण अतिथि आने वाला है और यह खाना मैं उसी के लिए ले जा रही हूँ. ”

“कोई बात नहीं, बहनजी. मैं समझता हूँ. आपका फिर भी धन्यवाद.”

उस आदमी ने अपनी पत्नी के कन्धों पर हाथ रखा और दोनों अपनी गली की ओर लौटने लगे. दोनों को वापस जाते देख, शिवानी के हृदय में दर्द की एक लहर सी उठी. वह भाग कर उनके पास गई और उस व्यक्ति को अपना किराने का सामान सौंप दिया.

“धन्यवाद, बहनजी. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! हम तहे दिल से आपके आभारी हैं.”
उस व्यक्ति की पत्नी को भी धन्यवाद कहते सुन, शिवानी की निगाह उस पर पड़ी. वह महिला स्पष्ट रूप से काँप रही थी.

“मेरे पास एक और कोट है. यह लो, तुम इसे रख लो.”
शिवानी ने अपना कोट उतारा और उस महिला के कंधों पर डाल दिया. फिर वह मुस्कुराते हुए मुड़ी और घर वापस लौटने लगी….. अब उसके पास न तो कोट था और न ही अपने अतिथि को खिलाने के लिए खाना.

जब तक शिवानी अपने घर के सामने वाले दरवाज़े तक पहुँची, वह ठिठुर रही थी और बेहद चिंतित थी. स्वयं प्रभु राम उसके घर पधारने वाले थे और उसके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं था.
दरवाज़े की चाभी निकालने के लिए जब वह अपना बटुआ टटोल रही थी तब उसकी निगाह डाक-पेटी में पड़े एक लिफ़ाफ़े पर पड़ी.
“बड़ी अजीब बात है. आम तौर पर डाकिया एक दिन में एक बार ही आता है.”

शिवानी ने डाक-पेटी में से लिफ़ाफ़ा निकला और उसे खोलकर पढ़ने लगी:
“प्रिय शिवानी: तुम्हें एक बार पुनः देखकर अच्छा लगा. आनंददायक खाने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. उस ख़ूबसूरत कोट के लिए भी तुम्हारा धन्यवाद.
सप्रेम- भगवान् राम. “

यद्यपि हवा में ठंडक थी और शिवानी ने कोट नहीं पहना हुआ था पर फिर भी उसे ठंड महसूस नहीं हो रही थी. उसकी आँखें ख़ुशी के आँसू बहा रहीं थीं और भगवान् राम का पत्र लेकर वह स्तंभित खड़ी हुई थी.

सीख:

मानव सेवा माधव सेवा होती है. ईश्वर की सृष्टि में हमें सर्वत्र ईश्वर को देखने का प्रयास करना चाहिए, सबसे प्रेम करना चाहिए और अवसर मिलने पर सबकी सेवा करनी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

कृष्ण के प्रति द्रौपदी की भक्ति- नाम स्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुराग, श्रद्धा

द्रौपदी, पांडवों की पत्नी थी. भगवान् कृष्ण ने द्रौपदी को कई बार अपमान व निरादर से बचाया था. भगवान् कृष्ण की पत्नियाँ, सत्यभामा और रुक्मिणी, अक्सर अचंभित होती थीं कि भगवान् , द्रौपदी की इतनी मदद क्यों करते थे और उसपर इतना अनुग्रह क्यों बरसाते थे.

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उनकी शंका दूर करने के लिए एक दिन कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी से कहा कि वह दोनों उनके साथ द्रौपदी के घर चलें.

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जब वह द्रौपदी के घर पहुँचे तब द्रौपदी स्नान करने के पश्चात अपने बाल सँवार रही थी. कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को बाल बनाने में मदद करें. यद्यपि सत्यभामा और रुक्मिणी क्रुद्ध थीं पर फिर भी उन्होंने कृष्ण की आज्ञा का पालन किया. द्रौपदी के एक-एक बाल से ‘कृष्णा, कृष्णा’ का निरंतर गुणगान सुनकर दोनों को बहुत ही आश्चर्य हुआ और तब उन्हें अहसास हुआ कि द्रौपदी सही मायने में कृष्ण के अनुग्रह की अधिकारी थी. कृष्ण का नाम द्रौपदी के रोम-रोम में व्याप्त था. कृष्ण के लिए उसकी ललक और भक्ति तथा उनके प्रति प्रेम से उसका अस्तित्व पूरी तरह भरा हुआ था. अपने इस भक्त की दिली श्रद्धा को पुरस्कृत करने के लिए भगवान् कृष्ण बाध्य थे. नामजप की इस सहज साधना के माध्यम से द्रौपदी ने प्रभु के साथ निरंतर संसर्ग प्राप्त किया था.

सीख:

कलयुग में ईश्वर के नाम का सतत जाप सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक अभ्यास है. ईश्वर के नाम का निरंतर गुणगान प्रचुर अनुग्रह व प्रेम सुनिश्चित करता है. ईश्वर को प्राप्त करने का यह सबसे अच्छा तरीका है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक – अर्चना